Saturday, June 28, 2014

ये समय एक वैश्या है !!

समय एक वैश्या है और हम लोग, जो इस समय में जी रहे हैं. वो सब भी वैश्या ही हैं. क्यों गाली लगा न ? कितनी बड़ी बात कह दी मैंने और सोचा भी नहीं. यकीन मानो बहुत सोचा, इस सोचने में यह भी सोचा कि सोचते-सोचते ही तो निराला, मुक्तिबोध, धूमिल, गोरख और रूसो पागल हो गए थे. जिन्हें भद्र लोग अपनी भद्र भाषा में विक्षिप्त कहते थे, कहते हैं. 

मैंने सोचने-सोचने में ही सोचा कि कह देता हूँ मैं भी, जो मन में आया है, कहाँ सोचते हैं वो लोग कुछ भी कहने से पहले. जिन्होंने इस वैश्या समय को गढा है. जो इस वैश्या समय की फैक्ट्री से वैश्या इंसानों को उत्पाद की तरह पैदा कर रहे हैं. वो कहते हैं दिन को रात और हम मान लेते हैं. उधर वो हमारी रात को भी वो रात नहीं कहते. जब वो करोणों लोगों के दर्द पर मुट्ठी भर लोगों का विकास लिखते हैं. तब हम पेट के पहाड के तले दबे हुए अपनी रोजी रोटी को निहारते रहते हैं. वो हमें हँसने को कहते हैं तो हम हंस देते हैं. रोने की इजाजत नहीं देते है वो लोग. वैश्यायें दिल बहलाने की चीज होतीं है. उन्हें सिर्फ हँसने-हंसाने और दिल बहलाने की इजाजत है. अपना दर्द कहने और दूसरों का दर्द सुनने की न उन्हें इजाजत है, न समय. 

वैश्या शब्द तुम्हारे लिए एक गाली होगी. हमारे लिए ये समय की एक कैद है, एक अवस्था है. एक अवस्था जहाँ हम हारे हुए, डरे हुए, कैद हैं. जहाँ जीवन एक पहाड है और मजबूरी अस्तित्व का दूसरा नाम. हर कदम जहाँ परतंत्र है और समर्पण जीवन की पहली और अंतिम शर्त. 

भाषा ने अपने हथियार डाल दिए हैं और वो हाँथ खड़े करके बेशामों की तरह उनके खेमे में खड़ी हो गयी है. व्याकरण ने अपने ही नियमों में उलझ कर दम तोड़ दिया है. जीवन अब बेशर्म भाषा और मुर्दा व्याकरण से परिभाषित नहीं किया जा सकता. इसीलिए हमने भाषा और व्याकरण के हांसिये पर फेंके गए शब्दों, नियमों और परिभाषाओं को बटोरना शुरू कर दिया है. हम इन्ही शब्दों, नियमों और परिभाषाओँ में अपने जीवन के स्वर तलाश रहे हैं. उसके अर्थ ढूंढ रहे हैं. तुमने जिन्हें अश्लील कह दिया है. वही हमें हमारी परिभषा लगती है. और तुम जो लाल किले की छत से कहते हो, देश की उन्नति के गीत गाते हो. आदर में सर झुकाते हो, गले मिलते हो, हाँथ जोड़ते हो. ये सब हमें बेहद अश्लील लगता है. आत्मा तक छील देने वाली अश्लीलता भरी है इसमें.

नौकरी है, रोजी है, रोटी, घर है, गाडी है, टीवी है, सुकून है, शोर से भरा हुआ. बीवी है, बच्चे हैं और बहुत सारा डर. ये व्यवस्था जब तब आत्मा तक को नंगा कर देती है. बलत्कृत देह नहीं आत्मा होती है. हर बार जब भी कुछ सही और गलत में टटोलने लगते हैं. सच जानते हैं पर झूठ बोलते हैं और हमारा बलात्कार हो जाता है. हम जानते हैं कि पुलिस ने गोली क्यों चलाई अपनी जमीन के लिए लड़ते हुए किसानों पर, हम जानते हैं कि लाल गलियारे में युद्ध जनता नहीं सत्ता लड़ रही है. हम जानते हैं कि ये पुलिस किसकी है, ये अदालतें, ये अफसर किसके हैं. पर हम बोलते कुछ नहीं . हम राष्ट्रगान गाते हैं और खुद को देशभक्त समझते हुए. एकटक देखते रहते हैं. रोजी रोटी के चाँद को. सुख को आराम को. हमारी कोई अपनी इच्छा नहीं है. क्योंकि वैश्याओं की अपनी कोई इच्छा नहीं होती. हम व्यवस्था के इशारे पर मुजरा कर रहे हैं. बेचे जा रहे हैं. नोचे जा रहे हैं. हम बेशर्म भाषा और मुर्दा व्याकरण के सहारे खड़े हैं. हमने अपने बचाओ में गढे हैं बेहद अश्लील, गोल मटोल तर्क. और उसी को सटा देते हैं जब हमारी आत्मा हमपर चढाई करती है. पेट और आत्मा की लड़ाई में पेट जीत जाता है और आत्मा बलत्कृत होने को अभिशप्त होती है. 

हम प्रोफ़ेसर, डाक्टर, कलेक्टर, इंजीनियर, पत्रकार, सत्ताधीश और न जाने क्या क्या बनने के फिराक में न जाने कब और कैसे वैश्या बन जाते हैं. हमें पता भी नहीं चलता. हम व्यवस्था के हांथों हजारों बार बेइज्जत होते हैं. शोषित होते हैं. लूटे जाते हैं. पीटे जाते हैं. बलत्कृत होते हैं. पर लगातार व्यवस्था के दरबार में नाचते रहते हैं. मन बहलाते रहते हैं सरकार बहादुर का. क्योंकि हम रोजी, रोटी, संरक्षण, सुरक्षा और संयम के मारे हुए लोग हैं. हम वैसे ही जीने के आदि होते जा रहे हैं जैसे  जिया ही नहीं जा सकता. सो हम मरते हुए जी रहे हैं और जीते हुए मर रहे हैं.

