Monday, December 26, 2011

ये दिसंबर बड़ा ही इम्पार्टेंट मंथ है .................

जब अलसाई हुई सुबह देर तक धुंध की चादर ताने  सोने की जिद्द करती रहे......और शाम सात बजे के बाद से ही डोंट डिस्टर्ब का बोर्ड लगा कर ,कोहरा ओढ़ कर सो जाए तब समझ लेना चाहिए की दिसंबर आ गया है .जब चौराहों पर चाय की दुकानों में सेल का  माहौल हो , बिना सिगरेट के मुंह से धुआं निकलने लगे और आदमी सुबह शाम खुद-ब-खुद माइकल जैक्शन जैसा थिरकने लगे तब जान  लेना चाहिए की ये दिसंबर का असर है ,ऐसे ही कई सारे सिग्नल हैं जिनसे पहचाना जा सकता है कि दिसंबर आ गया है ,
दिसंबर आते ही दिमाग में मोबाइल की रिंगटोन की तरह जावेद अख्तर का गाना....ए जाते हुए लम्हों जरा ठहरो! जरा ठहरो! मैं भी तो चलता हूँ ....बजने लगता है और हम दिसंबर के साथ चल देते है अपने बीते साल को इवैलुएट करते हुए , लेकिन वक़्त जिस दरवाजे से बहार निकलता है उसी से  इंटर भी करता है ...इसलिए उस दरवाजे की एक ओर बीतने वाला साल दिसंबर बन कर खड़ा होता है तो दूसरी ओर आने वाला साल जनवरी के गेटअप में अपनी बारी का इन्तजार करता रहता है,जैसे ही हम दिसंबर को सी आफ(see off )करते है वैसे ही जनवरी हमारा हाँथ थाम कर  विद्या बालन स्टाइल में कहती है '' अपने बीते हुए साल की कैंडल्स को फूंक मारो और आने वाले साल को बोलो हैप्पी बर्थडे ! हमारे मुंह से उस वक़्त बस एक शब्द निकलता  है ''बुम्बाट'' और हम यूथ अपना वही पुराना स्लोगन "जवानी टेस्ट करने के लिए होती है वेस्ट करने के लिए नहीं " याद करते हुए जुट जाते है जश्न मनाने में ,
इन सब के साथ-साथ जो दिसंबर में सबसे ज्यादा करने का मन करता है वो है रीजोलुशन पास करने का,हर एक यूथ साल के अंतिम महीने में कोई न कोई रीजोलुशन जरूर पास करता है ये और बात है की उनमे  से ज्यादा तर नए साल के पहले ही दिन टूट जाते है  जो कुछ बचते है तो वो जनवरी जाते-जाते शहीद हो जाते है,पूरा होने  वाले रीजोलुशनस की  संख्या १ % होती है ,पर जो लोग अपना रीजोलुशन पूरा कर लेते है वो कमाल कर देते है, मुझे इस मौके पर अपने दो दोस्तों की कहानी याद आ रही है जो की रीजोलुशन से ही जुडी है,
मेरा एक दोस्त था हर साल दिसंबर के महीने में अपनी सारी बैड हबिट्स बढ़ा देता था मसलन सिगरेट पीना,क्लास बँक मरना ,देर तक सोना,फिजूल खर्ची करना ,और हर वो बुरी आदत जो भी उसे छोडनी  चाहिए थी  ,बस पूछने पर कहता था ''नेक्स्ट इयर से ये सब छोड़ रहा हूँ यार सो अंतिम बार जी भर कर कर लूं''. वो दिसंबर लास्ट डे टाइमटेबल ड्राफ्ट करता था, अपनी सारी बुरी आदतों को लिख कर छोड़ने की कसम खाता था पर  न्यू इयर की पार्टी से ही जो रेजोलुशन  तोड़ने जो सिलसिला शुरू होता था ,वो फिर साल के अंतिम दिन ही रुकता था यही सिलसिला चलता रहा और आज वो इंटर तक की ही पढ़ाई बड़ी मुश्किल से कर पाया है,मेरा जो दूसरा दोस्त था वो गाँव से आया था उसे इंग्लिश नहीं आती थी इसलिए उसे टीचर का पढाना समझ नहीं आता था वो बहुत परेशान रहता था ,मुझे आज भी याद है की साल का अंतिम  दिन था कोचिंग में मैथ्स की क्लास के बाद पार्टी थी,हम सब पढ़ रहे थे और टीचर की पढ़ाई कोई बात शायद मेरे उस फ्रेंड को नहीं समझ आई सो  उसने टीचर से पुछा तो उन्होंने उसे डांट दिया और कहा की बिना इंग्लिश के पढ़ाई नहीं हो सकती ,तुम पढ़ाई छोड़ दे ,तुम  कभी इंजीनियर नहीं बन पाओगे ,उसे ये बात लग गयी वो उस दिन वो पार्टी में भी नहीं रुका और सीधे घर चला गया ,उसने रीजोलुशन पास किया की मैं इंग्लिश बोल कर दिखाऊंगा ,मैं इंजिनीयर बन कर दिखाऊंगा,ये उसके रीजोलुशन का ही असर था की वो छ:महीने के भीतर फ्लूएंट इंग्लिश बोलने लगा था ,और वो मात्र एक लड़का था जिसे हमारी कोचिंग से आई आई टी में सेलेक्शन मिला ,जिस टीचर ने उसे डांटा था वो उसके साथ फोटो खिचवाने के लिए परेशान था ,जो लड़का कल तक उनकी नज़र ने इंजीनियर बनने के काबिल नहीं था वो आज उसे अपनी कोचिंग का ब्रांड अम्बेसडर कह रहे थे,ये सारा कमाल उसके सच्चे रीजोलुशन का था ,

ये दिसंबर बड़ा ही इम्पार्टेंट मंथ है इसमें  हमें अपनी स्ट्रेंथ और वीकनेस के बारे में सोचना है और एक सच्चा रीजोलुशन पास करना है उसे पूरा करने के लिए अपनी  पूरी ताकत लगा देनी है,हमें खुद को एक नयी पहचान देनी है ,नयी स्टाइल में काम करना है ,लोगों को चौका देना है ,जो लोग हमें बेकार,निक्कम्मा कहते है उनके मुह से हमें काबिल और होनहार सुनना है,ये सरे कमाल हो सकते है जरूरत है तो बस सच्चे रीजोलुशन की ,
नया साल आ रहा है दिसंबर कब कोहरे के परदे के पीछे ड्रेस चेंज करके जनवरी हो जायेगा पता ही नहीं चलेगा,हम पार्टी मनाये जश्न मनाये ,पर अपने रीजोलुशन को न भूल जायें ,एक भी पल हमारे दिलो दिमाग से वो टारगेट नहीं हटना चाहिए जो हम इस दिसंबर में सेट करने वाले है,हमें जिन्दगी को महसूस करना सीखना होगा वरना जिंदगी मायूस हो जाएगी और आप जानते ही है की जिन्दगी जब मायूस होती है तभी महसूस होती है,तो जिन्दगी के मायूस होने से पहले महसूस करिए  नहीं तो ....वाई दिस कोलावेरी ...कोलावेरी ..कोलाबेरी डी गाने के अलावा कोई और रास्ता नहीं बचेगा,
                                                                     तुम्हारा --अनंत 
19 dec 2011 ko आई-नेक्स्ट (दैनिक जागरण) में प्रकाशित लेख 

लिंक यहाँ है http://epaper.inextlive.com/19671/INEXT-LUCKNOW/19.12.11#p=page:n=11:z=1

Thursday, November 24, 2011

.यहाँ भी वाल स्ट्रीट का कांसेप्ट फिट होता है.................

