Thursday, January 9, 2014

अरविन्द केजरीवाल और "आप" का उदय इतिहास की पुनरावृति ही तो नहीं !!

अरविन्द केजरीवाल और  "आप" का उदय इतिहास की पुनरावृति ही तो नहीं है !! ये सवाल  भाई कश्यप किशोर मिश्र  का लेख पढ़ कर लगा. आपातकाल और राजनीतिक विकल्पहीनता की सतह से उठी कई पार्टियां भाप हो चुकी हैं तो कईयों की शक्ल पुरनियों जैसी हो गयी है. उन पार्टियों और उनके नेताओं में खून की जगह बेशर्मी का पानी बहने लगा है और खाल पर ढिठाई की परत चढ चुकी है. ये लेख इसलिए भी साझा कर रहा हूँ क्योंकि ये बखूबी दीखता है कि कैसे देश में कांग्रेस ने कई उभरती हुई पार्टियों को विरोध करके नहीं बल्कि उनका समर्थन करके खतम कर दिया. 


हिन्दू-मुस्लिम एका’ के प्रतीक पुरुष माने जाने वाले जिन्ना को जब कांग्रेस में गाँधी के सामने अपना छोटा होता कद स्वीकार नहीं हुआ, तो उन्होंने राजनीति से संन्यास ले लिया. राजनीति से ज़िन्ना का यह संन्यास अपने आप में स्पष्ट करता था कि ज़िन्ना की राजनीति ‘व्यक्तिवादी’ थी और उनको अपनी समाजसेवा की मेहनत का ईनाम चाहिए था.
एक अंतराल के बाद ज़िन्ना अपनी दुरभसंधियों के साथ वापिस आये और ‘मुसलमान एक अलग कौम’ की अलग तान छेड़ बैठे. पता भी न चला और बस एक दशक के भीतर ज़िन्ना के पीछे-पीछे चला समूह एक अलग कौम पाकिस्तान बन गया. इस धुन के फ़रेब से जबतक पाकिस्तानी भाइयो की आँख खुलती, तबतक दो कौमियत के उसूल को तमाचा लगाते पाकिस्तान से एक अलग मुल्क बांग्लादेश बन चुका था.
ऐसा नहीं है, कि ज़िन्ना का पाकिस्तान किसी बहुत सोच-विचार का नतीज़ा था. ज़िन्ना की कल्पनाओं में जहाँ एक तरफ सदर-ऐ-मुल्क होने का ख़्वाब था, तो दूसरी तरफ अपने सप्ताहांत की छुट्टियाँ बम्बई के अपने बंगले में बिताने जैसा एकदम विरोधी ख्याल भी शामिल था.
अपने ख़्वाब की तामीर के पहले उदबोधन की बिना पर तो ज़िन्ना का पाकिस्तान, नेहरू के हिंदुस्तान के मुकाबले कई गुना ज्यादा सेकुलर होने वाला था, पर विमान से जब उन्होंने शरणार्थियों के हूजूम देखे, तो सिर पकड़ बैठ गए और बस उनके मुंह से यही निकला ‘हे भगवान् ! मैंने ये क्या कर दिया’. बीमारी के दौरान ज़िन्ना ने अपने चिकित्सक से पाकिस्तान को अपनी ज़िन्दगी की हिमालयी भूल कहा था. कम से कम ज़िन्ना, ईमानदार थे कि उन्होंने ख़ुद को गलत माना.
इधर आज़ादी के साथ ही नेहरू ने 'ट्राईस्ट विथ डेस्टिनी' के राग में आम आवाम को झूमाना शुरू किया और निर्गुट आन्दोलन के जरिये अपने लिए एक विश्व-नागरिक की पहचान का ईनाम ढूढने चल दिए. नेहरू के सपनों का ‘अंतिम अंग्रेज’ बस भारतीयों के ही नहीं, बल्कि दुनिया के दिलों पर राज करना चाहता था, पर भारत पर चीन के हुए हमले ने, नेहरू के फ़रेबी-राग को भंग कर दिया और सामान्य भारतीय जनता मानो सोते से जाग गयी. जनता की प्रतिक्रिया आये, इसके पहले नेहरू की मौत हो गई.
लालबहादुर शास्त्री ने अपने छोटे से कार्यकाल में पाकिस्तान को युद्ध में मात दी और युद्ध में जीती जमीन समझौते की मेज पर हार आये. समझौते के तुरंत बाद ताशकंद में ही शास्त्री जी की मौत हो गई और इंदिरा गाँधी परिदृश्य पर उभर आयीं. गूंगी गुड़िया इंदिरा के लिए जोड़-तोड़ का काम कामराज ने किया था.
अपने चौदह महीने के शासन के साथ इंदिरा गाँधी चौथी-लोकसभा के चुनाव का सामना कर रही थी. कांग्रेस के आतंरिक झगड़ो से आम आदमी ऊबा हुआ था. जर्जर अर्थव्यवस्था जहाँ हिंदुस्तान के मध्यम वर्ग की थाली पर असर डाल रही थी, तो निरंतर रुपये के अवमूल्यन से पैदा हुई महंगाई गरीबों को बदहाल कर रही थी. उत्तर पूर्व में मिजो आदिवासी असंतोष बगावत की शक्ल अख्तियार कर रहा था, तो मजदूर अपनी मजदूरी काम के घंटों और सुविधाओं के लिए आंदोलनरत थे.
पंजाब में भाषाई और धार्मिक अलगाववाद उभार पर था और इन सब पर भारी अकाल ने आम-आदमी के असंतोष को उभार दिया. अत्यंत सीमित विकल्पों के बाद भी भारत की जनता ने नीचले सदन में कांग्रेस से 60 सीटें छीन लीं और विधानसभा चुनावों में बिहार, केरल, उड़ीसा, मद्रास, पंजाब और पश्चिम बंगाल से कांग्रेस की सत्ता जाती रही.
अब यह ज़रूरी था कि गूंगी गुड़िया रही इंदिरा गाँधी खुलकर सामने आये. उन्होंने सबसे पहले अपने शुरू से ही मुखर विरोधी रहे, मोरारजी भाई देसाई को नवम्बर-69 में अनुशासनहीनता का आरोप लगाते कांग्रेस से निकाल बाहर किया. कांग्रेस दो हिस्से में बंट गयी, कांग्रेस (ओ) और कांग्रेस (ई).
किसी राजनीतिक दल के साथ संगठन वाद या विचार से इतर किसी व्यक्ति का इस तरह महत्वपूर्ण हो उठना उस वक़्त तक भारतीय राजनीति में ज़िन्ना के बाद व्यक्तिवाद का पहला उदाहरण था. इंदिरा का उभार किसी भी लिहाज से एक अत्यंत दुर्लभ राजनीतिक घटना थी, क्योंकि भारतीय राजनीति में बिना किसी वाद, विचार या संगठन के एक व्यक्ति का किसी दल को इस तरह हथिया लेना इसके पहले कभी नहीं हुआ था.
इंदिरा ने कांग्रेस-संगठन से अलग होकर कांग्रेस (ई) बनाई. यह व्यक्तिवाद की पराकाष्ठा थी और उससे एक कदम आगे जाते हुए, जैसे ख़ुद की कांग्रेस को ही मूल कांग्रेस की तरह स्थापित करने में सफल रही उसने भारतीय राजनीति में ‘चारण युग’ का सूत्रपात किया.
इंदिरा अब चतुराई से राजनीति करना सीख चुकी थी. उन्होंने एक साल अल्पमत की सरकार चलाई और दिसंबर-70 में एक साल पहले ही मध्यावधि चुनाव का शंख फूंक दिया. देश का एक बड़ा वर्ग अत्यंत निर्धन था. अपनी बदहाली के लिए वह सत्ता के विरुद्ध कोई प्रतिक्रिया करता उसके पहले ही इंदिरा ने उनके लिए अत्यंत ‘श्रुति-सुखकर’ नारा ‘गरीबी-हटाओ’ का ईजाद कर लिया.
बस इस एक अकेले नारे के साथ इंदिरा चुनाव में कूद पड़ी और जनता को भरमाने में भी सफल रहीं. चौथी लोकसभा की 283 सीटों के मुकाबले इंदिरा के पांचवी लोकसभा में 352 सांसद थे. इस बढ़त ने इंदिरा को प्रचंड आत्मविश्वास से भर दिया. दिसंबर-71 में बांग्लादेश मुक्ति संग्राम की विजय ने इंदिरा की छवि लौह महिला की बना दी.
पर इन सबका कोई भी फ़ायदा भारत की जनता को नहीं मिल रहा था. उल्टे युद्ध की भारी लागत, तेल की बढती कीमतों और घटते औद्योगिक उत्पादन ने लोगों का जीना मुहाल कर दिया था. पर इंदिरा अब जनता को बहलाना सीख चुकी थी. उनकी भंगिमायें और कार्य भावनात्मक तौर पर जनता पर असर करते थे. उन्होंने भारतीय जनता को आत्ममुग्ध करने की कसरत शुरू कर दी.
वो एक तरफ भारतीय जनता को कभी परमाणु-विस्फोट से तो कभी प्रिवी-पर्स की समाप्ति और बैंकों के निजीकरण से बहला लिए जा रही थीं, तो दूसरी तरफ एक-एक कर अपने विरोध में उठने वाली हरेक आवाज को दबाती भी जा रही थी. अब इंदिरा किसी भी विरोध से बेपरवाह एक निर्विघ्न शासक बन गयी थी, जहा प्रतिरोध के स्वर नगण्य थे.
पर इन सबसे अलग, इलाहाबाद उच्च-न्यायालय के एक अकेले फ़ैसले ने इंदिरा के आधिपत्य को चुनौती दे दी. 12 जून 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने चुनावी भ्रष्टाचार के आधार पर इंदिरा के 1971 के चुनाव को अवैध ठहरा दिया. इंदिरा अब तक बेलगाम हो चुकी थीं. उनकी मनःस्थिति एक लोकतंत्र के प्रधान की बजाय एक राजतंत्र वाले राजा की हो चुकी थी, जिसकी ख़ुद की सनक की कीमत भी उसके प्रजा को चुकानी पड़ती थी.
इंदिरा ने मध्यकाल के राजाओं वाली सनक का परिचय देते हुए बजाय इस्तीफ़ा देने के 26 जून को आपातकाल की घोषणा कर दी और पूरे विपक्ष को जेल में डाल दिया. यह सबकुछ इतना त्वरित और अकल्पनीय था कि इसकी खबर जनता को सुबह के समाचार से मिली.
आपातकाल के इक्कीस महीने, देश की जनता को अपने मताधिकार के सूझ-बूझ से इस्तेमाल करने के सबसे बड़े सबक थे. सारे नागरिक अधिकार समाप्त कर दिए गए. यह भारत के लोकतंत्र के सबसे अँधेरे दिन थे जब एक तरफ इंदिरा का अमर्यादित व्यवहार किसी तानाशाह की तरह का था, तो दूसरी तरफ उनके पुत्र संजय गाँधी, वस्तुतः दूसरे सत्ता ध्रुव बन गए थे, इन सबसे इतर संजय का एक चारण-भाट दल अत्यंत प्रभावी हो चुका था.
संजय का चापलूस और चारण यह दल एक से एक अमर्यादित कृत्य करता रहता. उस वक़्त सत्ता में प्रभावी रहा दल-बल लूट के हर मौके और तरीके को बड़ी ही निर्लज्जता से अमल में ला रहा था. भारतीय लोक ने अपनी बेबसी की जो वीभत्सतम कल्पना की थी, यह काल उससे भी वीभत्स था. 21 मार्च 1977 को आपातकाल समाप्त हुआ और इंदिरा गांधी ने लोकसभा भंग कर चुनाव कराने की सिफारिश कर दी।
जनता ने इंदिरा और उनके दल बल को करारा जबाब दिया और इंदिरा के विरोध में बने जनता पार्टी को अपना विश्वास सौपते हुए सत्ता सौप दी. मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने. जनता पार्टी को भारत की जनता ने सिर्फ सत्ता ही नहीं, अपने विश्वास की थाती भी सौपी थी.
उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब, हरियाणा और दिल्ली से कांग्रेस का एक भी उम्मेदवार विजयी नहीं हुआ. ख़ुद इंदिरा गांधी रायबरेली से चुनाव हार गयीं और कांग्रेस के मात्र 153 सांसद लोकसभा में पहुंचे. यह एक भयानक पराजय थी और विरोधी दलों की प्रचंड विजय भी.
भारतीय जनता, जिसका अहम् आपातकाल में बुरी तरह रौंदा गया था, ने कांग्रेस के सिर्फ उन्ही चेहरों को लोकसभा की राह दिखाई थी, जिसे उसने इंदिरा की व्यक्तिवादी और उन्मक्त राजनीति से इतर समझा था. जनता इंदिरा से इतनी बिफरी हुई थी कि जिसने भी इंदिरा का विरोध किया या इंदिरा द्वारा आपातकाल में प्रताड़ित हुआ उसे विजयी बना दिया.
जनता ने बड़े हुमक के साथ इंदिरा को बेदखल कर के यह प्रमाणित करने की कोशिश की कि ‘लोकतंत्र का राजा लोक होता है, तंत्र के शीर्ष पर बैठे लोग नहीं और शीर्ष पर बैठे लोग लोकजीवन से जुड़े हितों के प्रहरी मात्र होते हैं.’
जून 75 की शुरुआत में जयप्रकाश नारायण ने सम्पूर्ण क्रांति का नारा दिया था. जयप्रकाश नारायण जिन्हें जेपी भी कहा जाता था, के साथ पूरा बिहार हुंकार भर के खड़ा हो गया. जून के अंत में इंदिरा ने आपातकाल लगा दिया और जेपी को गिरफ्तार कर लिया, पर सम्पूर्ण क्रांति के स्वर दबाने में वह असफल रही.
जनता पार्टी के सूत्रधार जेपी थे, पर अधिक उम्र और अस्वस्थता की वजह से उनका सक्रिय रहना कठिन था, लिहाजा खूब सारी रार, मान मनौअल के बाद मुरारजी देसाई ने जनता पार्टी के प्रधानमंत्री के तौर पर मार्च-77 के अंत में शपथ ग्रहण की. प्रधानमंत्री पद के दूसरे दावेदार और प्रधानमंत्री की कुर्सी न मिलने से खफा चौधरी चरण सिंह उप-प्रधानमंत्री बने.
जनता पार्टी की सरकार तो बन गयी, पर स्थिति ‘मुंडे-मुंडे मतिभिन्ना’ की थी. सरकार बन जाने के बाद जनता पार्टी से जुड़े लोग अपना हित देख रहे थे, जबकि मोरारजी देसाई कायदे के बड़े सख्त थे, उनके भीतर प्रशाशनिक सख्ती भी बहुत थी, साथ ही वो एक बेलाग-लपेट बात करने वाले आदमी थे. लिहाजा सरकार बनने के साथ ही गुटबाजी और आपसी खींचतान नज़र आने लगी. जनता ने बड़े भरोसे से जनता पार्टी के हाथ में शासन की बागडोर सौपी थी, पर सरकार एक तमाशा बन गई थी.
जनता इस तमाशे से विचलित थी, पर जनता पार्टी से जुड़े लोग अड़ियल रुख से काम कर रहे थे, यहाँ तक कि जनता पार्टी ने शासन में आते ही उन नौ राज्यों में जहाँ कांग्रेस की सरकार थी, उन्हें भंग कर दिया और वहां चुनाव की घोषणा कर दी. यह अत्यंत असंवैधानिक, अलोकतांत्रिक और गलत निर्णय था, पर जनता पार्टी सारी आलोचनाओ को दरकिनार कर अपने रुख पर कायम रही.