हम मीडिल क्लास इस वैश्या समय के गुलाम हो गए हैं और ये गुलामी हमें लगातार वैश्या बनाती चली जा रही है. पर कभी कभी आशा जगती है कि ये वेश्याएं जागेंगी. अपना हक मागेंगीं. दूसरों के हक का हिसाब लेंगीं. आजादी और समानता के सिद्धांत को जीवन का दूसरा नाम घोषित किया जायेगा. और इस लड़ाई में ये वैस्यायें भी शामिल होंगी. मुक्ति यज्ञ में अपना डर, अपनी कैद, अपनी फिकर, अपनी रोजी रोटी सब आहूत कर के. जनता की मुक्ति के लिए. जनता की सत्ता के लिए. लड़ाई में ये सब साथ आयेंगीं. भाषा की बेशर्मी को दूर किया जाएगा. व्याकरण फिर से जिन्दा होगी और मानवता अश्लीलता को खतम कर देगी. यही सोचता हूँ मैं, जब सोचने बैठता हूँ. एक समय आएगा जब हम इस वैश्या समय को खत्म कर देंगे और इस समय की कैद में जितनी वैस्यायें हैं. सब को आजाद करा दिया जायेगा. इंसान होंगे सब एक दूसरे के लिए जीते, इंसान. अपना सुख दुःख बांटते इंसान. आजादी और समानता को जीवन के उद्देश्य की तरह जीते इंसान. 

तुम्हारा-अनंत         



       

एक वैकल्पिक का संधान और खोज !

मेरी कई महिला दोस्त हैं. जब वो कहीं मुसीबत में फंस जातीं हैं. जैसे किसी ने उन्हें छेड़ दिया या फिर गलत-सलत कहा हो तब वो फर्राटेदार गालियाँ देती हैं. हवा निकल देतीं हैं. सामने वाले की. बड़ी खुशी होती है, ये देख कर. सामने वाले चेहरे पर डर और अपने दोस्तों के चेहरे पर खुशी देख कर. पर एक दुःख भी होता है कि जो भी गाली इन लोगों ने दी है. वो सब गालियाँ इसी महिला विरोधी मर्दवादी समाज और मानिसकता के द्वारा गढ़ी गयी हैं. जहां सामने वाले की माँ, बहन, बेटी के साथ जितनी हैवानियत को शब्दों से चित्र खीच सकों उतनी ही असरदार गाली होगी. 

मैं अपनी महिला मित्रों से जब इस बारे में कहता हूँ यार तुमने तो सामने वाले की माँ, बहन, बेटी को गालियाँ दी हैं. उस इंसान को कुछ भी नहीं कहा. तुमने अपने शब्दों में उनकी माँ, बहन, बेटी के साथ हैवानियत का खाका खीचा है. इसमें उन बेचारियों का क्या दोष. वो भी तो तुम्हारी तरह ही है. इस जकड़े हुए समाज के बेहद कटीली जकड में. 

तो वो मुझसे कहतीं है... ओएई!  रहने दे अपना ज्ञान..गुस्सा आया. जो मुंह से निकला कह दिया. मैं अशांत हो जाता हूँ.  मैं तर्क करता हूँ. इस गुस्से और गुस्से को दिखने के तरीके को भी तो दुश्मन व्यवस्था ने ही बनाया है. तुम उनके नियम, उनके तरीके पर चल कर उनका ही काम कर रही हो. तुम ये गलियां दे कर समग्र महिला समाज को गाली दे रही हो. बेहतर होगा कि तुम लोग पुरषों पर गालियाँ बनाओं. तुम उनपर अत्याचार और दर्पमर्दन का दृश्य गढो. तुम उनके उस अहम पर चोट करने वाली गलियां बनाओ जो उन्हें हर पल ये अहसास करता रहता है कि वो महिलाओं से बड़े हैं. सक्षम है. वो मालिक है महिलाओं की तकदीर के. उनके पास सुरक्षित है उनकी बहन बेटी और माँ की तकदीर की कुंजी. तुम कुछ जलता हुआ क्यों नहीं गढती तो जला दे उनके भीतर के मर्द को. अगर जला नहीं पता तो असहज तो कर ही दे. 

तुम जाने अनजाने में खुद की ही चेतना पर वार करती हो. तुम अपनी गालियों में महिलाओं पर, अपनी सहयोद्धाओं पर ही तो हमला बोलती हो. हिंसक होती हो. अपनी लड़ाई और अपनी जमीन पहचानो यार. ये लड़ाई किसी के छेड़ने या गलत-सलत कहने पर उपजे हुए गुस्से की अभिव्यक्ति की लड़ाई नहीं है. ये सम्पूर्ण मर्दवादी व्यवस्था, सोच और संस्कृति के प्रतिकार और प्रतिरोध की लड़ाई है. यहाँ हमें अपने गुस्से का रंग, रूप, कला और कलेवर खुद ही गढना होगा. उसे अभिवक्त करने का भी तरीका भी हमारा अपना होगा उनसे बिलकुल अलग, रचनात्मक और सार्थक. हम हिंसा के पक्ष में नहीं है पर हिंसा का जवाब प्रतिहिंसा में देंगे. ये प्रतिहिंसा समानता के महान उद्देश्य के लिए होगी. ये रचनात्मक प्रतिहिंसा होगी. 

मैं इतना सब कुछ कहता हूँ और मेरी वो सब महिला मित्र चुप-चाप सुनती रहतीं है. फिर मुझे वाह! नेता जी! कह कर बात को हवा में उड़ा देतीं हैं. मैं भी हँसने लगता हूँ पर फिर बाद में वही लोग मुझे अपनी डायरी में मर्दों पर लिखी हुई गाली ला कर दिखाती है. इस गाली का कोष बढ़ता जा रह है. ये आपस में लड़कियां बांटने भी लगी हैं इन गलियों को. इन गलियों का प्रसार होता जा रह है. गज़ब का गुस्सा है इन गलियों में. गज़ब का दर्द. मर्दों के अत्याचार और हिंसा के खीचे सारे चित्र छोटे पड़ते हैं इस गलियों के दृश्यों के आगे. ये वैकल्पिक गलियां है. ये वैकल्पिक गुस्सा है. एक वैकल्पिक व्यवस्था के निर्माण प्रक्रिया का हासिल. एक सोच और संस्कृति का रूप धरता हुआ कौंधता हुआ क्रोध ! बड़ा सुकून देता है इस वैकल्पिक का संधान और खोज. 

तुम्हारा अनंत 

Friday, June 27, 2014

कल्पना, अनुभूति, समय और हम !!