संसार में जितने भी शब्द हैं उनकी अपने अर्थों के साथ अपनी एक तस्वीर भी होती है जो की सुनने वाले के ज्ञान ,अनुभव और पूर्वाग्रह पर निर्भर करती  है .उदहारण के लिए यदि मैं हिल स्टेशन पर रहने वाले व्यक्ति से ''सुबह'' कहूँगा तो उसके दिमाग में जो तस्वीर बनेगी वो मैदानी क्षेत्र में रहने वाले व्यक्ति से अलग होगी चूंकि सुबह को लेकर दोनों के अनुभव अलग अलग है ,
शब्द समय के साथ-साथ अपनी शक्ल भी बदलते रहते हैं जैसे अगर मैं सेवेनटीज़ के यूथ की बात करूंगा तो आपके मन में कान ढके लम्बे बाल ,बेलबाटम का चौड़ा पैंट ,बड़े कॉलर की शर्ट पहने  चहरे पर सिस्टम के खिलाफ असंतोष का भाव लिए हुए अमिताभ से मिलता जुलता कोई लड़का दिखेगा ,वहीँ यूथ लड़की की तस्वीर हेमा मालिनी से मिलती हुई साडी में लिपटी ,शर्मीली पर  पर्याप्त मुखर, अपने अस्तित्व के लिए जूझती,समाज की रूढ़ियों के खिलाफ मौन और शांति पूर्ण विरोध दर्ज कराती टिपिकल इंडियन वुमेन दिखेगी ,कुछ ऐसी ही कमोबेस तस्वीर लेट नाइनटीज़ बनी रहती है ,पर जैसे ही हम इकिसवीं सदी में कदम रखते हैं शब्दों की तस्वीर बड़ी तेजी से बदलनी शुरू हो जाती है ,आज की तारिख में मैं अगर आज के यूथ की बात करूँ. तो यदि आपने रॉकस्टार देख ली है तो आपके जहन में रणबीर कपूर और नर्गिश की तस्वीर कौंध जाएगी .एक ऐसे युवा की तस्वीर जिसके चेहरे पर अजीब बदहवासी भरा जूनून साफ़  देखा जा सकता है ,वो अपने मन  का करने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है ,मेरा अपना मानना  है की इन सब के बीच अगर कोई शब्द बड़ी तेजी से अपनी शक्ल बदल रहा है तो वो है.......... '' इंडियन गर्ल ''
अभी कुछ दिन पहले मैंने अखबार में एक हेडिंग पढ़ी ''लडकियां गढ़ रही अपनी किडनैपिंग की फर्जी कहानियाँ ''खबर डिटेल में पढ़ी तो पता चला की इंडियन गर्ल्स की तस्वीर में ये भी रंग जुड़ने लगे हैं. अलीगंज में रहने वाली एक लड़की अपने बॉयफ्रेंड के साथ देर रात तक घूमती रही और घर वापस आ कर परिजनों से अपनी  किडनैपिंग की फर्जी कहानी गढ़ डाली ,दूसरी कहानी गाजीपुर लखनऊ कोचिंग करने आई एक दूसरी लड़की की है जिसने अपने किडनैपिंग और रेप की झूंठी  कहानी बनाई थी ऐसी ही कुछ मिलती जुलती कहानी ट्रांसगोमती नगर में भी घटी थी ,पुलिस ने जब इन केसों की छानबीन की तो जो सच्चाई सामने आई वो अपने आप में बहुत बड़े सवाल खड़े करती है .......एक अहम सवाल  ये की आखिर लड़कियां ऐसा क्यों कर रही हैं ?
मैंने इस सवाल को समझने के लिए फेसबुक पर कई सारी लड़कियों से चैट की....एक ही सवाल एक ही समय में सबसे पूछे और यकीन मानिए सभी के जवाब मिलते जुलते थे ,मेरा पहला प्रश्न था कि ''तुम अपनी मम्मी से किस तरह अलग हो ''जवाब में सबने कहा कि ''थिंकिंग और ड्रेससिंग सेन्स'' से .'थिंकिंग और ड्रेससिंग सेन्स' को उन्होंने जो डिफाइन किया उसका निचोड़ था कि हमें आज अपनी चोइस   खुद करनी है मम्मी कि तरह पति को परमेश्वर हम नहीं मान सकते,पति-पत्नी का सम्बन्ध दोस्ती कि तरह अच्छा  लगता है ,हमें अपनी प्रिओरीटीज़ खुद तय  करने का मौका चाहिए समाज,संस्कार, और सिस्टम के नाम पर कोई भी हमारे राईट को एक्सप्लोइट नहीं कर सकता.......मैंने जब  उनसे ऊपर कि घटनाओं के बारे में डिसकस किया तो सभी का जवाब एक था ऐसा करना गलत है जो लडकियाँ ऐसा करतीं हैं वो सो काल्ड मार्डन हैं माँ बाप कि ट्रस्ट भी कोई चीज़ होती है  ,ये वो लडकियां है जो फिल्मों की रील लाइफ को रियल लाइफ में जीना चाहती  है ,
अब मुझे  मेरा जवाब मिल गया था ये सच है कि आज इंडियन गर्ल वो सब कुछ करना चाहती है जो कभी समाज उसे लड़की होने की वजह से नहीं करने देना चाहता था ,पर उसे अपनी लिमिटेशन का पता है, और जिन लड़कियों से ऐसी गलती हुई है उस गलती में वो अकेले जिमेदार नहीं है बल्कि इसके लिए पूरा सिस्टम जिम्मेदार है,वो पारिवारिक परिवेश जो लड़कियों में कुंठा भरता है और  वो इंटरटेनमेंट इंडस्ट्री जो इस कुंठा  को बाज़ार तक ले आती है और उसमे मुनाफे की सम्भावना तलाशती है ,आज टी.वी. पर डेट ट्रैप ,स्प्लिट विला ,रोड़ीस ,इमोशनल अत्याचार जैसे न जाने कितने ऐसे प्रोग्राम हैं ,जो भारतीय युवा की इसी  कुंठा का व्यापार कर रहे हैं ,इन प्रोगाम्स में दिखाई देने वाला युवा क्या सच भारतीय समाज के युवा की तस्वीर गढ़ता है , आज इन प्रोग्राम्स ने न सिर्फ उनकी चाल-ढाल बदली है .बल्कि उनकी जीवन शैली और भाषा को भी बदल दिया है ,आज से पांच साल पहले किसी गर्ल को हॉट कहना गलत माना जाता था पर आज ये कॉम्प्लीमेंट माना जा रहा है.ये बदलाव सही है या गलत ये दूसरी बात है पर अहम बात है की क्या ये बदलाव उस पूरे भारत का है १२५ करोर जनसँख्या वाला देश है ,आज भी इस देश में युवा अपने मन की करने से पहले अपने परिवार माँ- बाप, भाई, बहन, दोस्तों की सोचता है और फिर सबका ख्याल रखता हुआ अपने सपनो की उड़ान उड़ता है ,पर इनमे से कुछ ऐसे भी है जो रील लाइफ को रियल लाइफ समझने की भूल कर बैठते है और गलतियां कर बैठते है ......यहाँ भी वाल स्ट्रीट का कांसेप्ट फिट होता है ''एक परसेंट यूथ 99 % यूथ को डाइरेक्ट कर रहा है ''  इंडियन यूथ आज भी अपने संस्कारों से जुड़ाव मसूस करता है न की जकडन...........

Monday, November 14, 2011

हर सवाल जरूरी है ....................

लोगों को रास्ते में चलते वक़्त रुपए ,पैसे, या सामान गिरे मिले होंगे पर मुझे एक अजीब चीज़ मिली है '' किसी छोटे बच्चे की हैण्डराइटिंग में लिखा एक कागज का टुकड़ा ''उस टुकड़े में कुछ सवाल लिखे हुए थे, मसलन जिन्दगी क्या है ? ,तुम कहाँ जाना चाहते हो ?,तुम क्या बनना चाहते हो ?,तुम किसके लिए जी रहे हो? तुम्हारी कमजोरी और ताकत क्या-क्या  है ?,और बहुत सारे ऐसे ही सवाल...... 

हम  सभी के भीतर सवालों से भागने की एक अजीब टेंडेनसी होती है  चाहे बचपन में क्लासरूम में तेअचेर के सवाल हो ,जवानी में लोकतंत्र और सामाजिक जिम्मेदारी की सवाल हो या फिर बुढापे में जिन्दगी के हिसाब किताब के सवाल ,लाइफ के हर पड़ाव पर बस हम सवालों से भागना चाहते है पर उर रोज मैं उन सवालों से भाग नहीं पा रहा था और बार-बार मन गुलज़ार का लिखा मासूम फिल्म का गाना गुनगुना रहा था '' तुझसे नाराज नहीं जिन्दगी ,हैरान हूँ मै ,तेरे मासूम सवालों से परेशान हूँ मैं''...देखने में ये सवाल कितने सरल से लगते हैं पर सिरिअस हो कर सोचिये ये किनते गहरे सवाल हैं ,इन सवालों की उलझन ने  न जाने कितने कवि ,लेखक,रंगकर्मी ,क्रांतिकारी ,वैज्ञानिक ,दार्शनिक ,और कलाकारों को जीवन बहर उलझाए रखा ,लेकिन उनकी उसी उलझन और आत्मयुद्ध  से जो कुछ  दुनिया को मिला उसने दुनिया के अर्थ ही बदल दिए ,चाहे शेक्सपियर का नाटक हो या फिर एडिसन का बल्ब ,भगत सिंह की कुर्बानी हो या फिर अन्ना की सामाजिक क्रांति इन सब के पीछे उन्ही सवालों की उलझन को महसूस  किया जा सकता है ,इन सवालों की एक खास बात होती है की जो भी इन्हें हल करने की कोशिश करता है ये उसे कुछ ख़ास बना देते हैं ये सवाल अपने भीतर असीम विनाश और सृजन की संभावनाओं से युक्त होती है ,इतिहास गवाह है कि गली कुचे कि खाक छानने वाले इन्ही सवालों पर सवार हो कर सत्ता के गलियारे तक पहुंचे हैं ,और विलासिता कि ऊँचाइयों से कष्ट कि पराकाष्ठा तक लोगों को यही सवाल ले कर आये हैं , २०वीं शताब्दी के दुसरे दसक  तक जर्मनी कि गलिओं में भूँखा टहलने वाला ''हिटलर'' तीसरे -चुठे दसक तक विश्व का सबसे ताकतवर तानाशाह हो जाता है वहीँ बहरत जैसे गुलाम देश में सर्वोच्च प्रशासनिक परीक्षा '' ICS '' पास करने के बाद भी सुभाष चन्द्र बोस क्रांति के लिए कष्टमय जीवन चुनते है ,


