Friday, June 27, 2014

कल्पना, अनुभूति, समय और हम !!

कैसे बदलता रहा है हमारा संसार, हमारी अनुभूति और कल्पनाओं में सतत. इस बदलाव को हम कभी समझ नहीं पाए, कभी भांप नहीं पाए और ये बदलाव वैसे ही होते रहे जैसे चलती रहतीं हैं साँसे और धडकती रहतीं हैं धड़कने.

हमारे नियंत्रण के बाहर जीवन के बदलावों का एक संसार होता है.जहाँ समय शासन करता करता है, बिलकुल तानाशाह की तरह. हम हर बार अमेरिका बन कर घुस जाना चाहते हैं उसकी सरहदों के भीतर, सब कुछ अपने नियंत्रण में करने के लिए, मन माफिक रचने और गढ़ने के लिए, पर समय क्रांतिकारी होता है, बहुत ही क्रन्तिकारी, वो सामंती और साम्राज्यवादी शक्तियों के सामने नहीं झुकता, इसलिए मुझे हर बार हारना पड़ा है और मन, समय के अनियंत्रित संसार में, मातम की मजार पर कौव्वाली करने को अभिशप्त रहा है. समय जैसे चाहता है. हमें चलाता है, हमारा जीवन गढता है, बिगाड़ता है. हम बस साथ साथ चलते हैं. उजड़ते हुए. बसते हुए, बनते हुए, बिगड़ते हुए.

जब छोटे थे, मतलब बच्चे, तब मन करता था बड़े हो जाएँ, समय ने एक भी नहीं सुनी और हम रोते रोते, टिनटिनाते हुए स्कूल जाने को अभिशप्त रहे. तब हमारा संसार कामिक्स के गढे हुए चरित्रों के आस पास घूमता था. तब दिल इंजिनियर, डाक्टर, प्रोफ़ेसर और पत्रकार नहीं बल्कि शक्तिमान और चाचा चौधरी बनना चाहता था.

हमसे कोई पूछता कि किससे शादी करोगे तो कभी कहते पापा से करेंगे, कभी मम्मी का नाम ले लेते, कभी दीदी का. मतलब जो सामने आ जाये उसी का नाम ले लेना है. क्योंकि शादी की जो कल्पना और परिभाषा आज दिमाग में उभरती है तब उसका नामो-निशान नहीं था. तब शादी का मतबल किसी को बेहद प्यार करना था और प्यार का मतलब एक पप्पी दे कर कभी आइसक्रीम, कभी चाकलेट झटक लेना.

जीवन की अनुभूतियाँ रूई की तरह कोमल थी और कल्पनाएँ एकदम पारदर्शी. कोई रंग नहीं था उन कल्पनाओं का. इच्छाओं की सबसे ऊंची उड़ान फन पार्क में मस्ती, मेले के झूले, खूब सारी चाकलेट और आइसक्रीम तक जाते-जाते दम तोड़ देती थी. तब लड़की सिर्फ लड़की होती थी. वो दिमाग में कोई चित्र नहीं बनाती थी. न कोई तर्क, ख्याल, जज्बात और परिभाषा कौंधती थी लड़कियों को देख कर. हाँ माँ के कहे कुछ बाक्य जरूर गूंजते थे दिमाग में, लड़कियों की तरह क्या रोता है, क्या नाच रह हो लड़कियों की तरह, क्या डरते हो लड़कियों की तरह...सो लड़की मतलब रोने वाला, डरने वाला, नाचने गाने वाला कोई इंसान था.

हम लड़कियों से दोस्ती करते थे, चुटिया पकड़ का खींचते थे. कुस्ती लड़ते थे साथ में, वो भी मोहल्ले में हनुमान जी की मंदिर में, शाम सात से रात साढे-आठ बजे तक, वो भी एक शर्त के साथ कि चलो तुम हनुमान जी से शक्ति मांग लो, मैं नहीं मागूंगा फिर भी तुम्हे हरा दूंगा.

मैं लड़का था सो कहीं न कहीं ये भीतर बैठने लगा था कि बिना किसी सहारे के लड़किया लड़कों के बराबर नहीं हो सकतीं. ये भ्रम तब टूट जाता था. जब रीना लड़ने के लिए आती थी. कोई लड़का तैयार नहीं होता था. दारा सिंह की बहन थी वो, वो कहती थी तुम चाहो तो सारे देवी देवता से शक्ति मांग सकते हो, मैं नहीं मागुंगी और तुम्हे हरा दूंगी. मतलब बत्तीस करोड़ देवी देवता के साथ परास्त करने का दवा करती थी रीना. पूरी महिला भीम अवतार. कई बार दो तीन लड़के मिल कर लड़ते थे और हार जाते थे.

