Tuesday, January 16, 2018

ख़याली ख़ब्त भाग 2

असंतोष बहुत जरुरी है 

संतोष, सिर्फ एक शब्द नहीं है. ये अपने आप में एक दार्शनिक राजनीति है. जो आपकी चेतना को बदलकर आपके भीतर एक ऐसी सांस्कृतिक समझ रचती है कि आप हिसाब करना और हिसाब लेना भूल जाते हैं फिर कहीं से कोई बोलता "कोऊ नृप होय हमें का हानि" और आप संतोष कर लेते हैं. काम करते जाते हैं फल की चिंता नहीं करते क्योंकि आपके दिमाग में "कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन" गूंजता है. कर्म करते जाओ, फल की चिंता मत करो. फल की चिंता क्यों न करें? क्योंकि इससे असंतोष होगा और चूंकि संतोषम परमं सुखम है. इसलिए असंतोष से बचना चाहिए ? संतोष का पाठ इसलिए सिखाया जाता है कि हम पलट कर वार ना करें ? सवाल न पूछें ? हिसाब न करें ? न सोचें कि मेरे साथ ये हुआ तो क्यों हुआ, कैसे हुआ ? बस इसे बिधि का बिधान मान कर परम सुख में डूब जाएँ. रात में रोते हुए गाना गायें "जाहे विधि राखे राम, ताहि विधि रहिये" संतोष शोषक को शोषण की वैध्यता देता है और आप का मौन समर्थन भी मुहैया कराता है.

संतोष शोषितों की पाँव की बेडी है. दुर्बलों, अज्ञानियों और मरती हुई सभ्यताओं का गुण है संतोष. जो सबल है उसे सतोष का पाठ नहीं पढाया जाता. जो दुर्बल है उसे ही संतोष का सबक रटाया जाता है ताकि शोषण के विरुद्ध उठने वाली आवाज पनपने से पहले ही ख़तम कर दी जाए.

इस पित्रसत्तात्मक समाज में घर पर सबसे ज्यादा संतोष का सबक बेटी को ही पढाया जाता है. बेटे को दूध और बेटी को संतोष, बेटे को छूट और बेटी को संतोष. पति को मान-सम्मान, नाम और मुखिया होने का गौरव और पत्नी को संतोष. दरअसल संतोष ही वो सांचा है जिसमे ढाल कर एक लड़की को लड़की और एक औरत को औरत बनाया जाता है.

सारा संतोष जातियों में बंटे इस समाज में वंचितों-दलितों के खाते में ही क्रेडिट कर दिया गया है. संतोष का सारा एजुकेशनल माड्यूल दबी कुचली जातियों को ही पिलाया जाता रहा है. और कहा जाता रहा 'समरथ को का दोष गोसाईं' समरथ के लिए संतोष नहीं है उसके लिए दोषमुक्त निरंकुश मनमानी है.

संतोष का सांचा जब टूटता है तभी कुछ नया होता, कुछ रचनात्मक होता है, कुछ बेहतर, कुछ बड़ा होता है. संतोष आपको भोथरा बना देता है. जितना किया उसे ज्यादा करना है. जितना पूछा, उससे ज्यादा पूछना है. जितना जाना उससे, ज्यादा जानना है. जितना बेहतर हुए, उससे ज्यादा बेहतर होना है. जितना मनुष्य हुए, उससे ज्यादा मनुष्य होना है. ये भाव संतोष के सांचे के टूटने के बाद ही पाया जा सकता है.

ये सब कहने पर कोई पीछे से टोक कर कह सकता है कि संतोष नहीं होगा तो लोग एक दुसरे का हक मारने लगेंगे. एक दुसरे का गला काट देंगे. विनाश आ जायेगा. संतुलन बिगड़ जायेगा. मनुष्य मनुष्य नहीं रह जायेगा. मुझे उनसे बड़े आदर से कहना है कि देखिये महोदय ये सबकुछ संतोष शब्द के भ्रम जाल के चलते ही हो रहा है. और इन्हें हटाने के लिए संतोष शब्द के विलोप की बहुत बड़ी जरुरत है. किसान लगातार आत्महत्याएं कर रहें है. उनका हक मारा जा रहा है. पर वो संगठित होकर आवाज नहीं उठा रहे बल्कि संतोष से जान दे रहें हैं. यही हाल मजदूर, शोषितों, वंचितों और आम आदमी का है, महिलाओं का है, बच्चों का, बूढों का है.

