Saturday, July 13, 2013

जिंदगी ज़ब्त हो गयी शायद...

समंदर पर चल कर आती हुई लहर जैसे किनारे पर सर पटक कर मर जाती है वैसे ही उस दिन मरे थे कई ज़ज्बात, आखरी बार तडपते हुए देखा था उन्होंने मुझे, मानो कुछ भी नहीं कहना चाहते वो मुझसे और मैं खड़ा था वहीँ पर जैसे खड़े रह जाते हैं स्टेशन के किनारे के पेड़, जाती हुई रेलगाड़ी को देखते हुए, सब कुछ ऐसा घटा जैसा उसे घटना चाहिए. आस-पास जो हवा थी अचानक पानी बन गयी थी और एक नाकाम कोशिश जो बहुत पहले गंगा में डूब मरने की,  की थी, कामयाब होने पर अमादा थी. दम घुट रहा था और जहन में एक गाना गूँज रहा था "तड़प तड़प के इस दिल से आह निकलने लगी कि ऐसा क्या गुनाह किया कि लुट गए हम तेरी मोहब्बत में..." मन ही मन हम जल रहे थे पर होंठों पर मुस्कान थी. कितना कठिन होता है, रोते हुए हंसना हमने जान लिया था उसी एक क्षण में. आँखों में शाम उतर आई थी और कड़ी धूप में भी ऐसा लग रहा था कि बारिश हो रही हो. सिविल लाइन की रोड जहाँ थोड़ी सी सावधानी हटने पर मौत पक्की मानी जाती थी. मेरी आँखों में बिलकुल सूनसान दिख रही थी. उस समय मुझे कोई आदमी नहीं कह सकता था. मैं बिलकुल एक कटी पतंग हो गया था. जिसे कोई लूटना वाला भी नहीं था. जिसके हाँथ में मेरी डोर थी उसी ने डोर हाँथ पर से तोड़ दी थी और मारा था एक गुलाबी फ़्लाइंग किस धीरे से, मीठी मुस्कान चिपका कर,  भाई मन तो करा था कि उसकी फ़्लाइंग किस पर एक जोरदार किक चपका दें, पर क्या करें  मरते हुए आदमी में कोई ऐटीट्यूड नहीं होता, वो या तो कराह सकता है या मुस्कुरा सकता है. मैं उस समय कराहना चाहता था पर मुस्काना पड़ा. 

 वो यूं तो मेरे सामने से चली गयी थी पर मुझे वो साइकिल चलाती हुई दिख रही थी और मैं जो पेड़ों की तरह खड़ा था. उसने भी एक रेंजर साईकिल की सवारी कर ली थी. हम छ: साल पीछे चले गए थे. शायद शाम का वक्त था और हम दोनों कोचिंग से पढ़ कर वापस आ रहे थे. मैं उसके पीछे और वो मेरे आगे थी. उसके बराबर चलने की हिम्मत मेरे में नहीं थी. पर वो अक्सर मुझे आगे अपने साथ बुला लेती थी. उसकी आँखों में रेगिस्तान और समंदर दोनों थे और इसीलिए मैं उसकी आँखों में या तो डूबने लगता था या हांफने लगता था. वो अक्सर समझ जाती थी की मैं डूब रहा हूँ या हांफ रहा हूँ और खिलखिला कर हँसने लगती थी. जब वो हँसती थी न!  तो लगता था जैसे मानो मोहल्ले की मंदिर में आरती हो रही हो. बिलकुल पवित्र हंसी थी उसकी. मैं शाहरुख खान की तरह उसका नाम पुकारना चाहता था पर "ओम नम: शिवाय" बोल बैठता था. उसका और मेरा परिवार शिव जी का भक्त था. दोनों ब्राह्मण परिवार थे.

वो निराला चौक से अपने घर के लिए मुड जाती थी और मैं हनुमान जी की मंदिर की ओर मुड जाता था. क्योंकि मैं उसके पीछे ये कह कर आता था की मुझे हनुमान जी के दर्शन करने जाना है. हर दिन विदा होते हुए "आई लव यू" कहने का मन करता था पर "जय श्री राम" कह बैठता था. वो समय, समय जैसा नहीं था, वो कबूतर का पंख था जो थोड़ी सी हवा लगने पर फुदकने लगता था. पकड़ना मुश्किल था उन दिनों मुझे भी और मेरे समय को भी.....अरे भाई  मैं जनता हूँ की मैं सिविल लाइन में खड़ा हूँ और मेरे आस-पास कोई नहीं है. जो थी वो जा चुकी है. मैं छ: साल पीछे कहीं पर उलझा हुआ हूँ. हवा पानी हो चुकी है और रोड से सारी गाडियां गयाब हो गयी है. मैं जो एक पेड़ की तरह खड़ा था वो साइकिल में सफर कर रहा हूँ और वो लड़की जो कार में अभी-अभी चली गयी है. वो साइकिल से घर लौट चुकी है. तुम मुझे वापस बुलाना चाहते हो और सिविल लाइन में फैले हुए बवाल को खतम करना चाहते हो पर मैं एक भँवर में फंस चूका हूँ और फिलहाल वापस नहीं आ पाउँगा.ये मेरी मजबूरी भी है और मेरी इच्छा भी.