ऐसी पहलवान लड़की भी प्यार में हार गयी. पिछले बार जब घर गया था. मम्मी ने बताया की रीना ने प्रेमविवाह कर लिया था, सब की नाक कटाई थी और देखो जला कर मार डाला सबने, कोई केस भी नहीं कर पाए, घर वाले. मरने के छ: महीने बाद बताया कि लड़की खाना बनाते हुए मर गयी. मैं सोचने लगा कितने लोगों ने मिल के जलाया होगा रीना को, पूरा परिवार साथ मिला होगा और उनमे से हर एक ने सारे देवी देवताओं से ताकत भी ली होगी. तभी उसे मार पाए होंगे दरिंदे. लड़कियों को माल ही समझते हैं साले.

मैं रोना चाहता था पर माँ सामने थी वो कहती, लड़की है क्या जो रो रहा है ? इसलिए चुप ही रह गया. बहुत मारने की कोशिश करता हूँ भीतर के मर्द को, पर मरता ही नहीं, न जाने किस बेहया माटी का बना है ये. रीना की अनुभूतियाँ कैसे बदलीं होंगी. उसकी कल्पनाओं में क्या उभरा होगा. क्या दर्ज किया होगा उसने अपने दिल में. कैसे शासन किया होगा समय तानाशाह ने उसके जीवन के निर्णायक, पर अनियंत्रित क्षेत्र में मैं सोचना, समझना चाहता था. पर कैसे न मैं कोई लड़की था और न रीना ही जिन्दा थी. खैर कुछ देर रीना के दर्द के साथ रहा फिर दुनिया में लौट आया. जहाँ समय का शासन था.

बचपन में भूख की माप एक बित्ता थी. माँ कहती थी एक बित्ता पेट है मेरा, जितना पेट था उतना ही भूख थी. सुकून का चेहरा अलिफलैला, अलादीन, शक्तिमान, अंकल क्रूज, विन्नी दा पू, और दानासुर से मिलता था. दौलत का मतलब एक सिक्का था. जिसे दूकान में दे देने पर चाकलेट मिल जाये. सौ की गांधी छाप नोट बर्बाद कगाज का टुकड़ा था हमारे लिए, क्योंकि कभी खुद खर्च ही नहीं किया उसे, कोई मेहमान दे कर जाता और वो छिन जाती. मैं कभी-कभी सोचता हूँ कि क्यों मैं गाँधी जी को पसंद नहीं करता या पाता, तो बहुत सारे कारणों में मुझे ये भी एक कारण लगता है. जैसे जैसे बड़े होने लगे चारो तरफ और हमारे भीतर भी बदलाव आने लगे.

जिनके साथ हम खेलते थे उन लड़कियों ने जैसे ही दुप्पटे लिए, उनकी परिभाषा बदल गयी. मोहल्ले के ही जो चाचा, भाई कल तक बिटिया कहते थे अब बिजली, माल, कातिल, कट्टो, बिल्लो, छामक्छल्लो, और तूफानी कहने लगे थे. उनकी नजरें अब मेरी दोस्तों के शरीर पर महज दो जगह पर अटक जाती थीं. वो लड़कियां थीं इसलिए वो जल्दी बदल गयीं थी बहार से भी और भीतर से भी. अब वो हमारे साथ कुस्ती करना तो छोडो हाँथ पकड़ कर भी बात नहीं करती थीं. उनमे से कईयों ने तो घर से निकलना और बात करना भी छोड़ दिया था.

मैं ये नहीं समझ पाया था क्योंकि मैं उन अनुभूतियों और कल्पनाओं से नहीं गुजर रह था जिससे वो गुजर रहीं थीं. उनके लिए आदमी मतलब दरिंदा होने लगा था. जब वो घर से बहार निकलती थी तो उनका सारा ध्यान खुद के शरीर पर ही रहता था. चाल कैसी है? कपडा कैसा है ? मैं ढकी हूँ ठीक से कि नहीं ? मेरे उभार तो नहीं दिख रहे हैं ? ये सवाल वो लगातार खुद से पूछती रहती थी दिन रात, उन दिनों.

उन लड़कियों को उन कथित भाई और चाचाओं की आँखों में हवस का महाकाव्य लिखा जाना साफ़ दीखता था. उनकी कल्पनाओं में बेहद डरावने चित्र उभरने लगे थे और हर परिचित-अपरिचित आदमी उनकी कल्पनाओं में उन्हें नोच लेना चाहता था. इसलिए उन्होंने खुद को कैद कर लिया था खुद के ही घर में. मुझे कभी मौका नहीं मिला उन लड़कियों से ये पूछने के लिए कि भूख का क्या मतलब था उनके लिए उन दिनों, प्यार का रंग क्या था. सुकून का चेहरा कैसा था. जीवन क्या था उन दिनों. रिश्तों कि क्या परिभाषा थी तुम्हारे लिए. कैसा गढा था उस तानाशाह समय ने तुम्हारी कल्पनाओं और अनुभूतियों का संसार. खैर जब मैं उम के उस पड़ाव पर पहुंचा. जहाँ मेरी दोस्त लड़कियां पहले पहुँच चुकीं थी. तब शायद मैं जवान हो रह था. संसार के लिए मेरी अनुभूति, कल्पना और परिभाषा सब बदलने लगी थी.