दरअसल असंतोष ही सर्जना का मूल होता है. नए समाज के सृजन के लिए असंतोष का होना जरुरी है. एक असंतोष जो बेहतर से बेहतर की ओर ले जाए. सीमायों के विस्तार और नए वितान के निर्माण के लिए एक असंतोष सबके दिल में होना ही चाहिए.

अनुराग अनंत

#ख़याली_ख़ब्त

Friday, December 29, 2017

ख़याली ख़ब्त भाग 1

रात को नींद नहीं आती. मुक्तिबोध को भी नहीं आती थी. और मजाज़ को भी नहीं आती थी. रात भर मुक्तिबोध अपने चौकीदार दोस्त के साथ बीड़ी फूंकते हुए टहलते रहते थे. मजाज़ भी तो रात में जागते-टहलते खुद के दिल से ही पूछते रहते थे "ए गम-ए-दिल क्या करूँ, ए वहशत-ए-दिल क्या करूँ. खैर रात गुरु होती है जैसे जैसे घंटे बदलते जाते हैं वो अलग अलग सबक-पाठ पढ़ाती है. ठीक वैसे जैसे बचपन में स्कूल में पीरियड चेंज होता था. एक सब्जेक्ट के बाद दूसरा सब्जेक्ट पढ़ते थे. ठीक वैसे ही, रात, रात भर पढ़ाती रहती है.

रात को जो लोग जागते हैं वो दुनिया को बेहतर, ज्यादा बड़ी और खूबसूरत बनाने का सपना देखते हैं. वो कुछ रचने, कुछ सृजने के लिए, मनुष्य से मनुष्यतर होने के लिए जागते हैं. और रात को जो लोग जागते है उनमे इंसानों की फिकर थोड़ी ज्यादा होती है.

रात को प्रेमी जागते हैं, विद्यार्थी-शोधार्थी जागते हैं, पागल जागते है, कवि-कलाकार जागते हैं, वो समर्पित कार्यकर्ता भी जागते हैं जो दुनिया बदलने के लिए दीवारों पर नारे लिखते हैं, वो मजदूर भी जागते हैं जो कुर्सी पर बैठे नेताओं की झूठ को पेट की रोटी के खातिर शहर की दीवारों पर चस्पा कर देते हैं. वैश्यायें भी जागतीं हैं, समाज के विष को गले तक भर लेने के लिए. उस कुंठा को पी जाने के लिए जो अगर नहीं ख़तम की गयी तो तथाकथित इज्जतदार घरों में घुस जाएँगी. राम राम करते हुए वृद्ध भी जागते हैं और प्राश्चित की एक मध्हम सी आंच में सिकते रहते हैं. दुनिया के कल्याण और खुद के मोक्ष की सिफारिश में रफ्ता रफ्ता सांस दर सांस तमाम होते रहते हैं.

जागते तो चोर-डकैत, अपराधी भी हैं पर ये लोग थीसीस की एंटीथीसीस की तरह होते हैं. ये लोग दिन से घसिट कर रात में आ जाते हैं और चूंकि रात सबको आजादी देती है. ये लोग भी आजाद महसूस करने लगते हैं. दिन से घासिट कर रात में आने का मतलब ये कि दिन में जो काम पूरी व्यवस्था, पूरा तंत्र करता है. ये चंद अपराधी वही काम रात में करते हैं. चोरी, डकैती, लूट और अपराध का ये रूप और इसकी मात्र तो सफ़ेदपोश चोरी, डकैती, लूट और अपराध से तो बहुत कम है. दिन में तो हर कदम पर किसी न किसी तरह आपको लूटने-ठगने के लिए लोग बैठे रहते हैं. पैसे से लेकर भावनाएं तक दिन की उजाले में ही लूट ली जाती हैं. ये जो चोर-डकैत और अपराधी हैं न, ये रात का अँधेरा हैं, डर हैं और अगर ये न होते तो रात, रात जैसे नहीं होती. वो दिन हो जाती, व्यस्त, काम करती हुई. खुद को तमाम करती हुई.

ये एक उलझी हुई सी बात है. दिल के एक उलझे हुए कोने से उठती हुई भाप के जैसे. एक आईने की पीठ पर पड़ी खरोच के जैसे, न पारदर्शी, न परावर्ती, न आपको आपका चेहरा दिखा सकती है, न आरपार झंका सकती है.

