Sunday, March 26, 2017

क्योंकि उनके पास ज्ञान है बुद्धि नहीं है !!

कितना आसान होता है। खांचे में फंसा कर गर्दन उतार देना।  बिलकुल यांत्रिक कत्लखाने की तरह सहज और सफल। इस तरह के  कत्लखाने कब बंद होंगे ? कौन सी सरकार, कौन सा नेता ऐसे क़त्ल खाने को बंद करेगा? मैं नहीं जनता।

आप  किसी भी क्षण किसी भी ख़ास तरह के पैमाने से नाप दिए जाते हैं और नापने वाला आपकी एक परिभाषा, एक सूत्र अपने दिमाग में बैठा लेता है। और यदा-कदा उसी परिभाषा, उसी सूत्र के हिसाब से आपको हल करता रहता है।  कुछ तो आप पर पीएचडी कर लेते हैं और आप पर आपसे ज्यादा अधिकार उनका हो जाता है।  आप खुद को नहीं जान पाते पर वो आपकी नश-नश से वाकिफ होने का दावा करते हुए, आप पर लेक्चर देते हैं और लोग मन लगा कर आदर्श विद्यार्थी की तरह उन्हें सुनते हैं।  यही हमारे समय का सच है।  ये सुन्दर है या भयवाह।  ये आप जाने।

आपने देश और सेना पर बात कर दी, आप राष्ट्रवादी, आपने मोदी की तारीफ कर दी, जनविरोधी, बुर्जुआ, पूंजीवादी। आपने मोदी की आलोचना कर दी।  आप वामपंथी। आपने धर्म की बात कर दी, आप दक्षिणपंथी। आपने एंटी रोमियो की आलोचना कर दी। आप ठरकी, कुंठित। आपने योगी से सवाल कर दिया। आप खिसियानी बिल्ली। आपने गैरबराबरी वाली व्यवस्था को बदलने की बात कह दी, आप देशद्रोही।  आपने किसानों अदिवासियों के जलते सवाल पूछ दिए, आप नक्सलवादी।  आपने किसी विशेष संगठन, विशेष पार्टी पर कुछ कह दिया, आप पाकिस्तानी। 

ऐसे ही बहुत सारे खांचे हैं।  लोग हांथो में लिए घूम रहे हैं।  बिलकुल शिकारियों के तरह चौकन्ने।  आपके मूँह से कुछ निकला नहीं कि  आप खांचे में फिट, पैमाने से नाप लिए गए।  आपकी परिभाषा और सूत्र तैयार।  आप व्यक्ति नहीं रहे, एक बड़ी पहचान आपके साथ चस्पा, चाहे आप उस बड़ी पहचान का मतलब भी न जाने पर अब वो पहचान आपकी पहचान है।  

हमने सवाल उठाया कि एंटी रोमियो स्क्वाड का नाम एंटी रोमियो ही क्यों रखा गया ? और इस नाम के दर्शन को भारत के परिपेक्ष्य में देखने की कोशिश की। एक भाई हमारी बहन के लिए चिंतित हो गये।  उसे पूरे प्रकरण में ले आये।और एक खाँचा ले कर मुझे नाप दिया। ये खांचा था हम फर्जी विरोध करते हैं। ठीक है भाई ! पर हम फिर से सवाल पूछते हैं कि अगर महिला सुरक्षा ही  मामला था तो इस सेल का आम वीमेन सिक्युरिटी स्क्वाड रख देते।  तो ज्यादा व्यापक सुरक्षा हो पाती।  पर यहाँ तो नाम ही बताता है कि ये एन्टीरोमियो दल प्रेम या छेड़छाड़  के मामले में ही मुख्यतयः दखल रखेगा।  तो क्या हमारे प्रदेश में सबसे ज्यादा महिलाएं पार्क में, कालेजों के बाहर, और सार्वजानिक स्थलों पर ही असुरक्षित हैं ? क्या हमारे प्रदेश में बलात्कार सबसे ज्यादा हो रहे हैं ? नहीं दोनों बात नहीं है।  फिर एन्टीरोमियो नाम क्यों ? फिर भी महिला सुरक्षा के हर पहल का स्वागत है। बस सकारात्मक आलोचना ये है कि इस स्क्वाड का नाम बदल कर इसे लार्जर मैनडेट के साथ जोड़ा जाए। ताकि महिलाओं के साथ छेड़छाड़ का मामला उसके भीतर आये और उनके साथ हो रहे सारे अपराध के लिए पुलिस सीधे तौर पर जवाबदेह हो। ये तो योगी जी से इल्तजा थी। पर दूसरी  चीज़ तो  भगवान ही दे सकता है।  वो है खाँचेबाजों को बुद्धि, जितनी भी मिल जाए, उनके लिए सद्बुद्धि ही होगी।  क्योंकि उनके पास ज्ञान है बुद्धि नहीं है !!  

