Saturday, June 28, 2014

एक वैकल्पिक का संधान और खोज !

मेरी कई महिला दोस्त हैं. जब वो कहीं मुसीबत में फंस जातीं हैं. जैसे किसी ने उन्हें छेड़ दिया या फिर गलत-सलत कहा हो तब वो फर्राटेदार गालियाँ देती हैं. हवा निकल देतीं हैं. सामने वाले की. बड़ी खुशी होती है, ये देख कर. सामने वाले चेहरे पर डर और अपने दोस्तों के चेहरे पर खुशी देख कर. पर एक दुःख भी होता है कि जो भी गाली इन लोगों ने दी है. वो सब गालियाँ इसी महिला विरोधी मर्दवादी समाज और मानिसकता के द्वारा गढ़ी गयी हैं. जहां सामने वाले की माँ, बहन, बेटी के साथ जितनी हैवानियत को शब्दों से चित्र खीच सकों उतनी ही असरदार गाली होगी. 

मैं अपनी महिला मित्रों से जब इस बारे में कहता हूँ यार तुमने तो सामने वाले की माँ, बहन, बेटी को गालियाँ दी हैं. उस इंसान को कुछ भी नहीं कहा. तुमने अपने शब्दों में उनकी माँ, बहन, बेटी के साथ हैवानियत का खाका खीचा है. इसमें उन बेचारियों का क्या दोष. वो भी तो तुम्हारी तरह ही है. इस जकड़े हुए समाज के बेहद कटीली जकड में. 

तो वो मुझसे कहतीं है... ओएई!  रहने दे अपना ज्ञान..गुस्सा आया. जो मुंह से निकला कह दिया. मैं अशांत हो जाता हूँ.  मैं तर्क करता हूँ. इस गुस्से और गुस्से को दिखने के तरीके को भी तो दुश्मन व्यवस्था ने ही बनाया है. तुम उनके नियम, उनके तरीके पर चल कर उनका ही काम कर रही हो. तुम ये गलियां दे कर समग्र महिला समाज को गाली दे रही हो. बेहतर होगा कि तुम लोग पुरषों पर गालियाँ बनाओं. तुम उनपर अत्याचार और दर्पमर्दन का दृश्य गढो. तुम उनके उस अहम पर चोट करने वाली गलियां बनाओ जो उन्हें हर पल ये अहसास करता रहता है कि वो महिलाओं से बड़े हैं. सक्षम है. वो मालिक है महिलाओं की तकदीर के. उनके पास सुरक्षित है उनकी बहन बेटी और माँ की तकदीर की कुंजी. तुम कुछ जलता हुआ क्यों नहीं गढती तो जला दे उनके भीतर के मर्द को. अगर जला नहीं पता तो असहज तो कर ही दे. 

तुम जाने अनजाने में खुद की ही चेतना पर वार करती हो. तुम अपनी गालियों में महिलाओं पर, अपनी सहयोद्धाओं पर ही तो हमला बोलती हो. हिंसक होती हो. अपनी लड़ाई और अपनी जमीन पहचानो यार. ये लड़ाई किसी के छेड़ने या गलत-सलत कहने पर उपजे हुए गुस्से की अभिव्यक्ति की लड़ाई नहीं है. ये सम्पूर्ण मर्दवादी व्यवस्था, सोच और संस्कृति के प्रतिकार और प्रतिरोध की लड़ाई है. यहाँ हमें अपने गुस्से का रंग, रूप, कला और कलेवर खुद ही गढना होगा. उसे अभिवक्त करने का भी तरीका भी हमारा अपना होगा उनसे बिलकुल अलग, रचनात्मक और सार्थक. हम हिंसा के पक्ष में नहीं है पर हिंसा का जवाब प्रतिहिंसा में देंगे. ये प्रतिहिंसा समानता के महान उद्देश्य के लिए होगी. ये रचनात्मक प्रतिहिंसा होगी. 

मैं इतना सब कुछ कहता हूँ और मेरी वो सब महिला मित्र चुप-चाप सुनती रहतीं है. फिर मुझे वाह! नेता जी! कह कर बात को हवा में उड़ा देतीं हैं. मैं भी हँसने लगता हूँ पर फिर बाद में वही लोग मुझे अपनी डायरी में मर्दों पर लिखी हुई गाली ला कर दिखाती है. इस गाली का कोष बढ़ता जा रह है. ये आपस में लड़कियां बांटने भी लगी हैं इन गलियों को. इन गलियों का प्रसार होता जा रह है. गज़ब का गुस्सा है इन गलियों में. गज़ब का दर्द. मर्दों के अत्याचार और हिंसा के खीचे सारे चित्र छोटे पड़ते हैं इस गलियों के दृश्यों के आगे. ये वैकल्पिक गलियां है. ये वैकल्पिक गुस्सा है. एक वैकल्पिक व्यवस्था के निर्माण प्रक्रिया का हासिल. एक सोच और संस्कृति का रूप धरता हुआ कौंधता हुआ क्रोध ! बड़ा सुकून देता है इस वैकल्पिक का संधान और खोज. 

तुम्हारा अनंत 
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