अनुराग अनंत

#ख़याली_ख़ब्त

Monday, June 12, 2017

वो शायर, जो चाँद को महबूब नहीं मामा कहता था..!!

अजीब आदमी था वो, जो उड़ती हुई जुल्फों की लय पर मचलते हुए कुंआरियों के दिल की खबर रखता था। जो घडी की टिक टिक की आवाज़ का घेरा तोड़ कर, घोड़े को टिक टिक टिक चलने के लिए कहता था और बच्चों के बचपन के खेलों में घुल जाता था। वो दूर चाँद से महबूब का नहीं मामा का रिश्ता बनता था और हिंदुस्तान भर के बच्चे चाँद को मामा मान बैठते थे। उसने माओं की भावनाओं का अमर अनुवाद किया और हिन्दुस्तान के घरों में गायी जाने वाली सबसे लोकप्रिय लोरी रच दी। हमने बचपन में अपनी माओं से कभी न कभी "तुझे सूरज कहूँ या चंदा/ तुझे दीप कहूँ या तारा" गीत सुना होगा और मन ही मन सूरज, चंदा, दीप, सितारा सब एक साथ होना महसूस किया होगा। बात बचपन की बगिया से निकल कर, जवानी की पगडंडियों से होती हुई, वतन की गलियों पर निसार होने तक पहुंची तो यही शख्स भारत माँ से कहता हुआ पाया गया "मेरा रंग दे बसंती चोला"।  ये गीत "शहीद" फिल्म में भगत सिंह के किरदार पर फिल्माया गया और उसके बाद हम उस क्षण को महसूस कर पाए जिसमें  भगत सिंह बसंती चोले की लालसा में हंस पर फांसी पर झूल गए। 

ये उस शख्स का तारुफ़ है, जिसका नाम हम भले ही ना जानते हों पर उसके लिखे गीत हमारी स्मृतियों में इस तरह समाए हैं जैसे सीने में सांस समाई होती है। हम बात कर रहे हैं, फ़िल्मी गीतकार प्रेम धवन की। आज उनका जन्म दिन है। आज ही के दिन यानी 13 जून 1923 को उनका जन्म पंजाब के अम्बाला में हुआ था (आज ये जिला हरयाणा में है)। इनके पिता जी अंग्रेज सरकार में जेल सुपरिटेंडेंट थे इसलिए उनका तबादला होता रहता था जिसकी वजह से प्रेम धवन को भी देश के कई हिस्सों को देखने का मौका मिला। प्रेम धवन ने देश को जाना पहचाना और उसकी आत्मा की आवाज का अनुवाद करने में सफल रहे।  शायद यही वजह रही है कि प्रेम धवन के खाते में बेहतरीन देशप्रेम के गीत आये। 

प्रेम धवन ने लाहौर के मशहूर एम. सी. कालेज से ग्रेजुएशन किया, जहाँ उनके सहपाठी मशहूर शायर और गीतकार साहिर लुधियानवी थे और पूर्व प्रधानमंत्री आई. के. गुजराल उनके सीनियर थे। लाहौर में कालेज के दिनों से ही प्रेम धवन और साहिर साहब वामपंथी प्रगतिशील धारा से जुड़ गए और छात्र राजनीति भी की, फिर बाद में उन्होंने रचनात्मक प्रतिरोध की धारा को अपनी अभिवक्ति का माध्यम चुना और इप्टा में काम करने बम्बई चले आये। यहाँ उन्होंने ढंग से लिखना सीखा। इप्टा उस दौर में बम्बई में काफी सक्रिय हुआ करता था। प्रेम धवन ने इप्टा के नाटकों के लिए जी भर की गीत लिखे और इसी दौरान उन्होंने पं. रवि शंकर से संगीत एवं पं.उदय शंकर से नृत्य की शिक्षा ली। इस तरह प्रेम धवन एक गीतकार, अभिनेता, कोरियोग्राफर और कम्पोजर बन गए। उन्होंने फिल्मों में इन सारे क्षेत्र में काम किया लेकिन उनका एक गीतकार के रूप में विशेष उल्लेखनीय काम रहा। 