कैसे बदलता रहा है हमारा संसार, हमारी अनुभूति और कल्पनाओं में सतत. इस बदलाव को हम कभी समझ नहीं पाए, कभी भांप नहीं पाए और ये बदलाव वैसे ही होते रहे जैसे चलती रहतीं हैं साँसे और धडकती रहतीं हैं धड़कने.

हमारे नियंत्रण के बाहर जीवन के बदलावों का एक संसार होता है.जहाँ समय शासन करता करता है, बिलकुल तानाशाह की तरह. हम हर बार अमेरिका बन कर घुस जाना चाहते हैं उसकी सरहदों के भीतर, सब कुछ अपने नियंत्रण में करने के लिए, मन माफिक रचने और गढ़ने के लिए, पर समय क्रांतिकारी होता है, बहुत ही क्रन्तिकारी, वो सामंती और साम्राज्यवादी शक्तियों के सामने नहीं झुकता, इसलिए मुझे हर बार हारना पड़ा है और मन, समय के अनियंत्रित संसार में, मातम की मजार पर कौव्वाली करने को अभिशप्त रहा है. समय जैसे चाहता है. हमें चलाता है, हमारा जीवन गढता है, बिगाड़ता है. हम बस साथ साथ चलते हैं. उजड़ते हुए. बसते हुए, बनते हुए, बिगड़ते हुए.

जब छोटे थे, मतलब बच्चे, तब मन करता था बड़े हो जाएँ, समय ने एक भी नहीं सुनी और हम रोते रोते, टिनटिनाते हुए स्कूल जाने को अभिशप्त रहे. तब हमारा संसार कामिक्स के गढे हुए चरित्रों के आस पास घूमता था. तब दिल इंजिनियर, डाक्टर, प्रोफ़ेसर और पत्रकार नहीं बल्कि शक्तिमान और चाचा चौधरी बनना चाहता था.

हमसे कोई पूछता कि किससे शादी करोगे तो कभी कहते पापा से करेंगे, कभी मम्मी का नाम ले लेते, कभी दीदी का. मतलब जो सामने आ जाये उसी का नाम ले लेना है. क्योंकि शादी की जो कल्पना और परिभाषा आज दिमाग में उभरती है तब उसका नामो-निशान नहीं था. तब शादी का मतबल किसी को बेहद प्यार करना था और प्यार का मतलब एक पप्पी दे कर कभी आइसक्रीम, कभी चाकलेट झटक लेना.

जीवन की अनुभूतियाँ रूई की तरह कोमल थी और कल्पनाएँ एकदम पारदर्शी. कोई रंग नहीं था उन कल्पनाओं का. इच्छाओं की सबसे ऊंची उड़ान फन पार्क में मस्ती, मेले के झूले, खूब सारी चाकलेट और आइसक्रीम तक जाते-जाते दम तोड़ देती थी. तब लड़की सिर्फ लड़की होती थी. वो दिमाग में कोई चित्र नहीं बनाती थी. न कोई तर्क, ख्याल, जज्बात और परिभाषा कौंधती थी लड़कियों को देख कर. हाँ माँ के कहे कुछ बाक्य जरूर गूंजते थे दिमाग में, लड़कियों की तरह क्या रोता है, क्या नाच रह हो लड़कियों की तरह, क्या डरते हो लड़कियों की तरह...सो लड़की मतलब रोने वाला, डरने वाला, नाचने गाने वाला कोई इंसान था.

हम लड़कियों से दोस्ती करते थे, चुटिया पकड़ का खींचते थे. कुस्ती लड़ते थे साथ में, वो भी मोहल्ले में हनुमान जी की मंदिर में, शाम सात से रात साढे-आठ बजे तक, वो भी एक शर्त के साथ कि चलो तुम हनुमान जी से शक्ति मांग लो, मैं नहीं मागूंगा फिर भी तुम्हे हरा दूंगा.

मैं लड़का था सो कहीं न कहीं ये भीतर बैठने लगा था कि बिना किसी सहारे के लड़किया लड़कों के बराबर नहीं हो सकतीं. ये भ्रम तब टूट जाता था. जब रीना लड़ने के लिए आती थी. कोई लड़का तैयार नहीं होता था. दारा सिंह की बहन थी वो, वो कहती थी तुम चाहो तो सारे देवी देवता से शक्ति मांग सकते हो, मैं नहीं मागुंगी और तुम्हे हरा दूंगी. मतलब बत्तीस करोड़ देवी देवता के साथ परास्त करने का दवा करती थी रीना. पूरी महिला भीम अवतार. कई बार दो तीन लड़के मिल कर लड़ते थे और हार जाते थे.

ऐसी पहलवान लड़की भी प्यार में हार गयी. पिछले बार जब घर गया था. मम्मी ने बताया की रीना ने प्रेमविवाह कर लिया था, सब की नाक कटाई थी और देखो जला कर मार डाला सबने, कोई केस भी नहीं कर पाए, घर वाले. मरने के छ: महीने बाद बताया कि लड़की खाना बनाते हुए मर गयी. मैं सोचने लगा कितने लोगों ने मिल के जलाया होगा रीना को, पूरा परिवार साथ मिला होगा और उनमे से हर एक ने सारे देवी देवताओं से ताकत भी ली होगी. तभी उसे मार पाए होंगे दरिंदे. लड़कियों को माल ही समझते हैं साले.

मैं रोना चाहता था पर माँ सामने थी वो कहती, लड़की है क्या जो रो रहा है ? इसलिए चुप ही रह गया. बहुत मारने की कोशिश करता हूँ भीतर के मर्द को, पर मरता ही नहीं, न जाने किस बेहया माटी का बना है ये. रीना की अनुभूतियाँ कैसे बदलीं होंगी. उसकी कल्पनाओं में क्या उभरा होगा. क्या दर्ज किया होगा उसने अपने दिल में. कैसे शासन किया होगा समय तानाशाह ने उसके जीवन के निर्णायक, पर अनियंत्रित क्षेत्र में मैं सोचना, समझना चाहता था. पर कैसे न मैं कोई लड़की था और न रीना ही जिन्दा थी. खैर कुछ देर रीना के दर्द के साथ रहा फिर दुनिया में लौट आया. जहाँ समय का शासन था.