         मेरी आँखों में दृश्य बदल रहे हैं और अब मैं हमारे कसबे के सबसे व्यस्त चौराहे से  कोयले की बोरी लिए हुए गुजर रहा हूँ मेरे दिमाग में एक तस्वीर है जो उस लड़की की है जिसे मैं बचपन में प्यार करता था. ये बात और है कि उस समय मुझे प्यार की स्पेलिंग भी नहीं मालूम थी. यही कोई दूसरी या तीसरी कक्षा रही होगी. उस लड़की के बाल मुझे बहुत अच्छे लगते थे और जब मैं उसे याद करता था तो मेरी आँखों में उसके बाल ही दिखाई देते थे. मैं उसे एक कविता समझता था और उसे पढना चाहता था। उसे नए सिरे से रचना चाहता था। शायद इसीलिए मैं बचपन से ही कवी बनना चाहता था, बिना ये जाने हुए की कवी कोई बनता नहीं समय लोगों को कवी बना देता है। वो जब हंसती थी तो ब्रम्हांड के सारे नियम टूट कर बिखर जाते थे और एक आह सी उठती थी. जो प्रकृति स्वयं उसके सौन्दर्य से इर्ष्या करके भर रही होती थी. वो कुल मिला के बहते हुए पानी की धारा थी और मैंने उस पर कुछ लिखना चाह था. शायद लिख भी दिया था पर पढ़ नहीं पाया और पानी आगे बह गया था। बह कर कहाँ गया पता नहीं पर मैं प्यासा हूँ, था और रहूँगा उस पानी के लिए जिसकी सतह पर मैंने समय को कविता बना कर लिख दिया था। मैंने खुद को गढ़ा था उसकी हर एक बूँद में। उस पानी की धार जैसी लड़की का नाम 'स्नेहा' था. वो कहाँ की थी पता नहीं पर रहती मेरे दिल में थी.

 कक्षा तीन तक जिंदगी अपनी रफ़्तार में चल रही थी. सुबह माँ की डाँट उठाती थी और शाम को खेल की थकान सुला देती थी. दिन मनो शुरू होते ही खतम हो जाया करता था. पढाई करना एक औपचारिकता थी जिसे मैं औपचारिक रूप से ही निभा रहा था. रोज मैडम की डाँट-मार मिलती थी और वो भी जिंदगी का हिस्सा हो गयी थी. पर स्नेहा के आने के बाद मैं पढाई को पढाई की तरह करने लगा था. क्योंकि यही एक रास्ता था उसके करीब जाने का, उससे रिश्ता बनाने का. इन सब के बीच दो साल बीत गए और मैं पांचवीं पास करके सरकारी कालेज में अपनी बारहवीं तक की पढाई के लिए चला गया. स्नेहा आठवीं तक वहीँ पढ़ती रही. स्नेहा के पास मेरा जैसे कुछ छूट गया था. मैं नहीं जनता क्या था वो? पर उसे देखने की दिल में उन दिनों एक अजीब सी उलझन रहा करती थी. मैंने तब तक प्यार का नाम भी नहीं सुना था. इसलिए मैं उसे प्यार नहीं कह पाया था. वो क्या है ? या क्या हो रहा है? मैं नहीं जनता था. मैं रोज लंच के बाद कालेज की दिवार फांद कर उसे देखने के लिए भाग आता था. मैं उसका पीछा करते हुए उसके घर तक जाता और उसे तब तक निहारता रहता जब तक वो घर के भीतर नहीं चली जाती.तीन साल तक मेरी यही दिनचर्या रही. फिर आठवीं की छुट्टियाँ हुई और वो जो उन छुट्टियों में कहीं गयी फिर कभी नहीं आई. मैं उसे तलाशता रहा पर कभी नहीं मिल सका.  





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