आज इन  सवालों से जो सबसे ज्यादा परेशान है वो है हमारा यूथ ,फेसबुक  और ट्विटर पर उसके दोस्तों और जानकारों कि संख्या हज़ारों में है पर एक कन्धा ऐसा नहीं जिस  पर वो अपनी तन्हाई टिका सके ,अपने अश्क पोछ सके , भीड़ में तन्हाई झेलता ये यूथ ,एक तरफ कैरियर और भौतिकता के सवालों में उलझा हैं ,तो दूसरी तरफ समाज में फैले विसंगतियों के सवाल उसे परेशान  किये हुए हैं एक ओर उसकी खुद कि ख़ुशी है तो दूसरी ओर माँ बाप के एक्सपेक्टेशन और सोशल रिस्पोंस्बिल्टी ,कुल मिलाकर जिन्दगी जीने कि फ़िराक में वो जिन्दगी के खोता जा रहा है ,आज उसके सिने में बची है तो कुछ साँसे ,कुछ सपने ,उसके पास बचे हैं कुछ रिस्ते ,कुछ उम्मीदें औरवो खुद  इन सब को पूरा करने कि मशीन बन गया है ,

काहिर इन सब सवालों से जो एक एंटी सवाल निकलता है वो ये है कि ये कौन है जो हर वक़्त हमसे सवाल करता रहता है ,हमे उलझाए रहता है हमे परेशान करे रहता है तो उसका जवाब है हमारी चेतना ,ये हमारी चेतना ही है जो हर वक़्त जिन्दगी के सही मायने मायने ढूँढती फिरती है ये चेतना सिर्फ सांस लेने को जिन्दगी नहीं मानती ,आज झूठे जशन और जी.डी.पी. ग्रोथ के झूठे आंकड़ो में ये चेतना कही खोटी जा रही है तभी तो हम कुछ जरूरी सवालों से भी दूर होते जा रहे हैं .............एक बात बाताऊं मुझे लगता है कि वो छोटा बच्चा मेरी चेतना ही थी जिसने मेरी राह में इन सवालों को लिख कर फेंक दिया था ........... 

30/09/2011 को i-next (दैनिक जागरण )में प्रकाशित .........





                                           तुम्हारा --अनंत 




                                      

Sunday, November 13, 2011

बिना लाइसेंस के सपने.........................

हताशा में आशा तलाशो ....................................


''21वीं शताब्दी आवाजों और बातों की सदी है '' मेरे शब्दकोश में 21वीं शताब्दी की बहुत सारी परिभाषाओं में से ये भी एक परिभाषा है ,भागती हुई जिन्दगी के बैकग्राउंड में सुबह से शाम तक न जाने कितनी आवाज़े बजती रहती हैं,बातें गूंजती रहती हैं ,लेकिन इनमे से कुछ  ऐसी भी होती हैं जो न सिर्फ बदहवास दौड़ते क़दमों को रोक देतीं  है बल्कि इंसान के दिलो-दिमाग़ पर छा जाती हैं,
कल मार्निंगवॉक के समय मैंने भी ऐसी ही आवाजें और बातें सुनी जिसे  मैं आप के साथ शेयर करना चाहता हूँ ,पहली आवाज़ मुझे 18 -19 वर्ष के नवजवान की सुनाई दी,वो आपने दोस्त से  किसी सपने को पूरा करने की बात कर रहा था कि तभी उसके  दोस्त ने सेवेनटीज़ के रिबेलियन हीरो की तरह जवाब दिया ''सपने देखने का लाइसेंस है तेरे पास '' जो सपने देखने लगा ,सपनों की तेज रफ़्तार सड़क पर अपनी जिन्दगी की गाड़ी वो चलाते हैं जिनके पास सपने देखने का लाइसेंस होता है'' ! उसका मतलब सुविधा ,साधन और धन से था ,पर  इसके जवाब में उसके दोस्त ने जो कहा वो कमाल ही था ,उसने कहा :- '' तमिलनाडु के छोटे से शहर रामेश्वरम में जैनुलाब्दीन नाम के एक अनपढ़ मल्लाह का बेटा अखबार बेंच  कर  बिना लाइसेंस  के सपने देखते हुए  देश का राष्ट्रपति ,मिसाइल मैन और भारतरत्न डॉ अब्दुल कलाम बन सकता है ,तो मैं क्यों नहीं ? उसका ये  डायलॉग सुन कर डॉ अब्दुल कलाम का स्टेटमेंट याद आ गया कि '' सपने वो नहीं होते जो सोते हुए देखे जाते हैं ,सपने वो होते है जो सोने नहीं देते '' मैं  ये सब कुछ सोचते, सुनते, महसूस, करते कुछ आगे बढ़ा ही था कि एक दूसरी आवाज़ सुनाई दी 8-9 साल का एक बच्चा जॉगिंग करते अपने पापा से KBC के अमिताभ बच्चन स्टाइल में पूछ रहा था कि पापा एप्पल  के फाउंडर  स्टीव जॉब्स ने मरते वक़्त क्या कहा था ? पापा तो मानो दौड़ते-दौड़ते अचानक हॉट शीट पर बैठ गए हों ,और चेहरा वैसा बन गया , जैसा सुशील कुमार का 5 करोर का प्रश्न सुन कर बना था ,खैर सवाल का जवाब तो मुझे भी नहीं मालूम था ,सो मैंने ही पूछ लिया बेटा आप ही बताओ कि स्टीव जॉब्स ने लास्ट वर्ड्स क्या बोले थे ? उसका जवाब था , उन्होंने मरते वक़्त तीन बार हँसते हुए वॉव ! वॉव ! वॉव ! कहा था मैं अभी हैरानी से उसे देख ही रहा था कि वो अपने पापा के साथ आगे बढ़ गया मैं कुछ देर वहीँ खड़ा रहा और स्टीव जॉब्स मेरे कानों में वॉव! वॉव ! वॉव ! कहते रहे , हमेशा की तरह मार्निंगवॉक के बाद घर आ गया पर इस बार मैं अकेला नहीं आया था ,मेरे साथ मेरा पीछा करते हुए घर तक चली आई थी कुछ बातें और कुछ आवाजें ,,
मैंने उस लड़के की कही बात की जांच  करने के लिए इन्टरनेट पर चेक किया तो पाया 16 अक्टूबर को मेमोरिअल चर्च आफ स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में उनकी बहन मोना जॉब्स ने अपने इंटरव्यू में खुलासा किया था कि .''स्टीव जॉब्स के आखरीपलों होठों पर मुस्कान और मुंह पर वॉव !वॉव !वॉव ! था उन्हें देख कर ऐसा लग रहा था कि मानों वो कोई ऊँची चढ़ाई चढ़ रहे हों ,''
स्टीव जॉब्स भी उन लोगों में से थे जो अपने रास्ते खुद बनाते हैं ,अमेरिका में एक अविवाहित छात्रा के सामाजिक रूप से अस्वीकार्य बालक ने पूरे समाज को नई दिशा दी ,उनकी माँ ने उन्हें जिन लोगों को  गोद दिया वो एक अनपढ़ दंपत्ति थे ,अपनी मन कि करने वाले स्टीव खुद कभी ग्रेजुएट नहीं हो पाए ,पर दुनिया को मैकिनटॉस जैसा गिफ्ट दे कर अपने सपने ''एप्पल'' को एक  पूरी दुनिया में फैला दिया ,उन्हें जब 30 की  उम्र  उनकी ही कम्पनी से निकला गया तब उन्होंने घोर हताशा में भी आशा की किरण खोज निकाली थी ,और कहा था ''एप्पल से निकला जाना मेरे लिए बहुत अच्छा है इससे मुझे सफलता के भार की जगह नई शुरुवात  के लिए हल्कापन मिला है '' उन्होंने उसके बाद नेक्स्ट और पिक्सर नाम की दो कम्पनी खोली .पिक्सर आज दुनिया सबसे बढ़िया एनीमेशन स्टूडियो है ,और यहीं पर पहली एनीमेशन फिल्म '' टॉय स्टोरी '' बनी थी ,स्टीव जॉब्स के मुँह  से मरते वक़्त वॉव !वॉव !वॉव ! इसलिए निकला होगा क्योंकि उन्होंने शायद मृत्यु में भी जन्म  की संभावनाओं को देख लिया था,
स्टीव जॉब्स हो या डॉ अब्दुल कलाम उन्हें सपने देखने के लिए किसी लाइसेंस  की जरूरत नहीं  पड़ी, और ख़ुशी कि बात ये हैं आज हमारे देश का बचपन और जवानी इस बात को अच्छी तरह समझ रही है ,एक ओर जहाँ जवानी डॉ कलाम कि तर्ज पर बिना लाइसेंस  के सपने देखने कि हिम्मत कर रही है वहीँ दूसरी ओर बचपन स्टीव जॉब्स की हताशा में आशा और निगेटिविटी में पोजिटिविटी देखने कि कला को बारीकी से सीख रहा है और उन्हें अन्तिम सांस तक फालो कर रहा है ,अब मुझे वो दिन दूर नहीं लगता कि जब माइक्रोसाफ्ट और एप्पल  जैसी कम्पनी हमारे  देश में होंगी ,मैंने जो बातें कहीं और जो आवाजें आपने सुनी दोनों बड़ी काम कि थी '' फिर मिलेंगे तब तक के लिए  ''स्टे हंगरी ,स्टे फूलिश ''.............
                                  तुम्हारा --अनंत 
16 nov 2011 को आई- नेक्स्ट  (दैनिक जागरण ) प्रकाशित लेख  

Monday, October 31, 2011

बेटा! अगर हम इस उम्र में ये कर सकते है तो तुम अपनी उम्र में ...........................