अनुराग अनंत 


   
    

योगिराज कृष्ण बनाम सीएम योगी आदित्य नाथ..!!

गज़ब विरोधाभासी चरित्र है हमारा, और जो सत्ता में हैं वो इसे अच्छे से जानते हैं।  शायद उन्होंने ही इसे गढ़ा है और संस्कृति के फ्रेम में मढ़ा है। विराट भारतीय परंपरा में निषेध शब्द नहीं है।  भाषा, खान -पान, मत-विश्वास, रहन-सहन ले लेकर जीवन के हर मोर्चे पर एक बहुरंगी वितान भारतीय परंपरा का हिस्सा रहा है। पर इस उद्दात परंपरा के सामानांतर एक विरोधाभासी धारा हमेशा से बहती रही है।  जो कभी कम और कभी ज्यादा प्रभावित करती है।  भारतीय मानस इसी द्वय में फंस हुआ है।  इसीलिए काल के हर खंड में, हर बिंदु  पर विरोधाभासमें लिपटा  हुआ, घिरा हुआ पाया जा सकता है।

ये इसी द्वय की द्वंदात्मक परंपरा है कि जिस काल खंड में सत्ताएं मनुस्मृति के हिसाब से चल रही थीं।  कानों में  शीशे ढाले जा रहे थे।  पैरों में कीलें ठोकी जा रहीं थी। उसी समय सवर्ण मानसिकता को चुनौती देते हुए राजसत्ता के सीमाओं को लांग कर एक सवर्ण नवजवान सिद्धार्थ से गौतम बुद्ध हो गया। उसने क्या क्या, कैसे कैसे बदल दिया।  आप जानते हैं, मैं नहीं बताऊँगा। और वो कौन सी शक्तियां और सोच थी जिसने बुद्ध का बहिष्कार, विरोध किया।  ये भी आप जानते हैं। इसी देश में जहाँ द्रोणाचार्य एक शूद्र का अंगूठा बिना पढ़ाये गुरु दक्षिणा में ले लेते हैं।  वहीँ दूसरी तरफ चाणक्य भी हैं  जो रास्ते के किनारे भेड़ चराते एक शूद्र के बच्चे को शिक्षा दे कर चक्रवर्ती सम्राट बना देते हैं।  ब्राह्मणवाद के खिलाफ महान योद्धा भीम राव आंबेडकर में  आंबेडकर नाम उनके एक ब्राह्मण गुरु  का दिया  हुआ है। यहाँ मंदिरों का निर्माण कराते, मंदिरों  के चौखटों पर सर नवाते अकबर के कहानियां हैं तो मंदिर तोड़ते औरंज़ेब के किस्से भी हैं। ये विरोधाभासभारतीय इतिहास के हर मोड़ और वर्तमान के हर कदम पर विद्यमान है।

