Monday, May 22, 2017

इश्क़ में घायल हुआ वो शायर..!!

इश्क़ में घायल हुआ वो शायर, अपने ज़ख्मों में कलम डुबो कर शायरी लिखता था। ग़रीब-गुरबों का दर्द उसकी सांसों में धड़कता था। इसलिए ये शायर हुकूमत से ख़ल्क़ का नुमाइंदा बनके उलझने से भी नहीं कतराता था। पेशे से हकीम, हर्फों के जादूगर और दर्द के चारागर इस अजीम शायर का नाम असरारुल हसन खान उर्फ़ मजरूह सुल्तानपुरी था। शुरुवाती दिनों में पेशे से हकीम थे। लोगों की नब्ज़ देख कर दवाई देते थे। न सिर्फ जड़ी-बूटियों से बल्कि हर्फों से भी हर दर्द की दवा बनाते फिरते थे। इन्हें एक तहसीलदार की बेटी से इश्क़ हुआ था। ये बात उसके रसूख़दार पिता को नागवार गुजरी थी। सो मोहब्बत की कहानी अधूरी रह गयी इसलिए ज़िन्दगी एक ग़ज़ल की शक्ल में पूरी की। और मुशायरे के मंचों से होते हुए फिल्मों की खिड़की से कूदकर हमारे दिलों में इस तरह दाखिल हुए कि हमारे हर एहसास के लिए गीत लिख गए। जब हम प्रेम में पड़े तो मजरूह को गाया। जब दिल टूटा तो मजरूह को गुनगुनाया। जब दुनिया से लड़े तो मजरूह साथ थे। जब अकेले पड़े तब मजरूह के हाँथ हमारे हाँथ थे। इस तरह मजरूह सुलतानपुरी घायलों की "घायलियत" सवालियों की "सवालियत" और इंसानों की "इंसानियत" का दूसरा नाम था। 

मार्क्स और लेनिन का सपना उनकी साँसों में धड़कता था। इसलिए गैरबराबरी के अँधेरे में इंक़लाब का सुर्ख सूरज बनकर जलना चाहते थे। और इसलिए शायद ग़ज़लों की गौरैया को सरमायादारी के बाज़ से लड़ाना चाहते थे, इस यक़ीन के साथ कि जीत आखिर में गौरैया की ही होगी। 

बात आजादी के दो साल पहले की है।  44-45 का दौर था, जब मजरूह, बम्बई किसी मुशायरे में गए थे। मशहूर फिल्म निर्माता-निर्देशक कारदार साहब (एआर कारदार) ने उन्हें सुना और उनके मुरीद हो गए। उन्होंने मजरूह को अपनी फिल्म में गीत लिखने को कहा, मजरूह साहब ने मना कर दिया जैसे गीतकार शैलेन्द्र ने राजकपूर को मना किया था। ये बात जब उनके दोस्त जिगर मुरादाबादी को पता चली तो उन्होंने मजरूह साहब को समझाया और वो राजी हो गए। फिल्म का नाम था शाहजहान, गीत गाय था मशहूर गायक कुन्दनलाल सहगल (के.एल सहगल) ने, धुन बनाई थी नौशाद ने और जो गीत मज़रुह की कलम से निकल कर हमारे दिलों में दाखिल हुआ, वो था "जब दिल ही टूट गया, हम जी के क्या करेंगे" . इस गीत के लिए कहा जाता है कि ये गीत उस वक़्त के दिलफ़िगार आशिकों के लिए राष्ट्रीय गीत की तरह था। आज भी ये गीत टूटे हुए दिलों के तन्हाई का साथी है। 

उसके बाद एस फ़ज़ील की "मेहँदी (1947 )", महबूब  खान की "अंदाज़ (1949 )" और शाहिद लतीफ़ की "आरज़ू (1950)" के लिए मजरूह साहेब ने गीत लिखे।  आरज़ू फिल्म के सभी गीत सुपरहिट हुए।  "ए दिल मुझे ऐसी जगह ले चल जहाँ कोई न हो" जाना ना दिल से दूर, आँखों से दूर जाके", "कहाँ तक हम उठाएँ गम",  और "जाओ सिधारो हे राधे के शयाम" जैसे गीत आम जन मानस की जुबान पर चढ़ गए थे। फिल्म इंडस्ट्री ने मजरूह की धमक महसूस कर ली थी और ये तय हो गया था आने वाले समय में मजरूह सुल्तानपुरी सारे हिंदुस्तान को अपनी कलम की नोक पर नाचने वाले हैं। मगर इसी बीच बम्बई में मजदूरों की एक हड़ताल में मजरूह सुल्तानपुरी ने एक ऐसी कविता पढ़ी कि अपने आपको भारत के जवान समाजवादी सपनो का कस्टोडियन कहने वाली नेहरू सरकार आग बबूला हो गयी। तत्कालीन गवर्नर मोरार जी देसाई ने महान अभिनेता बलराज साहनी और अन्य के साथ मजरूह सुल्तानपुरी को भी ऑर्थर रोड जेल  में डाल दिया।  मजरूह सुल्तानपुरी को अपनी कविता के लिए माफ़ी मांगने को कहा गया और उसके एवज में जेल से आजादी का प्रस्ताव दिया गया। पर मजरूह के लिए किसी नेहरू का क़द उनकी कलम से बड़ा नहीं था। सो उन्होंने साफ़ शब्दों में मना कर दिया।  मजरूह सुल्तानपुरी को दो साल की जेल हुई और शायर आज़ाद भारत में आज़ाद लबों के बोल के लिए दो साल तक सलाखों के पीछे कैद रहा।  आप भी पढ़िए, मजरूह साहब ने नेहरू जी के लिए क्या कहा था।

मन में ज़हर डालर का बसा के 
फिरती है भारत की अहिंसा 
खादी की केचुल को पहन कर 
ये केचुल लहराने ना पाए 
ये भी है हिटलर का चेला 
मार लो साथी जाने ना पाए 
कॉमनवेल्थ का दास है नेहरू 
मार लो साथी जाने ना पाए 

सत्ता की छाती पर चढ़ कर एक शायर ने वो कह दिया था। जो पहले इतनी साफ़ और सपाट आवाज़ में नहीं कहा गया था।  ये मजरूह का वो इंक़लाबी अंदाज़ था जिससे उन्हें इश्क़ था। वो फिल्मों के लिए लिखे गए गानों को एक शायर की अदाकारी कहते थे और चाहते थे उन्हें उनकी ग़ज़लों और ऐसी ही इंक़लाबी शायरी के लिए जाना जाए। पर जैसाकि कहा जाता है पेट से उठने वाला दर्द, जिगर से उठने वाली आह से ज्यादा दिलफरेब होता है और ऐसा ही हुआ। जेल के दौरान ही मजरूह साहब को पहली बेटी हुई और परिवार आर्थिक तंगी गुजरने लगा।  मजरूह साहब ने जेल में रहते हुए ही कुछ फिल्मों के गीत लिखने की हामी भरी और पैसे परिवार तक पहुंचा दिए गए। फिर मजरूह साहब 1951-52 के दौर में बाहर आये और तबसे इस दुनिया को 24 मई 2000 को अलविदा कहने तक मुसलसल गीत  लिखते रहे। 

उन्होंने बेहतरीन हिंदी फिल्मों के लिए सैकड़ों बेसकीमती गीत लिखे।  उनकी जोड़ी संगीतकार नौशाद और फिल्म निर्देशक नासिर हुसैन के साथ कमाल बरपा करती रही और हमें बेहतरीन फ़िल्में और दिलनशीन गीत मिलते रहे। उन्होंने नासिर हुसैन के साथ "तुम सा नहीं देखा", "अकेले हम अकेले तुम", "ज़माने को दिखाना है", "हम किसी से काम नहीं",  "जो जीता  वही सिकंदर" और "क़यामत से क़यामत तक" जैसी कभी न भुलाई जाने वाली फिल्मे की। उन्होंने ए के सहगल से लेकर सलमान तक के लिए गीत लिखे। और अपने पचास साल से ऊपर के करियर में हमें सैकड़ों ऐसे गीत दे गए जो हमारे वज़ूद का हिस्सा हैं । उन्हें दोस्ती फिल्म के "चाहूंगा तुझे सांझ सवेरे"  गीत के लिए 1965 में पहला और आखरी फिल्मफेयर अवार्ड मिला। 1993 में मजरूह साहब को फिल्मों में उनके योगदान के लिए फिल्मों का सबसे बड़ा पुरूस्कार "दादा साहेब फाल्के अवार्ड" दिया गया . पर मजरूह साहब किसी भी पुरूस्कार और खिताब से ऊपर थे।  हर्फों के वो मसीहा थे जो उनमे जान फूंक कर उन्हें कालजयी कर दिया करते थे। वो अहसासों को आवाज़ देने के इस सफर में अकेले ही चले थे पर लोग उनके  साथ आते गए और कारवाँ बनता गया।  मजरूह साहब  किसी मजदूर के हांथों में पड़े लाल ठेठे की लाली हैं। किसी इंक़लाबी सुर्ख आवाज़ हैं तो किसी चाक़ जिगर आशिक के दिल का लहू हैं।  मजरूह साहब ने कभी हमें अकेला नहीं छोड़ा। वो  हमारे साथ थे और हम उनके साथ होते चले गए। वो शायद इस बात को जानते थे इसीलिए उन्होंने एक शेर में कहा है 
'मैं अकेला ही चला था जानिबे मंजिल मगर / लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया’

Sunday, March 26, 2017

क्योंकि उनके पास ज्ञान है बुद्धि नहीं है !!