ढलती उम्र की पाबंदियाँ बढ़ते  जूनून को नहीं रोक पाती ,अपने आप को साबित करने का ज़ज्बा वो उड़ान  है जिसे पंखों की  नहीं हौसलों की जरूरत पड़ती है,अभी हाल में जब १०० वर्षीय मैराथन धावक फौजा  सिंह का नाम अखबारों की सुर्खियाँ बना तब राहत इन्दौरी का वो शेर मुझे याद आ गया 
की..........               
                                     
                  '' ये कैंचियाँ हमें उड़ने से खाख़ रोकेंगे,,
                                   '' हम परों से नहीं हौसलों से उड़ते हैं ,,
                                       

सच में जिस उम्र में लोग बिमारियों की मार खा कर घरों में कैद हो जाते हैं उस उम्र में फौजा सिंह लन्दन की सड़कों में स्पोर्ट्स शूस पहने दौड़ते हुए नज़र आते है ,पंजाब के एक मामूली किसान परिवार में जन्मे फौजा सिंह पढ़े लिखे नहीं हैं और न ही उन्हें देश-दुनिया की ख़बर है ,पत्नी और बेटे की मौत के बाद वो अपने गाँव ब्यासपिंड को छोड़ कर अपने रिश्तेदारों के पास इल्फोर्ड लन्दन चले गए थे ,८९ वर्ष की उम्र में निपट अकेला एक बुजुर्ग भाषाई और सांस्कृतिक विभेद से जूझता ,पत्नी और बेटे का गम ढोता ,जब जिन्दगी के मायने तलाशने लन्दन की सड़कों पर दौड़ता है ,तब ये दौड़ उसके लिए सिर्फ दौड़ नहीं रह जाती ,वो उसकी जिन्दगी का मकसद बन जाती है  , अपनी जिन्दगी के ११ साल उन्होंने दौड़ते हुए गुजार दिए , इस दौरान उन्होंने ५ मरथन लन्दन में ,२ मैराथन टोरंटो में .और १ मैराथन न्यूयार्क में दौड़ी है ,और इस बार टोरंटो में होने वाली वाटरफ्रंट मैराथन में ४२ km ,दौड़ पूरी करके गिनीज बुक आफ वर्ल्ड रिकार्ड में विश्व के सबसे बुजुर्ग मैराथन धावक के रूप में अपना नाम दर्ज करवाया है ,उनके इसी ज़ज्बे और जूनून को सलाम करते हुए ब्रिटेन के महरानी ने उन्हें प्राइड ऑफ़ यू.के. से नवाज़ा है ,

अगर फौजा सिंह के जीवन से दौड़ के ये ११ साल निकाल दिए जाएँ तो वो बस ८९ साल के एक अनपढ़ किसान के आलावा कुछ नहीं बचते , ये हौसले,जूनून और संकल्प के ११ साल ही थे जिन्होंने फौजा सिंह को विश्व प्रसिद्ध टर्बन टोरनेडो (पगड़ी वाला तूफ़ान ) बना डाला ,


फौजा सिंह ही अकेले ऐसे  नहीं हैं जिन्होंने उम्र की कैंचियों को चुनौती देते हुए ताकत और सामर्थ के पर कट जाने के बाद भी हौसलों से सपनों और जूनून की उड़ान उड़ी है ,विश्व के सबसे बुजुर्ग डॉ. अमेरिका के, डॉ. वाल्टर वाटसन की उम्र भी १०० वर्ष है पर वो आज भी जवानों की तरह मरीजों की सेवा करते हैं,९७ वर्ष की ज्योर्ज मोयसे दुनिया के सबसे खतरनाक और रोमांचकारी खेलों में से एक खेल स्काई  ड्राइविंग की सबसे बुजुर्ग खिलाड़ी हैं पर खेल ऐसा खेलती हैं की जवानों को भी शर्म आ जाये, अभी उन्होंने हाल में ही १००० फुट की ऊंचाई  से छलांग लगाईं है ,डोरोथी डे ला ९९ वर्ष की है और चीन में होहोत में जून २०१० में आयोजित बुजुर्गों की टेबल टेनिस प्रतियोगिता में भाग लेने वाली सबसे अधिक  उम्र की खिलाड़ी थी ,इस उम्र में भी उनकी फूर्ती और खेल देखने लायक था ,असम के भोलाराम दास न्यायधीश पद से रिटायर्ड हुए है,  उनका सपना था की वो phd  करें ,उन्होंने भी उम्र को धता बताते हुए १०० की उम्र में गुवाहाटी विश्वविद्यालय में phd  के लिए दाखिला लिया है वो विश्व के सबसे बुजुर्ग शोध छात्र हैं, ७५ वर्ष के बिरजू महराज आज भी उतनी ही उर्जा और निपुणता के साथ नृत्य करते है जैसा वो युवा काल में करते थे ,शमसाद बेगम आज ९३ वर्ष की उम्र में भी गए बिना नहीं रह पाती है और किसी जमाने में पूरे हिन्दुस्तान को नचा देने वाली ये आवाज़ आज भी कम सुरीली नहीं है ,दिल्ली मेट्रो रेल कोर्पोरेशन के cmd ईं० श्रीधरन आज ८० साल की उम्र में भी पूरी तरह सक्रिय है उन्होंने दिल्ली मेट्रो का जाल बनाने में काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है,८४ साल की उम्र में  ७६०० km यात्रा शुरू करके  लाल कृष्ण अडवानी ने भी सबको चौका दिया है ,अन्ना ने ७४ वर्ष की ढलती उम्र में जवानों को राह दिखाई और सामाजिक क्रांति का सूत्रपात कर डाला ,पूरी दुनिया में फौजा सिंह से ले कर अन्ना तक कई ऐसे उदहारण फैले पड़े हैं,जिन्होंने उम्र के सामने घुटने नहीं टेके बल्कि पूरे हौसले और जूनून से  अपने सपनों के पूरा करने के लिए ,अपने मकसद को पाने के लिए ,अपने आपको साबित  करने के लिए लड़े, और ढलती उम्र में  जीवन के चरमोत्कर्ष को प्राप्त किया ये उन लोगों की जीवन के   प्रति  घोर आस्था और जिजीवषा का प्रतीक है ,फौजा सिंह समेत जूनून से भरपूर जीवन जीने वाला हर एक बुजुर्ग का जीवन हम युवाओं को  प्रेरणा दे रहा है  और मानो हमसे कह रहा है की बेटा! अगर हम इस उम्र में ये कर सकते है तो तुम अपनी उम्र में ...........................अब परों से नहीं हौसलों से उड़ने की बारी है 


                                     तुम्हारा--अनंत 
2 -11 -2011 को i -next में प्रकाशित ............

Sunday, October 30, 2011

समाज एक प्रयोगशाला है (अन्ना आन्दोलन का विश्लेषण और सुझाव )


मैंने कहीं पढ़ा था की समाज एक प्रयोगशाला है जहाँ सामाजिक विज्ञान के नियमों  के प्रयोग और प्रेक्षण किये जाते है ,पर ये प्रयोगशाला साधारण प्रोयागशाला से ज्यादा सतर्कता की माँग करती है कारण ये है की यदि विज्ञान की प्रयोगशाला में कोई गलत प्रयोग या  परिक्षण होता है तो दुष्परिणाम सिर्फ वैज्ञानिक को भुकतना पड़ता है पर समाज में यदि किसी प्रकार का गलत सामाजिक प्रयोग होता है तो इसका दुष्परिणाम सम्पूर्ण समाज को भुगतना पड़ता है ,इसलिए ये बहुत जरूरी हो जाता है समाज में आन्दोलन बड़ी ही सतर्कता से किया जाये और पूरी रणनीत तथा तैयारी के साथ ,नहीं तो आन्दोलन का बड़ा ही विनाशकारी परिणाम सामने आता है ,जब समाज में कोई आन्दोलन होता है तो इतिहास साक्षी रहा है उस आन्दोलन में बहुत से ऐसे तत्व भी आ जाते है जिन्हें आन्दोलन की गंभीरता और मुद्दे की सार्थकता से कोई सरोकार नहीं होता वे बस अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा के चलते आन्दोलन में आ जाते हैं और जनता की शक्ति और भावना दोनों का शोषण  करते है ,भारतीय आजादी आन्दोलन भी ऐसे ही अनेक उदाहरणों से भरा पड़ा है मैं नाम ले कर अपने इस लेख से इतिहास के पन्ने नहीं उलटना चाहता ,हर भारतीय जो थोड़ी भी सामाजिक ,राजनीतिक और आर्थिक समझ रखता है उसे इन मतलबपरस्त और अवसरवादियों के नाम मालूम है ,हो सकता है की उसमे भिन्नता हो पर मुझे इस बात का सत प्रतिशत   विश्वास है की हर व्यक्ति कम से कम पांच  नाम तो जरूर गिना ही देगा जो अपनी आर्थिक,राजनीतिक ,और सामाजिक उदेश्यों को लेकर आन्दोलन  में आये और उसका दोहन किया फिर उसे भ्रष्ट करके चल दिए ,परिणाम जैसे की हम सब जानते है की जिस आज़ादी के लिए जनता लड़ रही थी वो उसे नहीं मिल सकी बल्कि मिली तो आजादी के नाम की एक लालीपॉप और उसे नन्हे बच्चे की तरह चूसते रहने का आदेश ,जरा सा भी बड़ा बनने की कोशिश की तो देशद्रोही ,नक्सलवादी ,माओवादी ,आतंकवादी कुछ भी बनाये जा सकते हो ,खैर जो बात मुख्य है वो ये है की आजादी आन्दोलन में भी जो तबका अपने उद्देश्यों को ले कर आन्दोलन में आया था उसने अपने उद्देश्य पूरे किये और जिसके बल पर उसने सामाजिक ,आर्थिक ,राजनीतिक उद्देश्य पूरे किये वो जनता वैसे का वैसे ही कैदी बनी रह गयी,