अभी वर्तमान में हमारे प्रदेश में एन्टीरोमियो दल बनाया गया है।  कहा जा रहा है कि ये महिलाओं की सुरक्षा के लिए काम करेगा।  पर असल में ये प्रेमी युगलों पर पहरा है।  मिलने जुलने और प्रेम करने पर पाबन्दी है।  अब देखिये कितना मजेदार विरोधाभासहै।  हिंदी फिल्मों में जो परिवेश, संस्कृति, समाज दिखया जाता है वो मुख्य रूप से उत्तर-मध्य भारत का ही होता  है।  बॉलीवुड से दक्षिण-उत्तरवूर्व और पश्चिम लगभग नदारद ही रहता है।  तो मतलब हिंदी फिल्मे इसी गईया-पट्टी, हिंदी-पट्टी की ही कहानी होती है।  उसमे जब बागों  में प्रेम दिखाया जाता है तो हमें अच्छा लगता है।  लड़के मन ही मन हीरो और लड़कियां मन ही मन हीरोइन होती रहतीं है।  जब प्रेम ज़माने के खिलाफ बगावत का ऐलान करता है तो हम साथ होते हैं।  प्यार किया तो डरना क्या गाते हैं।  जब प्रेमी-युगल फिल्म में परेशानी में फंसता है तो अपने अल्लाह-भगवान से दिल के किसी कोने में दुआ जैसा भी कुछ  कर जाते हैं।  इस तरह  हम प्रेम  और प्रेमियों के पक्ष में खड़े हुए लोग लगते हैं; पर  एन्टीरोमियों दल हमारे प्रदेश में ही बनाया जाता है।  और हम उसे सही कहते हैं। यहीं एक बादशाह के खिलाफ एक राजकुमार ने प्रेम के लिए बगावत कर दी थी और एक हम हैं। जो प्रेम परंपरा के विरुद्ध बहे जा रहें हैं।  हमारे प्रदेश में ही प्रेम के प्रतीक श्री कृष्ण जी ने जन्म लिया। अच्छा हुआ आज-कल के दिनों में वो जवाँ नहीं हुए नहीं तो एंटी रोमियो वाले पकड़ लेते।  फिर राधा के घर वालों को फोन जाता। पूरे बृज में बदनामी होती और श्री कृष्ण का काम तमाम हो जाता। हम उस प्रदेश में एन्टीरोमियो दल देख रहे हैं जहाँ राधा कृष्ण के रूप में प्रेमियों को पूजते हैं। ये हमारे वर्तमान में भारतीय विरोधाभासी परंपरा का उधाहरण हैं।

दूसरा उदाहरण गोरखनाथ मंदिर का ही ले लेते हैं।  ये मंदिर कभी मुस्लिम योगियों और दलित-पिछड़े संतों का गढ़ रहा है। आपसी सद्भाव, सूफी संतत्व, जाति-प्रथा के नाश के आंदोलन का केंद्र रहा है। पर आज हम देख सकते हैं मंदिर किस  प्रतीक के रूप में जाना जाता है। आज लोग मंदिर को मुस्लिम-विरोध  का गढ़ मानने  लगे हैं। राजनीतिक महत्वाकांक्षा के चलते ऐसा कुछ समय से किया भी गया  जो  मंदिर के मूल चरित्र के साथ विरोधाभासी है।

ऐसे ही विरोधाभासके कई उदाहरण और भी दे सकता हूँ।  जिसकी  कोई जरूरत नहीं  है।  आप  समझ गए होंगे, मैं क्या कहना चाहता हूँ।  भारत बहुरंगी सांस्कृतिक धाराओं का विराट समुद्र है।  जिसमे कुछ भी निषेध नहीं है। हमने विश्व को प्रेम से सम्भोग और सम्भोग से समाधी तक जाने का रास्ता दिखाया है।  एंटी-रोमियों दल हमारी समृद्ध परंपरा और उसके विस्तार पर सवालिया निशान है। भारतीय परंपरा की  द्वय विरोधाभासी धारा में आप किधर जाना चाहते हैं? अंगूठा काटने वालों की तरफ, कानों में शीश ढालने वालों की तरफ या फिर गरीब के बच्चे को सम्राट बना कर भारत का गौरव बढ़ाने वालों के साथ। आप प्रेमियों का पक्ष लेते हुए योगिराज कृष्णा के साथ खड़े होना चाहते हैं या एन्टीरोमियो दल की वकालत  करते  हुए योगी आदित्यनाथ के साथ खड़े होना चाहते हैं। अब फैसला आपको करना है इस विरोधाभासी समय  में आप किस  तरफ हैं

अनुराग अनंत

         

Friday, March 3, 2017

गुरमेहर की आवाज में हमारी सांस्कृतिक विरासत प्रतिध्वनित होती है ..!!