कितना आसान होता है। खांचे में फंसा कर गर्दन उतार देना।  बिलकुल यांत्रिक कत्लखाने की तरह सहज और सफल। इस तरह के  कत्लखाने कब बंद होंगे ? कौन सी सरकार, कौन सा नेता ऐसे क़त्ल खाने को बंद करेगा? मैं नहीं जनता।

आप  किसी भी क्षण किसी भी ख़ास तरह के पैमाने से नाप दिए जाते हैं और नापने वाला आपकी एक परिभाषा, एक सूत्र अपने दिमाग में बैठा लेता है। और यदा-कदा उसी परिभाषा, उसी सूत्र के हिसाब से आपको हल करता रहता है।  कुछ तो आप पर पीएचडी कर लेते हैं और आप पर आपसे ज्यादा अधिकार उनका हो जाता है।  आप खुद को नहीं जान पाते पर वो आपकी नश-नश से वाकिफ होने का दावा करते हुए, आप पर लेक्चर देते हैं और लोग मन लगा कर आदर्श विद्यार्थी की तरह उन्हें सुनते हैं।  यही हमारे समय का सच है।  ये सुन्दर है या भयवाह।  ये आप जाने।

आपने देश और सेना पर बात कर दी, आप राष्ट्रवादी, आपने मोदी की तारीफ कर दी, जनविरोधी, बुर्जुआ, पूंजीवादी। आपने मोदी की आलोचना कर दी।  आप वामपंथी। आपने धर्म की बात कर दी, आप दक्षिणपंथी। आपने एंटी रोमियो की आलोचना कर दी। आप ठरकी, कुंठित। आपने योगी से सवाल कर दिया। आप खिसियानी बिल्ली। आपने गैरबराबरी वाली व्यवस्था को बदलने की बात कह दी, आप देशद्रोही।  आपने किसानों अदिवासियों के जलते सवाल पूछ दिए, आप नक्सलवादी।  आपने किसी विशेष संगठन, विशेष पार्टी पर कुछ कह दिया, आप पाकिस्तानी। 

ऐसे ही बहुत सारे खांचे हैं।  लोग हांथो में लिए घूम रहे हैं।  बिलकुल शिकारियों के तरह चौकन्ने।  आपके मूँह से कुछ निकला नहीं कि  आप खांचे में फिट, पैमाने से नाप लिए गए।  आपकी परिभाषा और सूत्र तैयार।  आप व्यक्ति नहीं रहे, एक बड़ी पहचान आपके साथ चस्पा, चाहे आप उस बड़ी पहचान का मतलब भी न जाने पर अब वो पहचान आपकी पहचान है।  

हमने सवाल उठाया कि एंटी रोमियो स्क्वाड का नाम एंटी रोमियो ही क्यों रखा गया ? और इस नाम के दर्शन को भारत के परिपेक्ष्य में देखने की कोशिश की। एक भाई हमारी बहन के लिए चिंतित हो गये।  उसे पूरे प्रकरण में ले आये।और एक खाँचा ले कर मुझे नाप दिया। ये खांचा था हम फर्जी विरोध करते हैं। ठीक है भाई ! पर हम फिर से सवाल पूछते हैं कि अगर महिला सुरक्षा ही  मामला था तो इस सेल का आम वीमेन सिक्युरिटी स्क्वाड रख देते।  तो ज्यादा व्यापक सुरक्षा हो पाती।  पर यहाँ तो नाम ही बताता है कि ये एन्टीरोमियो दल प्रेम या छेड़छाड़  के मामले में ही मुख्यतयः दखल रखेगा।  तो क्या हमारे प्रदेश में सबसे ज्यादा महिलाएं पार्क में, कालेजों के बाहर, और सार्वजानिक स्थलों पर ही असुरक्षित हैं ? क्या हमारे प्रदेश में बलात्कार सबसे ज्यादा हो रहे हैं ? नहीं दोनों बात नहीं है।  फिर एन्टीरोमियो नाम क्यों ? फिर भी महिला सुरक्षा के हर पहल का स्वागत है। बस सकारात्मक आलोचना ये है कि इस स्क्वाड का नाम बदल कर इसे लार्जर मैनडेट के साथ जोड़ा जाए। ताकि महिलाओं के साथ छेड़छाड़ का मामला उसके भीतर आये और उनके साथ हो रहे सारे अपराध के लिए पुलिस सीधे तौर पर जवाबदेह हो। ये तो योगी जी से इल्तजा थी। पर दूसरी  चीज़ तो  भगवान ही दे सकता है।  वो है खाँचेबाजों को बुद्धि, जितनी भी मिल जाए, उनके लिए सद्बुद्धि ही होगी।  क्योंकि उनके पास ज्ञान है बुद्धि नहीं है !!  

अनुराग अनंत 


   
    

योगिराज कृष्ण बनाम सीएम योगी आदित्य नाथ..!!

गज़ब विरोधाभासी चरित्र है हमारा, और जो सत्ता में हैं वो इसे अच्छे से जानते हैं।  शायद उन्होंने ही इसे गढ़ा है और संस्कृति के फ्रेम में मढ़ा है। विराट भारतीय परंपरा में निषेध शब्द नहीं है।  भाषा, खान -पान, मत-विश्वास, रहन-सहन ले लेकर जीवन के हर मोर्चे पर एक बहुरंगी वितान भारतीय परंपरा का हिस्सा रहा है। पर इस उद्दात परंपरा के सामानांतर एक विरोधाभासी धारा हमेशा से बहती रही है।  जो कभी कम और कभी ज्यादा प्रभावित करती है।  भारतीय मानस इसी द्वय में फंस हुआ है।  इसीलिए काल के हर खंड में, हर बिंदु  पर विरोधाभासमें लिपटा  हुआ, घिरा हुआ पाया जा सकता है।

ये इसी द्वय की द्वंदात्मक परंपरा है कि जिस काल खंड में सत्ताएं मनुस्मृति के हिसाब से चल रही थीं।  कानों में  शीशे ढाले जा रहे थे।  पैरों में कीलें ठोकी जा रहीं थी। उसी समय सवर्ण मानसिकता को चुनौती देते हुए राजसत्ता के सीमाओं को लांग कर एक सवर्ण नवजवान सिद्धार्थ से गौतम बुद्ध हो गया। उसने क्या क्या, कैसे कैसे बदल दिया।  आप जानते हैं, मैं नहीं बताऊँगा। और वो कौन सी शक्तियां और सोच थी जिसने बुद्ध का बहिष्कार, विरोध किया।  ये भी आप जानते हैं। इसी देश में जहाँ द्रोणाचार्य एक शूद्र का अंगूठा बिना पढ़ाये गुरु दक्षिणा में ले लेते हैं।  वहीँ दूसरी तरफ चाणक्य भी हैं  जो रास्ते के किनारे भेड़ चराते एक शूद्र के बच्चे को शिक्षा दे कर चक्रवर्ती सम्राट बना देते हैं।  ब्राह्मणवाद के खिलाफ महान योद्धा भीम राव आंबेडकर में  आंबेडकर नाम उनके एक ब्राह्मण गुरु  का दिया  हुआ है। यहाँ मंदिरों का निर्माण कराते, मंदिरों  के चौखटों पर सर नवाते अकबर के कहानियां हैं तो मंदिर तोड़ते औरंज़ेब के किस्से भी हैं। ये विरोधाभासभारतीय इतिहास के हर मोड़ और वर्तमान के हर कदम पर विद्यमान है।

अभी वर्तमान में हमारे प्रदेश में एन्टीरोमियो दल बनाया गया है।  कहा जा रहा है कि ये महिलाओं की सुरक्षा के लिए काम करेगा।  पर असल में ये प्रेमी युगलों पर पहरा है।  मिलने जुलने और प्रेम करने पर पाबन्दी है।  अब देखिये कितना मजेदार विरोधाभासहै।  हिंदी फिल्मों में जो परिवेश, संस्कृति, समाज दिखया जाता है वो मुख्य रूप से उत्तर-मध्य भारत का ही होता  है।  बॉलीवुड से दक्षिण-उत्तरवूर्व और पश्चिम लगभग नदारद ही रहता है।  तो मतलब हिंदी फिल्मे इसी गईया-पट्टी, हिंदी-पट्टी की ही कहानी होती है।  उसमे जब बागों  में प्रेम दिखाया जाता है तो हमें अच्छा लगता है।  लड़के मन ही मन हीरो और लड़कियां मन ही मन हीरोइन होती रहतीं है।  जब प्रेम ज़माने के खिलाफ बगावत का ऐलान करता है तो हम साथ होते हैं।  प्यार किया तो डरना क्या गाते हैं।  जब प्रेमी-युगल फिल्म में परेशानी में फंसता है तो अपने अल्लाह-भगवान से दिल के किसी कोने में दुआ जैसा भी कुछ  कर जाते हैं।  इस तरह  हम प्रेम  और प्रेमियों के पक्ष में खड़े हुए लोग लगते हैं; पर  एन्टीरोमियों दल हमारे प्रदेश में ही बनाया जाता है।  और हम उसे सही कहते हैं। यहीं एक बादशाह के खिलाफ एक राजकुमार ने प्रेम के लिए बगावत कर दी थी और एक हम हैं। जो प्रेम परंपरा के विरुद्ध बहे जा रहें हैं।  हमारे प्रदेश में ही प्रेम के प्रतीक श्री कृष्ण जी ने जन्म लिया। अच्छा हुआ आज-कल के दिनों में वो जवाँ नहीं हुए नहीं तो एंटी रोमियो वाले पकड़ लेते।  फिर राधा के घर वालों को फोन जाता। पूरे बृज में बदनामी होती और श्री कृष्ण का काम तमाम हो जाता। हम उस प्रदेश में एन्टीरोमियो दल देख रहे हैं जहाँ राधा कृष्ण के रूप में प्रेमियों को पूजते हैं। ये हमारे वर्तमान में भारतीय विरोधाभासी परंपरा का उधाहरण हैं।

दूसरा उदाहरण गोरखनाथ मंदिर का ही ले लेते हैं।  ये मंदिर कभी मुस्लिम योगियों और दलित-पिछड़े संतों का गढ़ रहा है। आपसी सद्भाव, सूफी संतत्व, जाति-प्रथा के नाश के आंदोलन का केंद्र रहा है। पर आज हम देख सकते हैं मंदिर किस  प्रतीक के रूप में जाना जाता है। आज लोग मंदिर को मुस्लिम-विरोध  का गढ़ मानने  लगे हैं। राजनीतिक महत्वाकांक्षा के चलते ऐसा कुछ समय से किया भी गया  जो  मंदिर के मूल चरित्र के साथ विरोधाभासी है।

ऐसे ही विरोधाभासके कई उदाहरण और भी दे सकता हूँ।  जिसकी  कोई जरूरत नहीं  है।  आप  समझ गए होंगे, मैं क्या कहना चाहता हूँ।  भारत बहुरंगी सांस्कृतिक धाराओं का विराट समुद्र है।  जिसमे कुछ भी निषेध नहीं है। हमने विश्व को प्रेम से सम्भोग और सम्भोग से समाधी तक जाने का रास्ता दिखाया है।  एंटी-रोमियों दल हमारी समृद्ध परंपरा और उसके विस्तार पर सवालिया निशान है। भारतीय परंपरा की  द्वय विरोधाभासी धारा में आप किधर जाना चाहते हैं? अंगूठा काटने वालों की तरफ, कानों में शीश ढालने वालों की तरफ या फिर गरीब के बच्चे को सम्राट बना कर भारत का गौरव बढ़ाने वालों के साथ। आप प्रेमियों का पक्ष लेते हुए योगिराज कृष्णा के साथ खड़े होना चाहते हैं या एन्टीरोमियो दल की वकालत  करते  हुए योगी आदित्यनाथ के साथ खड़े होना चाहते हैं। अब फैसला आपको करना है इस विरोधाभासी समय  में आप किस  तरफ हैं

अनुराग अनंत

         

Friday, March 3, 2017

गुरमेहर की आवाज में हमारी सांस्कृतिक विरासत प्रतिध्वनित होती है ..!!