मेरा सीधा संकेत उस पूंजीपति वर्ग या पूंजीवादी मानसिकता वाले लोगों की तरफ है जो की आजादी आन्दोलन में बड़े ही प्रगतिशील तेवर के साथ आये थे पर बाद में वो भी साम्राज्यवादियों और सामंतों  की भाषा बोलने लगे ,इसलिए मैं अपने राजनीतिक अनुभव के आधार  पर ये कहना चाहता हूँ , की हमें उस व्यक्ति को बहुत ध्यान से सुनना चाहिए जो हमारे भले की बात कर रहा हो ,चूँकि वो ही हमारा सबसे ज्यादा बुरा भी कर सकता है ,और उस व्यक्ति को भी बड़ी ध्यान से सुनना चाहिए जो हमारे खिलाफ बोल रहा है ,क्योंकि उसकी खिलाफत में हमारी कोई भलाई छुपी हो सकती है , न सिर्फ बात ध्यान से सुननी चाहिए बल्कि अपनी पूरी समझ के साथ उसका सामाजिक ,.राजनितिक, और आर्थिक विश्लेषण भी करना चाहिए फिर कहीं जा कर कोई कदम उठाना चाहिए ,हमें कभी नहीं भूलना चाहिए की जो जैसा दीखता है जो वास्तविकता में वैसा ही हो ये जरूरी नहीं है ,और जो जैसा है वो वैसा ही दीखता हो ये भी जरूरी नहीं है ,


अब आंदोलनों पर इतनी बात यदि मैंने लेख की भूमिका में की है तो जरूर मुझे किसी आन्दोलन की विश्लेषण प्रक्रिया में  जाना है आप समझ ही रहे होंगे और इस वक़्त अन्ना से बड़ा और प्रासंगिक आन्दोलन जनता की नज़र में और दूसरा कोई नहीं है क्योंकि  जनता आज वही देखती और सुनती है जो मीडिया उसे दिखाती और सुनाती है,खैर जो भी  हो अन्ना का आन्दोलन जनता और मीडिया का ध्यान खीचने में सफल रहा है ,पर क्या मीडिया और जनता का ध्यान खींच लेने और किसी हद तक उनका तथाकथित समर्थन प्राप्त कर लेने से कोई आन्दोलन सच्चा और सफल आन्दोलन बन जाता है ,तो जवाब है नहीं ऐसा नहीं है ,कोई प्रतिकार ,प्रतिरोध ,या प्रतिवाद आन्दोलन की शक्ल तब लेता है जब उसके नेतृत्वकर्ता और कार्यकर्ता में एकीकर हो ,मेरे कहने का सीधा मतलब ये है की जब आन्दोलन की दिशा और दशा नेता पक्ष और कार्यकर्ता पक्ष दोनों की आँखों में साफ़ हो ,उनकी राय में स्पष्टता हो , उनका आन्दोलन के मुद्दे से सीधा जुड़ाव हो ,और इन सबसे बड़ी बात है की कार्यकर्ता और नेता दोनों ही आन्दोलन के मूल्य समाज में स्थापित करने की प्रक्रिया में सदैव रत हो ,आन्दोलन जिस सामाजिक ,राजनीतिक ,और आर्थिक बुराई के खिलाफ चलाया जा रहा है असके विपरीत अच्छाई को स्थापित करने का प्रयास सतत रूप से जारी हो,तब कही जा कर आन्दोलन को सच्चा और सार्थक कहा जा सकता है .......सफलता के तो दुसरे ही मापदंड है ,जो फिर कभी किसी और लेख में चर्चा करूंगा, फिलहाल आज इस लेख में अन्ना के जन लोकपाल आन्दोलन की सार्थकता और सच्चाई की चर्चा करते हैं ,आन्दोलन के बीच बड़ी तेजी से ये प्रश्न उठाया जाने लगा की अन्ना का आन्दोलन सच्चा है की नहीं ,सार्थक है की नहीं ........मीडिया भी मानो एक अभियान तहत इस पूरी परिघटना में जूट गयी है ,पर इस पर मेरा एक सवाल ये की ये सवाल इतने बाद में क्यों ? क्या ये सवाल पहले नहीं उठाया जा सकता था ? क्या जो दोष टीम अन्ना के ऊपर है वो पहले नहीं मढ़ा जा सकता था ? क्या पहले यही लोग हीरो थे और बाद में जीरो हो गए? सरकार और मीडिया दोनों की नज़र में ?और ऐसे ही कई सवाल मेरे है जो इन सार्थक सवालों के घेरे से उठते है और मीडिया और पूरे सरकारी तंत्र के सर पर जा कर फूटते है पर मेरे सवालों को छोडिये जनता के सवाल की खबर लेते हैं क्योंकि मैं अपने सवालों का जवाब जनता हूँ और वो जवाब बस एक है की ............जनता को गुमराह करने के लिए ...........मुर्ख बनाने के लिए ..............


पर अहम् सवाल अन्ना के आन्दोलन की सार्थकता और सच्चाई का है तो मेरा मानना है की अन्ना का आन्दोलन सार्थक हो या न हो आन्दोलन का मुद्दा जरूर सार्थक है ,और सच्चाई जैसा की सभी जानते हैं की कटघरे में खड़ी है .................आन्दोलन के नेतृत्व में आपसी कलह इस बात को साफ़ करती है की अन्ना की टीम में राजनीतिक महत्वाकांक्षी तत्वों के बीच  घमासान मची हुई है जो की आन्दोलन पर एकाधिकार ज़माना चाह रहे हैं और आन्दोलन की लोकतांत्रिकता को नष्ट करना चाहते है ,वो जनता की कुंठा और रोष को अपनी ताकत बनाने की फिराक में है ,टीम अन्ना चुनावों में पार्टियों पर दबाव बना कर अपनी राजनीतिक शक्ति और सार्थकता बढ़ाना चाहती है न की इससे आन्दोलन की शक्ति और सार्थकता बढ़ाना  ,  इस प्रक्रिया से व्यवस्था परिवर्तन तो बिकुल ही नहीं होगा जैसा की केजरीवाल साहेब कहते है मैं व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई लड़ रहा हूँ ....
जिस तरह एक-एक करके अन्ना टीम की कोर कमेटी से मेम्बर हट रहे हैं ,वो इस बात का परिचायक है आन्दोलन के नेता पक्ष में मतभेद होने के साथ मनभेद भी है,उनमे आपस में आन्दोलन की दशा और दिशा को ले कर कोई साफ़ तस्वीर नहीं है ,और ना ही कोई वैचारिक आधारभूमि जिसपर वो आन्दोलन को टिका कर विश्राम कर सके ,टीम अन्ना ये जानती है की ये आन्दोलन नहीं ये उन्माद और आक्रोश था इसमें विचार की कमी थी ,इसीलिए अगर इसमें देरी की गयी या फिर कार्यकर्ताओं को यूँ ही छोड़ा गया तो वो भाग जायेगा और फिर से उसे घर से बहार निकालने की लिए मीडिया का सहारा लेना पड़ेगा ,इस आन्दोलन पर मेरी इतनी आलोचना का करने का कारण ये है की मैं ये महसूस कर रहा हूँ की इस आन्दोलन में भी बहुत से ऐसे तत्व आ गए है जो जनता के प्रेम ,शक्ति और भावना का शोषण कर रहे हैं , इस आन्दोलन को अब तक जिस स्तर की जो चेतना पैदा करनी चाहिए थी वो चेतना समाज तो छोडिये कार्यकर्ता स्तर के लोगों को भी नहीं हो पाई है ,जो लोग अन्ना के आन्दोलन से जुड़े है वो या तो इसे एन्जॉय कर रहे है ,या दुसरे गाँधी का दर्शन कर रहे है ,या अपनी देश भक्ति प्रूव कर रहे है ,कुछ तत्व ऐसे भी है जो इस आन्दोलन में सिर्फ उन्माद करने के लिए समर्थकों की भीड़ में घुस जाते है ,उन समर्थको ,उन आन्दोलनकारियों में मुद्दे को ले कर कोई समझ और गंभीरता नहीं है ...........कुछ लोग इस पर अक्सर कहते है समर्थकों और कार्यकर्ताओं में समझ और गंभीरता पैदा इतनी जल्दी नहीं होती है ,और वो इतना आसान भी नहीं है ..तो मैं उनसे बड़े ही आदर और प्रेम से कहता हूँ की कोई सार्थक और सफल आन्दोलन भी इनती आसानी और इतनी जल्दी नहीं होता है वो एक सतत संघर्ष का प्रतिफलन होता है न की मीडिया के धक्के से भेजे गए भोले-भाले लोगो की संख्या के दबाव से पास हुए किसी कानून से की उपज .....मुझे इस आन्दोलन से सार्थक तो आदिवासियों ,गरीबों,मजदूरों और किसानों का वो आन्दोलन लगता है जिसमे हर कार्यकर्ता के भीतर गंभीरता ,समझ ,अपनी माँग को ले कर स्पष्टता ,और इन सब से ज्यादा आन्दोलन के मुद्दे से सीधा जुड़ाव होता है ,वो अपने हक के लिए जान तक दे सकता है ,सत्ता के जुल्म सह सकता है पर यहाँ कहने को तो भ्रष्टाचार सभी भारतियों का मुद्दा है पर सभी भारतीय इससे प्रताड़ित होने के बावजूद इस मुद्दे से सीधा जुड़ाव महसूस नहीं करते, कोई माने न माने एक आम आदमी अपनी जमीन के लिए जितनी संजीदगी से लड़ सकता है उतनी संजीदगी से आज की तारिख में वो भ्रष्टाचार के लिए नहीं लडेगा ,मैं आप से पूछता हूँ की जिस तरह का कहर पुलिस सिंगूर और नंदीग्राम के किसान आन्दोलनकारियों के ऊपर कर रही थी क्या उस तरह का जुल्म आज अन्ना के समर्थक सह  सकते हैं ..........मुझे मालूम है आपका जवाब नहीं में है ,तो अंत में मैं यही कहूँगा की अन्ना का आन्दोलन सार्थक और सफल तभी होगा जब उसकी मुख्य ताकत जनता उसके सार्थकता और सफलता के लिए चिंतित होगी ,क्यूंकि आन्दोलन कैसा भी हो मुदा सार्थक है और सफल भी .........और रही बात टीम अन्ना की तो अगर टीम अन्ना इस आन्दोलन को वाकई सफल और सार्थक बनाना चाहती है तो उसे उसे अपनी दशा और दिशा पर पुनर्विचार करना होगा और जनता की  नेतृत्वक्षमता को विकसित कर के उसको मुद्दे से सीधे जोड़ते हुए उसे भी उसकी चेतना के स्तर पर आन्दोलन में सक्रिय भूमिका अदा करने के लिए प्रेरित करना होगा ,ताकि उसका इस मुद्दे से और इस आन्दोलन दोनों से ही सीधा जुड़ाव बन सके ,साथ ही साथ उन तत्वों को पहचान कर आन्दोलन से बहार करना होगा जो व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए आन्दोलन में जुड़े हैं ,इस काम में जनता को पहलकदमी करनी होगी उसे ही इस बात की पहचान करने की कोशिश करनी होगी की कौन सा ऐसा तत्व है जो उनकी शक्ति और भावना का शोषण करना चाहता है 