दिल्ली विश्वविद्यालय की वो लड़की जो अचानक मशहूर हो गयी थी। जिसके विषय में नेता से लेकर अभिनेता तक और खिलाड़ी से लेकर अनाड़ी तक आपस में लड़ रहे थे। दिल्ली छोड़ कर जालंधर वापस चली गयी है। उसने अपना फेसबुक प्रोफ़ाइल भी डीएक्टिवेट कर दिया है। जी हाँ "गुरमेहर कौर" की बात कर रहा हूँ। जिसकी गलती थी कि वो सोचती थी और बोलती भी थी। क्योंकि उसे लगता था कुछ नहीं सोचने और कुछ नहीं बोलने पर आदमी मर जाता है। और वो बिना कुछ किए मरना नहीं चाहती थी।  उसने एक लंबा दौर नफरत और घृणा से लड़ते हुए गुज़ारा था इसलिए वो प्रेम और शांति के कुछ अलग अर्थ समझती थी और शायद हम सब से वही अर्थ साझा कर रही थी। पर हम लोग जिस समय में जी रहे है वो शायद किसी शतरंज की बिसात पर बिछता जा रहा है। और पूरा समाज काले सफ़ेद घरों में बंटा हुआ दिख रहा  है। जिनके पास ताकत  है,  सत्ता है या फिर  जो लोग ताकत और सत्ता  के  साथ हैं,  वो खुद को सफ़ेद घरों में खड़ा हुआ महसूस करते हैं। बिलकुल स्वच्छ, पाक, साफ़।  उनसे इतर जो लोग है किसी भी राजनितिक विचार और सोच के, सभी काले घरों में हैं। बहके हुए, प्रदूषित दिमाग के लोग। जो देश के खिलाफ हैं। धर्म के खिलाफ हैं और जिन्हें फेसबुक ट्विटर से लेकर सड़कों और कैम्पसों तक मारा जाना चाहिए। इसीलिए काले घर में खड़ी हुई गुरमेहर कौर को स्वच्छ, पाक, साफ़ लोगों ने गलियां दीं, धमकियाँ दीं और उसे जताया कि वो लड़की है और उसका बलात्कार भी किया जा सकता है। सरकार के मंत्रियों ने उसे बहका हुआ, संक्रमित और प्रदूषित दमाग की देशविरोधी लड़की तक कह दिया। एक माननीय नेता जी ने कहा कि गुरमेहर ने अपने शहीद पिता की शहादत पर राजनीति करने की कोशिश की है और उन्हें शर्मिदा किया है।

माननीय बताना चाहते हैं कि शहीदों और सैनिकों पर अब उनके  बच्चों का भी कोई  अधिकार  नहीं बचा है और इसलिए वो अपने पिता के विषय में बात नहीं कर सकते। पर सरकार चाहे तो सेना और सैनिकों की उपलब्धि को अपनी उपलब्धि बता सकती है। अपनी योजनाओं को सही ठहराने के लिए उनके नाम का सहारा  ले  सकती है और तर्क ख़तम हो जाने पर सेना को ढाल की तरह इस्तेमाल  कर सकती  है। ये राजनीति नहीं है, राष्ट्रसेवा है और  एक बेटी  का अपने पिता को याद करना राजनीति है।  

गुरमेहर कौर को जिस बात पर ट्रोल किया गया।  वो लगभग उसने एक साल पहले कही थी। तो ऐसा उसने अभी क्या कह दिया जो उसकी एक साल पुरानी बात पर आज ट्रोलिंग की जा रही है। दरअसल उसने दिल्ली विश्यविद्यालय में हुई हिंसा के खिलाफ ABVP का प्रतिवाद करते हुए। ABVP से न डरने की बात कही थी। ये बात उन लोगों को शायद बुरी लगी, जो चाहते हैं लोग ABVP से डरें।  इसलिए उन्होंने एक साल पुराना वीडियो निकाला, जिसमे गुरमेहर हांथो में तख्तियां लेकर उनपे लिखे संदेशों के माध्यम से बिना कुछ बोले एक  बहुत बड़ी बात बोल रहीं थीं। बड़ी बातें हमेशा सम्पूर्ण सन्दर्भों में समझी जाती हैं। इसलिए उन लोगों ने उस पूरे वीडयो से एक हिस्सा निकाल लिया और तथ्य को सन्दर्भ से काट  दिया। उसके बाद लोग जुड़ते गए और तर्क, वितर्क और कुतर्क का कारवां बनता चला गया,  और बात  गुरमेहर की हत्या और बलात्कार की धमकियों तक पहुँच गयी। दिल्ली पुलिस इस बीच गुरमेहर को उसकी सुरक्षा का विस्वास दिलाने में असमर्थ रही और इसतरह दिल्ली में ही दिल्ली हार गयी। संविधान में  दी गयी, अपनी बात कहने की गारंटी की गारंटी जिन्हें लेना था वो चुनावी मंचो से नारियल और पाइन एपल के रस पर विमर्श करते रहे।  और एक भीड़ मौका पाते ही गुरमेहर पर फेसबुक से लेकर ट्विटर तक भेड़ियों की तरह टूट पड़ी।

