Friday, August 15, 2014

कश्मीर समस्या का एक पक्ष

अजेय कुमार का एक बेहद रोचक और स्थापित धारणाओं को एक नया आयाम देने वाला ये लेख  "कश्मीर पर नजरिये का प्रश्न"जनसत्ता में 13/08/2014 को मुख्य सम्पदिकिय लेख के रूप में छपा था. मैं वहीँ से इसे आप सब पाठकों के लिए ले आया हूँ.

जब प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री जितेंद्र सिंह ने जम्मू में दिए मोदी के भाषण के सार को यह कह कर दोहराया कि सरकार ने धारा-370 को समाप्त करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है, तो दरअसल वे आरएसएस की दशकों से चली आ रही मांग को ही दोहरा रहे थे। कैबिनेट मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कैबिनेट की बैठक के बाद कहा, ‘हम सही समय पर सही फैसला लेंगे...आप जानते हैं कि हमने चुनाव प्रचार में क्या कहा था।’

एक सच, जो संघ परिवार के प्रवक्ता देश की जनता को कभी नहीं बताते, वह यह है कि जब देश के बाकी राजाओं ने अपने राज्यों में भारतीय संविधान को वैध करार देना मंजूर किया, जम्मू और कश्मीर के हिंदू राजा ने ऐसा करने से इनकार कर दिया था। जम्मू और कश्मीर रियासत की बागडोर डोगरा राजवंश के हरीसिंह के हाथ में थी।
दूसरा सच, जो आरएसएस ने नहीं बताया, वह है कि ये कश्मीर के मुसलमान थे जिन्होंने पाकिस्तानी हमलावरों का डट कर मुकाबला किया था और कि धारा-370 कश्मीरी जनता और केंद्र सरकार के बीच एक कड़ी के रूप में अस्तित्व में आई।

जम्मू-कश्मीर राज्य में अधिकतर आबादी मुसलमानों की थी, पर वहां का राजा हरीसिंह हिंदू था। राजा धर्मनिरपेक्ष भारत के साथ जुड़ने का इच्छुक नहीं था। जम्मू-कश्मीर उन रियासतों में से एक थी, जो भारत की संविधान सभा में शामिल नहीं हुई। जो लोग कश्मीर समस्या के लिए नेहरू को दोष देते हैं उन्हें यह पता होना चाहिए कि नेहरू ने राजा हरीसिंह के इस रवैए को देखते हुए चेतावनी दी थी कि किसी भी राज्य के इस तरह के बर्ताव को विरोधी रवैया समझा जाएगा, जबकि मुसलिम लीग ने महाराजा हरीसिंह की जिद को ताकत दी। अंतरिम सरकार (जिसने दिसंबर,1946 में कार्य आरंभ किया था) में मुसलिम लीग के नेता लियाकत अली खान ने यह घोषणा की थी ‘संविधान सभा से किसी भी तरह संबंध रखने से इनकार करने के लिए सभी राज्य पूरी तरह आजाद हैं।’

आजादी मिलने से लगभग दो माह पूर्व 17 जून, 1947 को इंडियन मुसलिम लीग के प्रमुख नेता मुहम्मद अली जिन्ना ने घोषणा की थी: ‘परमसत्ता (अंगरेजी शासन) के समाप्त होने पर हिंदुस्तानी रियासतें संवैधानिक और कानूनी तौर पर स्वतंत्र और प्रभुसत्ता संपन्न होंगी, वे अपने लिए जो कुछ पसंद करें उसे अपनाने के लिए स्वतंत्र होंगी, यह उनकी इच्छा पर निर्भर करता है कि वे हिंदुस्तान संविधान सभा में शामिल हों या पाकिस्तान संविधान सभा में या चाहें तो स्वतंत्र रहें।’ यह बयान दरअसल दो दिन पूर्व यानी 15 जून, 1947 को हुई अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक में पारित प्रस्ताव के बाद आया, जिसमें कहा गया था कि कांग्रेस किसी राज्य के इस अधिकार को स्वीकार नहीं करेगी कि वह स्वयं को स्वतंत्र घोषित करे।