..............जैसे उदाहरण के लिए जीवन भर व्यक्तिवादी प्रेम पर आधारित ,व्यवसायिक कविता पढने वाला कवि यदि जनता का कवी और नेता बनने का दावा या कोशिश करने लगे तो जनता को इसको यूँ ही नहीं लेना चाहिए उसी वक़्त से उसे उस व्यक्ति विशेष ही नहीं पूरे आन्दोलन को पैनी निगाह से विश्लेषित करना चाहिए और यही प्रक्रिया सतत जरी रहनी चाहिए जब तक की आन्दोलन सार्थक और सफल न साबित हो जाये ,क्योंकि अगर जनता जरा सा भी चूकी तो हनन उसी का होना है .................
                                   तुम्हारा --अनंत

ये लेख प्रवक्ता में प्रकाशित है ...........

लिंक प्रवक्ता डाट काम ०:-http://www.pravakta.com/archives/31995
                    

Saturday, October 29, 2011

श्री लाल शुक्ल की मृत्यु से जन्म लेते कुछ सवाल

खबारों की खाख छानते हुए लगभग हर अखबार में मुझे एक तीखी आँखों में गड़ने वाली सच्चाई मिली की  सामंती बन्धनों ,राजनीतिक दंशों और रुढियों के खिलाफ अपनी कलम को हथियार बना कर लड़ने वाले, जुझारू आम आदमी की पीरा को स्वर देने वाले महान व्यंगकार ''श्री लाल शुक्ल ''के निधन की खबर से वो आम आदमी ही बेखबर था जिसके हकों की लड़ाई वो अपने साहित्य में जीवन भर  लड़ते रहे,लेकिन बात सिर्फ इतनी ही होती तो मैं इतना गंभीर न होता न ही इसे लेकर लिखने बैठ जाता, कभी लखनऊ की पहचान  कहलाने वाले''श्री शुक्ल ''अपने ही शहर में इस कदर बेगानियत के साथ रुखसत होंगे मैंने कभी नहीं सोचा था , आम आदमी अपनी ही समस्याओं से जुडी अभिव्यक्ति से इस कदर कैसे कट गया है ,कैसे वो उन लोगो से कट गया है जो उनके सारोकार की बातें करते हैं ,तो जवाब है ये आधुनिक पूजीवादी व्यवस्था में ऐसा एक साजिश के तहत हो रहा है , जनता की शक्ति दिग्भ्रमित है ,उसे अपने वास्तविक चरित्र का पता नहीं चल पा रहा है ,वो किस वर्ग में आती है ,उसे अपने हितों की रक्षा किस वर्ग से करनी है ,वो किस वर्ग संस्कृति की है ,कौन सा कला-वर्ग उसके अभिव्यक्ति  को स्वर दे रहा है ,वो ये निर्धारित करने में असफल महसूस करती है ,आज बाज़ार के धक्के ,विज्ञापन की खीच-तान,व्यर्थ जरूरतों के दबाव ,और अनगिनत सपनों की रंगीनियत में उलझा हुआ, बेजार सा,भटका हुआ,आम आदमी उन्हें ही अपना हीरो समझ बैठता हैं जिन्हें ये मीडिया कहती है दिखती है ,वो उस वर्ग का पोषक बन बैठता हैं जो उसका शोषक है ,वो सलमान के ठुमके पर जान लुटा देता है ,कटरीना के सौन्दर्य की चर्चा देश के हालातों से ज्यादा करता है ,और भूल जाता है हासिये पर बैठे उन लोगों को जो हंसिये की लोगों के कलाकार ,नेता ,शुभचिंतक है ,और उनके हितों को लड़ने वाले हैं ,ये उस व्यवस्था(पूंजीवादी व्यवस्था ) का चरित्र ही है की उन्हें अकेला कर दो  जो उसके  खिलाफ लड़ रहे है ,ताकि उस जनता की आवाज़ ही न उठ सके जिसका उसे शोषण करना है ,निराला , मुक्तिबोध नागार्जुन ,अज्ञेय ,पाश ,त्रिलोचन ,धूमिल ,कात्यायनी , रघुवीर सहाय ,केदारनाथ अग्रवाल और ऐसे अनेक नाम है जिन्होंने आम जनता की आवाज़ हो बुलंद किया ,उसे प्रखरता से राजनीतिक -सामाजिक पटल पर  रखा पर अफ़सोस की वही आम जनता इनके योगदान से अनभिज्ञ है उसे इनके जीवन संघर्ष तो छोडिये नाम तक नहीं मालूम है ...........तब आप ही बताइये क्या इस बात की जरूरत नहीं की हम इस बात का विश्लेषण करें की ऐसा क्यों होता जा रहा है की आम आदमी की लड़ाई लड़ने वालों का आम आदमियों से कोई जुड़ाव नहीं बचा हैं ये  हमारी यानि जनपक्षीय लोगो की हार है क्यूंकि  हमारी सबसे बड़ी ताकत जनता ही है हमें उससे सीधा संवाद स्थापित करना ही होगा ,उस संस्कृति को बचाना होगा, उस कला को बचाना होगा ,उस नेता को बचाना होगा ,और उस कलाकार को बचाना होगा जो जनता की लड़ाई लड़ता है ,हमे उन्हें अकेला नहीं पड़ने देना है ,हमें खुद ही ये निर्धारित करना है कि हम किस वर्ग में आते हैं ,हमारी कला कौन  सी है  हमारी संस्कृति कौन सी हैं  ,हमारे कलाकार कौन से है ,आज के इस घोर पूंजीवादी युग कम से कम इतनी वर्ग चेतना का होना तो बहुत जरूरी है वर्ना धीरे-धीरे जनता के लिए लड़ने वालों कि तादाद घटती जाएगी और एक समय ऐसा आएगा कि बकरी का रखवाला खुद शेर होगा तब कितनी दिन तक  बकरी बचेगी ये जनता समझ ही सकती है
                                                                                         तुम्हारा -अनंत

Saturday, October 15, 2011

जीवन उत्सव है



अबकी बार त्योहारों पर घर जाते समय पसेंजेर  ट्रेन से घर जाना पड़ा ,खाचा-खच भरी इस ट्रेन में एक किनारे दबे हुए खिड़की पर भागते  पेड़ों, खेत, खलियानों, किसानो, मजदूरों को देखते हुए एक ख्याल दिल में आया था कि इंडिया में कॉमन मैन कि लाइफ और इस पसेंजेर ट्रेन में कितनी सिमिलर्टी हैं. जब वो  किसी छोटे स्टेशन पर बड़ी देर तक रूकती तो न जाने क्यों ऐसा  लगने लगता कि मानों कोई कॉमन मैन अपनी किसी छोटी जरूरत के लिए बड़ी देर तक किसी लाइन में खड़ा हो ,पसेंजेर ट्रेन कि तरह ही कॉमन मैन रुकता, थकता ,अपने से तेज रफ़्तार वालों को पास देता डेस्टिनेशन पर पहुचने के लिए उतारू रहता हैं.जोर लगा के हईसा ! वाली स्टाइल में देश भर का बोझ अपने कंधे पर लादे एटलस कि तरह चलता ये कॉमन मैन दर्द में भी हँसने का बहाना ढूढ़  ही लेता हैं शायद यही कारण हैं कि इंडिया में जहाँ 80 -85 % लोग कॉमन मैन कि कटेगरी में आते हैं, हसने-मुस्कुराने, खेलने-खिलखिलाने का  कई मौका हैं और हर मौका एक त्यौहार. तभी तो हमारे देश को त्योहारों का का देश कहा जाता है,