तो क्या वाकई गुरमेहर ने कोई ऐसी बेजा बात कह दी थी जो आज से पहले भारत में नहीं कही गयी थी ? सवाल एक और भी है, जो सरकार पूछ रही है कि गुरमेहर किससे प्रभावित हो कर ऐसी बहकी बहकी बातें कर रही है ? कौन है जो उसका दिमाग प्रदूषित कर रहा है ? तो हम थोड़ा अगर अपने  इतिहास की तरफ देखें तो हमें पता चलता है कि गुरमेहर की आवाज में हमारी सांस्कृतिक विरासत प्रतिध्वनित होती हुई दिखती है। वो गौतम से लेकर गांधी तक की समझ को साझा करती हुई पायी जाती है।         

गुरमेहर ने कहा कि उसके पिता को पाकिस्तान ने नहीं बल्कि युद्ध ने मारा है। ये बात अशोक भी कलिंग के युद्ध क्षेत्र में लाशों के बीच खड़े हुए महसूस करते हैं। और खुद से पूछते है क्या ये मेरे निजी दुश्मन थे ? क्या मैंने ही इन्हें मारा ? और उत्तर में उन्हें जवाब मिलता है, मेरी महत्वाकांक्षा ने इन्हें मारा है। राजसत्ता ने इन्हें मारा है।  और वो राजसत्ता और महत्वाकांक्षा का त्याग करते हुए बौद्ध भिक्षु बन जाते हैं।  जब गौतम बुद्ध अंगुलिमाल डाकू से अकेले मिलते है तो उन्हें इस बात का विशवास होता है कि ये व्यक्ति हत्यारा नहीं है। हत्यारी इसकी मानसकिता है।  इसलिए वो उसे बदल पाते हैं और एक डकैत के भीतर से एक परोपकारी भिक्षु निकलता है।  जब गाँधी कहते हैं,  घृणा व्यक्ति से नहीं उसकी बुराई से करनी चाहिए।  जब वो कहते हैं,  हिन्दू मुसलमान एक दूसरे को नहीं मार रहे हैं बल्कि एक उन्माद है जो इन दोनों को मार रहा है।  और इसी विस्वास के साथ वो नोवाखली  जाते हैं और दंगे रोक देते हैं।  तो वो गुरमेहर वाली बात  रह रहे होते हैं।  भारतीय दार्शनिक इतिहास को  उठा कर देखिएगा तो  ऐसे सैकड़ो उदाहरण मिलेंगे जहाँ गुरमेहर के बयान की जड़ें हैं।


गुरमेहर ने गौतम से लेकर गांधी तक फैली हुई सैद्धान्तिक विरासत को  एक बार फिर दार्शनिक रूप में दोहराया है।  वो अगर प्रदूषित दिमाग की है तो उसके वैचारिक प्रदूषण का श्रोत गौतम से लेकर गांधी तक फैला हुआ है। तो क्या ये कहा जा सकता है कि जो लोग गुरमेहर की बात नहीं समझ पा रहे हैं और उसकी बेहद सतही व्याख्या कर रहे हैं।  वो हमारी मूल भारतीय दार्शनिक परिपाटी से कटे हुए लोग हैं।  या फिर ये कहें कि वे बेहद  धूर्त किसम के लोग हैं। वो एक नया भारत बनाना चाहते हैं जिससे गौतम और गाँधी खारिज़ हैं। जहाँ व्यवहारिक और सतही समझ के इतर सैद्धान्तिक और दार्शनिक बहसों के लिए कोई जगह नहीं होगी।  जहाँ गाँधी और गौतम पैदा नहीं होंगे।  जहाँ अंगुलिमाल को डाकू से इंसान नहीं बनाया जायेगा।  जहाँ नोवखली जैसे भीषण दंगे नहीं रोके जायेंगे।  जहाँ एक थोपी हुई परिभाषा के इतर कुछ नहीं कहा जा सकेगा।  अगर हम ऐसा नया भारत बनाने वाले हैं।  तो ये  भारत के प्रति अक्षम्य अपराध कर रहे हैं।  आज समय के इस  मुहाने पर गुरमेहर के साथ खड़े होना गांधी के साथ खड़े होने जैसा है।  गुरमेहर के लिए आवाज़ बुलंद करना गांधी की आवाज़ को बुलंद करना है।