प्रेम धवन साहब की फिल्मों में इंट्री 1946 की फिल्म पगडंडी में संगीतकार खुर्शीद अनवर के सहायक के तौर पर होती है। बाद में 1948 में वो बॉम्बे टाकीज में मुलाजिम हो जाते हैं और फिल्म "जिद्दी" के लिए गीत लिखते हैं। ये उनकी बतौर गीतकार पहली फिल्म थी और किशोर कुमार की भी। किशोर कुमार ने भी पार्श्व गायक के बतौर इसी फिल्म से शुरुवात की थी। प्रेम धवन की शुरुवात उतनी अच्छी नहीं रही और उन्हें पहचान के संकट से लगभग सात सालों तक जूझना पड़ा।    
    
इसी बीच उनके साथी साहिर लुधियानवी काम की तलाश में बम्बई आये और प्रेम धवन ने उन्हें फिल्म निर्देशकों और संगीतकारों से मिलवाया। साहिर अपने कलम की ताकत के दम पर फ़िल्मी जगत के रास्ते पूरे देश के सर पर चढ़ कर बोलने लगे थे। उनकी गिनती मजरूह सुल्तानपुरी, शैलेन्द्र, राजेंद्र कृष्ण, हसरत जयपुरी और शकील बदायुनी के साथ की जाने लगी थी पर प्रेम धवन के लिए अभी भी इन सितारों के बीच अपनी अलग चमक को परिभाषित करना बाकी था। हलाकि प्रेम धवन इसबीच काम पाते रहे और डाक बाबू, ठोकर, आसमान और मोती महल जैसी फिल्मे की पर उनका काम कुछ हलचल नहीं मचा सका और न इंडस्ट्री का और न ही देश का ध्यान प्रेम साहब की तरफ गया।  

फिर साल 1955 आता है और आती है, गीता बाली और राजेंद्र कपूर की फिल्म "वचन" जिसमे प्रेम साहब का गीत "चंदा मामा दूर के...." खासा मशहूर हुआ। लोगों ने पहली बार चाँद से एक नया रिश्ता बनाया और चाँद जवानों के लिए अगर महबूब था तो बच्चों के लिए वो मामा हो गया। ये गीत ऐसा मशहूर हुआ कि इसके बाद चाँद पर बैठी सूत कातती बुढ़िया की कहानी कहीं खो सी गयी और चाँद की आज़ाद पहचान बच्चों के मामा के रूप में अमर हो गयी। ये पहला मौका था जब न सिर्फ फ़िल्मी जगत बल्कि पूरा भारतीय मानस प्रेम धवन की कलम के प्रभाव में था। प्रेम धवन ने दो साल बाद, 1957 में आयी फिल्म नया दौर के लिए भी गीत लिखे। इस फिल्म में दिलीप कुमार पर फिल्माया गया गीत "उड़े जब जब जुल्फें तेरी/ कुवांरियों का दिल मचले" ऐसा मशहूर हुआ कि उस दौर के बांके जवान सच में जुल्फें रख कर घूमने लगे थे, इस आस में कि कोई उनके लिए भी कभी ये गीत गाये।  इस गाने में प्रेम धवन साहब ने कोरियोग्राफी भी की थी। 

प्रेम धवन के करियर के लिहाज़ से साल 1961 और 1965 बहुत विशेष रहे। साल 1961 में आयी फिल्म काबुलीवाला के लिए "ए मेरे प्यारे वतन, ऐ मेरे बिछड़े चमन, तुझपे दिल कुर्बान" गीत पूरे देश की जुबान पर चढ़ गया। लोग इसे गाते और अनायास ही उनकी आँखों में आंसू आ जाते। प्रेम धवन ने वतन की माटी के लिए उठती हुई हूक को गीत कर दिया था, इसीलिए ये गीत सीधा दिल पर टकराता था, आज भी जब इसे सुनो तो ये एक अज़ब सी खनक के साथ दिल पर जा कर लगता है। इसी साल फिल्म "हम हिंदुस्तानी" आयी जिसमे प्रेम साहब ने गीत लिखा "छोड़ो कल की बातें, कल की बात पुरानी/ नए दौर में लिखेंगे, मिल कर नई कहानी" ये गीत मानो आज़ाद भारत के स्वपन और संकल्प का मिश्रित रूप था। ये गीत उस दौर के भारत की राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक स्वप्न की अभिवक्ति बन कर उभरा। 