बचपन में भूख की माप एक बित्ता थी. माँ कहती थी एक बित्ता पेट है मेरा, जितना पेट था उतना ही भूख थी. सुकून का चेहरा अलिफलैला, अलादीन, शक्तिमान, अंकल क्रूज, विन्नी दा पू, और दानासुर से मिलता था. दौलत का मतलब एक सिक्का था. जिसे दूकान में दे देने पर चाकलेट मिल जाये. सौ की गांधी छाप नोट बर्बाद कगाज का टुकड़ा था हमारे लिए, क्योंकि कभी खुद खर्च ही नहीं किया उसे, कोई मेहमान दे कर जाता और वो छिन जाती. मैं कभी-कभी सोचता हूँ कि क्यों मैं गाँधी जी को पसंद नहीं करता या पाता, तो बहुत सारे कारणों में मुझे ये भी एक कारण लगता है. जैसे जैसे बड़े होने लगे चारो तरफ और हमारे भीतर भी बदलाव आने लगे.

जिनके साथ हम खेलते थे उन लड़कियों ने जैसे ही दुप्पटे लिए, उनकी परिभाषा बदल गयी. मोहल्ले के ही जो चाचा, भाई कल तक बिटिया कहते थे अब बिजली, माल, कातिल, कट्टो, बिल्लो, छामक्छल्लो, और तूफानी कहने लगे थे. उनकी नजरें अब मेरी दोस्तों के शरीर पर महज दो जगह पर अटक जाती थीं. वो लड़कियां थीं इसलिए वो जल्दी बदल गयीं थी बहार से भी और भीतर से भी. अब वो हमारे साथ कुस्ती करना तो छोडो हाँथ पकड़ कर भी बात नहीं करती थीं. उनमे से कईयों ने तो घर से निकलना और बात करना भी छोड़ दिया था.

मैं ये नहीं समझ पाया था क्योंकि मैं उन अनुभूतियों और कल्पनाओं से नहीं गुजर रह था जिससे वो गुजर रहीं थीं. उनके लिए आदमी मतलब दरिंदा होने लगा था. जब वो घर से बहार निकलती थी तो उनका सारा ध्यान खुद के शरीर पर ही रहता था. चाल कैसी है? कपडा कैसा है ? मैं ढकी हूँ ठीक से कि नहीं ? मेरे उभार तो नहीं दिख रहे हैं ? ये सवाल वो लगातार खुद से पूछती रहती थी दिन रात, उन दिनों.

उन लड़कियों को उन कथित भाई और चाचाओं की आँखों में हवस का महाकाव्य लिखा जाना साफ़ दीखता था. उनकी कल्पनाओं में बेहद डरावने चित्र उभरने लगे थे और हर परिचित-अपरिचित आदमी उनकी कल्पनाओं में उन्हें नोच लेना चाहता था. इसलिए उन्होंने खुद को कैद कर लिया था खुद के ही घर में. मुझे कभी मौका नहीं मिला उन लड़कियों से ये पूछने के लिए कि भूख का क्या मतलब था उनके लिए उन दिनों, प्यार का रंग क्या था. सुकून का चेहरा कैसा था. जीवन क्या था उन दिनों. रिश्तों कि क्या परिभाषा थी तुम्हारे लिए. कैसा गढा था उस तानाशाह समय ने तुम्हारी कल्पनाओं और अनुभूतियों का संसार. खैर जब मैं उम के उस पड़ाव पर पहुंचा. जहाँ मेरी दोस्त लड़कियां पहले पहुँच चुकीं थी. तब शायद मैं जवान हो रह था. संसार के लिए मेरी अनुभूति, कल्पना और परिभाषा सब बदलने लगी थी.

मैं जब जवान हो रह था तब मैंने पाया मेरे भीतर और बहार सब कुछ बड़ी तेजी से बदल रह है. मेरी कल्पनाओं के भी दृश्य और चित्र बदलने लगे थे. भूख की परिभाषा और माप दोनों बदल रही थी. भूख के दायरे में अब पूरा शरीर आ गया था. दौलत से ले कर ताकत तक सब कुछ खा जाना चाहता था मैं. मेरी आवाज जब से मोटी हुई थी. मैं दहाडना चाहता था ऐसे जैसे सारा संसार मुझसे डरने के लिए तैयार बैठा है.

जिन माँ-माप के डांटने पर मैं पैंट गीली कर देता था. उन्हें भी डराने लगा था मैं. मनुष्यों खास तौर पर लड़कियों के शरीर को देखने का नजरिया बदलने लगा था. अब सोचता हूँ तो लगता है कि वो मोहल्ले के चाचा और भईया टाइप लोग मेरी आँखों में छिप कर बैठने लगे थे. इलहाबाद में दारागंज के रहने वाले थे. सो कट्टा और बाम बनाना सीख लिया और जब कट्टा साथ होता था तो खुद को बराक ओबामा समझते थे हम लोग. जाने अनजाने अब हम भी लड़कियों में कट्टो, बिजली, तूफ़ान देखने लगे थे. अब हमारी इच्छाओं की उड़ान सारा संसार नाप लेना चाहती थी. जो कुछ भी हमने आँखों से देखा था. हम भोग लेना चाहते थे. समय सब कुछ बदल रह था. शक्तिमानो, चाचा चौधरियों, अलादिनों को अब मेरी कल्पना में जगह नहीं मिलती थी. वहाँ अब सचीन, सलमान, शाहरुख बसने लगे थे. सब कुछ बदल गया था. और मैं कुछ भी नहीं कर पा रहा था. समय का निरंकुश शासन था.

पर जब मैं इलहाबाद विश्वविद्यालय गया और वहीँ पहली बार मैंने मार्क्स का नाम सुना, एक संगठन था वहाँ, नाम नहीं बताऊंगा, क्योंकि नाम में क्या रखा है. उसने मेरे सोचने और समझने का तरीका बदल दिया. मुझे समाज में फैली हुई गुलामी, जकडन और बेडियाँ साफ़ दिखने लगीं. मुझे दिखने लगा शरीर के उस पार भी कुछ है. जिसे भावना कहते है, संवेदना कहते हैं. दर्द के इतिहास और अन्याय के भूगोल को मैं समझने लगा था. मुझे अपनी उन पुरानी दोस्तों का दर्द जिन्दा दीखता था. वो मुझसे बातें करत था. मुझे मेरा छोटापन दिखने लगा. गुलामी का दूत बना, मैं गुलामों की तरह गूम रह था. आज भी घूम रह हूँ. पर गुलाम नहीं हूँ. लड़ता हूँ हर पर अपने भीतर उभरती हुई कल्पनाओं से अनुभूतियों से, उस निरंकुश तानाशाह समय से. गुलामी और जंजीरों से.