कांग्रेस भी चुप नहीं बैठी थी, उसने चौधरी चरण सिंह और हेमवती नंदन बहुगुणा जैसे लोगों को तोड़ना शुरू कर दिया कांग्रेस की धुर विरोधी जनसंघ ने जनता पार्टी में अपना विलय कर लिया था, पर उसकी एक इकाई ‘आरएसएस’ जो राजनीतिक दल के रूप में पंजीकृत नहीं थी, अपने अस्तित्व को कायम रखे हुए थी. पूर्ववर्ती जनसंघ के सदस्यों के ‘आरएसएस’ से सम्बन्ध के मुद्दे को चरण सिंह ने हवा देना शुरू किया और इसी मुद्दे पर चरण सिंह ने जनता सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया.जनता अवसरवादिता के इस निकृष्ट उदाहरण की बेबस गवाह बनने को मजबूर थी.
जिस कांग्रेस विरोध में उसने जनता पार्टी को अपना मत दिया, उसी का एक हिस्सा बड़ी ही बेशर्मी से चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाने का दावा कर रहा था. चौधरी चरण सिंह अवसरवादिता के इस घटिया गठजोड़ के प्रधानमंत्री बने और यह सरकार पांच महीने तक चली, जिसमें चौधरी चरण सिंह कभी संसद नहीं गए.
आम जनता के साथ यह करारा विश्वासघात था. जनता ने समाजवाद और राष्ट्रवाद के जिस घालमेल को नजरअंदाज कर, लोकद्रोही इंदिरा को हरा जनता पार्टी को अपना विश्वास सौंपा था, उस विश्वास की जनता पार्टी के धड़े अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं और अंतरविरोधों की खुलेआम अभिव्यक्ति से खिल्ली उड़ा रहे थे.
दूसरी तरफ अपने खिलाफ़ चल रहे आक्रामक जाँच के तेवरों से इंदिरा फिर से सहानुभूति का पात्र बन रही थी. इंदिरा जनता पार्टी के नेताओं के मुकाबले कई गुणा ज्यादा चतुर थी. उन्होंने जनता पार्टी के नेताओं की फूहड़ता का पूरा फ़ायदा उठाया और पांच महीने बाद चरण सिंह की सरकार से समर्थन वापस ले लिया.
भारतीय जनता के पास अब कोई विकल्प नहीं था. इंदिरा के रूप में एक अकेला चरित्र था, जो मजबूत सरकार दे सकता था और सातवें आम चुनाव में इंदिरा कांग्रेस ने 350 जबकि जनता पार्टी ने 32 सीट प्राप्त कीं. जनता पार्टी ने भारतीय जनता से तगड़ा विश्वासघात किया था और वह अपने को मूर्ख बना महसूस कर रही थी.
इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद अंतरिम प्रधानमंत्री बने ‘मि. क्लीन’ राजीव गाँधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने भारी बहुमत से जीत हासिल की और 409 लोकसभा सीटों के प्रचंड बहुमत से वह सत्ता में आई. पर राजनीति में अनुभवहीन राजीव गाँधी पार्टी के भीतर चल रहे भितरघात और गुटबाजी से निबटने में इंदिरा की तरह सक्षम नहीं थे.
राजीव को अभी राजनीति के प्रारम्भिक पाठ भी सीखने थे और उनका पाला बड़े ही घाघ राजनीतिज्ञों से था. कांग्रेस के भीतर का ही एक गुट राजीव की कैम्ब्रीज की पढाई और आम आदमी से जुडाव न होने की ख़बरे उड़ाया करता. राजीव युवा थे और उस वक़्त भारतीय उपमहाद्वीप की भू-राजनीतिक परिस्थितियां जटिल थी.
राजीव ने मालदीव में सत्ता-पलट की एक कोशिश नाकाम की और वाहवाही लूटील, पर तमिल समस्या उनके गले की फांस बन गयी. आपरेशन ब्रास ट्रैक्स के जरिये पाकिस्तान पर दबाव बनाया, तो बोफ़ोर्स का जिन्न उछल कर सामने आ गया. राजीव पर उसके ही मंत्रिमंडल के सहयोगी विश्वनाथ प्रताप सिंह आक्षेप करने लगे.
एक तरफ सहयोगियों का आक्षेप तो दूसरी तरफ राष्ट्रपति जैल सिंह से मनमुटाव की खबरों के बीच राजीव ने अपने राजनीतिक जीवन की भयानक भूल की. राजीव ने प्रेस-अध्यादेश लाकर अखबारों की स्वतंत्रता सिमित करने की कोशिश की, जिसे चौतरफ़ा विरोध के बाद उन्होंने वापस ले लिया. पर प्रेस उनका विरोधी हो चुका था.
अखबारी जगत ने राजीव को खलनायक बना दिया और मंत्रिमंडल से बर्खास्त किये जाने के बाद कांग्रेस और लोकसभा में अपनी सदस्यता से इस्तीफा देकर, अरुण नेहरू और आरिफ मोहम्मद खान के साथ जन मोर्चा नाम से अपना दल बनाकर राजीव विरोध की राजनीति कर रहे ‘विश्वनाथ प्रताप सिंह’ को जननायक बनाकर पेश कर दिया.
जनता विश्वनाथ प्रताप सिंह और मीडिया की जुगलबंदी को समझ नहीं पाई और एक बार फिर फ़रेब का शिकार हुई. अखबारों ने ‘वीपी सिंह’ की ‘राजा नहीं फ़कीर’ की छवि गढ़ दी और राजीव की छवि बोफ़ोर्स के दलाल की गढ़ दी गई. वीपी एक मंझे हुए राजनीतिज्ञ थे, उनके मुकाबले राजीव अनाड़ी थे. विश्वनाथ प्रताप सिंह ने जान-बूझकर इस अफवाह को हवा दी कि उनके पास बोफ़ोर्स मामले से जुडी एक ऐसी फाइल है, जिससे राजीव का राजनीतिक जीवन तबाह हो जायेगा.
वीपी अपनी जनसभाओं में एक पॉकेट डायरी निकालते और दावा करते इस डायरी में बोफ़ोर्स से जुड़े खातों और व्यक्तियों के नाम के विवरण मौजूद हैं और वह उन्हें बेनकाब करके रहेंगे. वीपी का यह दावा बाद में सफ़ेद झूठ निकला, उनके पास ऐसी कोई जानकारी नहीं थी और वे आम जनता को धोखा दे रहे थे. जनता वीपी सिंह के फ़रेब का शिकार हुई और उसने एक झूठ बोलकर फ़रेब गढ़ रहे आदमी को भारत का प्रधानमंत्री बनने का मौका दे दिया.
वीपी सिंह बोफ़ोर्स से जुडा कोई दावा सामने नहीं ला सके. उनके कार्यकाल की दो प्रमुख स्मृतियाँ बीजेपी का उभार और मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू करना रही. वीपी की मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू करने की काट बीजेपी ने रथयात्रा से करने की कोशिश की, जिसका अंत सरकार से बीजेपी के समर्थन वापसी के रूप में सामने आया.
वीपी सिंह के पास विश्वास मत हारने के बाद कोई चारा नहीं बचा. उन्होंने नवम्बर-90 में इस्तीफ़ा दे दिया. कांग्रेस ने, 64 सांसदों के साथ जनता दल से अलग हो गए चंद्रशेखर की समाजवादी जनता पार्टी को बाहर से समर्थन देकर सरकार बनवाई, जो मार्च-91 के शुरू तक चली. कांग्रेस विरोध के नाम पर आये चंद्रशेखर अपने दल के साथ कांग्रेस के समर्थन से सरकार चला रहे थे और देश की जनता इस विडंबना की मूक गवाह बने रहने को मजबूर थी.
दसवें आम चुनाव के दौरान राजीव गाँधी की हत्या हुई और 232 सीटों के साथ कांग्रेस ने पीवी नरसिंहराव के नेतृत्व में अल्पमत सरकार बनायी. यह सरकार लगातार घोटालों के आरोप में रही. विश्वास मत पाने के लिए इस सरकार पर सांसदों की ख़रीद-फ़रोख्त के आरोप लगे, जो कालांतर में सही साबित हुए और कुछ करने की बजाय यह सरकार कुछ न करने के लिए ज्यादा जानी गई.
इसी सरकार के दौरान अयोध्या में विवादित ढांचा ढहाया गया. यह आरोप लगे कि विवादित ढांचे को ढहाने में नरसिंह राव की मूक सहमति थी. ग्यारहवें आम चुनाव के बाद संसद त्रिशंकु थी. सबसे पहले बीजेपी के अटल बिहारी वाजपेयी ने मई में प्रधानमंत्री का पद सम्भाला और तेरह दिनों के भीतर उन्हें इस्तीफ़ा देना पड़ा, जिसके बाद जनता दल के नेता देवेगौड़ा ने जून में संयुक्त मोर्चा गठबंधन की सरकार बनाई.
यह सरकार 18 महीने चली और अंत में एक बार फिर से जनता ने देखा कि बीस बरस भी पूरे नहीं हुए और इस छोटी सी समयावधि में कांग्रेस विरोध के नाम पर चुने लोगों की सरकार को कांग्रेस तीसरी बार समर्थन दे रही थी. कांग्रेस के बाहरी समर्थन से, देवेगौड़ा के विदेश मंत्री इंद्रकुमार गुजराल ने प्रधानमंत्री के रूप में अप्रैल 1997 में पदभार संभाला, जो नवम्बर-97 तक चली.
बाद के छः वर्ष तक बीजेपी का शासन रहा जिसमे बारहवें और तेरहवें लोकसभा चुनाव के साथ साथ वाजपेयी की पहले तेरह महीने और फिर पांच साल का शासन शामिल था. लोकसभा के चौदहवें आम चुनाव के साथ कांग्रेस की सत्ता में वापसी हुई. तमाम नाटकीय घटनाक्रम के बाद मनमोहन सिंह देश के प्रधानमंत्री बने, पर शुरूआती उम्मीद जगाने के बाद कुल मिलाकर उन्होंने जनता को निराश ज्यादा किया.
इसी निराशा के माहौल में अन्ना हजारे लोक जीवन के प्रतिनिधि बनके उभरे. अन्ना के सहयोगियों में से कुछ ने उनसे अलग होकर एक राजनीतिक आम आदमी पार्टी बनायी और 2014 में होने वाले सोलहवें आम चुनाव के पूर्व एक पायलट प्रोजक्ट के तौर पर दिल्ली विधानसभा के चुनाव में शिरकत की.
दिल्ली विधानसभा चुनाव में बीजेपी को 32, केजरीवाल के दल को 28 जबकि कांग्रेस को 8 सीटें मिलीं. आज की तारीख में जनता कांग्रेस के बाहर से समर्थन से दिल्ली विधानसभा में चल रही केजरीवाल की सरकार की साक्षी है.
यह जनता, जिसका एक बड़ा हिस्सा बढती शीत के साथ-साथ कांपता है, जिसकी रातें पूस हों तो गहराते जाने के साथ-साथ और गहरी नहीं, उनींदी होती हैं, वो ठंडाते रहते हैं रातभर! फागुनी रातें बस उनका मन ही नहीं भिगोतीं, उनके घर को भी, उनके शरीर को और उसकी जमा-पूँजी को भी गीला करती हैं. उनकी पूरी की पूरी जेठ की दुपहरी और रात गर्मी से भीगते तन-बदन के साथ बीतती है.
इन बीते बरसों में हिन्दुस्तान का आम-मतदाता हो सकता है मूर्ख नहीं रहा हो, राजनीतिक रूप से चतुर हो गया हो, नेताओं को पहचाने भी लगा हो, पर कुल मिलाकर बीतते हर बरस के साथ सत्ता-प्रतिष्ठानों के सामने बेचारा और, और ज्यादा बेचारा ही हुआ है. यह बेचारगी, कम से कम वे लोग जो किसी भी तरह से,किसी भी सत्ता प्रतिष्ठान से नहीं जुड़े हैं, रोज अनुभव करते है.
‘इन्टरप्रेटेशन ऑफ़ डीड्स, डाकुमेंट्स एंड लॉ’ हमें यह सिखाता है कि शब्दों के अर्थों से ज्यादा अर्थवान शब्दों के गर्भित अर्थ होते हैं. जैसा की ‘देरिदा’ भी कहा करते थे ‘शब्दों के मूलपाठ में नहीं, अर्थ उनके अंतरपाठ में होता है’ और जिसे कूटनीतिक तबके में और तरीके से ‘बिट्वीन द लाइंस’ कहते हैं.
इस देश का आम मतदाता न तो अंतरपाठ समझता है, न वाक्य मध्य के आशय जानता-बूझता है. वह अपनी बात सीधी-सीधी कहता है और दूसरों की बात सीधी-सीधी ही समझता भी है. अब अगर कोई आदमी यह कहता है कि वह उनके बीच का ही, उनके जैसा ही एक आम-आदमी है, तो यह असल वाला आम-आदमी यही मान लेगा कि उसके कहे का वही मतलब है, जैसा कि उसने कहा है.
तो जब विश्वनाथ प्रताप सिंह अपनी पॉकेट डायरी दिखाते हुए हरेक जनसभा में कहते फिरते थे कि इस डायरी में बोफ़ोर्स से जुड़े खातों के नंबर उनके पास मौजूद हैं और वह उन्हें बेनकाब करके रहेंगे, तो लोग उस पर बिना ‘तीन पांच’ किये भरोसा करते थे. यह भरोसा टूटा तो ‘राजा नहीं फ़कीर देश की तकदीर’ का नारा लगाने वाले इसी आम आदमी ने उनकी मौत की ख़बर तक को कितनी तवज्जो दी, यह बहुत पुरानी बात नहीं.
ठीक वैसे ही जब केजरीवाल अक्टूबर-13 के दौरान कहते फिरते थे कि उनके पास शीला दीक्षित के खिलाफ़ 370 पेजों के सबूत हैं तो एक आम-आदमी मान लेता था कि हां! इस आदमी के पास सबूत हैं और यह इसे साबित भी करेगा.
क्योंकि केजरीवाल चाहे जो भी हों, पर थे तो ‘भारतीय राजस्व सेवा’ के कमिश्नर रैंक के पूर्व अधिकारी ही, जिन्हें यह भली भांति पता था कि ‘विधि सम्मत सबूत’ क्या होता है. जब वो अपने पास सबूत होने का दावा करते थे, तो उसे साबित करने की जिम्मेदारी भी उनकी ही बन जाती थी.
और अब! जब केजरीवाल कहते हैं, ‘अगर कोई सबूत है तो लेकर आइये दो घंटे में जांच होगी’ तो वह इस आम-आदमी के भरोसे का मखौल उड़ा रहे होते हैं. यहाँ सीधे-सीधे जिम्मेदारी दूसरों के पाले में डाल देने की बात भी है. अर्थात जो सबूत लायेगा, साबित करने की जिम्मेदारी भी उसकी ही होगी कि आरोप सही हैं. यहाँ केजरीवाल किसी भी तरह की जबाबदेही से परे रहेंगे.
अभी जुम्मा जुम्मा चार दिन हुए हैं, पर इस तरह की पलटबयानी के बाद हम इत्मीनान से कैसे रहें? कहाँ तो केजरीवाल ने दिन-रात जनता के हित में काम करने का वायदा किया था और कहाँ वह ‘पोलिटिकली करेक्ट स्टैंड’ के फिक्रमंद हुए जा रहे हैं.
इस मुल्क के मतदाता ने बहुत धोखे खाए हैं, लिहाजा हम इत्मीनान से नहीं बैठ सकते. जनाब केजरीवाल! हम पहले दिन से ही, पहले घंटे से ही आपके किये के मुन्तजिर हैं. हम आपको तगड़ा सपोर्ट भी करेंगे और हम आपका तगड़ा विरोध भी करेंगे.