साल 1965 में मनोज कुमार ने प्रेम धवन को शहीद फिल्म का एक तरीके से कर्णधार ही बना दिया। भगत सिंह के जीवन पर आधारित इस फिल्म में प्रेम साहब न सिर्फ गीत लिखे बल्कि संगीत और नृत्य निर्देशन भी किया। इस फिल्म का "जट्टा पगड़ी संभल" , ऐ वतन, ऐ वतन, हमको तेरी क़सम और मेरा रंग दे बसंती चोला, आज भी देश प्रेम की अभिवक्ति के सशक्त माध्यम हैं। इनको सुन कर आज भी दिल देश भक्ति के ज़ज़्बे से भर जाता है। इसके अलावा इसी फिल्म का एक गीत "जोगी, हम तो लुट गये तेरे प्यार में... "  गज़ब का लोकप्रिय हुआ था। इसकी असर और उम्र का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि  उत्तर प्रदेश में योगी आदित्य नाथ की सरकार बनी तो ज्यादातर समाचार चैनलों और सोशल मीडिया पर ये गीत खूब बजाया गया। इस फिल्म के अलावा भी प्रेम धवन साहब ने रात के अंधेरे में (1969), पवित्र पापी (1970), मेरा धरम, मेरा देश (1973) जैसी कई और फिल्मों के लिए संगीत निर्देशन किया। प्रेम धवन साहब ने आरज़ू (1950), दो बीघा जमीन (1953), नया दौर (1957), सहारा (1958 ), वक़्त (1965) जैसी फिल्मों के लिए कोरियोग्राफी भी की। साल 1970 में भारत सरकार ने प्रेम धवन को फिल्मों में उनके योगदान के लिए भारत के चौथे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्मश्री से समान्नित किया। प्रेम धवन ने अपने करियर में लगभग 300 फिल्मों के लिए गीत लिखे और 50 से ज्यादा फ़िल्मो में संगीत भी दिया। अपने करियर के दूसरे हिस्से में जब "किसान और भगवान"  (1974), फ़र्ज़ और कानून (1978), क्वाजा अहमद अब्बास की नक्सलाइट्स (1980), गंगा मांग रही बलिदान (1981) जैसी फिल्मों में प्रेम धवन कुछ ख़ास नहीं कर पाए और उनके संगीत और गीत उस ऊंचाई पर नहीं दिखे तो उन्होंने धीरे धीरे फिल्मों से किनारा कर लिया और अपना सारा समय पढ़ने लिखने और इप्टा की गतिविधियों में लगाने लगे। लगभग चार दशकों तक भारतीय मानस के अंतर को आवाज़ देने वाला ये जीवंत गीतकार 07 मई 2001 को मृत्यु की सैया पर चिर निद्रा में सो गया, पर आज भी इस महान गीतकार के गीत भारतीयों के ह्रदय में जाग रहे हैं। फ़िल्मी गीत को लोक चेतना का स्वर देकर अमर कर देने वाले इस गीतकार का नाम इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है। जब जब हम भारतीय लोक की चेतना को खंगालेंगे, प्रेम धवन का चमकता हुआ नाम हमें वहाँ मिलेगा।  

अनुराग अनंत  

       

Sunday, June 4, 2017

वो शायर जो फ़िल्मी गाने लिखता था तो मुहावरे बन जाते थे..!!

वो जो गीत लिखते थे, उसके बोल लोगों की जुबान चढ़ कर मुहावरों में बदल जाते थे। उनके फ़िल्मी गीत हमारी भाषा का अकार बढ़ाते थे और हमारे एहसासों को व्यक्त करने का हमें एक नया तरीका दे जाते थे। याद करिए हमने ना जाने कितनी बार गुमसुम खड़े किसी अपने को "गुमसुम खड़े हो जरूर कोई बात है" कहते हुए छेड़ा होगा। जब हमारे बीच की कोई लड़की ज्यादा होशियारी करती हुई पायी गयी तो हमने उसके लिए "एक चतुर नार बड़ी होशियार" जुमला प्रयोग किया होगा। हमने अपने किसी ख़ास को इम्प्रेस करने के लिए "पल पल दिल के पास तुम रहती हो" वाला स्टेटमेंट भी चिपकाया होगा। ये सभी पंक्तियाँ फ़िल्मी गीतकार राजेंद्र कृष्ण के गीतों के बोल हैं। जो हमारी भाषा का हिस्सा होकर हमारे बीच मौजूद हैं। गीतकार राजेंद्र कृष्ण का जन्म  6 जून1919 को अविभाजित भारत के जलालपुर जाटां में हुआ था। आज ये स्थान पाकिस्तान में है। पर राजेंद्र कृष्ण के गीत भारत में भी हैं और पाकिस्तान में भी, बल्कि विश्व के हर उस कोने में राजेंद्र अपने गीतों के शक्ल में मौजूद हैं जहाँ हिंदी बोली समझी जाती है या फिर हिंदी बोलने समझने वाले लोग रहते हैं।