जीवन की परिभाषा और शक्ल बदल चुकी है और लगातार बदल रहीं हैं. पर इस बार लड़ाई है. हम समय के युद्ध बंदी है इस बार गुलाम नहीं. जीत की राह पर कुर्बानियों की लकीर खीच रहें हैं हम. ये लकीर ही वो निशाँ होगी जिसे देख कर हम जैसे लोग आयेंगे. वहाँ, जहाँ लड़कियां महज शरीर नहीं होंगी. उनकी काया के भूगोल के उस पार जा कर हम उनके दर्द का इतिहास हम बांच सकेंगे. हमारी भूख की माप एक बित्ता ही होगी और हमारी कल्पनाओं में हम हिंसक और अत्याचारी नहीं होंगे. इसी उम्मीद के साथ समय के खिलाफ विद्रोह कर रखा है हमने, एक दिन वो सुबह आएगी. जब समय के सभी युद्ध बंदी रिहा होंगे.

तुम्हारा- अनंत 

Sunday, June 15, 2014

सब कुछ खूबसूरत नहीं है !

कई बार सोचता हूँ कि क्या कोई कहानी सारी सच्चाई, सारा दर्द, सारी वेदना और सारा यथार्थ बयां कर सकती है. कुछ न कुछ हर बार छूटना नियति है और ये नियति है इसीलिए शायद एक अलग और नई कहानी की सम्भावना बनी रही है कुछ अलग, नया और छुटा हुआ कहने, दिखाने और जीने का ये सिलसिला चलता रहा है. शायद जीवन इसी का नाम है. जीवन की बहुत सारी परिभाषाएं हैं. उनमे से एक परिभाषा ये भी है कि जीवन की कोई परिभाषा नहीं हो सकती, वो एक अपरिभाषित परिभाषा है.

पिता के बारे में सोचते हुए अक्सर मैं सच्चाई, यथार्थ, जीवन, वेदना और कहानी के बारे में सोचने लगता हूँ. पिता जी की तस्वीर आँखों में उतरती तो है पर उसका नाम पिता नहीं होता. वो जीवन होती है. जिसके कई क्रूर रंग हैं और अँधेरा जिसका सबसे पसंदीदा लिबास है. पिता जी के बारे में सोचते हुए, कहते हुए मेरे होंठो पर मुस्कान होती है पर बेहद झूठी, इतनी कि कोई भी कह दे कि ये मुस्कान दर्द की बहन है. नहीं याद आता कुछ भी ऐसा कि जिस पर आह न कह सहूँ. कुछ नहीं सोच पाता ऐसा कि थोडा चैन आये. कुछ झलकियाँ मिलती हैं यहाँ-वहाँ से पर बेहद न काफी, इतनी कि रेगिस्तान के प्यासे को आंसू की बूँद मिली हो पीने के लिए. सब कुछ ऐसा कि कुछ कहने को जी ही नहीं करता. हिजरत करते सपने और एक बिखराव, एक संघर्ष, जमीन में लेटे, सोते लोग, गाली बकते चेहरे और हिकारत से देखती आँखें दिखती है. और पिता जी इन सब के बीच ओझल रहते हैं.न जाने कहाँ होंगे वो शायद गंगा जी के किनारे, या फिर कहीं और पता नहीं. कुछ दिन पता करने की कोशिश की पर फिर सोचा कि क्या फायदा पिता जी ने अपनी दुनिया बना ली है. हमें अपनी दुनिया बना लेनी चाहिए.

मैं बचपन याद करता हूँ तो ज्यादा कुछ याद नहीं आ पाता, चाय बेचते दो छोटे बच्चे याद आते हैं, जिन्होंने चाय भी ऐसी बनाई है जिसे चाय नहीं कहा जा सकता. कुम्भ मेला याद आता है और एक बेचैनी जो अपनी परिभाषा पाने के लिए बेक़रार है. बार बार यही दीखता है. दो छोटे लड़के परेड मैंदान में दोहरा बेचते हुए दीखते हैं, एक दूकान दिखती है और रेलवे स्टेशन, इस सब के बीच लोगों के तेज नज़र छीलती, भेदती रहती है. पिता जी यहाँ भी कही नहीं दीखते है. उनका नाम है वो नहीं है. हम हैं और हमारे साथ है हमारी माँ और उसके सपने.

सब कैसे लिखते हैं न कि पिता का अर्थ है एक छत, जो जीवन की सारी धूप और बारिश खुद झेल कर जीवन का बसंत अपने बच्चों को खाते में लिखता है. कैसे पिता को बरगद कहते है सब और मैं देखता हूँ शून्य में, जैसे वहाँ कुछ दिख जाये जिससे मैं उनके कहे का मतलब समझ सकूं. उनकी परिभाषा मेरी परिभाषा से मेल नहीं खाती. और न उनके पिता मेरे पिता जैसे हैं. शायद दुनिया के सारे पिता एक जैसे नहीं होते. मेरा जिया बदसूरत है इसका मतलब सबका होगा. मैं न ऐसा कह रहा हूँ और न ऐसा कभी कहूँगा. पर मैं ये जरूर कहना चाहता हूँ कि सब कुछ खूबसूरत नहीं है और जो खूबसूरत नहीं है मैं उसे खूबसूरत नहीं कह सकता.

तुम्हारा अनंत 

तुम्हारी सदिच्छा और मेरे सरोकार !!

धर्म की जय हो,
अधर्म का नाश हो.
प्राणियों में सद्भावना हो,
विश्व का कल्याण हो......वो ये कह रहे थे और मैं सोचा रहा था कि ये कौन तय करेगा कि धर्म क्या है और अधर्म क्या ? सद्भावना की परिभाषा को किस कसौटी पर कसा जायेगा.कल्याण के क्या मानक होंगे और कल्याण कैसे किया जायेगा.

