
यहाँ खेतों में नयी फसल उगे, या पेड़ों पर नए पत्ते लगें मौसम बदले या फिर गृह नक्षत्र के चाल में कोई परिवर्तन हो हम उसे त्यौहार कि तरह मनाते हैं. हर देवी-देवता, कथा-कहानी ,अनाज, अग्नि, वृक्ष, कृषि, पशु, ऋतू, के साथ कई-कई त्यौहार जुड़े हुए हैं, बच्चे के जन्म से ले कर मृत्यु तक हर कर्मकांड, संस्कार, और रश्म हम उत्सव की तरह मनाते हैं. हमारे देश में त्यौहार रिश्तों में एक नयी उर्जा भरते हैं ,यहाँ हर रिश्ते के लिए त्यौहार है ,पति के लिए करवाचौथ तो भाई के लिए भैया दूज और रक्षाबंधन, माँ-बहन के लिए तीज तो बच्चियों के लिए नवरात्र पूजा ,पुत्र के लिए आहोई व्रत और ऐसे ही कई बड़े छोटे कई त्योहारों की चेन हैं,
हमारे आस-पास हमे हमारे जीवन से जुड़ा जो भी दिखा ,हमने उससे रिश्ता बना लिया और उस रिश्ते को जीवंत रखने के लिए उसे हमने त्योहारों से जोड़ दिया , चाहे वो घर का जानवर ही क्यों ना हो ,तभी तो हम गाय के बछड़ों के लिए भी '' बछ्वारस'' जैसे त्यौहार मानते हैं, पीपल, बरगद, और नीम को देवी देवता मान कर पूरे देश में करमा, वट सावित्री , शीतला सप्तमी जैसे सैकड़ो त्यौहार मनाये जाते हैं.
विविध रंगों के इस देश में विविध रंग के त्यौहार मनाये जाते हैं जो जीवन के रंगों से भरपूर हैं, ये उत्सव ही है जो थकी हारी जिन्दगी के सिरहाने खड़े हो कर जब मासूम बच्चों कि तरह मुस्काते हैं तो जिन्दगी का पोर-पोर हँस पड़ता हैं, ये त्यौहार आम आदमी की बिखरी हुई जिन्दगी को बड़े ही सलीके से समेट कर उसे अपने परिवार, रिश्ते-नातों , समाज और प्रकृति से जोड़ते हैं. ये उसे मशीनी पुर्जा बनने से रोकते हैं, उसे उत्साह, संकल्प,और उर्जा से भर देते हैं, भावना, वेदना, और संवेदना जैसे मानवीय मूल्यों को जगाते हैं,
लेकिन आज आधुनिकता की तेज चटख रंग के आगे त्योहारों का रंग दब सा गया हैं, गाँव की मट्टी की खुशबू से ले कर रिश्तों की गर्माहट तक सब कुछ कम पड़ने लगा है आज दिवाली पर घर में दिये की जगह चाइनीस बल्ब ने ले ली हैं, मिलने-मिलाने की परंपरा को फेसबुक और फ़ोन ने खा लिया हैं नाटक, नौटंकी, स्वांग, लोकगीत और जीवंत लोककलाओं को टी.वी.,फिल्मों और फूहड़ गानों ने हासिये पर धकेल दिया हैं .दिया ,कुल्ल्हड़ ,बतासों ,कपास, मिठाई, रंगाई, पोताई, के नदारद होने कि वजह से कुटीर उधोग और आर्थिक सामाजिक रूप से पिछड़ों को भारी धक्का लगा है,
आज जब गोवर्धन पूजा, बछ्वारस, जैसे त्यौहार लगभग ख़त्म हो गए हैं, हम गयो भैसों को अक्सिटोंसिन (इंजेक्शन) दे कर उनके तन से दूध के साथ चर्बी और प्रोटीन तक खींच लेना चाहते हैं बछड़े की पूजा तो छोडिये, हम उसे भूखा मार कर उसकी खाल में भूसा भर के गाय-भैसों की भावना तक दूह लेते हैं .....यही काम आज हमने खेत खलियान नदी, पहाड़, जल, जंगल, जानवर और जिन्दगी के साथ भी जारी कर दिया है, आज इंसानों में रिश्तों को ले कर जो गंभीरता होनी चाहिए वो नहीं दिखती हर रिश्ते की नीव में लालच हैं,
मोहल्ले गाँव के वे छोटे उत्सव परम्पराएँ जैसे कुआं-पूजन, धूरा-पूजन, जलझूलिनी, नाग पंचमी, बिसौला, अन्नकूट,गोवर्धन पूजा, और न जाने ऐसे कितने छोटे-छोटे पर सार्थक और महवपूर्ण त्यौहार इस आधुनिकता ने ख़तम कर दिये हैं,
यही सब कुछ सोचते हुए मैं कॉमन मैन्स की उस कॉमन ट्रेन से आखिर अपने शहर पहुँच ही गया और घर जाते हुए रिक्शे पर बैठे हुए मन ही मन ये बुदबुदाता गया की अगर इंसान को इंसान बन कर रहना हैं तो कम से कम उसे इन त्योहारों को बचा कर रखना होगा और इन्हें आधुनिकता से दूर प्रकृति की गोद में बैठ कर मानना चाहिए ...........न जाने मुझे ऐसा क्यों लगा की मैं कोई ज़ज हूँ और मैंने किसी मुक़दमे का फैसला सुनाया हो .........लो मेरा घर आ गया मैं जा रहा हूँ
ये लेख आई- नेक्स्ट (दैनिक जागरण) में प्रकाशित हुआ है
लिंक :-http://inextepaper.jagran.com/68495/I-next-allahabad/16.11.12#page/11/2

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2 comments:
सुन्दर आलेख! जीवन की आपाधापी ही इतनी है कि छोटी-छोटी खुशियों पर ध्यान देने का समय ही नहीं है।
beautiful depiction of passenger train and portraying it with Common man.
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