दिल्ली विश्वविद्यालय की वो लड़की जो अचानक मशहूर हो गयी थी। जिसके विषय में नेता से लेकर अभिनेता तक और खिलाड़ी से लेकर अनाड़ी तक आपस में लड़ रहे थे। दिल्ली छोड़ कर जालंधर वापस चली गयी है। उसने अपना फेसबुक प्रोफ़ाइल भी डीएक्टिवेट कर दिया है। जी हाँ "गुरमेहर कौर" की बात कर रहा हूँ। जिसकी गलती थी कि वो सोचती थी और बोलती भी थी। क्योंकि उसे लगता था कुछ नहीं सोचने और कुछ नहीं बोलने पर आदमी मर जाता है। और वो बिना कुछ किए मरना नहीं चाहती थी।  उसने एक लंबा दौर नफरत और घृणा से लड़ते हुए गुज़ारा था इसलिए वो प्रेम और शांति के कुछ अलग अर्थ समझती थी और शायद हम सब से वही अर्थ साझा कर रही थी। पर हम लोग जिस समय में जी रहे है वो शायद किसी शतरंज की बिसात पर बिछता जा रहा है। और पूरा समाज काले सफ़ेद घरों में बंटा हुआ दिख रहा  है। जिनके पास ताकत  है,  सत्ता है या फिर  जो लोग ताकत और सत्ता  के  साथ हैं,  वो खुद को सफ़ेद घरों में खड़ा हुआ महसूस करते हैं। बिलकुल स्वच्छ, पाक, साफ़।  उनसे इतर जो लोग है किसी भी राजनितिक विचार और सोच के, सभी काले घरों में हैं। बहके हुए, प्रदूषित दिमाग के लोग। जो देश के खिलाफ हैं। धर्म के खिलाफ हैं और जिन्हें फेसबुक ट्विटर से लेकर सड़कों और कैम्पसों तक मारा जाना चाहिए। इसीलिए काले घर में खड़ी हुई गुरमेहर कौर को स्वच्छ, पाक, साफ़ लोगों ने गलियां दीं, धमकियाँ दीं और उसे जताया कि वो लड़की है और उसका बलात्कार भी किया जा सकता है। सरकार के मंत्रियों ने उसे बहका हुआ, संक्रमित और प्रदूषित दमाग की देशविरोधी लड़की तक कह दिया। एक माननीय नेता जी ने कहा कि गुरमेहर ने अपने शहीद पिता की शहादत पर राजनीति करने की कोशिश की है और उन्हें शर्मिदा किया है।

माननीय बताना चाहते हैं कि शहीदों और सैनिकों पर अब उनके  बच्चों का भी कोई  अधिकार  नहीं बचा है और इसलिए वो अपने पिता के विषय में बात नहीं कर सकते। पर सरकार चाहे तो सेना और सैनिकों की उपलब्धि को अपनी उपलब्धि बता सकती है। अपनी योजनाओं को सही ठहराने के लिए उनके नाम का सहारा  ले  सकती है और तर्क ख़तम हो जाने पर सेना को ढाल की तरह इस्तेमाल  कर सकती  है। ये राजनीति नहीं है, राष्ट्रसेवा है और  एक बेटी  का अपने पिता को याद करना राजनीति है।  

गुरमेहर कौर को जिस बात पर ट्रोल किया गया।  वो लगभग उसने एक साल पहले कही थी। तो ऐसा उसने अभी क्या कह दिया जो उसकी एक साल पुरानी बात पर आज ट्रोलिंग की जा रही है। दरअसल उसने दिल्ली विश्यविद्यालय में हुई हिंसा के खिलाफ ABVP का प्रतिवाद करते हुए। ABVP से न डरने की बात कही थी। ये बात उन लोगों को शायद बुरी लगी, जो चाहते हैं लोग ABVP से डरें।  इसलिए उन्होंने एक साल पुराना वीडियो निकाला, जिसमे गुरमेहर हांथो में तख्तियां लेकर उनपे लिखे संदेशों के माध्यम से बिना कुछ बोले एक  बहुत बड़ी बात बोल रहीं थीं। बड़ी बातें हमेशा सम्पूर्ण सन्दर्भों में समझी जाती हैं। इसलिए उन लोगों ने उस पूरे वीडयो से एक हिस्सा निकाल लिया और तथ्य को सन्दर्भ से काट  दिया। उसके बाद लोग जुड़ते गए और तर्क, वितर्क और कुतर्क का कारवां बनता चला गया,  और बात  गुरमेहर की हत्या और बलात्कार की धमकियों तक पहुँच गयी। दिल्ली पुलिस इस बीच गुरमेहर को उसकी सुरक्षा का विस्वास दिलाने में असमर्थ रही और इसतरह दिल्ली में ही दिल्ली हार गयी। संविधान में  दी गयी, अपनी बात कहने की गारंटी की गारंटी जिन्हें लेना था वो चुनावी मंचो से नारियल और पाइन एपल के रस पर विमर्श करते रहे।  और एक भीड़ मौका पाते ही गुरमेहर पर फेसबुक से लेकर ट्विटर तक भेड़ियों की तरह टूट पड़ी।

तो क्या वाकई गुरमेहर ने कोई ऐसी बेजा बात कह दी थी जो आज से पहले भारत में नहीं कही गयी थी ? सवाल एक और भी है, जो सरकार पूछ रही है कि गुरमेहर किससे प्रभावित हो कर ऐसी बहकी बहकी बातें कर रही है ? कौन है जो उसका दिमाग प्रदूषित कर रहा है ? तो हम थोड़ा अगर अपने  इतिहास की तरफ देखें तो हमें पता चलता है कि गुरमेहर की आवाज में हमारी सांस्कृतिक विरासत प्रतिध्वनित होती हुई दिखती है। वो गौतम से लेकर गांधी तक की समझ को साझा करती हुई पायी जाती है।         

गुरमेहर ने कहा कि उसके पिता को पाकिस्तान ने नहीं बल्कि युद्ध ने मारा है। ये बात अशोक भी कलिंग के युद्ध क्षेत्र में लाशों के बीच खड़े हुए महसूस करते हैं। और खुद से पूछते है क्या ये मेरे निजी दुश्मन थे ? क्या मैंने ही इन्हें मारा ? और उत्तर में उन्हें जवाब मिलता है, मेरी महत्वाकांक्षा ने इन्हें मारा है। राजसत्ता ने इन्हें मारा है।  और वो राजसत्ता और महत्वाकांक्षा का त्याग करते हुए बौद्ध भिक्षु बन जाते हैं।  जब गौतम बुद्ध अंगुलिमाल डाकू से अकेले मिलते है तो उन्हें इस बात का विशवास होता है कि ये व्यक्ति हत्यारा नहीं है। हत्यारी इसकी मानसकिता है।  इसलिए वो उसे बदल पाते हैं और एक डकैत के भीतर से एक परोपकारी भिक्षु निकलता है।  जब गाँधी कहते हैं,  घृणा व्यक्ति से नहीं उसकी बुराई से करनी चाहिए।  जब वो कहते हैं,  हिन्दू मुसलमान एक दूसरे को नहीं मार रहे हैं बल्कि एक उन्माद है जो इन दोनों को मार रहा है।  और इसी विस्वास के साथ वो नोवाखली  जाते हैं और दंगे रोक देते हैं।  तो वो गुरमेहर वाली बात  रह रहे होते हैं।  भारतीय दार्शनिक इतिहास को  उठा कर देखिएगा तो  ऐसे सैकड़ो उदाहरण मिलेंगे जहाँ गुरमेहर के बयान की जड़ें हैं।


गुरमेहर ने गौतम से लेकर गांधी तक फैली हुई सैद्धान्तिक विरासत को  एक बार फिर दार्शनिक रूप में दोहराया है।  वो अगर प्रदूषित दिमाग की है तो उसके वैचारिक प्रदूषण का श्रोत गौतम से लेकर गांधी तक फैला हुआ है। तो क्या ये कहा जा सकता है कि जो लोग गुरमेहर की बात नहीं समझ पा रहे हैं और उसकी बेहद सतही व्याख्या कर रहे हैं।  वो हमारी मूल भारतीय दार्शनिक परिपाटी से कटे हुए लोग हैं।  या फिर ये कहें कि वे बेहद  धूर्त किसम के लोग हैं। वो एक नया भारत बनाना चाहते हैं जिससे गौतम और गाँधी खारिज़ हैं। जहाँ व्यवहारिक और सतही समझ के इतर सैद्धान्तिक और दार्शनिक बहसों के लिए कोई जगह नहीं होगी।  जहाँ गाँधी और गौतम पैदा नहीं होंगे।  जहाँ अंगुलिमाल को डाकू से इंसान नहीं बनाया जायेगा।  जहाँ नोवखली जैसे भीषण दंगे नहीं रोके जायेंगे।  जहाँ एक थोपी हुई परिभाषा के इतर कुछ नहीं कहा जा सकेगा।  अगर हम ऐसा नया भारत बनाने वाले हैं।  तो ये  भारत के प्रति अक्षम्य अपराध कर रहे हैं।  आज समय के इस  मुहाने पर गुरमेहर के साथ खड़े होना गांधी के साथ खड़े होने जैसा है।  गुरमेहर के लिए आवाज़ बुलंद करना गांधी की आवाज़ को बुलंद करना है।



अनुराग अनंत


Sunday, February 26, 2017

हमारी लड़ाई आर्गुमेंटेटिव इंडिया को बचाने की लड़ाई है..!!

सरकार बहादुर से आप सहमत हैं तो "सही" हैं और यदि असहमत है तो "नहीं" हैं. आप देशभक्त नहीं हैं आप वफादार नहीं हैं, यहाँ तक कि आपके वजूद पर भी सवाल उठने लगते हैं और एक भीड़ चिल्ला कर कहती है कि आप इंसान ही नहीं हैं. आप हमलों के बीच घिरे हुए कभी अख़लाक़ होते हैं, कभी रोहित और कभी नजीब। कभी कोई भीड़ घर में घुस कर मार देती है. कभी मानवसंसाधन मंत्रालय से आती हुई चिट्ठियां अवसाद की कोठरी में आपको धकेल देतीं है और आप अपना दम घोट लेते हैं। तो कभी कोई देशभक्त संघटन आपको किसी मामूली सी बात पर इतना पीटता है कि आप अगली सुबह बिना किसी को बताए गायब हो जाते हैं, आपकी  माँ पागलों की तरह शहर दर शहर आपको तलाश करती है. और देश के सबसे काबिल पुलिस उसे ये भी नहीं बता पाती कि आप जिन्दा हैं या मर गए? जी हां ये बुलंद निज़ाम की बुलंद तस्वीर है और असहमति की रियायती मियाद पार करने के बाद किसी रोज़ आप भी इसका हिस्सा हो सकते हैं. ये हकीकत आप देख सकें तो देखें वार्ना कल ये आपकी आँख-आँख डाल कर अपनी मौजूदगी का अहसास खुद ही करा देगी।    

दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कालेज  में 21,22 फ़रवरी को जो घटना घटी वो साफ़ इस बात का सन्देश है कि "प्रतिरोध की संस्कृति" बचाए रखने के लिए अब कीमत चुकानी होगी। अब अभिव्यक्ति के खतरे उठाने पड़ेंगे। क्योंकि वो जिनके पास सत्ता है वो “बात के बदले लात” की संस्कृति चलना चाहते हैं. ये अपने सच को सच साबित  करने  के लिए आपका सर फोड़ सकते हैं.आपकी हड्डियां तोड़ सकते हैं.