कश्यप किशोर मिश्र



ये लेख जनज्वार से साभार लिया गया है http://www.janjwar.com/2011-05-27-09-06-02/69-discourse/4675-janvbhavnaon-ka-makhaul-aap-to-mat-udaiye-kejriwal-saheb-for-janjwar-by-kashyap-kishore-mishra

Sunday, January 5, 2014

केजरीवाल देवता बनना चाहते है या जननेता, वो खुद तय करें !!


तो भईया ! हिंदुस्तान के लोग बड़े पुजारी किस्म के लोग हैं. पूजा के लिए पूरी तरह पगलाए रहते हैं, जीवन जीने के लिए इन्हें सांस से ज्यादा भगवान की जरूरत है. दुनिया को जितने धर्म और ईस्वर इस देश ने दिए. कोई और देश दे ही नहीं सकता. ये इसकी खासियत भी है. और कमी, बुराई या कमजोरी भी. 

ये 34 करोड़ देवी देवताओं वाला देश है. इसके अलावा यहाँ गुरुनानक साहब, गौतम बुद्ध, ईसा मसीह, भगवान महावीर, आल्ला, को मानने वाले भी बड़ी मात्र में हैं. इन सबसे भी जब बात नहीं बनती तो कुछ लोग रजनीश "ओसो" और निर्मल बाबाओं जैसों को भी भगवान कहने लगते हैं. ये सूची बढ़ते-बढ़ते आसाराम और रविशंकर से होते हुए, मुलायम सिंह, नरेन्द्र मोदी, लालू यादव, मायावती को शामिल करते हुए नेहरु गाँधी परिवार तक पहुँच जाती है इसके बाद भी और भगवान और देवता जोड़ने की संभावनाएं बनी रहती हैं. और इस तरह धीरे धीरे ये सच लगते लगता है कि हम देवभूमि के वासी हैं. जहाँ जिसके पास सत्ता और ताकत है वो देवता है. ये सत्ता और ताकत धर्म की हो, राजनीति की, समाज की या फिर पैसे की.

घर के अंदर मर्द (पति) देवता है. वही देवता, जो अपनी पत्नी के लिए परमेश्वर है. आफिस जाते ही अपने बॉस को देवता समझने लगता है. बॉस के लिए उसके बॉस देवता, उस बॉस के लिए सरकार देवता, उस सरकार के लिए पूंजीपति देवता. उन पूंजीपति देवताओं के लिए पूँजी और मुनाफा देवता. देवता बनने और बनाने का ये क्रम बदस्तूर जारी रहता है.

हुफ्फ़!! क्या कहें अब देवताओं और उनके पुजारियों को, कि इस देश को देवता और पुजारी नहीं चाहिए! इंसान चाहिए! जिन्दा इंसान! जिनके दिमाग आज़ाद हों. जिनकी सोच किसी देवता के आधीन न हों, वो आलोचना और लोकतंत्र की कीमत समझते हों और उसके लिए आपनी जान की भी बाजी लगा सकें. पर नहीं इस देश में किसी को पसंद करने से शुरू होने वाला क्रम उसके समर्थन से होता हुआ उसे देवता मानने और बनाने पर ही रुकता है. शायद लोग ये नहीं जानते कि जब कोई अच्छा आदमी देवता हो जाता है. तो वो इंसानों के किसी काम का नहीं रह जाता. वो उनका साथी नहीं रह जाता, वो उनके सुख दुःख में साथ लड़ता नहीं बल्कि अपनी दया और कृपा का संचार करता है. जिसकी उन इंसानों को कतई जरूरत नहीं होती. दया और कृपा के संचार से संघर्ष की भावना और चेंतना कुंद पड़ती है और लोकतंत्र सामंती जाल में उलझते हुए वंशवाद का पर्याय हो जाता है. 