राजेंद्र कृष्ण का पूरा नाम राजेंद्र कृष्ण दुग्गल था। कविता का कीड़ा बचपन से काट गया था इसलिए मन बहुत कुछ कहना चाहता था। डायरियों के पन्नों पर मन का उलझाव दर्ज करते रहे और कविता, शायरी, ग़ज़ल जैसा कुछ रचने लगे। साहित्य ठीक से पढ़ा, जब 1942 में शिमला की म्युनसिपल कार्पोरेशन में क्लर्क हो गए। थोड़ी झिझक मिटी जो अख़बारों को कवितायेँ प्रकाशन के लिए भेजने लगे। धीरे धीरे भीतर का कवि आकार लेने लगा था। पर अभी भी वो विश्वास नहीं था कि छाती ठोंक कर कह सकें "हाँ ज़नाब शायर हूँ मैं" मंचों पर भी कविता पढ़ने जाने लगे और वाहवाही वहाँ भी मिली। पर बात वैसी नहीं थी जैसी राजेंद्र चाहते थे।  बात सन 1945-46 की है। उन दिनों शिमला में बहुत बड़ा मुशायरा हुआ करता था। जिसमे हिंदुस्तान (तब बंटवारा नहीं हुआ था ) के बड़े शायर पूरे देश से इकठ्ठा हुआ करते थे। वहां राजेंद्र साहब ने अपनी पहली ग़ज़ल पढ़ी और उस पर कुछ ऐसी दाद मिली की राजेंद्र साहब के दिल ने कह दिया "यार तुम पक्के वाले शायर हो" जब राजेंद्र साहब ग़ज़ल पढ़ चुके तो जिगर मुरादाबादी मंच पर पहुंचे। उनसे किसी ने कहा "जनाब आप इस नए शायर के कुछ गज़ब के शेर सुनने से रह गए" जिगर साहब साहब ने नवजवान शायर से फिर से शेर सुनाने को कहा, और जों ही राजेंद्र साहब ने मतला पेश किया "कुछ इस तरह वो मेरे पास आये बैठे हैं, जैसे आग से दामन बचाए बैठे हैं" इस मतले को सुनकर जिगर साहब से ऐसे और इतनी देर तक सर हिलाया कि राजेंद्र साहब ने तय कर लिया कि अब उन्हें नौकरी से इस्तीफा दे देना है और एक शायर की ही ज़िन्दगी जीनी है। राजेंद्र कृष्ण दुग्गल ने म्युनसिपल कार्पोरेशन के क्लर्क की नौकरी से इस्तीफा दे दिया और लेखक "राजेंद्र कृष्ण" मुंबई चले आये। उनके ज़हन में जिगर मुरादाबादी का दाद में देर तक हिलता हुआ सर था। जो हर वक़्त उनमे आत्मविस्वास जगाता रहता था। उन्हें कहीं भीतर बहुत गहरे में इस बात का विस्वास था कि जिगर साहब ने मान लिया है तो दुनिया भी मान ही लेगी।

इस बीच 1947  में देश आज़ाद हुआ और 1947 में उन्हें पहली फिल्म "जनता" पटकथा लिखने को मिली। उसी साल आयी किशोर शर्मा निर्देशित फिल्म ज़ंज़ीर के गीत भी लिखने को मिले। राजेंद्र कृष्ण साहब का पहला मशहूर गीत महात्मा गाँधी की हत्या के बाद लिखा गीत था।  जिसके बोल थे "सुनो सुनो दिनियावालों  बापू की ये अमर कहानी" ये गीत गाँधी जी के जीवन पर आधारित गीत था। जिसे बापू की हत्या के बाद पूरे देश ने करुण स्वर में गया। राजेंद्र कृष्ण ने भारत के रुंधे हुए गले को आवाज दे दी थी। पूरा भारत इस गाने की ताल पर रो पड़ा। इस गीत के बोल भारत के हर आंगन में गूंजे। इस तरह ये पहला मौका था जब राजेंद्र कृष्ण ने भारत की सामूहिक चेतना को आवाज़ दी थी। फिर इसके बाद ऐसे मौके आते रहे जब देश राजेंद्र कृष्ण के गीतों में लहराया, डूबा उतराया।