यहाँ खेतों में नयी फसल उगे, या पेड़ों पर नए  पत्ते लगें मौसम बदले या फिर गृह नक्षत्र के चाल में कोई परिवर्तन हो हम उसे त्यौहार कि तरह मनाते हैं. हर देवी-देवता, कथा-कहानी ,अनाज, अग्नि, वृक्ष, कृषि, पशु, ऋतू, के साथ कई-कई त्यौहार जुड़े हुए हैं, बच्चे के जन्म  से ले कर मृत्यु तक हर कर्मकांड, संस्कार, और रश्म हम उत्सव की  तरह मनाते हैं. हमारे देश में त्यौहार रिश्तों में एक नयी उर्जा भरते हैं ,यहाँ हर रिश्ते के लिए त्यौहार है ,पति के लिए करवाचौथ तो भाई के लिए भैया दूज और रक्षाबंधन, माँ-बहन के लिए तीज तो बच्चियों के लिए नवरात्र पूजा ,पुत्र के लिए आहोई व्रत और ऐसे ही कई बड़े छोटे कई त्योहारों की चेन हैं,

हमारे आस-पास हमे हमारे जीवन से जुड़ा जो भी दिखा ,हमने उससे रिश्ता बना लिया और उस रिश्ते को जीवंत रखने के लिए उसे हमने त्योहारों से जोड़ दिया , चाहे वो घर का जानवर ही क्यों ना हो ,तभी तो हम गाय  के बछड़ों के लिए भी '' बछ्वारस'' जैसे त्यौहार मानते हैं, पीपल, बरगद, और नीम को देवी देवता मान  कर पूरे देश में करमा, वट सावित्री , शीतला सप्तमी जैसे सैकड़ो  त्यौहार मनाये  जाते हैं.
विविध रंगों के इस देश में विविध रंग के त्यौहार मनाये जाते हैं जो जीवन के रंगों से भरपूर हैं, ये उत्सव ही है जो थकी हारी जिन्दगी के सिरहाने खड़े  हो कर जब मासूम बच्चों कि तरह मुस्काते हैं तो जिन्दगी का पोर-पोर हँस पड़ता हैं, ये त्यौहार आम आदमी की  बिखरी हुई जिन्दगी को बड़े ही सलीके से समेट कर  उसे अपने परिवार, रिश्ते-नातों , समाज और प्रकृति से जोड़ते हैं. ये उसे  मशीनी पुर्जा बनने से रोकते हैं, उसे उत्साह, संकल्प,और उर्जा से भर  देते हैं, भावना, वेदना, और संवेदना जैसे मानवीय मूल्यों  को जगाते हैं,

लेकिन आज आधुनिकता की तेज चटख रंग के आगे त्योहारों का रंग दब सा गया हैं, गाँव की  मट्टी की  खुशबू से ले कर रिश्तों की  गर्माहट तक सब कुछ कम पड़ने लगा  है आज दिवाली पर  घर में दिये की  जगह चाइनीस बल्ब ने ले ली हैं, मिलने-मिलाने की  परंपरा को फेसबुक और फ़ोन ने खा लिया हैं नाटक, नौटंकी, स्वांग, लोकगीत और जीवंत लोककलाओं को टी.वी.,फिल्मों और फूहड़ गानों ने हासिये पर धकेल दिया हैं .दिया ,कुल्ल्हड़ ,बतासों ,कपास, मिठाई, रंगाई, पोताई,  के नदारद होने कि वजह से कुटीर उधोग और आर्थिक सामाजिक रूप से पिछड़ों को भारी  धक्का लगा है,
आज जब गोवर्धन पूजा, बछ्वारस, जैसे त्यौहार लगभग ख़त्म हो गए हैं, हम गयो भैसों को अक्सिटोंसिन (इंजेक्शन) दे कर उनके तन से दूध के साथ चर्बी और प्रोटीन तक खींच लेना चाहते हैं बछड़े की पूजा तो  छोडिये, हम उसे भूखा मार कर उसकी खाल में भूसा भर के  गाय-भैसों की भावना तक दूह लेते हैं .....यही काम आज हमने खेत खलियान नदी, पहाड़,  जल, जंगल, जानवर और जिन्दगी के साथ भी जारी कर दिया है, आज  इंसानों में रिश्तों को ले कर जो गंभीरता होनी चाहिए वो नहीं दिखती हर रिश्ते  की नीव में लालच हैं,
मोहल्ले गाँव के वे छोटे उत्सव परम्पराएँ  जैसे कुआं-पूजन, धूरा-पूजन, जलझूलिनी, नाग पंचमी,  बिसौला, अन्नकूट,गोवर्धन पूजा, और न जाने ऐसे कितने छोटे-छोटे पर सार्थक और महवपूर्ण त्यौहार इस आधुनिकता ने ख़तम कर दिये हैं,
  
यही सब कुछ सोचते हुए मैं कॉमन मैन्स की उस कॉमन ट्रेन से आखिर अपने शहर पहुँच ही गया और घर जाते हुए रिक्शे पर बैठे हुए मन ही मन ये बुदबुदाता गया की अगर इंसान को इंसान बन कर रहना हैं तो कम से कम उसे इन त्योहारों को बचा कर रखना होगा और इन्हें आधुनिकता से दूर प्रकृति की गोद में बैठ कर मानना चाहिए ...........न जाने मुझे ऐसा क्यों लगा की मैं कोई ज़ज हूँ और मैंने किसी मुक़दमे का फैसला सुनाया हो .........लो मेरा घर आ गया मैं जा रहा हूँ

ये लेख आई- नेक्स्ट (दैनिक जागरण) में प्रकाशित हुआ है
लिंक :-http://inextepaper.jagran.com/68495/I-next-allahabad/16.11.12#page/11/2

Sunday, September 11, 2011

बाबू साहब ये हिन्दुस्तान है !,यहाँ गरीबों को इंसान नहीं समझते ....

अपने बनवारी लाल जी यूँ  तो मो० कैफ की  तरह आऊट आफ फार्म रहने वाले आदमी हैं। पर भईया जब एक बार उनकी जुबान चल गयी यकीन मानिए आपके दिमाग को लार्ड्स बना डालेंगे और शब्दों के ऐसे छक्के-चौके  लगाएंगे कि सपनों की सेंचुरी होते देर नहीं लगेगी। उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप LBW. हो रहे है  या फिर रन आऊट।  वो तो बस खेलने में मस्त रहेंगे, बात एक्चुली ये है की बनवारी लाल जी शिव खेडा, राबिन शर्मा सरीखे मोटिवेशनल गुरुओं से काफी प्रभावित है। तभी तो उन्हें जब भी मौका मिलता है मोटिवेशन करने लगते ये भी नहीं देखते की सामने वाला मोटिवेट होना  भी चाहता है कि नहीं, अभी कल की ही बात लीजिये, एक भिखारी चला आ रह था।  उस बिचारे  से  भूल  से ये भूल  हो गयी कि उसने बनवारी लाल जी से एक रुपया मांग लिया।  फिर क्या था बनवारी लाल जी के भीतर का शिव खेड़ा जाग उठा और वो शरू हो गए वैसे ही जैसे पंडित जी मंत्र पढ़ते है। अरे वृद्ध भिक्षुक! तुम प्रमाद में डूबे हो और धन के इक्षुक हो,पर यकीन मानो ये हाँथ जिन्हें तुम दूसरों के सामने फैलाते हो . ये दूसरों को दान देने के लिए बने है। तुम जिन आँखों को लोगों के सामने झुका कर बात करते  हो, वो गगन के पार देख सकती हैं। तुम्हारे एक इशारे पर धरती पताल एक हो सकते हैं। तुम मनुष्य हो, असीम संभावनाओं के स्वामी हो, तुम अग्नि, जल, आकाश, पर राज कर सकते हो , तुम अजर हो, अमर हो, विजेता हो, शक्तिपुंज हो, तुम यदि चाहो तो प्रदानमंत्री, राष्ट्रपति,......कुछ भी बन सकते हो।  अब्राहम लिंकन से अब्दुल कलाम तक लाखों उदहारण है,जो तुम्हे आगे बढ़ने के लिए कह रहें हैं। ध्यान से सुनों अपनी धड़कनों को, वो तुमसे कुछ कहती है, तुम सब कुछ बदल सकते हो, तुम महान हो।  हे भिक्षुक!  तुम इंसान हो, भिखारी पहले तो संजीव कुमार की  तरह लुटा पिटा  खड़ा रहा, फिर देवानंद की  तरह हिल कर, नाना पाटेकर की  स्टाईल में बोला, ये भाषणबाजी अमेरिका जैसे देश में देना शिव खेड़ा साहब! ये हिन्दुस्तान है, यहाँ गरीबों की  धड़कन सिर्फ  एक चीज़ कहना जानती है वो है ''रोटी'' उसे इसका नाम रटने से फुर्सत मिले तो कुछ और कहे,  आपकी सारी बात इंसानों पर लागू होती हैं, वो इंसान जो आपकी (शिव खेड़ा ) महंगी किताब खरीद सके और उसे अपने  इंसान होने पर यकीन हो सके, ''पर बाबू साहब ये हिन्दुस्तान है !,यहाँ गरीबों को इंसान नहीं समझते .........
                                           तुम्हारा --अनंत 

Thursday, September 8, 2011

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं ''

                                   '' सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं ''
                                  '' मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए ''
    
