Monday, November 14, 2011

हर सवाल जरूरी है ....................

लोगों को रास्ते में चलते वक़्त रुपए ,पैसे, या सामान गिरे मिले होंगे पर मुझे एक अजीब चीज़ मिली है '' किसी छोटे बच्चे की हैण्डराइटिंग में लिखा एक कागज का टुकड़ा ''उस टुकड़े में कुछ सवाल लिखे हुए थे, मसलन जिन्दगी क्या है ? ,तुम कहाँ जाना चाहते हो ?,तुम क्या बनना चाहते हो ?,तुम किसके लिए जी रहे हो? तुम्हारी कमजोरी और ताकत क्या-क्या  है ?,और बहुत सारे ऐसे ही सवाल...... 

हम  सभी के भीतर सवालों से भागने की एक अजीब टेंडेनसी होती है  चाहे बचपन में क्लासरूम में तेअचेर के सवाल हो ,जवानी में लोकतंत्र और सामाजिक जिम्मेदारी की सवाल हो या फिर बुढापे में जिन्दगी के हिसाब किताब के सवाल ,लाइफ के हर पड़ाव पर बस हम सवालों से भागना चाहते है पर उर रोज मैं उन सवालों से भाग नहीं पा रहा था और बार-बार मन गुलज़ार का लिखा मासूम फिल्म का गाना गुनगुना रहा था '' तुझसे नाराज नहीं जिन्दगी ,हैरान हूँ मै ,तेरे मासूम सवालों से परेशान हूँ मैं''...देखने में ये सवाल कितने सरल से लगते हैं पर सिरिअस हो कर सोचिये ये किनते गहरे सवाल हैं ,इन सवालों की उलझन ने  न जाने कितने कवि ,लेखक,रंगकर्मी ,क्रांतिकारी ,वैज्ञानिक ,दार्शनिक ,और कलाकारों को जीवन बहर उलझाए रखा ,लेकिन उनकी उसी उलझन और आत्मयुद्ध  से जो कुछ  दुनिया को मिला उसने दुनिया के अर्थ ही बदल दिए ,चाहे शेक्सपियर का नाटक हो या फिर एडिसन का बल्ब ,भगत सिंह की कुर्बानी हो या फिर अन्ना की सामाजिक क्रांति इन सब के पीछे उन्ही सवालों की उलझन को महसूस  किया जा सकता है ,इन सवालों की एक खास बात होती है की जो भी इन्हें हल करने की कोशिश करता है ये उसे कुछ ख़ास बना देते हैं ये सवाल अपने भीतर असीम विनाश और सृजन की संभावनाओं से युक्त होती है ,इतिहास गवाह है कि गली कुचे कि खाक छानने वाले इन्ही सवालों पर सवार हो कर सत्ता के गलियारे तक पहुंचे हैं ,और विलासिता कि ऊँचाइयों से कष्ट कि पराकाष्ठा तक लोगों को यही सवाल ले कर आये हैं , २०वीं शताब्दी के दुसरे दसक  तक जर्मनी कि गलिओं में भूँखा टहलने वाला ''हिटलर'' तीसरे -चुठे दसक तक विश्व का सबसे ताकतवर तानाशाह हो जाता है वहीँ बहरत जैसे गुलाम देश में सर्वोच्च प्रशासनिक परीक्षा '' ICS '' पास करने के बाद भी सुभाष चन्द्र बोस क्रांति के लिए कष्टमय जीवन चुनते है ,


आज इन  सवालों से जो सबसे ज्यादा परेशान है वो है हमारा यूथ ,फेसबुक  और ट्विटर पर उसके दोस्तों और जानकारों कि संख्या हज़ारों में है पर एक कन्धा ऐसा नहीं जिस  पर वो अपनी तन्हाई टिका सके ,अपने अश्क पोछ सके , भीड़ में तन्हाई झेलता ये यूथ ,एक तरफ कैरियर और भौतिकता के सवालों में उलझा हैं ,तो दूसरी तरफ समाज में फैले विसंगतियों के सवाल उसे परेशान  किये हुए हैं एक ओर उसकी खुद कि ख़ुशी है तो दूसरी ओर माँ बाप के एक्सपेक्टेशन और सोशल रिस्पोंस्बिल्टी ,कुल मिलाकर जिन्दगी जीने कि फ़िराक में वो जिन्दगी के खोता जा रहा है ,आज उसके सिने में बची है तो कुछ साँसे ,कुछ सपने ,उसके पास बचे हैं कुछ रिस्ते ,कुछ उम्मीदें औरवो खुद  इन सब को पूरा करने कि मशीन बन गया है ,

काहिर इन सब सवालों से जो एक एंटी सवाल निकलता है वो ये है कि ये कौन है जो हर वक़्त हमसे सवाल करता रहता है ,हमे उलझाए रहता है हमे परेशान करे रहता है तो उसका जवाब है हमारी चेतना ,ये हमारी चेतना ही है जो हर वक़्त जिन्दगी के सही मायने मायने ढूँढती फिरती है ये चेतना सिर्फ सांस लेने को जिन्दगी नहीं मानती ,आज झूठे जशन और जी.डी.पी. ग्रोथ के झूठे आंकड़ो में ये चेतना कही खोटी जा रही है तभी तो हम कुछ जरूरी सवालों से भी दूर होते जा रहे हैं .............एक बात बाताऊं मुझे लगता है कि वो छोटा बच्चा मेरी चेतना ही थी जिसने मेरी राह में इन सवालों को लिख कर फेंक दिया था ........... 

30/09/2011 को i-next (दैनिक जागरण )में प्रकाशित .........





                                           तुम्हारा --अनंत 




                                      
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