अनुराग अनंत


Sunday, February 26, 2017

हमारी लड़ाई आर्गुमेंटेटिव इंडिया को बचाने की लड़ाई है..!!

सरकार बहादुर से आप सहमत हैं तो "सही" हैं और यदि असहमत है तो "नहीं" हैं. आप देशभक्त नहीं हैं आप वफादार नहीं हैं, यहाँ तक कि आपके वजूद पर भी सवाल उठने लगते हैं और एक भीड़ चिल्ला कर कहती है कि आप इंसान ही नहीं हैं. आप हमलों के बीच घिरे हुए कभी अख़लाक़ होते हैं, कभी रोहित और कभी नजीब। कभी कोई भीड़ घर में घुस कर मार देती है. कभी मानवसंसाधन मंत्रालय से आती हुई चिट्ठियां अवसाद की कोठरी में आपको धकेल देतीं है और आप अपना दम घोट लेते हैं। तो कभी कोई देशभक्त संघटन आपको किसी मामूली सी बात पर इतना पीटता है कि आप अगली सुबह बिना किसी को बताए गायब हो जाते हैं, आपकी  माँ पागलों की तरह शहर दर शहर आपको तलाश करती है. और देश के सबसे काबिल पुलिस उसे ये भी नहीं बता पाती कि आप जिन्दा हैं या मर गए? जी हां ये बुलंद निज़ाम की बुलंद तस्वीर है और असहमति की रियायती मियाद पार करने के बाद किसी रोज़ आप भी इसका हिस्सा हो सकते हैं. ये हकीकत आप देख सकें तो देखें वार्ना कल ये आपकी आँख-आँख डाल कर अपनी मौजूदगी का अहसास खुद ही करा देगी।    

दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कालेज  में 21,22 फ़रवरी को जो घटना घटी वो साफ़ इस बात का सन्देश है कि "प्रतिरोध की संस्कृति" बचाए रखने के लिए अब कीमत चुकानी होगी। अब अभिव्यक्ति के खतरे उठाने पड़ेंगे। क्योंकि वो जिनके पास सत्ता है वो “बात के बदले लात” की संस्कृति चलना चाहते हैं. ये अपने सच को सच साबित  करने  के लिए आपका सर फोड़ सकते हैं.आपकी हड्डियां तोड़ सकते हैं.

आइये रामजस विवाद के बहाने  देश में पनप रही "बात के बदले लात" की संस्कृति को समझते हैं और ये भी समझने की कोशिश  करते  हैं  कि वो कौन सी चीज है जिससे ये देश और धर्म ठेकेदार डरते हैं और इतना डरते हैं कि हिंसक हो जाते हैं. रामजस कालेज में आयोजित सेमीनार इस बात पर  रोक  दिया  गया क़ि क्योंकि उमर खालिद और शेहला राशीद को वहां आना था और ये दोनों लोग ठेकेदारों के हिसाब से देशद्रोही है, जबकि न्यायालय में उमर खालिद  के खिलाफ ठोस सबूत नहीं पेश किये जाने पर उसे जमानत मिली है और दिल्ली की काबिल पुलिस अभी तक चार्जशीट भी नहीं फ़ाइल  कर पायी है. फिर भी ठेकेदार संगठन अगर कहता है तो सबको मान लेना चाहिए । शायद ये लोग खुद को संविधान और न्यायालय से ऊपर मानते हैं. शहला के विरोध का कारण कश्मीर पर उसका नजरिया है. जिससे ठेकेदार संगठन सहमत नहीं है।  इसलिए इनकी नज़र में  उसने बोलने और प्रतिवाद के सारे अधिकार खो दिए हैं।  फिर चाहे यही ठेकेदार लोग कश्मीर में कुर्सी के  लिए महबूबा मुफ़्ती  से सहमत न होते हुए भी गठबंधन कर लें और कहें की हम यहाँ लोकतंत्र को मजबूत कर रहे  हैं. तो कश्मीर में लोकतंत्र कमज़ोर है इसलिए अफ़ज़ल गुरु को शहीद बताने वालों के साथ सरकार  चला कर उसे मजबूत करना है और दिल्ली में लोकतंत्र बहुत मजबूत है इसलिए सेमीनार में गुंडागर्दी कर के इसे कमज़ोर करना है. अगर भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है तो भारत के एक हिस्से के लिए लोकतंत्र का एक पैमाना और दूसरे हिस्से के लिए दूसरा क्यों है ? और अगर है तो इस पर बात कौन करेगा हम या कोई परग्रही ?

