Sunday, June 15, 2014

सब कुछ खूबसूरत नहीं है !

कई बार सोचता हूँ कि क्या कोई कहानी सारी सच्चाई, सारा दर्द, सारी वेदना और सारा यथार्थ बयां कर सकती है. कुछ न कुछ हर बार छूटना नियति है और ये नियति है इसीलिए शायद एक अलग और नई कहानी की सम्भावना बनी रही है कुछ अलग, नया और छुटा हुआ कहने, दिखाने और जीने का ये सिलसिला चलता रहा है. शायद जीवन इसी का नाम है. जीवन की बहुत सारी परिभाषाएं हैं. उनमे से एक परिभाषा ये भी है कि जीवन की कोई परिभाषा नहीं हो सकती, वो एक अपरिभाषित परिभाषा है.

पिता के बारे में सोचते हुए अक्सर मैं सच्चाई, यथार्थ, जीवन, वेदना और कहानी के बारे में सोचने लगता हूँ. पिता जी की तस्वीर आँखों में उतरती तो है पर उसका नाम पिता नहीं होता. वो जीवन होती है. जिसके कई क्रूर रंग हैं और अँधेरा जिसका सबसे पसंदीदा लिबास है. पिता जी के बारे में सोचते हुए, कहते हुए मेरे होंठो पर मुस्कान होती है पर बेहद झूठी, इतनी कि कोई भी कह दे कि ये मुस्कान दर्द की बहन है. नहीं याद आता कुछ भी ऐसा कि जिस पर आह न कह सहूँ. कुछ नहीं सोच पाता ऐसा कि थोडा चैन आये. कुछ झलकियाँ मिलती हैं यहाँ-वहाँ से पर बेहद न काफी, इतनी कि रेगिस्तान के प्यासे को आंसू की बूँद मिली हो पीने के लिए. सब कुछ ऐसा कि कुछ कहने को जी ही नहीं करता. हिजरत करते सपने और एक बिखराव, एक संघर्ष, जमीन में लेटे, सोते लोग, गाली बकते चेहरे और हिकारत से देखती आँखें दिखती है. और पिता जी इन सब के बीच ओझल रहते हैं.न जाने कहाँ होंगे वो शायद गंगा जी के किनारे, या फिर कहीं और पता नहीं. कुछ दिन पता करने की कोशिश की पर फिर सोचा कि क्या फायदा पिता जी ने अपनी दुनिया बना ली है. हमें अपनी दुनिया बना लेनी चाहिए.

मैं बचपन याद करता हूँ तो ज्यादा कुछ याद नहीं आ पाता, चाय बेचते दो छोटे बच्चे याद आते हैं, जिन्होंने चाय भी ऐसी बनाई है जिसे चाय नहीं कहा जा सकता. कुम्भ मेला याद आता है और एक बेचैनी जो अपनी परिभाषा पाने के लिए बेक़रार है. बार बार यही दीखता है. दो छोटे लड़के परेड मैंदान में दोहरा बेचते हुए दीखते हैं, एक दूकान दिखती है और रेलवे स्टेशन, इस सब के बीच लोगों के तेज नज़र छीलती, भेदती रहती है. पिता जी यहाँ भी कही नहीं दीखते है. उनका नाम है वो नहीं है. हम हैं और हमारे साथ है हमारी माँ और उसके सपने.

सब कैसे लिखते हैं न कि पिता का अर्थ है एक छत, जो जीवन की सारी धूप और बारिश खुद झेल कर जीवन का बसंत अपने बच्चों को खाते में लिखता है. कैसे पिता को बरगद कहते है सब और मैं देखता हूँ शून्य में, जैसे वहाँ कुछ दिख जाये जिससे मैं उनके कहे का मतलब समझ सकूं. उनकी परिभाषा मेरी परिभाषा से मेल नहीं खाती. और न उनके पिता मेरे पिता जैसे हैं. शायद दुनिया के सारे पिता एक जैसे नहीं होते. मेरा जिया बदसूरत है इसका मतलब सबका होगा. मैं न ऐसा कह रहा हूँ और न ऐसा कभी कहूँगा. पर मैं ये जरूर कहना चाहता हूँ कि सब कुछ खूबसूरत नहीं है और जो खूबसूरत नहीं है मैं उसे खूबसूरत नहीं कह सकता.

तुम्हारा अनंत 
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