आइये रामजस विवाद के बहाने  देश में पनप रही "बात के बदले लात" की संस्कृति को समझते हैं और ये भी समझने की कोशिश  करते  हैं  कि वो कौन सी चीज है जिससे ये देश और धर्म ठेकेदार डरते हैं और इतना डरते हैं कि हिंसक हो जाते हैं. रामजस कालेज में आयोजित सेमीनार इस बात पर  रोक  दिया  गया क़ि क्योंकि उमर खालिद और शेहला राशीद को वहां आना था और ये दोनों लोग ठेकेदारों के हिसाब से देशद्रोही है, जबकि न्यायालय में उमर खालिद  के खिलाफ ठोस सबूत नहीं पेश किये जाने पर उसे जमानत मिली है और दिल्ली की काबिल पुलिस अभी तक चार्जशीट भी नहीं फ़ाइल  कर पायी है. फिर भी ठेकेदार संगठन अगर कहता है तो सबको मान लेना चाहिए । शायद ये लोग खुद को संविधान और न्यायालय से ऊपर मानते हैं. शहला के विरोध का कारण कश्मीर पर उसका नजरिया है. जिससे ठेकेदार संगठन सहमत नहीं है।  इसलिए इनकी नज़र में  उसने बोलने और प्रतिवाद के सारे अधिकार खो दिए हैं।  फिर चाहे यही ठेकेदार लोग कश्मीर में कुर्सी के  लिए महबूबा मुफ़्ती  से सहमत न होते हुए भी गठबंधन कर लें और कहें की हम यहाँ लोकतंत्र को मजबूत कर रहे  हैं. तो कश्मीर में लोकतंत्र कमज़ोर है इसलिए अफ़ज़ल गुरु को शहीद बताने वालों के साथ सरकार  चला कर उसे मजबूत करना है और दिल्ली में लोकतंत्र बहुत मजबूत है इसलिए सेमीनार में गुंडागर्दी कर के इसे कमज़ोर करना है. अगर भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है तो भारत के एक हिस्से के लिए लोकतंत्र का एक पैमाना और दूसरे हिस्से के लिए दूसरा क्यों है ? और अगर है तो इस पर बात कौन करेगा हम या कोई परग्रही ?

दूसरा ऐतराज जेएनयू में लगाए गए नारों पर अक्सर किया जाता है और उस बिना पर कहा जाता है कि उमर और  कन्हैया  ने देश विरोधी नारे लगाए हैं इसलिए ये, इनकी पार्टी और इनकी विचारधारा देश विरोधी है. अव्वल तो ये सिद्ध नहीं हुआ है कि इन्होंने देश विरोधी नारे लगाए हैं फिर भी अगर बहस  के लिए मान  भी लें तो क्या मध्य प्रदेश में पड़के गए पाकिस्तानी जासूस क्योंकि भाजपा के कार्यकर्ता थे तो क्या भाजपा और इनकी विचारधारा देश विरोधी है? गौर करने वाली बात ये है कि  उमर और  कन्हैया पर लगाया गया आरोप एक वीडियो पर आधारित है और इन ग्यारह जासूसों पर एटीएस की  छानबीन के आधार पर आरोप लगे हैं।  इसलिए ज्यादा संगीन है.

तीसरा आरोप या ऐतराज ये है कि ये लोग आजादी के नारे लगाते हैं।  बस्तर और कश्मीर की आज़ादी मांगते हैं।  और क्योंकि देश आज़ाद हो गया है इसलिए आज़ादी मांगना एक दंडनीय अपराध है और  ये जिम्मेदारी ठेकेदार संगठन ने आपने हांथों में ले रखी  है। ये लोग बस्तर और कश्मीर ही नहीं केरल की भी आज़ादी चाहते हैं। कभी सुनियेगा।  ये पूरे देश के लिए आजादी मांगे  हैं। देश के चप्पे चप्पे की आज़ादी, जन जन की आज़ादी  मांगते हैं ये लोग।  ये भारत  से नहीं  भारत  में आज़ादी चाहते हैं। ये जब कश्मीर की बात करते हैं मानवीय भावना से प्रेरित हो कर वहां के बच्चों और महिलाओं पर चलती पैलेट गन से आज़ादी मांगते है।  फैले  हुए डर के साए से आज़ादी मांगते हैं।  कभी भी गायब हो जाने के खौफ से आज़ादी मांगते हैं।  हिंसा में मारे जाते हमारे  जवानों  के  लिए  इस हिंसात्मक चक्रव्यू से आज़ादी मांगते हैं. अधर में लटकी हुई किस्मत से आज़ादी मांगते है। जब बस्तर की बात करते हैं तो पुलिसिया दमन और कार्पोरेटी शोषण से आजादी मांगते हैं. सरकारी एजेंसियां खुद इस बात को स्वीकार करती हैं की आदिवासी इलाकों में पुलिस आदिवासियों के गाँवों को जलाये जाने में संलिप्त रही है. पुलिस वहां फर्जी एनकाउंटर कर रही है. पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को झूठे मुकदमो  में फसाया  जा रहा है।  पुलिस वहां सरकार के पोलिटिकल एजेंट्स की तरह सामाजिक कार्यकर्ताओं के पुतले जलाती हुई पायी जाती है।  इस पेशे-मंज़र के खिलाफ आज़ादी चाहिए। आज़ादी हमें भी चाहिए और तुम्हे भी चाहिए। आज़ादी मानवीय जीवन का परम लक्ष्य है और एक सभ्य समाज का अभीष्ठ भी।  हमें  पितृसत्ता से, गरीबी से, सामंतवाद से, लूट से, गुंडागर्दी से, अन्याय और दमन से आज़ादी चाहिए। हमें अपने पूर्वाग्रह और झूठे अहम् से आज़ादी चाहिए।  क्या खराबी है इस आज़ादी की मांग में. आज़ादी की संकल्पना कन्हैया ने पूरे देश के सामने रखी थी फिरभी अगर कोई सवाल है तो संवाद का रास्ता है ही. पर संवाद का रास्ता बंद करके फसाद फैलाना एक सुनियोजित कार्यक्रम है.  

दरअसल ये लोग राष्ट्रवाद के नारों तले बुनियादी सवालों को दबा देना चाहते हैं. ये लोग नहीं चाहते कि लोग सच्चाइयों से रूबरू हो. ये नहीं चाहते कि लोग बस्तर और कश्मीर पर तर्कपूर्ण बहस का हिस्सा बने. ये नहीं चाहते कि दमन और शोषण पर विमर्श हो।  ये हमें घसीट कर पोस्ट ट्रुथ एरा में ले जाना चाहते हैं.  इसीलिए ये टीवी स्टूडियो से लेकर यूनिवर्सिटी, कालेजों और सड़कों तक हमले कर रहे हैं. चीख रहे हैं हिंसक हो रहे हैं।  देश और देशभक्ति  को अपने तरीके से परिभाषित कर रहे हैं। इनके लिए देशभक्त होने की पहली और आखरी शर्त असहमति के अधिकार का त्याग है।  ये लोग वामपंथियों पर इसलिए खासतौर पर हमलावर है क्योंकि वो पूछ लेते हैं,"वसुधैव  कुटुम्बकम" वाले देश में अपने ही गावँ के दलित को पंडित जी और ठाकुर साहब पानी क्यों नहीं पीने देते ? वो पूछ लेते हैं महिलाओं को शक्तिस्वरूपा मानने वाले देश में अठारह साल की बहन के साथ पांच साल का भाई रक्षा के लिए क्यों भेजा जाता है ? जब सभी लोग अपनी बहनों की रक्षा कर रहे हैं तो हमारे समाज में बलात्कार कौन कर  रहा है।  जब बच्चे बाल गोपाल का रूप है तो बाल मजदूरी और बाल यौनशोषण क्यों है ? ये सवाल चेहरे पर से नकाब खींच लेते हैं।  और सच्चाई बेपर्दा हो जाती है।  देश और धर्म के ठेकेदार असहज होते हैं, डरते हैं और हिंसक हो जाते हैं।  ये बाइनरी बनाते हैं, इस्टीरियोटाइप गढ़ते हैं।  और सवाल पूछने वाले को उसमें फंसा देते हैं।  ये कभी एंटी-हिन्दू कहते हैं, कभी एंटी-नेशनल। ये जानते हुए भी कि ये लोग ऐसे नहीं हैं।  ये सफ़दर हाश्मी की तरह अपने  साल का आगाज़ साहिबाबाद में अपने दोस्त के यहाँ रामचरित मानस के पाठ से कर सकते हैं।  ये राही मासूम रज़ा बनकर  महाभारत का संवाद लिख सकते हैं।  ये  साहिर लुधियानवी की तरह बेहतरीन भजन और भक्ति गीत भी लिख सकते हैं।  और कैफ़ी आजमी बन कर हमारी खून की रवानी बढ़ा देने वाला देशभक्ति गीत भी रच  सकते हैं।ये सभी लोग आज़ादी मांगने वाले लोग थे. उसी विचारधारा से जुड़े थे. जिसे ये एंटी-हिन्दू, एंटी-नेशनल कहते हैं. हमारी लड़ाई इन्ही बाइनरी और इस्टीरियोटाइप को तोड़ने की लड़ाई है।  हमारी लड़ाई संवाद, विमर्श और अभिवक्ति की स्वतंत्रता की लड़ाई है।  हमारी लड़ाई आर्गुमेंटेटिव इंडिया को बचाने की लड़ाई है.

तुम्हारा-अनंत 

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दा वायर पर 

यूथ की आवाज़ पर 

Friday, August 15, 2014

कश्मीर समस्या का एक पक्ष

अजेय कुमार का एक बेहद रोचक और स्थापित धारणाओं को एक नया आयाम देने वाला ये लेख  "कश्मीर पर नजरिये का प्रश्न"जनसत्ता में 13/08/2014 को मुख्य सम्पदिकिय लेख के रूप में छपा था. मैं वहीँ से इसे आप सब पाठकों के लिए ले आया हूँ.