मैं जब जवान हो रह था तब मैंने पाया मेरे भीतर और बहार सब कुछ बड़ी तेजी से बदल रह है. मेरी कल्पनाओं के भी दृश्य और चित्र बदलने लगे थे. भूख की परिभाषा और माप दोनों बदल रही थी. भूख के दायरे में अब पूरा शरीर आ गया था. दौलत से ले कर ताकत तक सब कुछ खा जाना चाहता था मैं. मेरी आवाज जब से मोटी हुई थी. मैं दहाडना चाहता था ऐसे जैसे सारा संसार मुझसे डरने के लिए तैयार बैठा है.

जिन माँ-माप के डांटने पर मैं पैंट गीली कर देता था. उन्हें भी डराने लगा था मैं. मनुष्यों खास तौर पर लड़कियों के शरीर को देखने का नजरिया बदलने लगा था. अब सोचता हूँ तो लगता है कि वो मोहल्ले के चाचा और भईया टाइप लोग मेरी आँखों में छिप कर बैठने लगे थे. इलहाबाद में दारागंज के रहने वाले थे. सो कट्टा और बाम बनाना सीख लिया और जब कट्टा साथ होता था तो खुद को बराक ओबामा समझते थे हम लोग. जाने अनजाने अब हम भी लड़कियों में कट्टो, बिजली, तूफ़ान देखने लगे थे. अब हमारी इच्छाओं की उड़ान सारा संसार नाप लेना चाहती थी. जो कुछ भी हमने आँखों से देखा था. हम भोग लेना चाहते थे. समय सब कुछ बदल रह था. शक्तिमानो, चाचा चौधरियों, अलादिनों को अब मेरी कल्पना में जगह नहीं मिलती थी. वहाँ अब सचीन, सलमान, शाहरुख बसने लगे थे. सब कुछ बदल गया था. और मैं कुछ भी नहीं कर पा रहा था. समय का निरंकुश शासन था.

पर जब मैं इलहाबाद विश्वविद्यालय गया और वहीँ पहली बार मैंने मार्क्स का नाम सुना, एक संगठन था वहाँ, नाम नहीं बताऊंगा, क्योंकि नाम में क्या रखा है. उसने मेरे सोचने और समझने का तरीका बदल दिया. मुझे समाज में फैली हुई गुलामी, जकडन और बेडियाँ साफ़ दिखने लगीं. मुझे दिखने लगा शरीर के उस पार भी कुछ है. जिसे भावना कहते है, संवेदना कहते हैं. दर्द के इतिहास और अन्याय के भूगोल को मैं समझने लगा था. मुझे अपनी उन पुरानी दोस्तों का दर्द जिन्दा दीखता था. वो मुझसे बातें करत था. मुझे मेरा छोटापन दिखने लगा. गुलामी का दूत बना, मैं गुलामों की तरह गूम रह था. आज भी घूम रह हूँ. पर गुलाम नहीं हूँ. लड़ता हूँ हर पर अपने भीतर उभरती हुई कल्पनाओं से अनुभूतियों से, उस निरंकुश तानाशाह समय से. गुलामी और जंजीरों से.

जीवन की परिभाषा और शक्ल बदल चुकी है और लगातार बदल रहीं हैं. पर इस बार लड़ाई है. हम समय के युद्ध बंदी है इस बार गुलाम नहीं. जीत की राह पर कुर्बानियों की लकीर खीच रहें हैं हम. ये लकीर ही वो निशाँ होगी जिसे देख कर हम जैसे लोग आयेंगे. वहाँ, जहाँ लड़कियां महज शरीर नहीं होंगी. उनकी काया के भूगोल के उस पार जा कर हम उनके दर्द का इतिहास हम बांच सकेंगे. हमारी भूख की माप एक बित्ता ही होगी और हमारी कल्पनाओं में हम हिंसक और अत्याचारी नहीं होंगे. इसी उम्मीद के साथ समय के खिलाफ विद्रोह कर रखा है हमने, एक दिन वो सुबह आएगी. जब समय के सभी युद्ध बंदी रिहा होंगे.

तुम्हारा- अनंत 
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