इससे ठीक उलट वर्तमान भारतीय जनता पार्टी के प्रारंभिक रूप ‘अखिल जम्मू और कश्मीर राज्य हिंदू सभा’ के नेताओं का मानना था कि जम्मू और कश्मीर राज्य को ‘हिंदू राष्ट्र’ होने का दावा पेश करना चाहिए और धर्मनिरपेक्ष भारत में शामिल नहीं होना चाहिए महज इसलिए कि उस राज्य का राजा हिंदू है, जबकि 1941 की जनगणना के अनुसार कश्मीर घाटी में मुसलमानों की जनसंख्या 93.45 प्रतिशत थी। इस तथ्य को जानते हुए भी हिंदू महासभा ने राजा हरीसिंह को समर्थन उनके शासन के सांप्रदायिक चरित्र के कारण दिया।
हरीसिंह के शासन में व्यापार, शिक्षा, उद्योग, रोजगार और कृषि में मुसलमानों को बराबर के अवसर नहीं दिए गए। साठ प्रतिशत गजेटेड नौकरियां डोगरों और विशेषकर राजपूतों के लिए सुरक्षित थीं, बेशक उनकी शैक्षिक योग्यता कम थी। महाराजा हरीसिंह के पहले पांच वर्ष के शासन में जो पचीस जागीरें बांटी गर्ईं, उनमें से केवल दो जागीरें मुसलमानों को दी गर्इं। न्यायिक व्यवस्था में यह कानून था कि हत्या के जुर्म में डोगरा को छोड़ कर किसी को भी फांसी की सजा हो सकती है।

इसलिए भाजपा जब जम्मू शाखा के अपने पहले अवतार प्रजा परिषद और महाराजा हरीसिंह की भूमिका को नजरअंदाज करके नेहरू और शेख अब्दुल्ला को कश्मीर समस्या का जनक बताती है तो वह सरासर झूठ बोलती है। सच्चाई यह है कि इन दोनों के साथ-साथ गांधीजी की भूमिका भी बहुत सराहनीय थी।

शेख अब्दुल्ला का ‘कसूर’ यह था कि उन्होंने अपनी इमरजेंसी सरकार के चलते वह जमीन, जो अधिकतर महाराजा और उनके लग्घों-बग्घों के हाथ में थी, जब्त कर ली थी और कोई मुआवजा नहीं दिया था। ये जमींदार अधिकतर हिंदू तो थे ही, उनका संबंध हिंदूवादी विचारधारा से भी था। शेख अब्दुल्ला ने जमीन पर खेती करने वालों की रक्षा के लिए कानून बनाए ताकि उन्हें बेदखल न किया जा सके। उनके कर्जे माफ कर दिए गए, आदि।

यह गौर करने लायक है कि जिस राज्य की पंचानबे प्रतिशत जनता मुसलिम थी, वहां न केवल एक गैर-मुसलिम, बल्कि एक गैर-कश्मीरी का शासन था। साथ में, उसका नजरिया फिरकापरस्त था, इसलिए कश्मीरी जनता से उसका जुड़ाव होने का कोई प्रश्न न था। जब अब्दुल्ला ने 1946 में राजा के शासन के विरुद्ध ‘कश्मीर छोड़ो आंदोलन’ का नेतृत्व किया तो उसने कश्मीरी मुसलमानों की धार्मिक, क्षेत्रीय और जनतांत्रिक आकाक्षांओं को संतुष्ट किया। आरएसएस-भाजपा पूरे देश में यह फैलाते हैं कि वहां विभाजन रेखा इस्लाम है।

यह झूठ है, यह विभाजन रेखा कश्मीरी से गैर-कश्मीरी शासन का बदलाव है। नेहरू अपने को हमेशा कश्मीर का बेटा कहते थे और इस ‘कश्मीर छोड़ो आंदोलन’ से जुड़ने की खातिर वे कश्मीर पहुंचे थे, जहां उन्हें पुलिस ने दाखिल होने से रोका और इसमें उन्हें चोटें भी आई थीं। कश्मीर में नेहरू की लोकप्रियता का दूसरा कारण था कि उन्होंने शेख अब्दुल्ला के वकील के रूप में काम किया, जबकि उन पर हरीसिंह ने ‘राजद्रोह’ का मुकदमा ठोका था।
नेहरू पर जनसंघ के प्रमुख श्यामाप्रसाद मुखर्जी और कुछ कांग्रेसी नेताओं का भारी दबाव था कि कश्मीर का भारत में पूर्ण विलय हो, धारा 370 समाप्त की जाए, आदि। पर नेहरू ने कहा, ‘हमें दूरदृष्टि रखनी होगी। हमें सच्चाई को उदारतापूर्वक स्वीकार करना होगा। तभी हम कश्मीर का भारत में असली विलय करवा सकेंगे। असली एकता दिलों की होती है। किसी कानून से, जो आप लोगों पर थोप दें, कभी एकता नहीं आ सकती और न सच्चा विलय ही हो सकता है।’
कश्मीरी लोग गांधीजी से भी प्रभावित हुए जब उन्होंने एक अगस्त, 1947 को कश्मीर के अपने दौरे के दौरान कहा कि जब पूरे भारत में सांप्रदायिक झगड़े हो रहे हैं, कश्मीर रोशनी की एक किरण की तरह है। शेख अब्दुल्ला ने, यह जानते हुए कि पाकिस्तान एक सच्चाई बन चुका है, न केवल भारत, बल्कि पाकिस्तान की सरकार के साथ भी बातचीत का सिलसिला शुरू किया। पाकिस्तान का रुख दोस्ताना न था। यह बातचीत चल ही रही थी कि पाकिस्तान ने बंदूक की ताकत से कश्मीर का भविष्य तय करना चाहा। पाकिस्तान के कबायली छापामारों के हमले से डोगरा सेना पिछड़ गई और इस तरह कश्मीर की आजादी और पहचान को खतरा पैदा हो गया। इन छापामारों के विरुद्ध स्वाभिमानी कश्मीरियों का क्रोध भड़क उठा। महाराजा के पास हिंदुस्तान से मदद मांगने के अलावा कोई चारा न था। कश्मीरी मानसिकता भी हिंदुस्तान के नेताओं के पक्ष में थी।