धर्म की जय के लिए ही तो तालिबान अफगानिस्तान और पाकिस्तान में इंसानी जिंदगी के सारे रंगों को बेरंग कर देना चाहता है.धर्म की जय के लिए ही मलाला युसूफ जई को गोली मारी गयी थी, केनिया के एक मॉल कई निर्दोषों की हत्याएं कर दी गयीं थी. धर्म की जय के लिए ही गूंजे थे नारे "अभी तो बस ये झांकी है आगे मथुरा, काशी है" और एक पुरानी आस्था की जर्जर ईमारत को गुलामी का प्रतीक कहते हुए धराशाही कर कर दिया गया था. धर्म की जय सुनिश्चित करने के लिए ही तो पूरा उपमहाद्वीप जल उठा था, और न जाने कितनी औरतों को ये जताया गया था कि उनका शरीर एक इंसानी देह नहीं है बल्कि एक किला है जिस पर पौरुष का झंडा गाडा जायेगा और धर्म की जय सुनिश्चित की जायेगी. धर्म की जय के नाम पर ही यूरोप में औरतों को जलाया गया था और धर्म की जय के ही खातिर धर्म के विजय दूत दलितों को जानवर से भी बद्दतर जिंदगी खैरात में देते थे.

अधर्म के नाश करने के लिए ही तो अमेरिका घुसा था अफगानिस्तान में, और ईराक में. अधर्म के नाश के नाम पर आपरेशन ग्रीन हंट का अश्वमेघ यज्ञ किया गया. अधर्म के नाश के लिए अभी परम प्रिय मोदी जी भी जंगलों की ओर रुख करेंगे जैसे परम प्रतापी राजा भगवान राम ने किया था और सम्भूक की गर्दन धड से अलग कर दी थी, अभी न जाने कितने सम्भूक तारे जायेंगे, मारे जायेंगे. सब दंतेवाडा के जंगलों में अधर्म के पक्ष में लड़ते हुए तारे जाने, मारे जाने के लिए तैयारी कर रहे हैं.

प्राणियों में सद्भावना फैलाई थी तुमने इराक में, जब अहमदियों की नस्ल खत्म करने पर उतारू था एक तानाशाह, प्राणियों में सद्भावना फ़ैलाने के लिए ही होते रहे हैं गुजरात, मालेगाँव, मुजफ्फरनगर, असाम, मुंबई और भागलपुर के दंगे. सद्भावना के नाम पर ही तो अमेरिका पी रहा है खाड़ी देशों का सारा पेट्रोल और सद्भावना के नाम पर ही सलवा जुडूम ने जन्म लिया है. तुम्हारी सद्भावना से ही प्ररित हो कर गिरजाघरों, मंदिरों और मदरसों में कई मौलवियों, बाबाओं और पादरियों ने हवस के महाकाव्य लिखे हैं. जब तुम सद्भावना की बात करते हो तो मुझे दर्द से चीखती हुई वो माँ दिखती है जिसकी कोख से नवजात बच्चे को निकाल कर तलवार के नेजे पर रखा गया था. मुझे रूप कंवार दिखती है जो तुम्हारी सद्भावना से प्रेरित हो कर खुद को आग लगा लेती है, और हमें उसे सती कहने के लिए कहा जाता है. जब तुम सद्भावना की बात करते हो तो मेरे भीतर बहुत कुछ ठहर जाता है और बहुत कुछ प्रकाश की रफ़्तार से घूमने लगता है और मैं खुद कभी ठहरता हूँ, कभी घूमता हूँ. मुझे कुछ नहीं सुनाई देता सिवाय रोने, चीखने की आवाजों और सद्भावना के अनवरत उच्चारण के. मैं बहुत लाचार और ठगा हुआ महसूस करता हूँ जब तुम सद्भावना शब्द बोलते हो. अलग अलग भाषा में, कभी अरबी में, कभी अंग्रेजी में तो कभी संस्कृत में. पर हर बार उसका असर एक सा ही होता है.

विश्व का कल्याण करने के लिए ही निकले थे, कुछ व्यापारी मिसनरी समुद्री यात्रा पर और दुनिया को गुलाम बना लिया था. इंसानी आजादी उनके लिए एक बेमतलब का शब्द था क्योंकि विश्व का कल्याण करने का ठेका उनके पास था. अफ्रीका के नीग्रों लोगों को इसलिए बैलों सा जोता जाता था क्योंकि विश्व के कल्याण के लिए उसकी दरकार थी. विश्व का कल्याण करने के लिए ही तो पूंजीपति डाल रहें हैं डांके, जल, जंगल, जमीन और जीवन पर. विश्व के कल्याण का मंत्र जपते हुए ही तो हुए थे प्रथम विश्व युद्ध और द्वितीय विश्व युद्ध, और हिरोशिमा, नागासाकी के लोग भी तो भाप बनाकर उड़ा दिए गए थे, विश्व के कल्याण के नाम पर ही. विश्व के कल्याण के नाम पर ही तो यह समीकरण बनाया गया है कि विश्व की सकल सम्पदा मुट्ठी भर लोगों के हाँथ में रहे और बाकी आबादी भूख के भजन गाए.

सुनो तुम रहने दो धर्म की जय का जिम्मा लेने को, तुम अधर्म के नाश की चिंता छोड़ दो.हमारे भीतर की सद्भावना को हमें जीने दो, रचने दो, गढ़ने दो, लिखने दो, कहने दो, उसे अनवरत अविरल बहने दो. तुम उसका आवाहन मत करो, उसके लिए रास्ता मत बनाओ. हमें हमारे कल्याण को खुद ही परिभाषित करना है. हम जनता हैं और जनता जानती है कि उसका कल्याण किसमे है. तुम्हारी सदिच्छा की राजनीति हम समझते हैं. इसलिए हम तुम्हारे धर्म, अधर्म, सद्भावना और कल्याण के माया जाल के खिलाफ अपना विद्रोह दर्ज कराते हैं, और तुम्हारी परिभाषाओं और समझ से अपना नाम ख़ारिज करते हैं.

तुम्हारा-अनंत 

Thursday, June 12, 2014

शिवाजी और मुसलमान !!

'राम पुनियानी' आई. आई. टी. मुंबई में प्रोफेसर थे, और सन 2007 के नेशनल कम्‍यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्‍मानित हैं। - इन्हेने एक महत्वपूर्ण लेख लिखा है. कोहराम.कॉम पर छपा था. इस लेख को कोहराम ने दैनिक ‘अवाम-ए-हिंद, नई दिल्‍ली, बृहस्‍पतिवार 24 सितंबर 2009,पृष्‍ठ 6 से साभार लिया है. ये लेख मैं आपके लिए यहाँ ले आया. आपभी पढ़िए.