कुछ यही स्वर थे रामलीला मैदान में बैठे रालेगन सिद्धि के उस आम आदमी के ,जो आत्महनन के रास्ते जनसंवेदना तक पहुंचना चाहता  था , पर जब व्यक्तिगत   तौर पर मैं  ये तलाशने निकलता हूँ की क्या आधारभूत कारण  है जो समाज में भ्रष्टाचार एक सचाई की तरह व्याप्त  हो गया है ,हमने इसे अपने जीवन का हिस्सा मान लिया है ,तब मुझे इस सच्चाई के नींव  में एक सच बैठा दिखता  है वो है हमारे भीतर सवेदना और दायित्व बोध का सतत क्षरण ,तभी तो एक अफसर  किसी गरीब के दवाई के पैसे से भी रिश्वत मांग लेता है ,राशन वितरक  भूंखे बच्चों का पेट काट  कर राशन की काला  बाजारी करता है ,सड़क पर चलते हुआ नवजवान ये भूल जाता है ,की उसकी बहन भी घर से अकेले बहार निकली होगी ,कालेजों में नशा करते ,अय्याशी करते छात्र ये भूल जाते हैं की माँ बाप की आँखों में कुछ सपने पल रहे होंगे , संसद और विधान मंडलों में जाने के बाद जन प्रतिनिधि जनता  को भूल ही जाता है ,उसकी भावनाओं का मजाक उड़ाता है, सदन में  जूते उछाले जाते हैं , गलियाँ दी जाती है और संसद की  गरिमा को ठेस पहुंचाया  जाता है ,जब समाज में   इस तरह का घन घोर अँधेरा छाता है  ,तब कहीं जा कर किसी आन्दोलन कि जमीन तैयार होती है और वो आन्दोलन जनता के साथ जुड़ता है, उसकी आवाज़ को बुलंद करता है ,जैसा कि हम सभी जानते है कि समाज की  दशा और दिशा बहुत हद तक सत्ता और व्यवस्था के हांथों निर्धारित होती  है और जनता के भीतर भी  स्वेच्छा या अनिच्छा से सत्ता और व्यवस्था  के  लक्षण परिलक्षित होते है पर आन्दोलन इस चुप्पी को तोड़ने का काम  करता  है, जनता में व्याप्त  सामाजिक और राजनीतिक बुराई को दूर करने का करने का काम करता है , तभी जा कर ये आन्दोलन सही अर्थों में जनांदोलन कहलाता है वरना ये मात्र  एक प्रदर्शन बन कर रहा जाता है ,जिन महान आदर्शों को ले कर आन्दोलन चल रहा है ,सब से पहले ये आदर्श आन्दोलन के कार्यकर्ताओं के द्वारा आत्मसात किया जाना चाहिए ,चूंकि आत्मपरिवर्तन  के बिना जगपरिवर्तन  कि प्रक्रिया सफल हो ही नहीं सकती, मेरा आन्दोलन  के आधारभूत लक्षणों पर चर्चा करने का कारण ये है कि  ,जब अन्ना का कथित जन आन्दोलन चरम पर था, रामलीला मैदान में जीत का  जस्न मनाया जा रहा था तभी वहां आन्दोलनकारियों के द्वारा पानी कि बोतलें , चाय नाश्ते कि दुकान ,और फूटपाथ पर दुकान वालों कि दुकानें  लूटी जा रही थी , इस तरह कि घटना से आन्दोलन और आन्दोलन का नेतृत्व दोनों कटघरे में आ जाते है ,और जनांदोलन कि संज्ञा पा चुका आन्दोलन जन भावनाओं पर अघात करता हुआ नज़र आता है ,तब ऐसी स्थिति  में ये जरूरी हो जाता है कि अन्ना आन्दोलन के आदर्श को ले कर जनता के बीच  जाएँ  ,और उनसे उनके सच्चे ,सार्थक ,और रचनात्मक समर्थन कि मांग करे ,ताकि ये आन्दोलन अपनी आधारभूत कसौटी  पर सही उतर सके ,और उनके आन्दोलन में सही और सच्चे कार्यकर्ता  जुड़ सके .न कि मीडिया के द्वारा उतेजित किये गए लोग ,जिन्हें ये भी नहीं मालूम है  कि वो  किसलिए रामलीला के मैदान में आये है ,लोकपाल किस बला का नाम है ,और जो सिर्फ रिश्वत को ही भ्रष्टाचार समझते हैं  ,उनसे आन्दोलन को सार्थक अंत तक पहुंचाने कि उम्मीद भी निरर्थक है ,मेरा मानना है कि  आन्दोलन तभी जन आन्दोलन बन पायेगा जब इस आन्दोलन के कर्यकर्ताओं में सामाजिक और राजनीतिक समझ होगी ,वे फसबुक और ट्विटर पर लिख कर ,झंडा लहरा कर नहीं बल्कि  जनता के बीच जागरूकता , सवेदना ,और दायित्व बोध जगा कर आन्दोलन करें ,देशभक्ति दिखाएं , तथा  कथित देश भक्ति कि गंगा में हाँथ धुलने के बजाय  सच्चे  परिवर्तन कि गंगा को उतरने वाले भागीरथ बनने के लिया तैयार रहें  , वो ये न कहे कि'' अन्ना तुम संघर्ष करो हम तुम्हारे साथ हैं ''बल्कि कहें ''अन्ना हम सब मिल संघर्ष करें हम सब एक दूजे के साथ है '' 

                                                                तुम्हारा -- अनंत

मैं तो अब बस अन्ना बनना चाहता हूँ ,


अभी कुछ दिन  पहले शिक्षक दिवस बीत गया ,शिक्षक बोले तो question दागने का टैंक ,जो जहाँ मिलता है'' दे भन्न से '' के अंदाज़ में  question दाग देता है  ,मगर अपने बनवारी लाल जी के बच्चे के क्या कहने , और हो क्यों न , बनवारी लाल जी ने  उसका नाम ही महान लाल रखा है,यूँ तो कक्षा  दो में पढ़ते है महाशय, मगर किसी दार्शनिक से कम नही है . अब अगर ऐसे महान दार्शनिक विचारों के छात्र से कोई साधारण छात्रों  वाला प्रश्न  पूछेगा तो आप समझ ही सकते हैं कि उसके दिमाग  की दही बनने में कितनी देर लगेगी ,शिक्षक दिवस के पावन  अवसर पर एक ऐसा ही साधारण प्रश्न  महान लाल से पूछ लिया गया कि ''तुम बड़े हो कर क्या बनोगे ''फिर क्या था महान लाल किसी महान उत्तर की तलाश में कुछ देर चुप रहा फिर एक काव्यात्मक  उत्तर दिया ,कि गुरुवर! ,
अब न डॉक्टर बनना है न  इंजीनियर 
न प्राइममिनिस्टर ,  न गवर्नर ,
अब नहीं लुभा पाते  मुझे धोनी और तेंदुलकर ,
अब न अमिताभ बच्चन बनना है ,
न राजेश खन्ना बनना है ,
मेरे दिल में तो बस अन्ना बनने कि तमन्ना है ,

हाल तालियों से गूँज उठा कि तभी शिक्षक ने जोर से पुछा, क्यों ? महान लाल ने कहा :- गुरु जी ! अन्ना सर्वशक्तिमान और परम कल्याणकारी हैं। उन्हें छोडिये  उनकी टोपी इतनी शक्तिशाली है कि परम शक्तिमान नेता गण और अनंत शक्तिमान संसद भी उससे डरती है ,आप अन्ना की वो चात्मत्कारी टोपी पहन लीजिये फिर चाहे गाड़ी पर तीन सवारी बिना हेलमेट के चलिए, या फिर झंडे का अपमान करिए, सरकारी राशन की दूकान पर कालाबाजारी करिए, फर्जी चंदा उसूलिये, दिल्ली की सड़कों पर बिना डर के मूत्रदान करिए, ये टोपी इतनी महान है कि इसे पहन कर यदि आप दारू भी पियेंगे तो आपके मुंह से गाली नहीं ''इन्कलाब जिंदाबाद'' निकलेगा और आप आराम से रामलीला मैदान में रात भर कैंडल डांस एन्जॉय कर सकेंगे ,अन्ना तो कलयुग के भागीरथ है जिन्होंने देशभक्ति की नयी गंगा देश में बहाई (वरना लोग तो  टीम इंडिया की जीत  से निकलने वाली देशभक्ति की गंगा से बोर हो गए थे टीम अन्ना की जीत ने मुंह का स्वाद बादल दिया) जिसमे कई भ्रष्टाचारियों  और देशद्रोहियों को अपने तन की कालिख को धुलने  में मदद की, वो भी किसी खास प्रक्रिया में उलझाए  बिना, .करना कुछ नहीं था बस ''अन्ना तुम संघर्ष करो ,हम तुम्हारे साथ हैं'', का नारा लगाया और हो गया  रंग काले  से बसंती।  ठीक किसी कपडा धुलने वाले साबुन के प्रचार की तरह रोचक और सरल, अब आप ही बताइए गुरु जी! जो इंसान भगत  सिंह की कुर्बानी का रंग एक डुबकी में चढवा सकता है, वो कितना महान है और मै ऐसे तो महान  हूँ ही, वैसे भी महान  बनना चाहता हूँ।  इसीलिए हे  गुरु जी! मैं तो अब बस अन्ना बनना चाहता हूँ , सर्व शक्तिशाली अन्ना जो........................... 

                                                                            
                                     तुम्हारा--अनंत