Sunday, March 23, 2014

ई लहरिया चुनाव है भईया !!

साल 2014 का चुनाव कई मायनों में याद किया जायेगा. ये वो समय है जब देश में अपनी लहर बहा रहा नेता 'सुरक्षित सीट खोजो अभियान' का प्रणेता बना हुआ है और पार्टी अध्यक्ष के साथ मिलकर अपने ही खेमे के नेताओं को एक एक कर के ध्वस्त कर रहा है. वो जनता है कि चुनावी लड़ाई के बाद उसे इनसे लड़ना पड़ेगा सो इससे बेहतर है कि पहले ही इन्हें परास्त कर दिया जाये.

इस लड़ाई में एक तरफ औसत राजनितिक कद के राजनाथ सिंह हैं. जो अध्यक्ष पद पर बैठेकर शक्ति संपन्न है और अटल के अभेद्य किले से चुनावी लड़ाई लड़ने जा रहे है. तो दूसरी तरफ भारतीय राजनीति की भाषा और व्याकरण बदल देने वाले युग पुरुष अडवानी हैं. वही अडवानी जिसने "जय श्री राम" के नारे से देश की राजनीती और हिंदू मानस का चेहरा रँग कर भगवा कर दिया था. आज उसी आडवानी का चेहरा संघ के भगवा लाल मोदी ने बेरंग कर छोड़ा है.कहने के लिए तो इस राजनीति के योद्धा ने अपने नाम से पूरा एक युग जिया है पर आज अपनी ही पार्टी में अपनी पसंद की एक अदद सीट के लिए तरस रहा है. बात अनुशासन और पार्टी के नियम की होती तो भी ठीक था, बात आतंरिक राजनिति में पछाड़ खा कर चित्त होने की है. जिसे आडवानी ने लंगोट बंधना सिखाया था उसीने आज अडवानी को चारो खाने चित्त कर दिया है. अहमदाबाद ने हिरेन पाठक की सीट बचाना तो छोडिये. अडवानी भोपाल की सीट से लड़ने का हट भी छोड़ आये. जुबान में चाहे जो भी रहा हो, उनके दिल में, बड़े बेआबरू हो कर तेरे कुचे से हम निकले, वाला ख्याल रहा होगा. 

नरेन्द्र मोदी की लहर की लहर ने गैरों को अपनों के खेमे में और अपनों को कहीं का न छोड़ने का काम शुरू कर दिया है. अडवानी से लेकर जसवंत सिंह तक की कतार जो लाल जी टंडन, कलराज मिश्र, विनय कटियार, उमा भारती जैसों से भरी पड़ी है, मोदी लहर में बह गयी और मुख्यधारा से बह कर हासिये पर पहुँच गई. पर इसे सत्ता की लालच में उपजी मजबूरी कहें या लोकतंत्र की विडम्बना, जो मुख्यधारा के पुरोधाओं को हासिये पर खड़े हो कर मुस्काते हुए मनो मंत्र का जाप करना पड़ रहा है. अपनों को अपने ही खेमे में जिस लहर ने धाराशाही किया उसी लहर ने विरोधियों को अपनों के खेमे में ला कर पटक दिया है और जसवंत सिंह जैसे लोग नई पार्टी और पुरानी पार्टी की थियरी देने लगे हैं. 

मनुवाद का झंडा बुलंद करने वाले संघ की संतान बीजेपी की गोद में जब रामदास अठावले, राम विलास पासवान और उदित राज जैसे लोग बैठे तो आवाज उठी कि नमो लहर ने खाइयां और दूरिय पाट दी हैं. भीम सेना ने संघर्ष और प्रतिरोध का नीला झंडा छोड़ कर भगवा बुलंद कर लिया है. इसीबीच एक वरिष्ठ पत्रकार और सेकुलर कांग्रेसी पूर्व संसद भगवा ओढते हुए दिखे. पत्रकार एमजे अकबर ने जब कमल के फूल का गुणगान करना शुरू किया तब  वो एक पत्रकार नहीं एक मुश्लिम चेहरा बन गए. जो नमो मंत्र का जाप कर रहा है. ताकि देश स्थिर बना रहे और उसकी प्रगति सुनिश्चित की जा सके.

गैरों को अपना बनाने वाली और अपनों को गैर कर देने वाली इस नमो लहर का क्या होगा ये एक रहस्य है. जो भावी चुनाव के गर्भ में विश्राम कर रहा है. पर इतना तय है कि इस लहर में कई लहर है और हर लहर की अपनी अलग राजनीति है. इस सतरंगी नमो लहर में कौन सी वाली लहर जीतती है, देखना दिलचस्प होगा. 

लहरियों के लहरिया, राजनाथ ने इस नमो लहर में अपनी हिस्से की भी नमो लहर छोड़ रखी है. जो तब उभर कर सतह में आएगी जब मोदी 220  या उससे कम सीट पाएंगे. तब राजनाथ इस छुपी हुई लहर पर सवार हो कर सतह पर प्रकट होंगे और मोदी का शिकार, ये कह कर करेंगे कि देखिये लहराधिपति ! आपके सांप्रदायिक होने की वजह से गटबंधन नहीं हो पा रहा है इसलिए आप नेपथ्य में संभावनाएं तलाशिए. मैं मंच पर नायक की भूमिका में आता हूँ. आडवानी, यशवंत सिंह की तरह नहीं रूठ रहे क्योंकि उन्हें लगता है कि जब मोदी की लहर से राजनाथ लहर टकराएगी तब वो वरिष्ठता की  लहर पर सवार हो कर गद्दी पर जा चढेंगे. इधर अरुण जेठली ने भी नमो लहर में अपने हिस्से की लहर मिला दी है. इस लहर के भागीरथी, प्रकश सिंह बादल हैं. जिन्होंने पंजाब की रैली में जेठली के उपप्रधानमंत्री होने कि घोषणा कर दी. बीजेपी इस बार मनो लहर पर चुनाव लड़ रही है और वो अब लहरिया पार्टी बन चुकी है. जहाँ नेता नहीं हैं बस लहरें हैं. हर नेता एक लहर है और हर लहर एक नेता. सब लहर इस समय रूप बदल कर नमो लहर बनी हुई हैं, सही समय पर अपना असली नाम और चेहरा उजागर करेंगी.  कोई चाय वाला कह रहा था कि भईया इस बार का चुनाव लहर से लहर के टकराव का चुनाव है. इस बार का चुनाव लहरिया चुनाव के नाम से जाना जायेगा.

अनुराग अनंत

ये लेख जनज्वार वेबसाईट पर प्रकाशित हुआ है.
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ई लहरिया चुनाव है भईया!

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