दूसरा ऐतराज जेएनयू में लगाए गए नारों पर अक्सर किया जाता है और उस बिना पर कहा जाता है कि उमर और  कन्हैया  ने देश विरोधी नारे लगाए हैं इसलिए ये, इनकी पार्टी और इनकी विचारधारा देश विरोधी है. अव्वल तो ये सिद्ध नहीं हुआ है कि इन्होंने देश विरोधी नारे लगाए हैं फिर भी अगर बहस  के लिए मान  भी लें तो क्या मध्य प्रदेश में पड़के गए पाकिस्तानी जासूस क्योंकि भाजपा के कार्यकर्ता थे तो क्या भाजपा और इनकी विचारधारा देश विरोधी है? गौर करने वाली बात ये है कि  उमर और  कन्हैया पर लगाया गया आरोप एक वीडियो पर आधारित है और इन ग्यारह जासूसों पर एटीएस की  छानबीन के आधार पर आरोप लगे हैं।  इसलिए ज्यादा संगीन है.

तीसरा आरोप या ऐतराज ये है कि ये लोग आजादी के नारे लगाते हैं।  बस्तर और कश्मीर की आज़ादी मांगते हैं।  और क्योंकि देश आज़ाद हो गया है इसलिए आज़ादी मांगना एक दंडनीय अपराध है और  ये जिम्मेदारी ठेकेदार संगठन ने आपने हांथों में ले रखी  है। ये लोग बस्तर और कश्मीर ही नहीं केरल की भी आज़ादी चाहते हैं। कभी सुनियेगा।  ये पूरे देश के लिए आजादी मांगे  हैं। देश के चप्पे चप्पे की आज़ादी, जन जन की आज़ादी  मांगते हैं ये लोग।  ये भारत  से नहीं  भारत  में आज़ादी चाहते हैं। ये जब कश्मीर की बात करते हैं मानवीय भावना से प्रेरित हो कर वहां के बच्चों और महिलाओं पर चलती पैलेट गन से आज़ादी मांगते है।  फैले  हुए डर के साए से आज़ादी मांगते हैं।  कभी भी गायब हो जाने के खौफ से आज़ादी मांगते हैं।  हिंसा में मारे जाते हमारे  जवानों  के  लिए  इस हिंसात्मक चक्रव्यू से आज़ादी मांगते हैं. अधर में लटकी हुई किस्मत से आज़ादी मांगते है। जब बस्तर की बात करते हैं तो पुलिसिया दमन और कार्पोरेटी शोषण से आजादी मांगते हैं. सरकारी एजेंसियां खुद इस बात को स्वीकार करती हैं की आदिवासी इलाकों में पुलिस आदिवासियों के गाँवों को जलाये जाने में संलिप्त रही है. पुलिस वहां फर्जी एनकाउंटर कर रही है. पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को झूठे मुकदमो  में फसाया  जा रहा है।  पुलिस वहां सरकार के पोलिटिकल एजेंट्स की तरह सामाजिक कार्यकर्ताओं के पुतले जलाती हुई पायी जाती है।  इस पेशे-मंज़र के खिलाफ आज़ादी चाहिए। आज़ादी हमें भी चाहिए और तुम्हे भी चाहिए। आज़ादी मानवीय जीवन का परम लक्ष्य है और एक सभ्य समाज का अभीष्ठ भी।  हमें  पितृसत्ता से, गरीबी से, सामंतवाद से, लूट से, गुंडागर्दी से, अन्याय और दमन से आज़ादी चाहिए। हमें अपने पूर्वाग्रह और झूठे अहम् से आज़ादी चाहिए।  क्या खराबी है इस आज़ादी की मांग में. आज़ादी की संकल्पना कन्हैया ने पूरे देश के सामने रखी थी फिरभी अगर कोई सवाल है तो संवाद का रास्ता है ही. पर संवाद का रास्ता बंद करके फसाद फैलाना एक सुनियोजित कार्यक्रम है.  