जब प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री जितेंद्र सिंह ने जम्मू में दिए मोदी के भाषण के सार को यह कह कर दोहराया कि सरकार ने धारा-370 को समाप्त करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है, तो दरअसल वे आरएसएस की दशकों से चली आ रही मांग को ही दोहरा रहे थे। कैबिनेट मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कैबिनेट की बैठक के बाद कहा, ‘हम सही समय पर सही फैसला लेंगे...आप जानते हैं कि हमने चुनाव प्रचार में क्या कहा था।’

एक सच, जो संघ परिवार के प्रवक्ता देश की जनता को कभी नहीं बताते, वह यह है कि जब देश के बाकी राजाओं ने अपने राज्यों में भारतीय संविधान को वैध करार देना मंजूर किया, जम्मू और कश्मीर के हिंदू राजा ने ऐसा करने से इनकार कर दिया था। जम्मू और कश्मीर रियासत की बागडोर डोगरा राजवंश के हरीसिंह के हाथ में थी।
दूसरा सच, जो आरएसएस ने नहीं बताया, वह है कि ये कश्मीर के मुसलमान थे जिन्होंने पाकिस्तानी हमलावरों का डट कर मुकाबला किया था और कि धारा-370 कश्मीरी जनता और केंद्र सरकार के बीच एक कड़ी के रूप में अस्तित्व में आई।

जम्मू-कश्मीर राज्य में अधिकतर आबादी मुसलमानों की थी, पर वहां का राजा हरीसिंह हिंदू था। राजा धर्मनिरपेक्ष भारत के साथ जुड़ने का इच्छुक नहीं था। जम्मू-कश्मीर उन रियासतों में से एक थी, जो भारत की संविधान सभा में शामिल नहीं हुई। जो लोग कश्मीर समस्या के लिए नेहरू को दोष देते हैं उन्हें यह पता होना चाहिए कि नेहरू ने राजा हरीसिंह के इस रवैए को देखते हुए चेतावनी दी थी कि किसी भी राज्य के इस तरह के बर्ताव को विरोधी रवैया समझा जाएगा, जबकि मुसलिम लीग ने महाराजा हरीसिंह की जिद को ताकत दी। अंतरिम सरकार (जिसने दिसंबर,1946 में कार्य आरंभ किया था) में मुसलिम लीग के नेता लियाकत अली खान ने यह घोषणा की थी ‘संविधान सभा से किसी भी तरह संबंध रखने से इनकार करने के लिए सभी राज्य पूरी तरह आजाद हैं।’

आजादी मिलने से लगभग दो माह पूर्व 17 जून, 1947 को इंडियन मुसलिम लीग के प्रमुख नेता मुहम्मद अली जिन्ना ने घोषणा की थी: ‘परमसत्ता (अंगरेजी शासन) के समाप्त होने पर हिंदुस्तानी रियासतें संवैधानिक और कानूनी तौर पर स्वतंत्र और प्रभुसत्ता संपन्न होंगी, वे अपने लिए जो कुछ पसंद करें उसे अपनाने के लिए स्वतंत्र होंगी, यह उनकी इच्छा पर निर्भर करता है कि वे हिंदुस्तान संविधान सभा में शामिल हों या पाकिस्तान संविधान सभा में या चाहें तो स्वतंत्र रहें।’ यह बयान दरअसल दो दिन पूर्व यानी 15 जून, 1947 को हुई अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक में पारित प्रस्ताव के बाद आया, जिसमें कहा गया था कि कांग्रेस किसी राज्य के इस अधिकार को स्वीकार नहीं करेगी कि वह स्वयं को स्वतंत्र घोषित करे।

इससे ठीक उलट वर्तमान भारतीय जनता पार्टी के प्रारंभिक रूप ‘अखिल जम्मू और कश्मीर राज्य हिंदू सभा’ के नेताओं का मानना था कि जम्मू और कश्मीर राज्य को ‘हिंदू राष्ट्र’ होने का दावा पेश करना चाहिए और धर्मनिरपेक्ष भारत में शामिल नहीं होना चाहिए महज इसलिए कि उस राज्य का राजा हिंदू है, जबकि 1941 की जनगणना के अनुसार कश्मीर घाटी में मुसलमानों की जनसंख्या 93.45 प्रतिशत थी। इस तथ्य को जानते हुए भी हिंदू महासभा ने राजा हरीसिंह को समर्थन उनके शासन के सांप्रदायिक चरित्र के कारण दिया।
हरीसिंह के शासन में व्यापार, शिक्षा, उद्योग, रोजगार और कृषि में मुसलमानों को बराबर के अवसर नहीं दिए गए। साठ प्रतिशत गजेटेड नौकरियां डोगरों और विशेषकर राजपूतों के लिए सुरक्षित थीं, बेशक उनकी शैक्षिक योग्यता कम थी। महाराजा हरीसिंह के पहले पांच वर्ष के शासन में जो पचीस जागीरें बांटी गर्ईं, उनमें से केवल दो जागीरें मुसलमानों को दी गर्इं। न्यायिक व्यवस्था में यह कानून था कि हत्या के जुर्म में डोगरा को छोड़ कर किसी को भी फांसी की सजा हो सकती है।

इसलिए भाजपा जब जम्मू शाखा के अपने पहले अवतार प्रजा परिषद और महाराजा हरीसिंह की भूमिका को नजरअंदाज करके नेहरू और शेख अब्दुल्ला को कश्मीर समस्या का जनक बताती है तो वह सरासर झूठ बोलती है। सच्चाई यह है कि इन दोनों के साथ-साथ गांधीजी की भूमिका भी बहुत सराहनीय थी।

शेख अब्दुल्ला का ‘कसूर’ यह था कि उन्होंने अपनी इमरजेंसी सरकार के चलते वह जमीन, जो अधिकतर महाराजा और उनके लग्घों-बग्घों के हाथ में थी, जब्त कर ली थी और कोई मुआवजा नहीं दिया था। ये जमींदार अधिकतर हिंदू तो थे ही, उनका संबंध हिंदूवादी विचारधारा से भी था। शेख अब्दुल्ला ने जमीन पर खेती करने वालों की रक्षा के लिए कानून बनाए ताकि उन्हें बेदखल न किया जा सके। उनके कर्जे माफ कर दिए गए, आदि।

यह गौर करने लायक है कि जिस राज्य की पंचानबे प्रतिशत जनता मुसलिम थी, वहां न केवल एक गैर-मुसलिम, बल्कि एक गैर-कश्मीरी का शासन था। साथ में, उसका नजरिया फिरकापरस्त था, इसलिए कश्मीरी जनता से उसका जुड़ाव होने का कोई प्रश्न न था। जब अब्दुल्ला ने 1946 में राजा के शासन के विरुद्ध ‘कश्मीर छोड़ो आंदोलन’ का नेतृत्व किया तो उसने कश्मीरी मुसलमानों की धार्मिक, क्षेत्रीय और जनतांत्रिक आकाक्षांओं को संतुष्ट किया। आरएसएस-भाजपा पूरे देश में यह फैलाते हैं कि वहां विभाजन रेखा इस्लाम है।

यह झूठ है, यह विभाजन रेखा कश्मीरी से गैर-कश्मीरी शासन का बदलाव है। नेहरू अपने को हमेशा कश्मीर का बेटा कहते थे और इस ‘कश्मीर छोड़ो आंदोलन’ से जुड़ने की खातिर वे कश्मीर पहुंचे थे, जहां उन्हें पुलिस ने दाखिल होने से रोका और इसमें उन्हें चोटें भी आई थीं। कश्मीर में नेहरू की लोकप्रियता का दूसरा कारण था कि उन्होंने शेख अब्दुल्ला के वकील के रूप में काम किया, जबकि उन पर हरीसिंह ने ‘राजद्रोह’ का मुकदमा ठोका था।
नेहरू पर जनसंघ के प्रमुख श्यामाप्रसाद मुखर्जी और कुछ कांग्रेसी नेताओं का भारी दबाव था कि कश्मीर का भारत में पूर्ण विलय हो, धारा 370 समाप्त की जाए, आदि। पर नेहरू ने कहा, ‘हमें दूरदृष्टि रखनी होगी। हमें सच्चाई को उदारतापूर्वक स्वीकार करना होगा। तभी हम कश्मीर का भारत में असली विलय करवा सकेंगे। असली एकता दिलों की होती है। किसी कानून से, जो आप लोगों पर थोप दें, कभी एकता नहीं आ सकती और न सच्चा विलय ही हो सकता है।’
कश्मीरी लोग गांधीजी से भी प्रभावित हुए जब उन्होंने एक अगस्त, 1947 को कश्मीर के अपने दौरे के दौरान कहा कि जब पूरे भारत में सांप्रदायिक झगड़े हो रहे हैं, कश्मीर रोशनी की एक किरण की तरह है। शेख अब्दुल्ला ने, यह जानते हुए कि पाकिस्तान एक सच्चाई बन चुका है, न केवल भारत, बल्कि पाकिस्तान की सरकार के साथ भी बातचीत का सिलसिला शुरू किया। पाकिस्तान का रुख दोस्ताना न था। यह बातचीत चल ही रही थी कि पाकिस्तान ने बंदूक की ताकत से कश्मीर का भविष्य तय करना चाहा। पाकिस्तान के कबायली छापामारों के हमले से डोगरा सेना पिछड़ गई और इस तरह कश्मीर की आजादी और पहचान को खतरा पैदा हो गया। इन छापामारों के विरुद्ध स्वाभिमानी कश्मीरियों का क्रोध भड़क उठा। महाराजा के पास हिंदुस्तान से मदद मांगने के अलावा कोई चारा न था। कश्मीरी मानसिकता भी हिंदुस्तान के नेताओं के पक्ष में थी।

भारत सरकार ने राज्य सरकार पर दबाव डाला कि वह भारतीय संविधान की अधिक से अधिक धाराएं वहां लागू करना स्वीकार करे। इसमें कड़ी सौदेबाजी हुई और जुलाई 1952 को शेख अब्दुल्ला और नेहरू के बीच समझौता हुआ जिसे ‘दिल्ली समझौता’ के नाम से जाना जाता है। इस समझौते की पहली शर्त थी ‘धारा 370 के प्रति प्रतिबद्धता’, जिसके अनुसार रक्षा, मुद्रा, विदेशी मामले और संचार को छोड़ कर अन्य सभी विषयों पर निर्णय लेने का पूरा अधिकार कश्मीर की सरकार को था। एक प्रावधान यह भी था कि कश्मीर का अपना अलग राजकीय ध्वज होगा, पर तिरंगे को अलग और विशिष्ट स्थान देते हुए ही राजकीय ध्वज फहराया जा सकेगा। इसी तरह सदरे-रियासत केंद्र द्वारा मनोनीत न होकर राज्य विधायिका द्वारा निर्वाचित किया जाएगा जिसमें भारत के राष्ट्रपति की सहमति अनिवार्य रूप से लेनी होगी।

इन तमाम मुद्दों पर सहमति के कारण ही आज जम्मू और कश्मीर भारत का राज्य बना हुआ है। मोदी ने तो अपने प्रचार अभियान के दौरान ही धारा 370 पर राष्ट्रीय बहस की मांग कर दी थी और प्रश्न किया था कि ‘इससे किसे लाभ हुआ?’ सरकार के गठन के बाद अरुण जेटली और सुषमा स्वराज ने तो कश्मीर में 1953 के पूर्व की स्थिति की बहाली की मांग ही कर डाली।