मैं ये बात यहाँ इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि मैं देख रहा हूँ कि अरविन्द केजरीवाल जोकि एक जुझारू जननेता बन कर उभरे हैं और जनता की बहुत सारी उम्मीदें उनके साथ जुडी हुई है. वो  लोगों को एक ऐसा सपना दिखाते हैं, जो सुनहरा और सुखद है. वो भी आजकल सोशल मीडिया पर इन पगलाए पुजारियों से घिरने लगे है. ये पुजारी अपने देवता के खिलाफ एक शब्द तक नहीं सुन सकते और आक्रामकता की हद तक चले जाते हैं. मुझे डर है कि कहीं ये पुजारी दीमक, अरविन्द और उनके भीतर के इंसान को खा न जाएँ, क्योंकि उसके बाद अरविन्द जनता के नेता नहीं बल्कि सत्ता के भगवान भर बचेंगे. जो कि मुझे लगता है कि अरविन्द कभी नहीं बनना चाहेंगे. इसलिए मैं कामना करता हूँ अरविन्द इन अंधे पुजारियों और उनकी अंधी चाटुकार साधना और पूजा से दूर रहें और बेहतर होगा कि अगर ऐसे लोग उनके आस-पास भी हों तो तुरंत उन्हें बहार की राह दिखाएँ. समर्थन और साधना के अंतर होता है. समर्थन सामर्थ बढाता है और साथना देवत्व, केजरीवाल खुद तय करें उन्हें जनता की सेवा के लिए सामर्थ की आवश्यकता है या देवत्व की. राजनीतिक भगवानों के होने और मिटने की कई कहानियां भारतीय लिक्तंत्र ने देखीं हैं और गवाह भी है की इस देवताओं के जाने के बात जनता इनके नाम भी भूल जाती है. इसलिए केजरीवाल खुद तय करें की उन्हें जनता का देवता बनना है या जनता का नेता. क्योंकि एक देवता जैसा दूसरा देवता तो हो सकता है पर एक जननेता जैसा दूसरा जननेता नहीं हो सकता है

अनुराग अनंत 

Saturday, January 4, 2014

अरविन्द केजरीवाल और "आप" के लिए अनुराग अनंत का एक तीखापत्र


अरविन्द केजरीवाल और "आप" के लिए अनुराग अनंत का एक तीखापत्र

आम आदमी प्रिय 
अरविन्द केजरीवाल जी 


लोकतंत्र का नारा, आम आदमी नकारा है !! 

ये मैं नहीं कह रहा हूँ. मेरा मन कह रहा है. और रो-रो कर कह रहा है. क्योंकि जब आदर्श की राजनीति का दावा करते हुए "आप" व्यवहारिता के कीचड़ में धंसे जा रहे है. तब ये स्वर फूटना स्वाभाविक है.

माफ करना केजरीवाल साहब "आप" क्या है मैं नहीं जानता पर मुझे एक बात लगने लगी है की आप "आम आदमी" तो नहीं ही हैं. क्योंकि देश का आम आदमी इतना शातिर नहीं हो सकता. यहाँ का आम आदमी बड़ा भोला और भाउक है. इसे सोनिया अपनी माता, मोदी अपना नायक और केजरीवाल अपना कर्णधार लगता है. ये बहुत ही आशावादी जनता है. जो अपने झुके हुए कंधो पर एटलस की तरह मरे हुए लोकतंत्र का बोझ ढो रही है. नहीं तो जो स्थिति भारत में है वहाँ सत्ताएं उखड जाया करती हैं. तख़्त गिरा दिए जाते हैं और ताज उछाल दिए जाते हैं. शायद इसका एक कारण ये भी हो सकता है कि जहाँ ऐसा होता है वहाँ व्यवस्था को संजीवनी पीला कर बचाने के लिए कोई केजरीवाल जैसा हनुमान नहीं होता होगा. जो जनता का व्यवस्था के प्रति पूरा गुस्सा बिजली और पानी तक समेट दे और फिर जनता के ही पैसे (सब्सीडी) से उसे सस्ता और मुफ्त कर दे. 



मुझे तो देखना है कि भाई केजरीवाल जिन्हें सत्ता के बहार रहते हुए तो पूरे सच और सुबूत दिख रहे थे. सारे नेता भ्रष्टाचारी, दलाल और देश के लिए खतरा लग रहे थे. शीला दीक्षित भ्रष्टाचार की दानव थी. अब सत्ता में जा कर वो क्या करते है. महगाई और गरीबी का पूरा अर्थशास्त्र समझा दिया था "आप" ने सड़कों पर लोगों को. बताया था की कैसे कम्पनियाँ सरकार के साथ मिलकर महगाई और टैरिफ बढाती है. बिजली के दाम और पेट्रोल का मूल्य तय करने में कैसे धांधली होती है. कौन लोग वर्तमान सरकार में इसमें संलिप्त हैं. सड़कों पर कहा था कि सत्ता में आते ही इन सभी भ्रष्ट नेताओं की जेल परेड करवाएंगे. मुझे तो अब उसी दिन का इंतज़ार है कि कब केजरीवाल अपने केजरीवाल होने को साबित करेंगे. जिस केजरीवाल को देश की जनता ने जिताया और प्यार किया है. वो विद्रोही, भोला, साधारण और भाउक केजरीवाल है न कि परदे के पीछे का निर्देशक जो जनता को दर्शक बनाने पर विस्वास रखता है और लोकतंत्र को एक नाटक की तरह खेलता है. 


"आप" ने कहा है कि जांच एजेंसियों से जांच करवाएँगे आडिट एजेंसियों से आडिट कराएँगे और फिर अगर घोटाला या अनियमितताएं मिलीं तो कड़े कदम उठाये जायेंगे. मैं इस बार बता दूं केजरीवाल साहब जांच चाहे जितनी भी करवा लीजिए पर साजा तो देनी ही होगी आपको उन भ्रष्ट नेताओं को, क्योंकि ये तो दुनिया जानती है कि कॉमन वेल्थ गेम में घोटाला हुआ. शीला दीक्षित भ्रष्ट नेता है और एमसीडी में भाजपा ने खूब मलाई काटी है. ये सारी बातें जब बाहर से आपको दिख रही थी और "आप" खुलासे पर खुलासे कर रहे थे तो जांच तो अब बस एक औपचारिकता होनी चाहिए. क्योंकि आम आदमी पार्टी के पास पहले से सुबूत भरे पड़े हैं जैसाकि "आप" कहते आये हैं. और हाँ अगर "आप" शासन में भी इन भ्रष्टाचारियों को क्लीन चिट मिल गई. जैसाकि अन्य सरकारों में होता आया है. तो ये बात साफ़ है कि चोरों के साथ "आप"ने भी रिश्ता बना लिया है मौसेरे भाई न सही तो ममेरे भाई का ही सही. और जन लोकपाल पर तो बात करना ही भूल गया. आपने कहा था कि दिल्ली की जनता को नए साल पर जन लोकपाल का तोहफा देंगे. तो जल्दी करिये साहब उस तोहफे के लिए हममें से कितने कब से आस लगाये बैठे है. सरकार का समीकरण बने या बिगड़े, सत्ता रहे या जाए. जन लोकपाल का तोहफा "आप" जल्द से जल्द दीजिए. जिसके चलते चूहा से ले कर शेर तक सब जेल में जा सकें और अपनी सारी अदाएं-कलाएं भूल जाएँ. आशा है 'आप" जल्द ही ऐसा कुछ करेंगे. 

एक और बात जो मुझे पूछनी है "आप"से कि जनता को "आप" एकदम बेवकूफ समझते है क्या ? या फिर ये बताएं कि "आप" की रीढ़ की हड्डी में कोई प्रोब्लम है ? आप ठीक से खड़े क्यों नहीं रह पाते केजरीवाल साहब ! बड़ा खतरनाक होता है बिना रीढ़ के आदमी को अपना नेता बनाना. मैं कभी कभी डरता हूँ इस बात से. जब आप गिरते है या फिसलते है तो अपनी रीढ़ की हड्डी को दोष न देकर जनता को इस रोग में शामिल कर लेते है. और कहते है कि जनता ने गिरने के लिए कहा था. या जनता ने सँभालने के लिए आदेश किया था. अत: मैं गिरुं या संभालूं इसमें मेरी कोई गलती नहीं है. इसकी जिम्मेदार जनता है. वाह भाई वाह ! बात बहुत गोल है पचेगी नहीं ज्यादा दिन. 

केजरीवाल साहब पांच कमरों का फ़्लैट आपने लिया था तो कुछ सोच कर लिया होगा. जनता के लिए फैसले जल्दी हो सकें. आप ज्यादा काम कर सकें जैसे कई कारण हो सकते है. पर जैसे ही विपक्ष हमलावर हुआ आपने अपने जेब से जनता का बहाना निकाल लिया और मीडिया में कहा कि मेरे दोस्तों और समर्थकों ने मुझे फोन और मेल/मैसेज करके कहा है कि मुझे पांच कमरों के फ़्लैट में नहीं रहना चाहिए इसलिए मैं सरकार से कहता हूँ कि मुझे एक अपेक्षाकृत छोटा आवास दिया जाए. आपने कहा सरकारी गाडी नहीं लेंगे फिर कहते हैं जनता का काम करने के लिए सरकारी गाडी लेंगे पर लाल बत्ती नहीं लगाएंगे. ऐसे ही कई और उधाहरण है साहब जहाँ आपकी मीडियाबाजी और रीढ़ की हड्डी का रोग साफ़ दीखता है. बंगाल की मुख्यमंत्री प्लाईबुड के मकान में रहती है. त्रिपुरा का मुख्मंत्री टीन के मकान में रहता है. ममता निजी गाडी से जनता के बीच काम करती है बिना कोई खास सुरक्षा के तामझाम के. यही हाल मानिक सरकार का भी है. पर उन्होंने इतना आम आदमी वाला राग नहीं आलाप जितना "आप" आलाप रहे है. "आप" काम करें व्यवस्था परिवर्तन का जो वादा आपने किया था थोडा निभाइए. आम आदमी की रट कम लगाइए. 

जिसे इतिहास नहीं मालूम या जो राजनीति में नयी नयी रूचि ले रहा है उसे "आप" चमत्कारी लग सकतें हैं. पर जो आपको इतिहास की कसौटी पर कसेगा उसे "आप' चमत्कारी नेता नहीं दिखेंगे. क्योंकि जब मुलायम और नीतिश ने जयप्रकाश नारायण के आन्दोलन के गर्भ से जन्म लिया था तो वो भी आप के जैसे जनता के नेता थे. उन्होंने भी किसानों और मेहनतकश जनता को बहुत सब्सीडी दी, उपहार दिए, सस्ती-मुफ्ती शिक्षा-दवाई दी. पर आखरी में सब वही ढाक के तीन पात ही रहा. पार्टियों की भीड़ में एक और पार्टी बढ़ गई. कुछ अन्य दलों के समर्थक इन पार्टियों ने तोड़े और किसी को घटा और किसी को फायदा पहुंचाती हुई अपनी परणिति को प्राप्त हैं. मैं "आप" के साथ ऐसा होते नहीं देखना चाहता. इसिलिए आपको ये पत्र लिख रहा हूँ. "आप" जो समझौते कर रहे है अगर वो गैर समझौतावाद पर आधारित है जैसा होना थोडा मुश्किल है पर मान ही लेते है कि ऐसा है. तो आप समझौते की चिंता मत करिये अपने व्यवस्था परिवर्तन का लक्ष्य पूर्ण करिये. और व्यावहारिकता की राजनीति से दूर रहिये. नहीं तो केजरीवाल को मुलायम और नीतिश होते देर नहीं लगेगी. 

क्या "आप" वही केजरीवाल हैं जिसने अपने चार कमरों के फ़्लैट में रहते हुए इतना बड़ा आंदोलन चलाया. वाही केजरीवाल आज सरकार चालने के लिए डुप्लेक्स फ़्लैट क्यों ले रहा है. जो शपत लेने के लिए मेट्रो में जा सकता है वो आफिस जाने के लिए सरकारी गाडी क्यों लेने को तैयार है. जिसने मंत्रिओं और विधायकों को सरकारी मकान और गाडी के लिए पार्टी संविधान में लिखित निषेद किया है. वो अब विचार करने की बात क्यों कह रहा है. केजरीवाल साहब ये सारे संकेत है पतन के. समझौतावादी राजनीति में फंसने और व्यावहारिकता की राजनीति में धंसने के. मैं "आप" के साथ ऐसा होते देख सकता हूँ पर आम आदमी के साथ ऐसा होते नहीं देख सकता क्योंकि आज "आप" आम आदमी के प्रतीक है. उसकी राजनीति का चिन्ह बन कर उभरे है आप, "आप"का पतन आम आदमी के संघर्ष और उसके जज्बे पर चोट होगी. मुझे "आप" से बड़ी आशा है और मेरा ये पत्र मेरा विरोध नहीं है ये मेरी तरफ से "आप" की स्वस्थ और सकारात्मक आलोचना है. 