शिवाजी, जनता में इसलिए लोकप्रिय नहीं थे क्‍योंकि वे मुस्लिम-विरोधी थे या वे ब्राह्मणों या गायों की पूजा करते थे। वे जनता के प्रिय इसलिए थे क्‍योंकि उन्‍होंने किसानों पर लगान ओर अन्‍य करों का भार कम किया था। शिवाजी के प्रशासनिक तंत्र का चेहरा मानवीय था और वह धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं करता था। सैनिक और प्रशासनिक पदों पर भर्ती में शिवाजी धर्म को कोई महत्‍व नहीं देते थे।
उनकी जलसेना का प्रमुख सिद्दी संबल नाम का मुसलमान था और उसमें बडी संख्‍या में मुस्लिम सिददी थे। दिलचस्‍प बात यह है कि शिवाजी की सेना से भिडने वाली औरंगज़ेब की सेना नेतृत्‍व मिर्जा राजा जयसिंह के हाथ में था, जो कि राजपूत था।
जब शिवाजी आगरा के किले में नजरबंद थे तब कैद से निकल भागने में जिन दो व्‍यक्तियों ने उनकी मदद की थी उनमें से एक मुलमान था जिसका नाम मदारी मेहतर था। उनके गुप्‍तचर मामलों के सचिव मौलाना हैदर अली थे और उनके तोपखाने की कमान इब्राहिम गर्दी के हाथ मे थी। उनके व्‍यक्तिगत अंगरक्षक का नाम रूस्‍तम-ए-जामां था।
शिवाजी सभी धर्मों का सम्‍मान करते थे। उन्‍होंने हजरत बाबा याकूत थोर वाले को जीवन पर्यन्‍त पेंशन दिए जाने का आदेश दिया था। उन्‍होंने फादर अंब्रोज की उस समय मदद की जब गुजरात में स्थित उनके चर्च पर आक्रमण हुआ। अपनी राजधानी रायगढ़ में अपने महल के ठीक सामने शिवाजी ने एक मस्जिद का निर्माण करवाया था जिसमें उनके अमले के मुस्लिम सदस्‍य सहूलियत से नमाज अदा कर सकें। ठीक इसी तरह, उन्‍होंने महल के दूसरी और स्‍वयं की नियमित उपासना के लिए जगदीश्‍वर मंदिर बनवाया था। अपने सैनिक अभियानों के दौरान शिवाजी का सैनिक कमांडरों को यह सपष्‍ट निर्देश था रहता था कि मुसलमान महिलाओं और बच्‍चों के साथ कोई दुर्व्‍यवहार न किया जाए। मस्जिदों और दरगाहों को सुरक्षा दी जाए और यदि कुरआन की प्रति किसी सैनिक को मिल जाए तो उसे सम्‍मान के साथ किसी मुसलमान को सौंप दिया जाए।
एक विजित राज्‍य के मुस्लिम राजा की बहू को जब उनके सैनिक लूट के सामान के साथ ले आए तो शिवाजी ने उस महिला से माफी माँगी और अपने सैनिकों की सुरक्षा में उसे उसके महल तक वापस पहुँचाया शिवाजी को न तो मुसलमानों से घृणा थी और न ही इस्‍लाम से। उनका एकमात्र उद्देश्‍य बडे से बडे क्षेत्र पर अपना राज कायम करना था। उन्‍हें मुस्लिम विरोधी या इस्‍लाम विरोधी बताना पूरी तरह गलत है। न ही अफजल खान हिन्‍दू विरोधी था। जब शिवाजी ने अफजल खान को मारा तब अफजल खान के सचिव कृष्‍णाजी भास्‍कर कुलकर्णी ने शिवाजी पर तलवार से आक्रमण किया था। आज सांप्रदायिकरण कर उनका अपने राजनेतिक हित साधान के लिए उपयोग कर रही हैं। सांप्रदायिक चश्‍मे से इतिहास को देखना-दिखाना सांप्र‍दायिक ताकतों की पुरानी आदत है। इस समय महाराष्‍ट्र में हम जो देख रहे हैं वह इतिहास का सांप्रदायिकीकरण कर उसका इस्‍तेमाल समाज को बांटने के लिए करने का उदाहरण है। समय का तकाजा है कि हम संकीर्ण भावनाओं से ऊपर उठें ओर राष्‍ट्र निर्माण के काम में संलग्‍न हों। हमें राजाओं, बादशाहों और नवाबों को किसी धर्म विशेष के प्रतिनिधि के तौर पर देखने की बजाए ऐसे शासकों की तरह देखना चाहिए जिनका एकमात्र उद्देश्‍य सत्‍ता पाना और उसे कायम रखना था।

राम पुनियानी

Monday, June 9, 2014

अगर मुसलमान न होते |


वो कहते हैं कि अगर मुसलमान न होते तो बेहतर था, मैं कहता हूँ कि मुसलमान न होते तो ये देश हिंदुस्तान, हिंदुस्तान न होता. ये जम्बू दीप भारत खंड हो सकता था या फिर आर्यों का आर्यावर्त. लेकिन ये हिंदुस्तान तो कतई नहीं हो सकता था. एक देश जहाँ ब्राह्मण दलितों के कान में सीसा पिघलाकर डाल रहा होता, उनके जीवन के अर्थों में उदासी और बेचैनी के रंग भरता हुआ, विश्वगुरु होने का दंभ भरता या फिर शैव और वैष्णव के खून से धारा को लाल कर रह होता. उत्तर वाले दक्षिण वालों को धर्म समझाते कि अपनी ही भांजी या ममेरी, चचेरी, फुफेरी बहन से शादी करना धर्म के खिलाफ है. ये सनातन धर्म सम्मत नहीं है. तब दक्षिण वाले उन्हें और उनके धार्मिक समझ को नकार देते और फिर तलवारें तय करतीं कि कौन सही कह रहा है और किसकी बात मानी जायेगी.


मुसलमान न होते तो जो सहनशील, क्षमाशील, विनयशील और एकमत हिंदूइज्म दीखता है वो न होता. मुस्लमान न होते तो लखनऊ न होता, इलहाबाद न होता, वो नजाकत और नफासत न होती, भारत की शान लाल किला न होता, प्रेम की परिभाषा ताज महल न होता, चार मीनार न होती, अदब में वो धार न होती. मीर, मखदूम, मोमिन, जोश और दाग न होते, जाँ निसार अख्तर, जावेद, शबाना, युसूफ, गुलज़ार न होते.