यूपीए सरकार ने कश्मीर की स्थिति का जायजा लेने के लिए दिलीप पडगांवकर, राधा कुमार और एमएम अंसारी के एक दल को कश्मीर भेजा था जिन्होंने मई 2012 में अपनी रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंप दी। इस रिपोर्ट में 1953 से पूर्व की स्थिति बहाल करने की मांग खारिज की गई है। साथ ही इसमें सिफारिश की गई है कि कश्मीर को वह स्वायतत्ता दी जानी चाहिए, जो उसे पहले प्राप्त थी। उनका यह सुझाव था कि मामला अगर कश्मीर की आंतरिक या बाहरी सुरक्षा से संबंधित न हो, तो संसद को इस संबंध में कोई कानून बनाने की पहल नहीं करनी चाहिए। यह भी कहा कि राज्य के प्रशासनिक तंत्र में कोई भी बदलाव लागू करने से पहले, स्थानीय लोगों की भागीदारी सुनिश्चित की जाए। इस दल ने धारा 370 को ‘अस्थायी’ के स्थान पर ‘विशेष’ प्रावधान का दर्जा देने की भी सलाह दी। वित्तीय ताकत से लैस क्षेत्रीय परिषदों के गठन की सिफारिश भी इस दल ने की। सीमा पर तनाव घटाने के उद्देश्य से हुर्रियत और पाकिस्तान के साथ बातचीत शुरू करने का सुझाव भी इस टीम ने दिया।

यह रिपोर्ट फिलहाल ठंडे बस्ते में है। मोदी सरकार अगर सचमुच कश्मीर मसले को सुलझाना चाहती है तो सबसे पहले उसे धार्मिक राष्ट्रवाद के चश्मे से कश्मीर समस्या को देखना बंद करना होगा। धारा 370 पर बहस हो सकती है, पर इस बहस के केंद्र में कश्मीरियों की इच्छाएं रखनी होंगी। जम्मू, कश्मीर और लद््दाख क्षेत्रों की अपनी-अपनी भाषाई और सांस्कृतिक पहचान की रक्षा करते हुए उन्हें अधिक से अधिक क्षेत्रीय स्वायत्तता देनी होगी। कश्मीरियत के लिए संघर्ष और जेहाद में फर्क को समझना होगा।
दंभपूर्ण आक्रामक तेवरों से न कश्मीर की जनता का भला होगा, न देश का।


Saturday, June 28, 2014

ये समय एक वैश्या है !!

समय एक वैश्या है और हम लोग, जो इस समय में जी रहे हैं. वो सब भी वैश्या ही हैं. क्यों गाली लगा न ? कितनी बड़ी बात कह दी मैंने और सोचा भी नहीं. यकीन मानो बहुत सोचा, इस सोचने में यह भी सोचा कि सोचते-सोचते ही तो निराला, मुक्तिबोध, धूमिल, गोरख और रूसो पागल हो गए थे. जिन्हें भद्र लोग अपनी भद्र भाषा में विक्षिप्त कहते थे, कहते हैं. 

मैंने सोचने-सोचने में ही सोचा कि कह देता हूँ मैं भी, जो मन में आया है, कहाँ सोचते हैं वो लोग कुछ भी कहने से पहले. जिन्होंने इस वैश्या समय को गढा है. जो इस वैश्या समय की फैक्ट्री से वैश्या इंसानों को उत्पाद की तरह पैदा कर रहे हैं. वो कहते हैं दिन को रात और हम मान लेते हैं. उधर वो हमारी रात को भी वो रात नहीं कहते. जब वो करोणों लोगों के दर्द पर मुट्ठी भर लोगों का विकास लिखते हैं. तब हम पेट के पहाड के तले दबे हुए अपनी रोजी रोटी को निहारते रहते हैं. वो हमें हँसने को कहते हैं तो हम हंस देते हैं. रोने की इजाजत नहीं देते है वो लोग. वैश्यायें दिल बहलाने की चीज होतीं है. उन्हें सिर्फ हँसने-हंसाने और दिल बहलाने की इजाजत है. अपना दर्द कहने और दूसरों का दर्द सुनने की न उन्हें इजाजत है, न समय. 

वैश्या शब्द तुम्हारे लिए एक गाली होगी. हमारे लिए ये समय की एक कैद है, एक अवस्था है. एक अवस्था जहाँ हम हारे हुए, डरे हुए, कैद हैं. जहाँ जीवन एक पहाड है और मजबूरी अस्तित्व का दूसरा नाम. हर कदम जहाँ परतंत्र है और समर्पण जीवन की पहली और अंतिम शर्त. 

भाषा ने अपने हथियार डाल दिए हैं और वो हाँथ खड़े करके बेशामों की तरह उनके खेमे में खड़ी हो गयी है. व्याकरण ने अपने ही नियमों में उलझ कर दम तोड़ दिया है. जीवन अब बेशर्म भाषा और मुर्दा व्याकरण से परिभाषित नहीं किया जा सकता. इसीलिए हमने भाषा और व्याकरण के हांसिये पर फेंके गए शब्दों, नियमों और परिभाषाओं को बटोरना शुरू कर दिया है. हम इन्ही शब्दों, नियमों और परिभाषाओँ में अपने जीवन के स्वर तलाश रहे हैं. उसके अर्थ ढूंढ रहे हैं. तुमने जिन्हें अश्लील कह दिया है. वही हमें हमारी परिभषा लगती है. और तुम जो लाल किले की छत से कहते हो, देश की उन्नति के गीत गाते हो. आदर में सर झुकाते हो, गले मिलते हो, हाँथ जोड़ते हो. ये सब हमें बेहद अश्लील लगता है. आत्मा तक छील देने वाली अश्लीलता भरी है इसमें.

नौकरी है, रोजी है, रोटी, घर है, गाडी है, टीवी है, सुकून है, शोर से भरा हुआ. बीवी है, बच्चे हैं और बहुत सारा डर. ये व्यवस्था जब तब आत्मा तक को नंगा कर देती है. बलत्कृत देह नहीं आत्मा होती है. हर बार जब भी कुछ सही और गलत में टटोलने लगते हैं. सच जानते हैं पर झूठ बोलते हैं और हमारा बलात्कार हो जाता है. हम जानते हैं कि पुलिस ने गोली क्यों चलाई अपनी जमीन के लिए लड़ते हुए किसानों पर, हम जानते हैं कि लाल गलियारे में युद्ध जनता नहीं सत्ता लड़ रही है. हम जानते हैं कि ये पुलिस किसकी है, ये अदालतें, ये अफसर किसके हैं. पर हम बोलते कुछ नहीं . हम राष्ट्रगान गाते हैं और खुद को देशभक्त समझते हुए. एकटक देखते रहते हैं. रोजी रोटी के चाँद को. सुख को आराम को. हमारी कोई अपनी इच्छा नहीं है. क्योंकि वैश्याओं की अपनी कोई इच्छा नहीं होती. हम व्यवस्था के इशारे पर मुजरा कर रहे हैं. बेचे जा रहे हैं. नोचे जा रहे हैं. हम बेशर्म भाषा और मुर्दा व्याकरण के सहारे खड़े हैं. हमने अपने बचाओ में गढे हैं बेहद अश्लील, गोल मटोल तर्क. और उसी को सटा देते हैं जब हमारी आत्मा हमपर चढाई करती है. पेट और आत्मा की लड़ाई में पेट जीत जाता है और आत्मा बलत्कृत होने को अभिशप्त होती है. 

हम प्रोफ़ेसर, डाक्टर, कलेक्टर, इंजीनियर, पत्रकार, सत्ताधीश और न जाने क्या क्या बनने के फिराक में न जाने कब और कैसे वैश्या बन जाते हैं. हमें पता भी नहीं चलता. हम व्यवस्था के हांथों हजारों बार बेइज्जत होते हैं. शोषित होते हैं. लूटे जाते हैं. पीटे जाते हैं. बलत्कृत होते हैं. पर लगातार व्यवस्था के दरबार में नाचते रहते हैं. मन बहलाते रहते हैं सरकार बहादुर का. क्योंकि हम रोजी, रोटी, संरक्षण, सुरक्षा और संयम के मारे हुए लोग हैं. हम वैसे ही जीने के आदि होते जा रहे हैं जैसे  जिया ही नहीं जा सकता. सो हम मरते हुए जी रहे हैं और जीते हुए मर रहे हैं.

हम मीडिल क्लास इस वैश्या समय के गुलाम हो गए हैं और ये गुलामी हमें लगातार वैश्या बनाती चली जा रही है. पर कभी कभी आशा जगती है कि ये वेश्याएं जागेंगी. अपना हक मागेंगीं. दूसरों के हक का हिसाब लेंगीं. आजादी और समानता के सिद्धांत को जीवन का दूसरा नाम घोषित किया जायेगा. और इस लड़ाई में ये वैस्यायें भी शामिल होंगी. मुक्ति यज्ञ में अपना डर, अपनी कैद, अपनी फिकर, अपनी रोजी रोटी सब आहूत कर के. जनता की मुक्ति के लिए. जनता की सत्ता के लिए. लड़ाई में ये सब साथ आयेंगीं. भाषा की बेशर्मी को दूर किया जाएगा. व्याकरण फिर से जिन्दा होगी और मानवता अश्लीलता को खतम कर देगी. यही सोचता हूँ मैं, जब सोचने बैठता हूँ. एक समय आएगा जब हम इस वैश्या समय को खत्म कर देंगे और इस समय की कैद में जितनी वैस्यायें हैं. सब को आजाद करा दिया जायेगा. इंसान होंगे सब एक दूसरे के लिए जीते, इंसान. अपना सुख दुःख बांटते इंसान. आजादी और समानता को जीवन के उद्देश्य की तरह जीते इंसान. 

तुम्हारा-अनंत         



       

एक वैकल्पिक का संधान और खोज !

मेरी कई महिला दोस्त हैं. जब वो कहीं मुसीबत में फंस जातीं हैं. जैसे किसी ने उन्हें छेड़ दिया या फिर गलत-सलत कहा हो तब वो फर्राटेदार गालियाँ देती हैं. हवा निकल देतीं हैं. सामने वाले की. बड़ी खुशी होती है, ये देख कर. सामने वाले चेहरे पर डर और अपने दोस्तों के चेहरे पर खुशी देख कर. पर एक दुःख भी होता है कि जो भी गाली इन लोगों ने दी है. वो सब गालियाँ इसी महिला विरोधी मर्दवादी समाज और मानिसकता के द्वारा गढ़ी गयी हैं. जहां सामने वाले की माँ, बहन, बेटी के साथ जितनी हैवानियत को शब्दों से चित्र खीच सकों उतनी ही असरदार गाली होगी. 

मैं अपनी महिला मित्रों से जब इस बारे में कहता हूँ यार तुमने तो सामने वाले की माँ, बहन, बेटी को गालियाँ दी हैं. उस इंसान को कुछ भी नहीं कहा. तुमने अपने शब्दों में उनकी माँ, बहन, बेटी के साथ हैवानियत का खाका खीचा है. इसमें उन बेचारियों का क्या दोष. वो भी तो तुम्हारी तरह ही है. इस जकड़े हुए समाज के बेहद कटीली जकड में. 