"आप"का आम आदमी नहीं 
अनुराग अनन्त
यह लेख जनज्वार, नया इण्डिया और खबरकोश.कॉम पर भी प्रकाशित है 

जनज्वार.कॉम लिंक 
http://www.janjwar.com/2011-05-27-09-00-20/25-politics/4671-agale-neetish-mulayam-to-nahi-kejrival-for-janjwar-by-anurag-anant

नया इण्डिया.कॉम लिंक 
http://www.nayaindia.com/news/latest-news/open-page/next-nitish-kejriwal-not-so-soft-239523.html

खबरकोश.कॉम लिंक 
http://www.khabarkosh.com/?p=3823



Friday, November 15, 2013

देह की ज्यामिति से बहार...

सीबीआई प्रमुख रंजीत सिन्हा की बात कि यदि रेप न रोक सको तो उसका आनंद लो शायद प्रतापगढ़ लालगंज को वो लड़की नहीं सुन सकी होगी जो बलात्कार का विरोध करते हुए जिन्दा जला दी गयी. खुद पर हो रही ज्यादती का आनंद कैसे लेना है उसे नहीं आता था. उसे नहीं मालूम था कि बलात्कार का भी आनंद लिया जा सकता है. नहीं तो वो लड़ते हुए जलना न स्वीकार करती बल्कि उस आनंद का पान करती जिसका जिक्र रंजीत सिन्हा साहब कर रहे थे. देश की इतनी बड़ी संवैधानिक संस्था का मुखिया कह रहा है तो जरूर कोई नुख्सा होगा जिससे बलात्कार का भी मजा लिया जा सकता हो.
प्रतापगढ़ के लालगंज में मानवता को शर्मसार करने वाली एक घटना फिर सामने आई है. इंटरमीडिएट की एक छात्रा, दो छोटे भाइयों के साथ अपने घर में अकेली थी. उसके माँ-बाप किसी काम से दिल्ली गए हुए थे. तभी एक मनचला उसके घर में घुस आया और उसके साथ बलात्कार करने की कोशिश करने लगा पर विरोध के चलते नाकाम होने पर उसने लड़की को आग के हवाले कर दिया. इन सबके बीच मासूम छोटे भाई रोते रहे, और अपराधी अपराध कर के भाग निकला.  दिसंबर में दामिनी बलात्कार कांड पर खाई गयी सारी कसमें समय के साथ इतनी जल्दी धुल जाएँगी. समाज की संवेदना और चेतना इतनी जल्दी कुंठित हो जायेगी. इसका कोई अंदाजा नहीं था. " एक अकेली लड़की को खुली तिजोरी समझने वाले इस समाज में एक लड़की को हमेशा ये लगता रहा है कि वो एक वस्तु है और उसे कोई भी कभी भी चट कर सकता है, लूट सकता है, उस पर डाका डाल सकता है.

यहाँ कभी कोई सिरफिरा आशिक चेहरे पर तेजाब फेंक देता है तो कभी कोई मनचला घर में घुस कर बलात्कार करता है और नाकाम होने पर जिन्दा जला देता है. कभी भाई-बाप इज्जत के नाम पर मौत के घाट उतार देते है तो कभी पति और प्रेमी शक की बिनाह पर हत्या कर देते है. माँ-बाप के घर की कैद से ले कर सास-ससुर के घर की काल कोठरी तक सब कुछ एक जैसा ही तो है औरतों के लिए.  हम औरत के बदन के भूगोल में उलझे हुए लोग उसके दर्द के इतिहास के बारे में कभी नहीं जान सकते. क्योंकि हम अभी भी उसके बदन से आगे ही नहीं बढ़ पाए हैं. चाहे हम अपनी बहन की बात कर रहे हो या प्रेमिका की. उसका बदन ही हमारी बात के केंद्र में रहता है. बहन की रक्षा से लेकर राह चलती किस लड़की को छेड़ने तक उसका शरीर ही मुद्दा रहता है. खुद का शरीर भी कभी कभी महिलाओं को एक कैदखाना लगने लगता होगा.

खैर हम उनकी पीढा कैसे समझ सकते है हम तो पित्रसत्तात्मक समाज के लोग है. जहाँ लड़के के पैदा होने पर थाल बजाकर मिठाइयां बांटी जातीं हैं और लड़की पैदा होने पर माँ को गाली दी जाती है. हम रंजीत सिन्हा की मानसिकता वाले समाज के हैं. जहाँ महिलाओं को बलात्कार में आनंद तलाशने की नसीहत दी जाती है. ये देश औरत की आज़ादी और सुरक्षा के लिए जब दिल्ली की सड़कों पर कानून बनाने की मांग कर रहा था ठीक उसी समय सुप्रीम कोर्ट का एक रिटायर जज अपनी पोती की उम्र की मातहत का शारीरिक शोषण कर रहा था. एक अध्यात्मिक गुरु लड़कियों को बलात्कारियों को भाई कह कर पुकारने की सीख दे रहा था और देश के राष्ट्रपति का बेटा आज़ादी की मांग करती औरतों-लड़कियों को " डेंटेड-पेंटेड औरतें" कह रहा था. कितने बार बेपर्दा होगा व्यवस्था का चेहरा, कितनी बार साफ़ जताया जायेगा की ये व्यवस्था औरतों को मर्द के बराबर अभी नहीं मानती है. शरीर अभी भी औरत की आज़ादी की राह में रोड़ा है. बाहर पढाई के लिए जाना हो या फिर काम के लिए ये शरीर जाने से रोकता है. माँ-बाप, भाई, समाज  सब को इस शरीर की ही चिंता हैं. औरत की और उसके दिल की फिकर कौन करता है ? कौन ये समझता है कि उसके भीतर भी एक दिल है. जिसमे अरमान है. उसके पास भी आखें हैं. जिसमे सैकड़ों सपने हैं.
अब औरत को खुद ही  देह की ज्यामिति से बहार अपना संसार गढ़ना होगा.  इस नए संसार को गढ़ने के लिए कई बगावते करनी होगी. कई शहादतें देनी होगी. कई आसरामों, रंजीत सिन्हानों और अभिजीत मुखार्जियों से लड़ना होगा. समाज अपने हक में बदलना होगा.

अनुराग अनंत

खबर की लिंक
http://www.amarujala.com/news/crime-bureau/rape-attempt-burnt-alive-victim-uttar-pradesh/





Thursday, November 14, 2013

राजनीतिक अकाल की उपज

राजनीतिक विकल्पहीनता की स्थिति में साधारण से साधारण व्यक्तित्व भी असाधारण लगने लगते हैं और उनकी बिना सर-पैर की नीतियां या सुझाव भी सुनहरे मॉडल कहे जाते हैं. निर्वात में जैसे हर वस्तु हलकी हो जाती है ठीक वैसे ही इस समय देश में राजनीतिक निर्वात है शायद इसीलिए सारी विचारधाराएँ हवा में तैरती हुई जान पड़ती है. इस समय विचारधारा को संशोधनवाद और प्रयोगवाद ने पूरी तरह अपनी गिरफ्त में ले लिया है. आज वाम से ले कर दक्षिण तक सब गड्ड-मड्ड हो गया है. आंबेडकर की अस्मिताई राजनीति से लेकर जेपी और लोहिया का समाजवाद तक सबकुछ बिखरा हुआ, बेतरतीब सा दीखता है. इस राजनीतिक निर्वात के समय में  छापामार राजनीति करने वालों और विचार को फैशन की तरह ओढने वालों की चल निकली है. सब उनमें देश का भविष्य तलाशने लगे हैं. उनके किये बिन सर-पैर के वादे उज्जवल भविष्य की कुंजी माने जा रहे हैं और विचारधारा की राजनीति करने वाले लोग पुरातन व पिछड़े कहे जा रहे हैं.  

देश में इंटरनेट आने के बाद राजनीति में भी व्यापक बदलाव आये हैं, लोकप्रियता के पैमाने बदले हैं. लोग इन्टरनेट में चलने वाले पोल, मिलने वाली लाइक, कमेन्ट और विजिट को अपनी लोकप्रियता का पैरामीटर बताने लगे हैं और मीडिया से लेकर आमजनता तक उस आभासी दुनिया की लोकप्रियता को कोट करने लगी है. देश में खासतौर पर पिछले दो सालों में इंटरनेट पालिटिक्स ने देश के युवाओं और बहुत हद तक मध्यम वर्ग की राजनीतिक चेतना को प्रभावित किया है. अन्ना का आन्दोलन हो, अरविन्द केजरीवाल का उदय या फिर आम आदमी पार्टी का प्रभावशाली उभार इनसब के पीछे इन्टरनेट की महती भूमिका रही है. नरेन्द्र मोदी को लोकप्रिय बनाने में भी इन्टरनेट ने बड़ी भूमिका निभाई है. इन्टरनेट पालिटिक्स के महत्व का अनुमान हम इस बात से भी लगा सकता है कि एक व्यक्ति जिसे स्वयं उसकी पार्टी के वरिष्ठ नेता और गठबंधन की कई पार्टियां पसंद नहीं करती, वो प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बन जाता है. ये इन्टरनेट की आभासी दुनिया पर उसकी विश्वव्यापी लोकप्रियता और उसके गुजरात मॉडल की ब्रांडिंग ही थी कि पार्टी के बड़े नेताओ को भी मोदी के सामने झुकना पड़ा और उन्हें प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया. मोदी ने इस अभियान की शुरुवात २००७-०८ में एपको वर्ल्डवाइड नाम की अमेरिकन विज्ञापन एजेंसी को खुद के छवि निर्माण के लिए नियुक्त करके कर दी थी. जिसके परिणाम हमें २०१३ में पूरी रंगत के साथ दिख रहें हैं. मोदी इन्टरनेट पालिटिक्स और तकनीक के महत्त्व को समझते हैं तभी तो उन्होंने एक पूरी टीम बना रखी है जो मोदी की इन्टरनेट पर ब्रांडिंग करती है. उनकी लोकप्रियता बढ़ाने के लिए अभियान चलाती है और फिर मीडिया से लेकर आमजनता तक उसी आभासी लोकप्रियता और समर्थन की आंधी में उड़ती नज़र आती है. मोदी की तरह दूसरी जो शख्सियत इन्टरनेट और तकनीक के हथियार से राजनीति का समर लड़ रही है वो है, अरविन्द केजरीवाल. एक ऐसा आदमी जो दो साल पहले राजनीति की “रा” नहीं जानता था आज “आप” के नाम पर आपको क्रांति बाँट रहा है. केजरीवाल ने आपकी क्रांति नाम से एक वेब साईट बनवाई है. जहाँ जाते ही आपको महसूस होता है की क्रांति एक उत्पाद है जिसे केजरीवाल आपको सस्ते दाम या यूं कहिये मुफ्त में दे रहे हैं. उनकी पार्टी की वेबसाईट पर ऊपर ही एक डिजिटल घड़ी लगी है जो  मतदान की तिथि को कितने सेकेण्ड बचे हैं ये बताती है. आपको वहाँ कोई सेल लगे होने का पूरा अहसास होता है. केजरीवाल और मोदी ने देश में छापामार राजनीति का नया व्याकरण गढा है. उन्होंने देश की आभासी नब्ज़ टटोली है. वो इन्टरनेट पर मौजूद आभासी लोगों को देश की जनता मान बैठे हैं. इसीलिए उनकी राजनीती, उनके सवाल और चिंताएं सबकुछ आभासी ही लगते हैं.