दरअसल ये लोग राष्ट्रवाद के नारों तले बुनियादी सवालों को दबा देना चाहते हैं. ये लोग नहीं चाहते कि लोग सच्चाइयों से रूबरू हो. ये नहीं चाहते कि लोग बस्तर और कश्मीर पर तर्कपूर्ण बहस का हिस्सा बने. ये नहीं चाहते कि दमन और शोषण पर विमर्श हो।  ये हमें घसीट कर पोस्ट ट्रुथ एरा में ले जाना चाहते हैं.  इसीलिए ये टीवी स्टूडियो से लेकर यूनिवर्सिटी, कालेजों और सड़कों तक हमले कर रहे हैं. चीख रहे हैं हिंसक हो रहे हैं।  देश और देशभक्ति  को अपने तरीके से परिभाषित कर रहे हैं। इनके लिए देशभक्त होने की पहली और आखरी शर्त असहमति के अधिकार का त्याग है।  ये लोग वामपंथियों पर इसलिए खासतौर पर हमलावर है क्योंकि वो पूछ लेते हैं,"वसुधैव  कुटुम्बकम" वाले देश में अपने ही गावँ के दलित को पंडित जी और ठाकुर साहब पानी क्यों नहीं पीने देते ? वो पूछ लेते हैं महिलाओं को शक्तिस्वरूपा मानने वाले देश में अठारह साल की बहन के साथ पांच साल का भाई रक्षा के लिए क्यों भेजा जाता है ? जब सभी लोग अपनी बहनों की रक्षा कर रहे हैं तो हमारे समाज में बलात्कार कौन कर  रहा है।  जब बच्चे बाल गोपाल का रूप है तो बाल मजदूरी और बाल यौनशोषण क्यों है ? ये सवाल चेहरे पर से नकाब खींच लेते हैं।  और सच्चाई बेपर्दा हो जाती है।  देश और धर्म के ठेकेदार असहज होते हैं, डरते हैं और हिंसक हो जाते हैं।  ये बाइनरी बनाते हैं, इस्टीरियोटाइप गढ़ते हैं।  और सवाल पूछने वाले को उसमें फंसा देते हैं।  ये कभी एंटी-हिन्दू कहते हैं, कभी एंटी-नेशनल। ये जानते हुए भी कि ये लोग ऐसे नहीं हैं।  ये सफ़दर हाश्मी की तरह अपने  साल का आगाज़ साहिबाबाद में अपने दोस्त के यहाँ रामचरित मानस के पाठ से कर सकते हैं।  ये राही मासूम रज़ा बनकर  महाभारत का संवाद लिख सकते हैं।  ये  साहिर लुधियानवी की तरह बेहतरीन भजन और भक्ति गीत भी लिख सकते हैं।  और कैफ़ी आजमी बन कर हमारी खून की रवानी बढ़ा देने वाला देशभक्ति गीत भी रच  सकते हैं।ये सभी लोग आज़ादी मांगने वाले लोग थे. उसी विचारधारा से जुड़े थे. जिसे ये एंटी-हिन्दू, एंटी-नेशनल कहते हैं. हमारी लड़ाई इन्ही बाइनरी और इस्टीरियोटाइप को तोड़ने की लड़ाई है।  हमारी लड़ाई संवाद, विमर्श और अभिवक्ति की स्वतंत्रता की लड़ाई है।  हमारी लड़ाई आर्गुमेंटेटिव इंडिया को बचाने की लड़ाई है.

तुम्हारा-अनंत 

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