अगर मुस्लमान न होते तो उपमहाद्वीप के अखंड संगीत को सुननेवाला अमीर ख़ुसरो न होता, कृष्ण के प्रेम में पागल रसखान न होते, पूरे देश का दर्प तोड़ने वाला कबीर न होता, पूरे उपमहाद्वीप के बेचैन दर्द को आवाज़ देने वाले ग़ालिब न होते.

मुसलमान न होते तो अट्ठारह सौ सत्तावन न होता, असफाक उल्ला खान न होते, अब्दुल हमीद शहीद हो इस माटी में दफ़न न होता, बहादुर शाह जफ़र न होते, बेगम हज़रात महल, चाँद बीबी, चचा हसन न होते. अबुल कलाम आज़ाद, गफ्फार खान, मग्फूर अहमद, मंज़ूर एहसान, आसिफ अली, मौलाना शौकत अली, अब्दुल कलाम न होते, अगर मुस्लमान न होते तो ये हिन्दुस्तान न होता।

वो कहते हैं कि अगर मुसलमान न होते तो बेहतर था, मैं कहता हूँ कि अगर मुगालमन न होते तो ये देश हिंदू पाकिस्तान होता। जहाँ सरियात की जगह मनु स्मृति का निजाम होता। अकबर की निजामी तासीर न होती, सेकुलरिज्म का नाम न होता। अगर मुस्लमान न होते तो ये देश जैसा है, वैसा प्यारा "मेरा हिंदुस्तान" न होता।


अनुराग अनंत 

Sunday, June 1, 2014

अरविन्द ये सबकुछ ड्रामा लगता है !!

अरविन्द का यही ड्रामा सबसे ज्यादा मुझे अप्पति जनक लगता है. इमोशनल अत्याचार कर रहे हो यार ये चिट्ठी बाजी कर के, तुम बार बार क्या राहुल गांधी की तरह त्याग की बंशी बजाते रहते हो, एक तरफ तुम क्रांतिवीर बनते हो और दुसरी तरफ दस दिन जेल जाने पर आंसू बनाने लगते हो. दुहाई देते हो, इस लड़ाई में मैं भूखा रहा, पुलिस से लाठियां खाई, अपमान सहा और अब देखो मैं तिहाड जेल में हूँ.

क्या चाहते हो तुम तुम्हे सत्ता सर पर बैठा कर लोरी सुनाये, अरे जनता के लिए लड़ रहे हो तो ये स्वाभाविक है. उसमे जनता पर ऋण क्यों जताते हो कि देखो मैं त्याग की मूर्ती हूँ. मैंने अफसरी छोड़ी, और आज जेल में हूँ. अरे जनता ने तुम्हे इसी लिए मुख्यमंत्री भी तो एक साल की नौटंकी में ही बना दिया. काम कम कर रहे हो, चिल्ला ज्यादा रहे हो, अरविन्द तुम, ये तुम्हे और तुम्हारी पार्टी दोनों को विनाश की ओर ले जायेगा.

जनता के लिए लड़ने वाले लोग त्याग का रोना नहीं रोते और जो रोते हैं उनकी नियत में काला होता है. वो सत्ता के भूखे होते है. मैंने कहीं नहीं पढ़ा की कभी सुभाष बाबू ने कहा हो कि जनता देखो मैंने तुम्हारे लिए अफसरी छोड़ दी और अब मैं देश दुनिया की ख़ाक छान रहा हूँ. भगत सिंह ने कभी नहीं जताया कि वो जनता के लिए शहादत दे रहे हैं. 

तुम भी एक आम से राजनेता हो, जिसे सत्ता चाहिए, जिसे सरकार बनानी है, जो बहुत जल्दबाज सनही और ओछा है, तुम जब भाषण देते हों तो हर तीसरी बात पर कहते हो मैं इनकम टैक्स डिपार्टमेंट में अफसर था, मैंने नौकरी छोड़ का महान काम किया. जनता पर अहसान किया जाता देते हो. अरे नौकरी न छोड़ते तो मुख्यमंत्री कैसे बनते, और देश का प्रधानमंत्री बनने का सपना कैसे देखते.

तुम्हे तो इस बात का गर्व होना चाहिए, कि खुशी से तुमने मानव सम्मान की और सच्चे लोकतंत्र की लड़ाई के लिए संघर्ष का रास्ता चुना है. तुमने एक साधारण तुच्छ जीवन छोड़ कर एक महान लक्ष्य को समर्पित स जीवन जीने का फैसल किया है. तुम एक साधारण जीवन रूपी झोपडी से निकल कर मानव स्वतन्त्रता के लक्ष्य को समर्पित जीवन रूपी महल में रहने आये हो. इस राह पर मिलने वाले हर कष्ट को खुशी से सलाम करो, हंस कर गले लगाओ, त्याग गान मत गाओ. 

क्या तुमने कभी विनायक सेन को ये कहते सुना कि यार मैं तो एक बड़ा डाक्टर था मैं जनता के लिए जंगलों में भटक रहा हूँ, मैं महान हूँ. बहुत ओछी हरकत कर रहे हो यार. यकीन मानों इससे तुम्हारा राजनीति पतन भी हो रह है और तुम लोगों कि नजरों से भी गिर रहे हो. ये सब ड्रामेबाजी कर के.

इस देश में न जाने कितने लोग हैं जो इस पक्षपाती व्यवस्था में सलाखों ने पीछे हैं पर मैंने कभी ऐसा रुदन नहीं सुना. तुम खुद को जरूरत से ज्यादा महान और त्यागी समझने लगे हो, जैसा है बिलकुल भी नहीं है. तुम और तुम्हारी पार्टी भी भारत की अन्य पार्टियों जैसी ही एक पार्टी है, जोड़-तोड़, गुणा-भाग करने वाली पार्टी, सीट बढ़ाने और चुनाव लड़ने वाली पार्टी, सरकार बनाने और गिराने वाली पार्टी. 

मैं तुम्हारे इस ओछे कृत्य की निंदा करता हूँ, जनता पर अहसान जाताना बंद करो, अरविन्द केजरीवाल! वैसे इस बार जो चिठ्ठी तुम भेज रहे हो, उसमे बच्चे समोसे खायेंगे.

अनुराग अनंत
"हिंदुस्तान" दैनिक में प्रकाशित !!