मोदी ने झाँसी में यूपी के मजदूरों के लिए छ: महीना काम और छ: महीना आराम का जो मॉडल बताया वो मजदूरों के प्रति उनकी खोखली समझ और पूंजीवादी शोषण के गिरफ्त में मजदूरों को धकेलने की साजिश सी जान पड़ती है. मोदी का ये मॉडल कांट्रेक्ट लेबर मॉडल का एक घिनौना रूप होगा. इसके अलावा अर्थशास्त्रीय नज़रिए से भी ये मॉडल निराधार ही है. वहीँ केजरीवाल का स्वराज का मॉडल कई सारे सवालों पर औंधे मुंह गिरता हुआ दीखता है. ये केजरीवाल के भारतीय समाज की समझ का अभाव ही है जो वो जनता को दूध का धुला मान रहे हैं  और अतिविकेंद्रिकरण की बात कर रहे हैं. इसी जनता और आम आदमी के बीच सामंती और जातिवादी सोच वाले लोग भी हैं. दलित, किसान मजदूर और स्त्री भी हैं. केजरीवाल की जनता और आम आदमी कौन है? ये साफ़ नहीं हुआ है. शायद अभी केजरीवाल को भी उनके आम आदमी की परिभाषा ठीक ठीक मालूम नहीं होगी. उनका एक बहुत प्रयोग किया जाने वाला उदाहरण है कि गांव में नल कहाँ लगेगा इसमें सरकार की कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए ये वहाँ के लोग तय करेंगे कि नल कहाँ लगेगा. मेरा सवाल है कि वो गांव जहाँ आज भी ठाकुर साहब का कहा जनता का कहा होता है. वहाँ सरकार के प्रभाव न होने पर तो नल किसी ठाकुर जी के या यहाँ किसी पंडित जी के यहाँ ही लगेगा. तब तो आपका स्वराज फिर से सामंती जकड़ को नए चेहरे के साथ समाज में लाएगा. 

खैर मोदी और केजरीवाल जैसे नेता अपनी दूरदर्शिता और तकनीक के प्रयोग से राजनीतिक वितान पर एक सशक्त परिघटना तो बन कर उभरे हैं पर इनके नेतृत्व में देश की जनता कहीं नहीं है- मजदूर, किसान, दलित और स्त्री कहीं नहीं हैं. ये देश में विचारधारा आधारित राजनीतिक-अकाल की उपज है जिनसे भूखे को भूख मिलेगी और खाए अघाये को खाना.

अनुराग अनंत 

Saturday, November 9, 2013

सब कुछ सुनहरा नहीं


एक ऐसे समय में जब सबकुछ सुनहरा-सुनहरा ही बताया जा रहा हो. सांसद धंनजय सिंह के दिल्ली स्थित सरकारी आवास पर काम करने वाली महिला, राखी की मौत कई सारे भ्रम एक साथ तोडती है. इन्टरनेट के इस तिलस्मी समय में जब जाति, रंग और वर्ग के सवाल बीते दिनों की बात कही जाने लगी है. तब ये घटना एक बार फिर सच्चाई नए सिरे से बयां करती है. दासता के बदले हुए स्वरुप और लोकतान्त्रिक सामंतो का विद्रूप चेहरा बेपर्दा करती ये घटना समाज की संवेदना और चेतना से लेकर देश में लोकतंत्र की जीवंतता तक पर कई सवाल खड़ा करती है. दलितों और वंचितों की पार्टी कही जाने वाली बीएसपी से आया एक नेता, जिसका इतिहास अपराधों का इतिहास है और उसकी पत्नी अपने ही घर में काम करने वाली महिला राखी की निर्मम हत्या के आरोप में हिरासत में है. ये विचारधार का विरोधाभास और सामाजिक न्याय की लड़ाई की संकल्पना के साथ चलती हुई पार्टी का पक्षधरता और सरोकार के सवाल पर ध्वस्त होना नहीं तो और क्या है?

गौरतलब है कि राखी के बेटे शहनाज़ को पुलिस ने पूछ-ताछ के लिए बुलाया था जिसके बाद से उसका कोई पता नहीं लग रहा है. कयास लगाये जा रहे हैं कि सांसद ने उसकी हत्या या अपहरण करा दिया है. सांसद ने जिस तरह से पहले सीसीटीवी कैमरे के फूटेज गायब कराये और फिर राखी के बेटे को गायब कराया वो ये साफ़ बयां करता है कि इस सियासी सामंत के मन के कानून को ले कर कितना खौफ़ है. क्या इस देश का कानून केवल गरीब, किसान, मजदूर और मेहनतकश को ही डरा सकता है ? उनकी ही जमीने और रोटी छीन सकता है. पेट के सवालों में उलझे हुए इंसानों को डराने वाला कानून क्या कारण है कि ऐसे सियासी सामंतो के दिल में झुरझुरी तक नहीं पैदा कर पाता ? वो संविधान जो “हम भारत के लोग... से शुरू होता है. सिर्फ भारत के आम लोगों को ही डरा सकता है. सत्ता और सियासत के आगे इसके कुछ और ही मायने हो जाते है. खैर इस पूरे घटनाक्रम से जो चीज़ साफ़ दिखती है वो है  व्यवस्ता में व्याप्त सामंतवाद व उसका सामंती चरित्र. 

ये घटना ये भी दिखाती है कि कैसे घर में काम करने वाले लोगों को इस समाज में पूंजीपति, सामंती और तथाकथित पढ़े लिखे लोग अपना दास और निजी बपौती समझते है. इन मेहनतकश लोगों के लिए सुरक्षा, न्याय और लोकतंत्र जैसे शब्द कोरे लफ्फाजी के अलावा कुछ और नहीं हैं. अभी कुछ दिन पहले दिल्ली के नेता जी नगर में एक एयर होस्टेस ने अपने घर में 12 साल की मेड को कमरे बंद करके आस्ट्रेलिया चली गयी थी. जिसे दो दिन बाद ने पुलिस ने बहार निकला था. ऐसे ही निर्ममता की कई कहानियां है. जो महानगरों की चमकदार गलियों के घुप्प अँधेरे में दम तोड़ देती है या दबी कुचली आवाज़ की तरह न जाने कब उठती है और कब दब जाती है.

एक देश जहाँ एक लाख छिहत्तर हज़ार करोंड़ का घोटाला लोकतंत्र के सिरमौर माननीय सांसद जी लोग करते है. वहीँ उत्तर प्रदेश, बिहार, उत्तर-पूर्व जैसे राज्यों से गरीब लड़कियां-औरते रोटी की तलाश में महानगरों में यौन शोषण से लेकर निर्मम हत्याओं तक का दंश भोगने को अभिशप्त हैं. और हर बार कोई धनजय सिंह, कोई पूंजीपति. कोई सामंत, थोड़ी सी कानूनी नूराकुश्ती और मीडिया उठापटक के बाद मुक्त हो जाता है फिर से वही सबकुछ करने के लिए. और इस सब के बीच हम कुछ सुनहरा है के ख्याल के साथ, आल इज वेल कहते हुए पाए जाते हैं.  


मेरा ये लेख जनसत्ता में 13-nov-2013 को छापा था यहाँ मैं नीचे लिंक दे रहा हूँ आप इसे जनसत्ता की वेबसाईट पर भी पढ़ सकते हैं. 

Monday, July 29, 2013

हमें ये बेखबरी का दौर तोडना होगा. ...

ये सावन का महीना है. बादलों की सरकार और बूंदों की व्यवस्ता चल रही है. हम भीतर से लेकर बाहर तक सावन के रंग में रंग गए हैं और इस समय मन जब तब गा उठता है....सावन का महीना पवन करे शोर..जियरा रे ऐसे नाचे जैसे बन में नाचे मोर...| मैं कल अपनी बाइक पर लौट रहा था. कि तभी बारिश होने लगी, बारिश की रिमझिम में मन यही गीत गाने लगा. सुनील दत्त और नूतन पर फिल्माया ये गीत 1967 में बनी फिल्म “मिलन” का है. ये तो मुझे पता था पर दिल अलग ही सवाल पूछ बैठा, ये गीत लिखा किसने है? फिर क्या था, मन अशांत हो गया. एक ग्लानी का भाव उमड़ उठा, और मैं सोचने लगा की ये गीत जो देश में सावन के प्रतीक गीतों में से एक है और बारिश की एक बूँद भी शरीर पर गिरते ही हर हिन्दुस्तानी दिल इसे गुनगुना उठता है, उसके ही लेखक का नाम नहीं मालूम. ऐसे ही न जाने कितने गीत हैं जो वक्त का बंधन तोड़ कर हमारी जिंदगी, हमारी खुशी, हमारे गम का हिस्सा है पर हम उन नामों को नहीं जानते जिन्होंने हमारी अनकही अमूर्त भावना को गीत के रूप में साकार किया और हमारे कई अव्यक्त भावों को अमर स्वर दिए. जब हम-आप उदास होते है और कुछ नहीं समझ आता तो अकसर “आनंद” फिल्म का गाना “ जिंदगी कैसी है पहेली हाय!...या “सफर” फिल्म का गीत “जिंदगी का सफर है ये कैसा सफर..या फिर ऐसे ही अनगिनत गाने हैं जिनसे हम अपना दर्द बाँट लेते हैं. ये गीत कभी हमारे आंसूं पोछ कर काँधे का सहारा देते हैं तो कभी उदास मन में एक नई उमंग भर देते है. पर अफ़सोस हम उन नामों को नहीं जानते जिन्होंने हमें इतने अनलोम तोहफे दिए.

ऊपर जो मैंने दो गीत बताये हैं उनके बोल पढते ही आपके दिमाग में जो पहली तस्वीर बनेगी वो राजेश खन्ना की होगी क्योंकि ये गीत उनपर ही फिल्माए गए हैं पर आपके दिमाग में “योगेश” और “इंदीवर” का नाम तक नहीं आयेगा. जो इन गीतों के गीतकार है. ये हम दर्शकों की उदासीनता कहें, या फ़िल्मी दुनिया का बेजा दस्तूर. जो हिंदी फिल्मों का गीतकार हमारी जिंदगी में इतनी अहमियत रखने के बावजूद इतना उपेछित है. हम दिन रात जिस गीतकार के लिखे गीत गुनगुनाते रहते हैं उसके नाम तक को नहीं जानते और न जानने की कोशिश ही करते हैं.

 मैं जब किसी को कोई गीत गाते सुनता हूँ और उससे उसके लेखक का नाम पूछता हूँ तो 99.99% लोगों को गीतकार का नाम नहीं मालूम होता. ये एक ऐसा सच है जो कई सारी सच्चाइयों को झुठला देता है. जैसेकि अच्छे गीत ही फिल्म की जान होते है, गाने अच्छे हैं तो फिल्म कभी घाटा नहीं खा सकती या फिर अच्छे गीत फिल्म को अमर बना देते हैं. मैं पूछता हूँ अगर ऐसा है तो इन गीतों को लिखने वाले गीतकारों की हालत इतनी दयनीय और जिंदगी इतनी गुमनाम क्यों है. मुझे ये कहते हुए थोड़ी सी भी झिझक नहीं होती कि भारतीय फिल्म इंडस्ट्री लेखकों और गीतकारों के खून पी कर पनप रही है. ये उनके गुमनाम संघर्ष और शोषण पर टिकी हुई है. और हम, हमारे ग़मों को आवाज़ देने वालों के ग़मों से बेखबर हैं. 