तो वो मुझसे कहतीं है... ओएई!  रहने दे अपना ज्ञान..गुस्सा आया. जो मुंह से निकला कह दिया. मैं अशांत हो जाता हूँ.  मैं तर्क करता हूँ. इस गुस्से और गुस्से को दिखने के तरीके को भी तो दुश्मन व्यवस्था ने ही बनाया है. तुम उनके नियम, उनके तरीके पर चल कर उनका ही काम कर रही हो. तुम ये गलियां दे कर समग्र महिला समाज को गाली दे रही हो. बेहतर होगा कि तुम लोग पुरषों पर गालियाँ बनाओं. तुम उनपर अत्याचार और दर्पमर्दन का दृश्य गढो. तुम उनके उस अहम पर चोट करने वाली गलियां बनाओ जो उन्हें हर पल ये अहसास करता रहता है कि वो महिलाओं से बड़े हैं. सक्षम है. वो मालिक है महिलाओं की तकदीर के. उनके पास सुरक्षित है उनकी बहन बेटी और माँ की तकदीर की कुंजी. तुम कुछ जलता हुआ क्यों नहीं गढती तो जला दे उनके भीतर के मर्द को. अगर जला नहीं पता तो असहज तो कर ही दे. 

तुम जाने अनजाने में खुद की ही चेतना पर वार करती हो. तुम अपनी गालियों में महिलाओं पर, अपनी सहयोद्धाओं पर ही तो हमला बोलती हो. हिंसक होती हो. अपनी लड़ाई और अपनी जमीन पहचानो यार. ये लड़ाई किसी के छेड़ने या गलत-सलत कहने पर उपजे हुए गुस्से की अभिव्यक्ति की लड़ाई नहीं है. ये सम्पूर्ण मर्दवादी व्यवस्था, सोच और संस्कृति के प्रतिकार और प्रतिरोध की लड़ाई है. यहाँ हमें अपने गुस्से का रंग, रूप, कला और कलेवर खुद ही गढना होगा. उसे अभिवक्त करने का भी तरीका भी हमारा अपना होगा उनसे बिलकुल अलग, रचनात्मक और सार्थक. हम हिंसा के पक्ष में नहीं है पर हिंसा का जवाब प्रतिहिंसा में देंगे. ये प्रतिहिंसा समानता के महान उद्देश्य के लिए होगी. ये रचनात्मक प्रतिहिंसा होगी. 

मैं इतना सब कुछ कहता हूँ और मेरी वो सब महिला मित्र चुप-चाप सुनती रहतीं है. फिर मुझे वाह! नेता जी! कह कर बात को हवा में उड़ा देतीं हैं. मैं भी हँसने लगता हूँ पर फिर बाद में वही लोग मुझे अपनी डायरी में मर्दों पर लिखी हुई गाली ला कर दिखाती है. इस गाली का कोष बढ़ता जा रह है. ये आपस में लड़कियां बांटने भी लगी हैं इन गलियों को. इन गलियों का प्रसार होता जा रह है. गज़ब का गुस्सा है इन गलियों में. गज़ब का दर्द. मर्दों के अत्याचार और हिंसा के खीचे सारे चित्र छोटे पड़ते हैं इस गलियों के दृश्यों के आगे. ये वैकल्पिक गलियां है. ये वैकल्पिक गुस्सा है. एक वैकल्पिक व्यवस्था के निर्माण प्रक्रिया का हासिल. एक सोच और संस्कृति का रूप धरता हुआ कौंधता हुआ क्रोध ! बड़ा सुकून देता है इस वैकल्पिक का संधान और खोज. 

तुम्हारा अनंत 

Friday, June 27, 2014

कल्पना, अनुभूति, समय और हम !!

कैसे बदलता रहा है हमारा संसार, हमारी अनुभूति और कल्पनाओं में सतत. इस बदलाव को हम कभी समझ नहीं पाए, कभी भांप नहीं पाए और ये बदलाव वैसे ही होते रहे जैसे चलती रहतीं हैं साँसे और धडकती रहतीं हैं धड़कने.

हमारे नियंत्रण के बाहर जीवन के बदलावों का एक संसार होता है.जहाँ समय शासन करता करता है, बिलकुल तानाशाह की तरह. हम हर बार अमेरिका बन कर घुस जाना चाहते हैं उसकी सरहदों के भीतर, सब कुछ अपने नियंत्रण में करने के लिए, मन माफिक रचने और गढ़ने के लिए, पर समय क्रांतिकारी होता है, बहुत ही क्रन्तिकारी, वो सामंती और साम्राज्यवादी शक्तियों के सामने नहीं झुकता, इसलिए मुझे हर बार हारना पड़ा है और मन, समय के अनियंत्रित संसार में, मातम की मजार पर कौव्वाली करने को अभिशप्त रहा है. समय जैसे चाहता है. हमें चलाता है, हमारा जीवन गढता है, बिगाड़ता है. हम बस साथ साथ चलते हैं. उजड़ते हुए. बसते हुए, बनते हुए, बिगड़ते हुए.

जब छोटे थे, मतलब बच्चे, तब मन करता था बड़े हो जाएँ, समय ने एक भी नहीं सुनी और हम रोते रोते, टिनटिनाते हुए स्कूल जाने को अभिशप्त रहे. तब हमारा संसार कामिक्स के गढे हुए चरित्रों के आस पास घूमता था. तब दिल इंजिनियर, डाक्टर, प्रोफ़ेसर और पत्रकार नहीं बल्कि शक्तिमान और चाचा चौधरी बनना चाहता था.

हमसे कोई पूछता कि किससे शादी करोगे तो कभी कहते पापा से करेंगे, कभी मम्मी का नाम ले लेते, कभी दीदी का. मतलब जो सामने आ जाये उसी का नाम ले लेना है. क्योंकि शादी की जो कल्पना और परिभाषा आज दिमाग में उभरती है तब उसका नामो-निशान नहीं था. तब शादी का मतबल किसी को बेहद प्यार करना था और प्यार का मतलब एक पप्पी दे कर कभी आइसक्रीम, कभी चाकलेट झटक लेना.

जीवन की अनुभूतियाँ रूई की तरह कोमल थी और कल्पनाएँ एकदम पारदर्शी. कोई रंग नहीं था उन कल्पनाओं का. इच्छाओं की सबसे ऊंची उड़ान फन पार्क में मस्ती, मेले के झूले, खूब सारी चाकलेट और आइसक्रीम तक जाते-जाते दम तोड़ देती थी. तब लड़की सिर्फ लड़की होती थी. वो दिमाग में कोई चित्र नहीं बनाती थी. न कोई तर्क, ख्याल, जज्बात और परिभाषा कौंधती थी लड़कियों को देख कर. हाँ माँ के कहे कुछ बाक्य जरूर गूंजते थे दिमाग में, लड़कियों की तरह क्या रोता है, क्या नाच रह हो लड़कियों की तरह, क्या डरते हो लड़कियों की तरह...सो लड़की मतलब रोने वाला, डरने वाला, नाचने गाने वाला कोई इंसान था.

हम लड़कियों से दोस्ती करते थे, चुटिया पकड़ का खींचते थे. कुस्ती लड़ते थे साथ में, वो भी मोहल्ले में हनुमान जी की मंदिर में, शाम सात से रात साढे-आठ बजे तक, वो भी एक शर्त के साथ कि चलो तुम हनुमान जी से शक्ति मांग लो, मैं नहीं मागूंगा फिर भी तुम्हे हरा दूंगा.

मैं लड़का था सो कहीं न कहीं ये भीतर बैठने लगा था कि बिना किसी सहारे के लड़किया लड़कों के बराबर नहीं हो सकतीं. ये भ्रम तब टूट जाता था. जब रीना लड़ने के लिए आती थी. कोई लड़का तैयार नहीं होता था. दारा सिंह की बहन थी वो, वो कहती थी तुम चाहो तो सारे देवी देवता से शक्ति मांग सकते हो, मैं नहीं मागुंगी और तुम्हे हरा दूंगी. मतलब बत्तीस करोड़ देवी देवता के साथ परास्त करने का दवा करती थी रीना. पूरी महिला भीम अवतार. कई बार दो तीन लड़के मिल कर लड़ते थे और हार जाते थे.

ऐसी पहलवान लड़की भी प्यार में हार गयी. पिछले बार जब घर गया था. मम्मी ने बताया की रीना ने प्रेमविवाह कर लिया था, सब की नाक कटाई थी और देखो जला कर मार डाला सबने, कोई केस भी नहीं कर पाए, घर वाले. मरने के छ: महीने बाद बताया कि लड़की खाना बनाते हुए मर गयी. मैं सोचने लगा कितने लोगों ने मिल के जलाया होगा रीना को, पूरा परिवार साथ मिला होगा और उनमे से हर एक ने सारे देवी देवताओं से ताकत भी ली होगी. तभी उसे मार पाए होंगे दरिंदे. लड़कियों को माल ही समझते हैं साले.

मैं रोना चाहता था पर माँ सामने थी वो कहती, लड़की है क्या जो रो रहा है ? इसलिए चुप ही रह गया. बहुत मारने की कोशिश करता हूँ भीतर के मर्द को, पर मरता ही नहीं, न जाने किस बेहया माटी का बना है ये. रीना की अनुभूतियाँ कैसे बदलीं होंगी. उसकी कल्पनाओं में क्या उभरा होगा. क्या दर्ज किया होगा उसने अपने दिल में. कैसे शासन किया होगा समय तानाशाह ने उसके जीवन के निर्णायक, पर अनियंत्रित क्षेत्र में मैं सोचना, समझना चाहता था. पर कैसे न मैं कोई लड़की था और न रीना ही जिन्दा थी. खैर कुछ देर रीना के दर्द के साथ रहा फिर दुनिया में लौट आया. जहाँ समय का शासन था.

बचपन में भूख की माप एक बित्ता थी. माँ कहती थी एक बित्ता पेट है मेरा, जितना पेट था उतना ही भूख थी. सुकून का चेहरा अलिफलैला, अलादीन, शक्तिमान, अंकल क्रूज, विन्नी दा पू, और दानासुर से मिलता था. दौलत का मतलब एक सिक्का था. जिसे दूकान में दे देने पर चाकलेट मिल जाये. सौ की गांधी छाप नोट बर्बाद कगाज का टुकड़ा था हमारे लिए, क्योंकि कभी खुद खर्च ही नहीं किया उसे, कोई मेहमान दे कर जाता और वो छिन जाती. मैं कभी-कभी सोचता हूँ कि क्यों मैं गाँधी जी को पसंद नहीं करता या पाता, तो बहुत सारे कारणों में मुझे ये भी एक कारण लगता है. जैसे जैसे बड़े होने लगे चारो तरफ और हमारे भीतर भी बदलाव आने लगे.