भारत सरकार ने राज्य सरकार पर दबाव डाला कि वह भारतीय संविधान की अधिक से अधिक धाराएं वहां लागू करना स्वीकार करे। इसमें कड़ी सौदेबाजी हुई और जुलाई 1952 को शेख अब्दुल्ला और नेहरू के बीच समझौता हुआ जिसे ‘दिल्ली समझौता’ के नाम से जाना जाता है। इस समझौते की पहली शर्त थी ‘धारा 370 के प्रति प्रतिबद्धता’, जिसके अनुसार रक्षा, मुद्रा, विदेशी मामले और संचार को छोड़ कर अन्य सभी विषयों पर निर्णय लेने का पूरा अधिकार कश्मीर की सरकार को था। एक प्रावधान यह भी था कि कश्मीर का अपना अलग राजकीय ध्वज होगा, पर तिरंगे को अलग और विशिष्ट स्थान देते हुए ही राजकीय ध्वज फहराया जा सकेगा। इसी तरह सदरे-रियासत केंद्र द्वारा मनोनीत न होकर राज्य विधायिका द्वारा निर्वाचित किया जाएगा जिसमें भारत के राष्ट्रपति की सहमति अनिवार्य रूप से लेनी होगी।

इन तमाम मुद्दों पर सहमति के कारण ही आज जम्मू और कश्मीर भारत का राज्य बना हुआ है। मोदी ने तो अपने प्रचार अभियान के दौरान ही धारा 370 पर राष्ट्रीय बहस की मांग कर दी थी और प्रश्न किया था कि ‘इससे किसे लाभ हुआ?’ सरकार के गठन के बाद अरुण जेटली और सुषमा स्वराज ने तो कश्मीर में 1953 के पूर्व की स्थिति की बहाली की मांग ही कर डाली।

यूपीए सरकार ने कश्मीर की स्थिति का जायजा लेने के लिए दिलीप पडगांवकर, राधा कुमार और एमएम अंसारी के एक दल को कश्मीर भेजा था जिन्होंने मई 2012 में अपनी रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंप दी। इस रिपोर्ट में 1953 से पूर्व की स्थिति बहाल करने की मांग खारिज की गई है। साथ ही इसमें सिफारिश की गई है कि कश्मीर को वह स्वायतत्ता दी जानी चाहिए, जो उसे पहले प्राप्त थी। उनका यह सुझाव था कि मामला अगर कश्मीर की आंतरिक या बाहरी सुरक्षा से संबंधित न हो, तो संसद को इस संबंध में कोई कानून बनाने की पहल नहीं करनी चाहिए। यह भी कहा कि राज्य के प्रशासनिक तंत्र में कोई भी बदलाव लागू करने से पहले, स्थानीय लोगों की भागीदारी सुनिश्चित की जाए। इस दल ने धारा 370 को ‘अस्थायी’ के स्थान पर ‘विशेष’ प्रावधान का दर्जा देने की भी सलाह दी। वित्तीय ताकत से लैस क्षेत्रीय परिषदों के गठन की सिफारिश भी इस दल ने की। सीमा पर तनाव घटाने के उद्देश्य से हुर्रियत और पाकिस्तान के साथ बातचीत शुरू करने का सुझाव भी इस टीम ने दिया।

यह रिपोर्ट फिलहाल ठंडे बस्ते में है। मोदी सरकार अगर सचमुच कश्मीर मसले को सुलझाना चाहती है तो सबसे पहले उसे धार्मिक राष्ट्रवाद के चश्मे से कश्मीर समस्या को देखना बंद करना होगा। धारा 370 पर बहस हो सकती है, पर इस बहस के केंद्र में कश्मीरियों की इच्छाएं रखनी होंगी। जम्मू, कश्मीर और लद््दाख क्षेत्रों की अपनी-अपनी भाषाई और सांस्कृतिक पहचान की रक्षा करते हुए उन्हें अधिक से अधिक क्षेत्रीय स्वायत्तता देनी होगी। कश्मीरियत के लिए संघर्ष और जेहाद में फर्क को समझना होगा।
दंभपूर्ण आक्रामक तेवरों से न कश्मीर की जनता का भला होगा, न देश का।


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