कितने नाम गिनाएं जाएँ, फेहरिस्त बहुत लंबी है गुमनाम शहीदों की, योगेश, इंदीवर, राजेंद्र किशन, भारत व्यास, अनजान, प्रेम धवन, गुलशन बवरा, आरज़ू लखनवी, शैलेन्द्र, ये कल के वो नाम हैं जो हमारे आज में गुनगुनाते है. जो हमारे जिंदगी का हिस्सा हैं. आज के कुछ नाम जो अपना कल दोहरा रहे है और अपने पुरखो की तरह ही गुमनामी में ही गीत लिखे जा रहे है जैसे मिथुन, संदीप नाथ, तुराज़, संजय मासूम, इरशाद कामिल, हिमांशु कुमार, शब्बीर अहमद, निरंजन इयांगर, रजत अरोरा, अमिताभ भट्टाचार्य, जावेद बशीर, कुमार, प्रिया पंचाल,  न जाने कितने युवा गीतकार और लेखक है जो लगातार उन्दा लेखन कर रहे है पर हम उन्हें नहीं जानते. हम हिन्दुस्तानी, पटकथा लेखक और गीतकार के नाम पर जावेद और गुलज़ार से आगे ही नहीं बढ़ पाते. पर अब समय बदल चूका है. एक पूरी की पूरी खेप आ चुकी है जो बहुत ही उन्दा और जिन्दा लिख रही है. जरूरत है तो बस उनके हुनर को उनका हक देने की. उनकी वो पहचान उन्हें देने की जिसके वो हक़दार हैं. 

मैंने जितने नाम ऊपर गिनाये हैं, उन सबके गीत और फ़िल्में तो मैं यहाँ नहीं बता सकता पर इतना जरूर कह सकता हूँ कि इनके लिखे गीत और संवाद, हमारी  जिंदगी का अटूट हिस्सा हैं और उनके बिना शायद हम खुद को पूरी तरह व्यक्त नहीं कर सकते. त्यौहार नहीं मना सकते, हंस नहीं सकते, रो नहीं सकते. 

अब इन दिनों आशिकी 2 का ही मशहूर गीत “सुन रहा है न तू, रो रहा हूँ मैं.... को लें ले, जो संदीप नाथ जैसे युवा गीतकार  ने लिखा है, या "राँझना" जैसी सुपरहिट फिल्म जिसे हिमांशु कुमार ने लिखा है पर ये  हममें से कईयों को नहीं पता होगा . हमें ये बेखबरी का दौर तोड़ना होगा. और मुझे ये उम्मीद है की वो दिन जल्द ही आयेगा.

मेरा ये लेख दैनिक जागरण के (आई नेक्स्ट) में दिनांक 17-10-2013 को प्रकाशित हुआ है. लिंक नीचे है यदि चाहें तो वेबसाइट पर भी पढ़ सकते है.




Saturday, July 13, 2013

जिंदगी ज़ब्त हो गयी शायद...

समंदर पर चल कर आती हुई लहर जैसे किनारे पर सर पटक कर मर जाती है वैसे ही उस दिन मरे थे कई ज़ज्बात, आखरी बार तडपते हुए देखा था उन्होंने मुझे, मानो कुछ भी नहीं कहना चाहते वो मुझसे और मैं खड़ा था वहीँ पर जैसे खड़े रह जाते हैं स्टेशन के किनारे के पेड़, जाती हुई रेलगाड़ी को देखते हुए, सब कुछ ऐसा घटा जैसा उसे घटना चाहिए. आस-पास जो हवा थी अचानक पानी बन गयी थी और एक नाकाम कोशिश जो बहुत पहले गंगा में डूब मरने की,  की थी, कामयाब होने पर अमादा थी. दम घुट रहा था और जहन में एक गाना गूँज रहा था "तड़प तड़प के इस दिल से आह निकलने लगी कि ऐसा क्या गुनाह किया कि लुट गए हम तेरी मोहब्बत में..." मन ही मन हम जल रहे थे पर होंठों पर मुस्कान थी. कितना कठिन होता है, रोते हुए हंसना हमने जान लिया था उसी एक क्षण में. आँखों में शाम उतर आई थी और कड़ी धूप में भी ऐसा लग रहा था कि बारिश हो रही हो. सिविल लाइन की रोड जहाँ थोड़ी सी सावधानी हटने पर मौत पक्की मानी जाती थी. मेरी आँखों में बिलकुल सूनसान दिख रही थी. उस समय मुझे कोई आदमी नहीं कह सकता था. मैं बिलकुल एक कटी पतंग हो गया था. जिसे कोई लूटना वाला भी नहीं था. जिसके हाँथ में मेरी डोर थी उसी ने डोर हाँथ पर से तोड़ दी थी और मारा था एक गुलाबी फ़्लाइंग किस धीरे से, मीठी मुस्कान चिपका कर,  भाई मन तो करा था कि उसकी फ़्लाइंग किस पर एक जोरदार किक चपका दें, पर क्या करें  मरते हुए आदमी में कोई ऐटीट्यूड नहीं होता, वो या तो कराह सकता है या मुस्कुरा सकता है. मैं उस समय कराहना चाहता था पर मुस्काना पड़ा. 

 वो यूं तो मेरे सामने से चली गयी थी पर मुझे वो साइकिल चलाती हुई दिख रही थी और मैं जो पेड़ों की तरह खड़ा था. उसने भी एक रेंजर साईकिल की सवारी कर ली थी. हम छ: साल पीछे चले गए थे. शायद शाम का वक्त था और हम दोनों कोचिंग से पढ़ कर वापस आ रहे थे. मैं उसके पीछे और वो मेरे आगे थी. उसके बराबर चलने की हिम्मत मेरे में नहीं थी. पर वो अक्सर मुझे आगे अपने साथ बुला लेती थी. उसकी आँखों में रेगिस्तान और समंदर दोनों थे और इसीलिए मैं उसकी आँखों में या तो डूबने लगता था या हांफने लगता था. वो अक्सर समझ जाती थी की मैं डूब रहा हूँ या हांफ रहा हूँ और खिलखिला कर हँसने लगती थी. जब वो हँसती थी न!  तो लगता था जैसे मानो मोहल्ले की मंदिर में आरती हो रही हो. बिलकुल पवित्र हंसी थी उसकी. मैं शाहरुख खान की तरह उसका नाम पुकारना चाहता था पर "ओम नम: शिवाय" बोल बैठता था. उसका और मेरा परिवार शिव जी का भक्त था. दोनों ब्राह्मण परिवार थे.

वो निराला चौक से अपने घर के लिए मुड जाती थी और मैं हनुमान जी की मंदिर की ओर मुड जाता था. क्योंकि मैं उसके पीछे ये कह कर आता था की मुझे हनुमान जी के दर्शन करने जाना है. हर दिन विदा होते हुए "आई लव यू" कहने का मन करता था पर "जय श्री राम" कह बैठता था. वो समय, समय जैसा नहीं था, वो कबूतर का पंख था जो थोड़ी सी हवा लगने पर फुदकने लगता था. पकड़ना मुश्किल था उन दिनों मुझे भी और मेरे समय को भी.....अरे भाई  मैं जनता हूँ की मैं सिविल लाइन में खड़ा हूँ और मेरे आस-पास कोई नहीं है. जो थी वो जा चुकी है. मैं छ: साल पीछे कहीं पर उलझा हुआ हूँ. हवा पानी हो चुकी है और रोड से सारी गाडियां गयाब हो गयी है. मैं जो एक पेड़ की तरह खड़ा था वो साइकिल में सफर कर रहा हूँ और वो लड़की जो कार में अभी-अभी चली गयी है. वो साइकिल से घर लौट चुकी है. तुम मुझे वापस बुलाना चाहते हो और सिविल लाइन में फैले हुए बवाल को खतम करना चाहते हो पर मैं एक भँवर में फंस चूका हूँ और फिलहाल वापस नहीं आ पाउँगा.ये मेरी मजबूरी भी है और मेरी इच्छा भी.

         मेरी आँखों में दृश्य बदल रहे हैं और अब मैं हमारे कसबे के सबसे व्यस्त चौराहे से  कोयले की बोरी लिए हुए गुजर रहा हूँ मेरे दिमाग में एक तस्वीर है जो उस लड़की की है जिसे मैं बचपन में प्यार करता था. ये बात और है कि उस समय मुझे प्यार की स्पेलिंग भी नहीं मालूम थी. यही कोई दूसरी या तीसरी कक्षा रही होगी. उस लड़की के बाल मुझे बहुत अच्छे लगते थे और जब मैं उसे याद करता था तो मेरी आँखों में उसके बाल ही दिखाई देते थे. मैं उसे एक कविता समझता था और उसे पढना चाहता था। उसे नए सिरे से रचना चाहता था। शायद इसीलिए मैं बचपन से ही कवी बनना चाहता था, बिना ये जाने हुए की कवी कोई बनता नहीं समय लोगों को कवी बना देता है। वो जब हंसती थी तो ब्रम्हांड के सारे नियम टूट कर बिखर जाते थे और एक आह सी उठती थी. जो प्रकृति स्वयं उसके सौन्दर्य से इर्ष्या करके भर रही होती थी. वो कुल मिला के बहते हुए पानी की धारा थी और मैंने उस पर कुछ लिखना चाह था. शायद लिख भी दिया था पर पढ़ नहीं पाया और पानी आगे बह गया था। बह कर कहाँ गया पता नहीं पर मैं प्यासा हूँ, था और रहूँगा उस पानी के लिए जिसकी सतह पर मैंने समय को कविता बना कर लिख दिया था। मैंने खुद को गढ़ा था उसकी हर एक बूँद में। उस पानी की धार जैसी लड़की का नाम 'स्नेहा' था. वो कहाँ की थी पता नहीं पर रहती मेरे दिल में थी.

 कक्षा तीन तक जिंदगी अपनी रफ़्तार में चल रही थी. सुबह माँ की डाँट उठाती थी और शाम को खेल की थकान सुला देती थी. दिन मनो शुरू होते ही खतम हो जाया करता था. पढाई करना एक औपचारिकता थी जिसे मैं औपचारिक रूप से ही निभा रहा था. रोज मैडम की डाँट-मार मिलती थी और वो भी जिंदगी का हिस्सा हो गयी थी. पर स्नेहा के आने के बाद मैं पढाई को पढाई की तरह करने लगा था. क्योंकि यही एक रास्ता था उसके करीब जाने का, उससे रिश्ता बनाने का. इन सब के बीच दो साल बीत गए और मैं पांचवीं पास करके सरकारी कालेज में अपनी बारहवीं तक की पढाई के लिए चला गया. स्नेहा आठवीं तक वहीँ पढ़ती रही. स्नेहा के पास मेरा जैसे कुछ छूट गया था. मैं नहीं जनता क्या था वो? पर उसे देखने की दिल में उन दिनों एक अजीब सी उलझन रहा करती थी. मैंने तब तक प्यार का नाम भी नहीं सुना था. इसलिए मैं उसे प्यार नहीं कह पाया था. वो क्या है ? या क्या हो रहा है? मैं नहीं जनता था. मैं रोज लंच के बाद कालेज की दिवार फांद कर उसे देखने के लिए भाग आता था. मैं उसका पीछा करते हुए उसके घर तक जाता और उसे तब तक निहारता रहता जब तक वो घर के भीतर नहीं चली जाती.तीन साल तक मेरी यही दिनचर्या रही. फिर आठवीं की छुट्टियाँ हुई और वो जो उन छुट्टियों में कहीं गयी फिर कभी नहीं आई. मैं उसे तलाशता रहा पर कभी नहीं मिल सका.  





Thursday, February 7, 2013

ये समय नारी मुक्ति का इतिहास लिखने का समय हैं....

कश्मीर की वादियों में इन दिनों सबसे बड़े मुफ्ती बशीरुन्दीन अहमद की जहरीली आवाज़ गूंज रही है. आबो-हवा में संगीत, कला, प्रतिभा और सपनों का दम घोट देना वाला फ़तवा तैर रहा है. लड़कियों के एक मात्र बैंड “प्रगाश” को बंद करने के लिए कट्टरपंथियों ने लामबंदी कर ली और हदें तोड़ते हुए उन लड़कियों को सोशल नेटवर्किंग साईट पर बलात्कार तक की धमकी तक दे डाली. डरी-सहमी लड़कियों को अपना बैंड बंद करने और कभी गाना न गाने का फैसला लेना पड़ा.