जिनके साथ हम खेलते थे उन लड़कियों ने जैसे ही दुप्पटे लिए, उनकी परिभाषा बदल गयी. मोहल्ले के ही जो चाचा, भाई कल तक बिटिया कहते थे अब बिजली, माल, कातिल, कट्टो, बिल्लो, छामक्छल्लो, और तूफानी कहने लगे थे. उनकी नजरें अब मेरी दोस्तों के शरीर पर महज दो जगह पर अटक जाती थीं. वो लड़कियां थीं इसलिए वो जल्दी बदल गयीं थी बहार से भी और भीतर से भी. अब वो हमारे साथ कुस्ती करना तो छोडो हाँथ पकड़ कर भी बात नहीं करती थीं. उनमे से कईयों ने तो घर से निकलना और बात करना भी छोड़ दिया था.

मैं ये नहीं समझ पाया था क्योंकि मैं उन अनुभूतियों और कल्पनाओं से नहीं गुजर रह था जिससे वो गुजर रहीं थीं. उनके लिए आदमी मतलब दरिंदा होने लगा था. जब वो घर से बहार निकलती थी तो उनका सारा ध्यान खुद के शरीर पर ही रहता था. चाल कैसी है? कपडा कैसा है ? मैं ढकी हूँ ठीक से कि नहीं ? मेरे उभार तो नहीं दिख रहे हैं ? ये सवाल वो लगातार खुद से पूछती रहती थी दिन रात, उन दिनों.

उन लड़कियों को उन कथित भाई और चाचाओं की आँखों में हवस का महाकाव्य लिखा जाना साफ़ दीखता था. उनकी कल्पनाओं में बेहद डरावने चित्र उभरने लगे थे और हर परिचित-अपरिचित आदमी उनकी कल्पनाओं में उन्हें नोच लेना चाहता था. इसलिए उन्होंने खुद को कैद कर लिया था खुद के ही घर में. मुझे कभी मौका नहीं मिला उन लड़कियों से ये पूछने के लिए कि भूख का क्या मतलब था उनके लिए उन दिनों, प्यार का रंग क्या था. सुकून का चेहरा कैसा था. जीवन क्या था उन दिनों. रिश्तों कि क्या परिभाषा थी तुम्हारे लिए. कैसा गढा था उस तानाशाह समय ने तुम्हारी कल्पनाओं और अनुभूतियों का संसार. खैर जब मैं उम के उस पड़ाव पर पहुंचा. जहाँ मेरी दोस्त लड़कियां पहले पहुँच चुकीं थी. तब शायद मैं जवान हो रह था. संसार के लिए मेरी अनुभूति, कल्पना और परिभाषा सब बदलने लगी थी.

मैं जब जवान हो रह था तब मैंने पाया मेरे भीतर और बहार सब कुछ बड़ी तेजी से बदल रह है. मेरी कल्पनाओं के भी दृश्य और चित्र बदलने लगे थे. भूख की परिभाषा और माप दोनों बदल रही थी. भूख के दायरे में अब पूरा शरीर आ गया था. दौलत से ले कर ताकत तक सब कुछ खा जाना चाहता था मैं. मेरी आवाज जब से मोटी हुई थी. मैं दहाडना चाहता था ऐसे जैसे सारा संसार मुझसे डरने के लिए तैयार बैठा है.

जिन माँ-माप के डांटने पर मैं पैंट गीली कर देता था. उन्हें भी डराने लगा था मैं. मनुष्यों खास तौर पर लड़कियों के शरीर को देखने का नजरिया बदलने लगा था. अब सोचता हूँ तो लगता है कि वो मोहल्ले के चाचा और भईया टाइप लोग मेरी आँखों में छिप कर बैठने लगे थे. इलहाबाद में दारागंज के रहने वाले थे. सो कट्टा और बाम बनाना सीख लिया और जब कट्टा साथ होता था तो खुद को बराक ओबामा समझते थे हम लोग. जाने अनजाने अब हम भी लड़कियों में कट्टो, बिजली, तूफ़ान देखने लगे थे. अब हमारी इच्छाओं की उड़ान सारा संसार नाप लेना चाहती थी. जो कुछ भी हमने आँखों से देखा था. हम भोग लेना चाहते थे. समय सब कुछ बदल रह था. शक्तिमानो, चाचा चौधरियों, अलादिनों को अब मेरी कल्पना में जगह नहीं मिलती थी. वहाँ अब सचीन, सलमान, शाहरुख बसने लगे थे. सब कुछ बदल गया था. और मैं कुछ भी नहीं कर पा रहा था. समय का निरंकुश शासन था.

पर जब मैं इलहाबाद विश्वविद्यालय गया और वहीँ पहली बार मैंने मार्क्स का नाम सुना, एक संगठन था वहाँ, नाम नहीं बताऊंगा, क्योंकि नाम में क्या रखा है. उसने मेरे सोचने और समझने का तरीका बदल दिया. मुझे समाज में फैली हुई गुलामी, जकडन और बेडियाँ साफ़ दिखने लगीं. मुझे दिखने लगा शरीर के उस पार भी कुछ है. जिसे भावना कहते है, संवेदना कहते हैं. दर्द के इतिहास और अन्याय के भूगोल को मैं समझने लगा था. मुझे अपनी उन पुरानी दोस्तों का दर्द जिन्दा दीखता था. वो मुझसे बातें करत था. मुझे मेरा छोटापन दिखने लगा. गुलामी का दूत बना, मैं गुलामों की तरह गूम रह था. आज भी घूम रह हूँ. पर गुलाम नहीं हूँ. लड़ता हूँ हर पर अपने भीतर उभरती हुई कल्पनाओं से अनुभूतियों से, उस निरंकुश तानाशाह समय से. गुलामी और जंजीरों से.

जीवन की परिभाषा और शक्ल बदल चुकी है और लगातार बदल रहीं हैं. पर इस बार लड़ाई है. हम समय के युद्ध बंदी है इस बार गुलाम नहीं. जीत की राह पर कुर्बानियों की लकीर खीच रहें हैं हम. ये लकीर ही वो निशाँ होगी जिसे देख कर हम जैसे लोग आयेंगे. वहाँ, जहाँ लड़कियां महज शरीर नहीं होंगी. उनकी काया के भूगोल के उस पार जा कर हम उनके दर्द का इतिहास हम बांच सकेंगे. हमारी भूख की माप एक बित्ता ही होगी और हमारी कल्पनाओं में हम हिंसक और अत्याचारी नहीं होंगे. इसी उम्मीद के साथ समय के खिलाफ विद्रोह कर रखा है हमने, एक दिन वो सुबह आएगी. जब समय के सभी युद्ध बंदी रिहा होंगे.

तुम्हारा- अनंत 

Sunday, June 15, 2014

सब कुछ खूबसूरत नहीं है !

कई बार सोचता हूँ कि क्या कोई कहानी सारी सच्चाई, सारा दर्द, सारी वेदना और सारा यथार्थ बयां कर सकती है. कुछ न कुछ हर बार छूटना नियति है और ये नियति है इसीलिए शायद एक अलग और नई कहानी की सम्भावना बनी रही है कुछ अलग, नया और छुटा हुआ कहने, दिखाने और जीने का ये सिलसिला चलता रहा है. शायद जीवन इसी का नाम है. जीवन की बहुत सारी परिभाषाएं हैं. उनमे से एक परिभाषा ये भी है कि जीवन की कोई परिभाषा नहीं हो सकती, वो एक अपरिभाषित परिभाषा है.

पिता के बारे में सोचते हुए अक्सर मैं सच्चाई, यथार्थ, जीवन, वेदना और कहानी के बारे में सोचने लगता हूँ. पिता जी की तस्वीर आँखों में उतरती तो है पर उसका नाम पिता नहीं होता. वो जीवन होती है. जिसके कई क्रूर रंग हैं और अँधेरा जिसका सबसे पसंदीदा लिबास है. पिता जी के बारे में सोचते हुए, कहते हुए मेरे होंठो पर मुस्कान होती है पर बेहद झूठी, इतनी कि कोई भी कह दे कि ये मुस्कान दर्द की बहन है. नहीं याद आता कुछ भी ऐसा कि जिस पर आह न कह सहूँ. कुछ नहीं सोच पाता ऐसा कि थोडा चैन आये. कुछ झलकियाँ मिलती हैं यहाँ-वहाँ से पर बेहद न काफी, इतनी कि रेगिस्तान के प्यासे को आंसू की बूँद मिली हो पीने के लिए. सब कुछ ऐसा कि कुछ कहने को जी ही नहीं करता. हिजरत करते सपने और एक बिखराव, एक संघर्ष, जमीन में लेटे, सोते लोग, गाली बकते चेहरे और हिकारत से देखती आँखें दिखती है. और पिता जी इन सब के बीच ओझल रहते हैं.न जाने कहाँ होंगे वो शायद गंगा जी के किनारे, या फिर कहीं और पता नहीं. कुछ दिन पता करने की कोशिश की पर फिर सोचा कि क्या फायदा पिता जी ने अपनी दुनिया बना ली है. हमें अपनी दुनिया बना लेनी चाहिए.

मैं बचपन याद करता हूँ तो ज्यादा कुछ याद नहीं आ पाता, चाय बेचते दो छोटे बच्चे याद आते हैं, जिन्होंने चाय भी ऐसी बनाई है जिसे चाय नहीं कहा जा सकता. कुम्भ मेला याद आता है और एक बेचैनी जो अपनी परिभाषा पाने के लिए बेक़रार है. बार बार यही दीखता है. दो छोटे लड़के परेड मैंदान में दोहरा बेचते हुए दीखते हैं, एक दूकान दिखती है और रेलवे स्टेशन, इस सब के बीच लोगों के तेज नज़र छीलती, भेदती रहती है. पिता जी यहाँ भी कही नहीं दीखते है. उनका नाम है वो नहीं है. हम हैं और हमारे साथ है हमारी माँ और उसके सपने.

सब कैसे लिखते हैं न कि पिता का अर्थ है एक छत, जो जीवन की सारी धूप और बारिश खुद झेल कर जीवन का बसंत अपने बच्चों को खाते में लिखता है. कैसे पिता को बरगद कहते है सब और मैं देखता हूँ शून्य में, जैसे वहाँ कुछ दिख जाये जिससे मैं उनके कहे का मतलब समझ सकूं. उनकी परिभाषा मेरी परिभाषा से मेल नहीं खाती. और न उनके पिता मेरे पिता जैसे हैं. शायद दुनिया के सारे पिता एक जैसे नहीं होते. मेरा जिया बदसूरत है इसका मतलब सबका होगा. मैं न ऐसा कह रहा हूँ और न ऐसा कभी कहूँगा. पर मैं ये जरूर कहना चाहता हूँ कि सब कुछ खूबसूरत नहीं है और जो खूबसूरत नहीं है मैं उसे खूबसूरत नहीं कह सकता.

तुम्हारा अनंत