1948 में बनी फ़िल्म  "प्यार की जीतका सुरैया की आवाज़ में गाया गया गीत "तेरे नैनों ने चोरी किया मेरा छोटा सा जिया परदेसिया" देश में किसी लोक गीत की तरह गया गया। 1949 में फिल्म आयी "बड़ी बहन" जिसमे राजेंद्र कृष्ण का मशहूर गीत "चुप चुप खड़े हो जरूर कोई बात है, पहली मुलाकात है, ये पहली मुलाकात है" लता मंगेशकर और प्रेमलता की आवाज में गाया गया। इस गीत ने उस समय के युवाओं को दीवाना कर दिया। गली, नुक्कड़, चौराहों से लेकर मंदिर और कोठों तक ये गीत गाया गया कहीं इसे मूल रूप में गाया गया कहीं इसकी पैरोडी बना कर गाया गया। पूरा देश राजेंद्र कृष्ण की कलम के मोहपाश में बंध गया था। इस गीत की सफलता से खुश हो कर फ़िल्म के निर्माता-निर्देशक डी.डी. कश्यप ने राजेंद्र कृष्ण साहब को ऑस्टिन कार इनाम के रूप में दी। ये कार उस समय बड़े बड़े लोगों के पास नहीं हुआ करती थी।

1951 में आयी फ़िल्म  बहार का शमशाद बेगम का गाया गया गीत "सैंया दिल में आना रे, आके फिर जाना रे, छम छमाछम छम" इतना मकबूल हुआ कि उस समय की महिलाएं और प्रेमिकाएं अपने पति और प्रेमी से इसी गाने को गा के मनुहार करतीं थीं। आज भी कहीं करतीं ही होंगी। 1953 में फिल्म अनारकली आयी जिसके गीत भी राजेंद्र कृष्ण ने लिखे। गीतों ने लोकप्रियता के नए कीर्तिमान बनाये।  इस फ़िल्म में "जिंदगी प्यार की दो-चार घड़ी होती है, चाहे छोटी भी हो, ये उम्र बड़ी होती है" जैसे मशहूर और मार्मिक गीत थे। इसी साल फिल्म "लड़की" सिलीज हुई जिसमे एक से बढ़ कर एक गीत थे "मेरे वतन से अच्छा कोई वतन नहीं है/ सारे जहां में ऐसा कोई रतन नहीं है" ये गीत बहुत मशहूर हुआ। हर देशभक्त उस वक़्त इस गीत को गाता हुआ मिल जाता था। नारी सशक्तिकरण का एक गीत इसी फिल्म में था "मैं हूं भारत की नार, लड़ने मरने को तैयार, मुझे समझो ना कमजोर, लोगो समझो ना कमजोर" इस गीत को जितने बल के साथ राजेंद्र साहब ने लिखा था, उसी तेवर के साथ लता जी ने गाया भी था। पूरे देश में महिलाएं इस गीत से अज़ब सा तेज और ओज प्राप्त करतीं थीं। इस फिल्म में एक और अलहदा अंदाज़ का गीत गज़ब का मशहूर हुआ। गीत लता मंगेशकर ने ही गाया था गीत के बोल थे "तोड़के दुनिया की दीवार/ बलमवा करले मुझसे प्यार/ जो होगा देखा जाएगा"