इस्लामिक संघटन दुश्तकान-ए-मिल्लत ने बैंड में शामिल लड़कियों के परिवार का सामाजिक बहिष्कार कर दिया और इसी के साथ एक बार फिर साबित हो गया कि कोई भी धर्म कभी भी लड़कियों और महिलाओं को बराबर का दर्जा नहीं दे सकता. चाहे वो हिंदु धर्म हो या इस्लाम या फिर दुनिया का कोई और धर्म हो. मुझे दुःख होता है ये देख कर कि जिन प्रतिभाओं को सर आँखों पर बिठाना चाहिए था उन्हें समाज बलात्कार की धमकियाँ दे रहा है. जिनकी आवाज़ सात समंदर पार जा सकती थी वो बंद दरवाजे में गुट रहीं हैं. ये कैसा धर्म है? ये कैसा समाज है? जहाँ लड़कियां खुद ही खुद में कैद कर दी जातीं है. और उनकी आवाज़ तक नहीं निकलने दी जाती. चाहे किसी खाप का सरपंच हो या मंदिर-मस्जिद का पुजारी-मुल्ला सब के सब हांथों में जंजीरें लिए लड़कियों की प्रतिभा, क्षमता, और आजादी को कैद करने को तैयार पाए जाते हैं.  “प्रगाश” का बंद होना एक ऐसी सांकेतिक घटना है जो ये दिखाती है कि समाज में लड़कियों की आज़ादी पर कितने कड़े पहरे हैं और हमारे देश की आधी आबादी, कितने तरह-तरह की जंजीरों में कैद है

कोई लड़की बढ़ कर ये पूछ सकती है कि मेहँदी हसन, गुलाम अली, रहत फ़तेह अली खान, नुसरत फ़तेह अली खान, आतिफ असलम जैसे पुरुष गायकों पर कभी फ़तवा जारी क्यों नहीं किया गया. उनसे कभी क्यों नहीं कहा गया कि संगीत इस्लाम में हराम है. क्यों ?....क्योंकि वो पुरुष थे?
मैं जनता हूँ उस लड़की के सवालों का कोई जवाब न मुफ्ती साहब के पास होगा और न किसी धर्म के पास. जवाब सब जानते है. लड़की को “लड़की” और लड़के को “लड़का” समझने वाला समाज दोनों को बराबरी का दर्जा नहीं दिला सकता.

इस समाज में जिस दिन से कोई लड़की कन्धों पर दुपट्टा लेने लगती है उसी दिन से वो एक वस्तु हो जाती है जो छाती, कमर के नीचे, और टांगों के बीच के हिस्से में बंटी होती है. उस दिन से माँ उसे परियों की कहानियों के बजाय कपडे पहने, अपने अंगों को ढकने, बात करने, चलने, देखने, हँसने, मुस्कुराने के तरीके समझाने लगती है. तो बाप की नज़र, बागबान की नज़र से कोतवाल की नज़र हो जाती है जिसे हमेसा ये लगता है कि उसकी लड़की किसी और का धन है और उसे इसकी हिफाजत करते हुए उन्हें सौंप देना है जिनकी ये अमानत है. तभी तो बात-बात पर उसे जाता दिया जाता है कि बेटी तू पराया धन है, तुझे कहीं और जाना है. उसका भाई जो कल तक हमसाया था, वो अचानक रखवाला बन जाता है और बहन की साँसों और दिल की धडकनों तक पर पहरा देना चाहता है. और इस तरह लड़कियां अपने ही घर में कैद कर दी जातीं हैं.

मुझे याद हैं बचपन के वो दिन जब गर्मियों में लाईट चले जाने पर मोहल्ले भर की लड़कियां गली भर में दौड लगातीं थीं. सावन में झूले डाले जाते थे. लुका-छिपी से ले कर दौड़ा-भागी तक न जाने कितने खेल खेला करते थे हम. पर आज जैसे गली में कोई लड़की ही नहीं है. सब कहते है कि जमाना खराब हो गया है. मैं कहता हूँ, हम खराब हो गए हैं और हमारी सोच खराब हो गयी है. जहाँ हम लड़कियों को इंसान के बजाए खुली तिजोरीघर की इज्ज़तपराया धनखानदान की शान और एक वस्तु समझ बैठे हैं. आज जवान होते ही लड़कियों के  कट्टो,गिलहरीछम्मक-छल्लोरानीबिल्लोकंटासकटपीसमालशीलामुन्नी, जैसे न जाने कितने  नाम पड़ जातें हैं और उनके असली नाम गुमनाम हो जाते है. राह पर चलते हुए से ले कर बस में सफर करते हुए तक उन्हें उन्ही नामों से पुकारा जाता है.

ये गज़ब का खतरनाक समय है जो लड़कियों से उनकी कला, प्रतिभा, आज़ादी और पहचान सब कुछ  छीन लेना चाहता है. इस कठीन दौर में जरूरत है कि देश की महिलाशक्ति  एकजुट हो जाये और इसे अपनी मुक्ति के संग्राम की तरह समझे, हर गलत चीज़ का प्रतिकार करे, विरोध करे. तब तक, जब तक उसके पैरों की सारी बेडियाँ कट न जाएँ. ये समय नारी मुक्ति का इतिहास लिखने का समय हैं. 

अनुराग अनंत 


दैनिक जागरण (i-next) में 19-2-2013 को लेख प्रकाशित पढ़ने के लिए लिंक क्लीक http://inextepaper.jagran.com/90805/I-next-allahabad/19.02.13#page/11/1



Wednesday, January 2, 2013

स्वतंत्रता बनाम स्वछंदता


जब सारा देश नए साल का स्वागत जश्न के माहौल से नहीं बल्कि आँखों में आंसू लिए इस संकल्प के साथ कर रहा था कि अब देश की किसी भी लड़की या महिला के साथ बलात्कार जैसी आमानवीय घटनाएं नहीं होने देंगे. उसी समय गुडगाँव के एक समारोह में कला के नाम पर अश्लील कुंठाएं बेचने वाला एक गायक अपने फूहड़ गानों का दरबार सजाये बैठा था. ये वही था जो ‘’मैं हूँ बलात्कारी’’ जैसे क्रूर और अश्लील गाने गाता है और विडम्बना ये कि प्रसिद्धि और लोकप्रियता भी हासिल कर लेता है. दुःख तो तब होता है जब इसके चाहने वालों में लड़कियों की भी भारी संख्या देखी जाती है.

दिल्ली की सड़कों पर जो युवा “ वी वांट जस्टिस” के नारे लगते, पुलिस की लाठी खाते पाए जाते है वही इसके गानों और वाहियात कार्यक्रमों में थिरकते और इसकी एक दरश को तरसते भी मिलते है. हैरानी तब और बढ़ जाती है. जब देश की सरकारें इसे सरकारी कार्यक्रमों में बुलातीं है और मंचों पर मुख्यमंत्री इसके साथ नाचती हुई पायी जातीं है. सच कहता हूँ यकीन नहीं होता कि 21 वीं सदी में क्या यही कला और कलाकार हैं? अगर हाँ तो मुझे लगता है कि कला और कलाकार दोनों की संवेदना मर चुकी है. जब मैं ये सब कुछ सोच रहा हूँ तब मेरे दिमाग में कालीदास से ले कर सफ़दर हाश्मी तक के नाम आ रहे है और मन में वन्देमातरम से सरफरोशी की तमन्ना तक सब कुछ गूँज रहा है.

हिन्दुस्तान के मनोरंजन उद्द्योग, खास तौर पर फिल्मों ने महिलाओं के साथ ज्यादातर अन्याय ही किया है. एक महिला पर बीतने वाली सबसे भयानक ट्रेजडी “बलात्कार” को फिल्मों में सक्सेस कंटेंट और मसाला एलिमेंट की तरह यूज किया जाता रहा है. और लगभग हर फिल्म में महिला को उसकी सोकॉल्ड इज्ज़त लुटने के बाद हासिए  पर धकेल कर फिल्म को इज्ज़त लूटने वाले पुरुष और इज्ज़त बचने वाले पुरुष का संघर्ष मात्र दिखया जाता रहा है. इन फिल्मों और विज्ञापनों ने कहीं न कहीं महिलाओं और उनके शरीर को एक उत्पाद की तरह पेश करने और उसे मुनाफे के लिए प्रयोग करने की कोशिश की है. तभी कहीं पंखे के विज्ञापन में फ्रांक उड़ाती लड़की तो कहीं परफ्यूम के विज्ञापनों में लड़के की ओर पागलों सी भागती, लिपटती, यहाँ तक कि शर्ट फाड़ती लड़कियां दिखाई गयी है. उदाहरणों की  फेहरिस्त बहुत लंबी है.

फ़िल्मी गानों के जरिये भी महिलाओं को चिकनी चमेली बना कर पव्वा पिलाया गया तो कभी शीला और मुन्नी नाम की लाखों लड़कियों की जिंदगी में जहर घोल दिया गया. टिंकू जिया को इश्क का मंजन कराती लड़की से ले कर फेविकोल से सीने में तस्वीर चिपकाने की नसीहत देने वाली तक कोई भी लड़की इस देश की आम लड़की नहीं लगती तो फिर न जाने ये कला और कलाकार कौन सी लड़की की तस्वीर दिखा रहे है जो हमारे समाज के लिए बिलकुल ही “एलियन” है.

मुझे तब बिलकुल आश्चर्य नहीं होता जब दिल्ली बलात्कार कांड के विरोध प्रदर्शन में शामिल एक लड़की अखबार में ये बयान देती है कि हनी सिंह अश्लील गाने गाता है पर उसमे सिर्फ मनोरंजन है और कुछ नहीं...मैं जानता हूँ कि आजकल की पीढ़ी कला के नाम चल रहे “कल्चरल इम्पिरिलिजम” को नहीं समझ पा रही है. तभी तो एक छोटी सी बच्ची गुड़ियों से खेलने की उम्र में हॉट दिखना चाहती है, एक छोटा बच्चा “मैं हूँ बलात्कारी” गाना गाते पाया जाता और बड़े हो कर हनी सिंह जैसा बनना चाहता है. जिस उम्र में हम सिर्फ फ्रेंड बनाया करते थे उस उम्र में ये बच्चे बॉय फ्रेंड और गर्ल फ्रेंड बनाने में लगे है. अब इसे बदलती पीढ़ी का बदलाव कहें या बहकती पीढ़ी का बहकाव.

ये वो समय है जब पूनम पांडे, राखी सावंत और उनके प्रसिद्धि पाने के सस्ते तरीके लड़कियों को लुभाने लगे हैं और वो सत्ता, ताकत, रुतबा और दौलत के लिए फिजा मोहम्मद, भंवरी देवी, मधुमिता शुक्ला और गीतिका शर्मा बन कर अपने दुखद अंजाम अंत तक पहुँच रही है.

आज दामिनी बलात्कार कांड ने पूरे देश को जगा कर रख दिया है इसलिए जरूरी है कि हम हर विषय और हर स्तर पर चर्चा करें और जहाँ से भी हमारी वैल्यू सिस्टम में सेंध लग रही हो उसे ठीक करें. हमें स्वतंत्रता और स्वछंदता में भेद करना होगा.ये जानना होगा कि जिम्मेदार आज़ादी स्वतंत्रता होती है और बहकी हुई आज़ादी स्वछंदता. स्वतंत्रता के नाम पर समाज में गलत मूल्य स्थापित करने वाली हर चीज का प्रोटेस्ट करना होगा चाहे वो कला हो या कलाकार. तभी हम एक ऐसा हिन्दुस्तान बना पाएंगे जो सारे जहाँ से अच्छा होगा.

 तुम्हारा अनंत  



दैनिक जागरण (i-next) में 04-1-2013 को लेख प्रकाशित]  पढ़ने के लिए लिंक क्लीक करें http://inextepaper.jagran.com/79704/I-next-allahabad/04.01.13#page/11/2