Wednesday, March 14, 2012

’अब न रहे वो पीने वाले , अब न रही वो मधुशाला....


घर से निकलते ही कुछ दूर चलते ही रस्ते पर है घिस्सू मियां का घर, शरीर जर्जर, तेज नज़र, आवाज़ प्रखर, देश-दुनिया की खबर, कविता मे तलवार का असर, तुकबंदी  करता चला जाऊँ तो मुक्तिबोध की तरह एक बड़ी कविता लिख डालूँगा पर उसकी कोई जरूरत नहीं है। लेकिन आप सोच रहे होंगे कि 1997 मे ‘’ पापा कहते हैं’’ फिल्म के लिए जावेद अख्तर के लिखे जिस गाने को ‘’फिल्म फेयर’’ मिला। उसे मैंने, न जाने किस घिस्सू मियां के ऊपर वार दिया। जवाब आपको चौंका सकता है ! पर मैं जानता हूँ कि आप चौकने के आदि हो गए है, और अब बड़ी से बड़ी बात भी आपको नहीं चौका पाती, अभी राजनीतिक अटकलों के बीच पूर्ण बहुमत की सरकार बनने की चौकाने वाली घटना भी बिन चौकाए ही होली की तरह हो ली। और आपकी की माथे की लकीरें न हिलीं न डोलीं।
खैर बात घिस्सू मियां कौन हैं पर अटकी थी। तो इस सवाल का जवाब है कि घिस्सू मियां कोई नहीं है पर बहुत कुछ हैं। क्योंकि वो एक कवि है और कवि कुछ न होते हुए भी बहुत कुछ होता है। मैं घिस्सू मियां से जब मिलने गया तब वो कागज पर कलम घिस रहे थे। शायद कोई कविता लिख रहे थे। उनका चेहरा होली के बाद बिजली की तारों पर लटके हुए कपड़ों कि तरह लटका हुआ था।


मैंने उनकी उदासी कि परत कुरेदी तो दर्द का समंदर फूट पड़ा, कहने लगे ‘’अजी ये कोई होली है, होली तो हमारे जमाने मे मनाई जाती थी,अच्छे-खासे रंगों के त्योहार को बदरंग कर डाला, मैंने कुछ और जानने की नियत से घिस्सू मियां को थोड़ा और घिसा तो कहने लगे ‘’होली मे पहले कविता के गुलाल उड़ते थे, व्यंग की  पिचकारियाँ चलाई जाती थी। छोटे शहर-कस्बों से लेकर महानगरों तक रंगभरी एकादसी से होली के बाद चलने वाले होली मिलन समारोह मे कवि सम्मेलनों मे आम आदमी के दुख, दर्द, पीड़ा, कुंठा की बात की जाती थी । फागुन की हवा जैसे ही फगुनाती थी हवा मे हरमुनिया बजने लगता था आदमी क्या पेड़ पौधे तक बौरा उठते थे।  उस होली के उमंग मे कहना पड़ता था ‘’होली मे बाबा देवरा लागे’’ लेकिन मोबाइल और कंप्यूटर के इस युग मे सब नदारद हो गया है। अब त्योहार के आते ही हवाओं मे डिजिटल मैसेज तैरने लगते है वो भी फारवर्ड किए हुए, खुद के दिल से निकले नहीं बल्कि एड्वरटाइजिंग एजेंसी के डिजाइन किए गए मैसेज। अब होली मे न वैसा रंग है, न वैसा संग है, मन को हुलसाने वाली वैसी हुड़दंग भी कहाँ है ! न वो प्रीत है, न मीत है और न ही वो गीत है। 
घिस्सू मियां की आँखें अतीत मे कुछ देख रही थी और वो कह रहे थे कि  ‘’अब वो फिल्मे भी नहीं रही जो बताती हों कि कैसे घर के आँगन मे गोरी लऊँगा-ईलाईची का बीरा लगा कर अपने यार का इंतजार किया करती है ताकि वो आकर ‘’सिलसिला’’ के अमिताभ की तरह उसके साथ गा सके ‘’ रंग बरसे भीगे चुनर वाली रंग बरसे’’।
गली मोहल्ले मे हमजोलियों की टोलियाँ दो-चार-दस मोहल्ले मे दौड़ लगा कर ‘’कटी पतंग’’ का सुपर हिट गाना ‘’आज न छोड़ेगे बस हमजोली खेलेंगे हम होली, खेलेंगे हम होली,, गाया करती थी। 
उन्हे इस बात कि कोई सुध नहीं रहती थी कि हमजोली की चुनरिया भीग रही है या चोली’’ वो तो बस होली खेलने मे मस्त रहते थे, कहीं‘’होली खेलय रघुवीरा’’ गूंज रहा होता था तो कहीं मधुवन मे राधा-कृष्ण के होली गीत गए जा रहे होते थे। चौराहों मे लगे हुए लाउड स्पीकर से जब ‘’शोले’’ फिल्म का गीत …’’होली के दिन, दिल खिल जाते है, रंगों मे रंग मिल जाते है, गिले शिकवे सब भूल के दोस्तों! दुश्मन भी गले मिल जाते है....’’ सुनाई देता था तो लगता था कि मानो किसी ने होली का सच्चा फलसफा कह दिया हो।
 हमारे बालीबुड़ मे ‘’सिलसिला’’ से ले कर ‘’बागबान’’ तक ऐसी सैकड़ों फिल्मे हैं जो होली के रंगों से रँगी हैं। पर हाल इसमे कुछ कमी आई है आजकल के फिल्मों और उसके गीतों से हमारा जीवन और जीवन के प्रतीक गायब से होते जा हैं। त्योहार, पर्व, नदी, पहाड़ी, जंगल, झरना,डाकिया, खत, फूल, बाग, भौंरा, आसमान, हवा, परिंदे, याद, दर्द, आँसू सब कुछ कहीं खो सा गए है।
आज गोरी होली पर ‘’डर’’ फिल्म की  नायिका की तरह अपने साजन से ‘’ अंग से अंग लगाना साजन,, ऐसा रंग लगाना साजन,, कि मनुहार नहीं करती बल्कि ‘’चिकनी चमेली’’ छिपके अकेली पव्वा चढ़ा कर आती है और न जाने कितनों को खुद पर फिसलाते हुए, उपभोगतावाद की अंधी गलियों मे अपना नाम ‘’जलेबी बाई’’ बता कर गुम हो जाती है। आज बसंत मे आम के बौराने पर गोरी कोई लोकगीत गाते हुए जवान नहीं होती बल्कि किसी और ग्रह से आई हुई शीला की तरह जवान होती है और मुन्नी की तरह बदनाम हो जाती है।
घिस्सू मियां और भी बहुत कुछ कहना चाह रहे थे पर न जाने क्यों हरिबंश राय बच्चन की मधुशाला की पंक्तियाँ गाते हुए चुप हो गए  ‘’अब न रहे वो पीने वाले , अब न रही वो मधुशाला......मैं तो घिस्सू मियां का दर्द समझ गया था... शायद आप भी समझ गए हो।      

तुम्हारा--अनंत  

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