1954 में आयी नागिन फिल्म का गीत "मेरा मन डोले, मेरा तन डोले", "मेरा दिल ये पुकारे" और "जादूगर सैंया छोड़ो मोरी बहिंयां हो गई आधी रात, अब घर जाने दो" आज भी दिल में बसा है और हमारे पसंदीदा गीतों में शुमार है। फ़िल्म देख कबीरा रोया (1957) का गीत "कौन आया मेरे मन के द्वारे पायल की झंकार लिएऔर इसी साल आयी फिल्म गेट वे ऑफ़ इंडिया फिल्म का गीत "सपने में सजन से दो बातें की एक याद रही, एक भूल गए " और भाभी फिल्म का गीत "चल उड़ जा रे पंछी कि अब ये देश हुआ बेगाना" हिंदी  गीतों की मक़बूलियत की मिसाल हैं। राजेंद्र कृष्ण पूरे पचास के दशक में छाये रहे। 1961 में आयी फ़िल्म संजोग का गीत "वो भूली दास्ताँ लो फिर याद आयी" और 1962 की फिल्म मनमौजी का किशोर कुमार की अल्हड़-खिलंदड़ अंदाज़ में गाया गया गीत "जरूरत है, जरूरत है, जरुरत  है, एक श्रीमती की, कलावती की, सेवा करे जो पति  की" आज भी उतनी ही मस्ती और चाव से गाया जाता है जितना उस दौर में गाया जाता था। ये गीत समय के पाश में नहीं बंधता और समय के साथ-साथ अमर होता चला जा रहा  है। राजेंद्र साहब ने जहाँआरा (1964), नींद हमारी ख्वाब तुम्हारे (1966) और पड़ोसन (1968) के बेहतरीन गीत लिखे। साठ और सत्तर के दशक में राजेंद्र कृष्ण ने फिल्मों की कहानी, संवाद और पटकथा ज्यादा लिखी और अपने काम से सबको चौकाते रहे। फिल्म गोपी (1970) के लिए लिखा गीत "सुख के सब साथी दुख का कोय" घर घर में जीवन का दर्शन बताने और अपने से छोटों को सिखाने-समझाने के लिए आज भी प्रयोग किया जाता है। 

राजेंद्र कृष्ण को घोड़े की दौड़ का ख़ासा शौक़ था। उन्हें सत्तर के दशक में 46 लाख का इनकम टैक्स फ्री जैकपॉट घोड़े की दौड़ में मिला। ये राजेंद्र कृष्ण साहब की किस्मत थी, जिसने उन्हें उस दौर का सबसे अमीर लेखक बना दिया था। राजेंद्र कृष्ण ने फिल्मों के लिए हज़ारों गीत लिखे। करीब सौ से ज्यादा फिल्मों की  कहानी, संवाद और पटकथा लिखी। जिसमे कुछ मशहूर फ़िल्में पड़ोसन, छाया, प्यार का सपना, मनमौजी, धर्माधिकारी, माँ-बाप, साधु और शैतान जैसे फ़िल्में हैं।

राजेंद्र कृष्ण  साहब को तमिल भाषा पर भी अच्छा अधिकार था। वो तमिल फिल्मों की पटकथा भी लिखा करते थे। उन्होंने करीब अठारह तमिल फ़िल्में AVM Studios  के लिए लिखीं। राजेंद्र साहब ने लगभग सभी बड़े संगीत निर्देशकों के साथ फ़िल्में की पर उनकी जोड़ी ख़ास तौर पर सी. रामचंद्रा के साथ रही। यूं तो राजेंद्र साहेब के गीतों को करीब करीब सभी पार्श्व गायकों ने गाया पर सुरैया, लता, किशोर, मुहम्मद रफ़ी, और मन्ना डे ने राजेंद्र कृष्ण के गीतों अलग सी  ऊंचाई तक पहुँचाया।

राजेंद्र कृष्ण अपने आखरी दिनों तक काम में  मशगूल रहे। उन्हें लगातार काम मिलता रहा और वो काम करते रहे। काम भी ऐसे जो दिलों में बस जाए और हम याद भी ना करना चाहें तो भी बसबस याद जाए। उनकी आखरी फिल्म आग का दरिया थी जिसके लिए वो गीत  लिख रहे थे।ये फ़िल्म उनकी  मृत्यु के दो साल बाद 1990 में आयी। राजेंद्र कृष्ण साहब का निधन 23 सितम्बर 1988 को मुंबई में हुआ।

आज राजेंद्र कृष्ण हमारे बीच नहीं है बल्कि वो हमारे भीतर कहीं गहरे बसे हुए हैं। हमारे दिमाग की दिवार पर रचे हुए हैं। हमारी भाषा में घुले हुए हैं और हमारी अभिव्यक्ति में मिले हुए हैं। ये अलग बात है कि हम इस सच को नहीं जानते। हम इस सच से अनजान हैं। 


अनुराग अनंत