Monday, December 24, 2012

मेरे भीतर एक कायर है, उसे मार देना चाहिए


लखनऊ से अहमदाबाद के लिए सीधे ट्रेन नहीं मिल पाई थी, सो ब्रेक जर्नी ही एक रास्ता था. लखनऊ से दिल्ली और दिल्ली से अहमदाबाद जाना तय किया था हमने. हम PHD में एडमिशन के बाद यूनिवर्सिटी ज्वाइन करने जा रहे थे, हम तीन लोग थे पर मैं बिलकुल अकेला ही था. वो दोनों अपने आप में मगन थे और मैं अपने आप में मस्त. ट्रेन के बाहर का नज़ारा भी ट्रेन की ही रफ़्तार से ट्रेन की उलटी दिशा में भाग रहा था. खेत, पेड़, नदी, पहाड़ और आदमी सब को पहिये लग गए थे. मैं उन भागते हुए दृश्यों को अपनी ठहरी हुई आँखों से देखते हुए न जाने कब सो गया मुझे पता ही नहीं चला. दिल्ली आने वाली थी, घडी ने यही कोई साढ़े पांच या छ: बजाये होंगे कि ठंढी हवाओं ने जगा दिया था. लाल किला एक्सप्रेस, लाल किले के पीछे से गुजर रही थी और रेल की पटरियों के किनारे बसी बस्तियों के घरों के भीतर तक हमारी निगाहें घुस चुकी थी. कहने के लिए तो उन झोपडियों में दीवारें थी पर सब कुछ दिख रहा था. उनका सोना, रोना, लड़ना, नहाना, धोना सब कुछ बेपर्दा था. जिंदगी का बेपर्दा होना कैसा होता है. मैंने पहली बार वहीँ महसूस किया था. निजता जैसा कोई शब्द उन झोपडी में रह रहे लोगों ने शायद ही कभी सुना हो. जिंदगी वहाँ शर्म के बंधनों से आजाद थी, या यूं कहें उनकी और हमारी शर्म की परिभाषा में बहुत बड़ा अंतर था. जो हमारे लिए शर्म है उनके लिए क्या हैं मैं नहीं जनता, पर शर्म बिलकुल नहीं है. जिंदगी जीने के ज़ज्बे, जरूरत, या मजबूरी (आप जो भी कहना चाहें) के आगे शर्म बहुत छोटी चीज़ होती है.  मेरे लिए ये बात भी बिलकुल साफ़ हो गयी थी. 

रेल कुछ आगे बढ़ चुकी थी और अब जिस इलाके से गुजार रही थी. वहाँ कूड़े-कचरे का अम्बार लगा था. आँखों में समाई लाल किले की सूरत कचरे में बचपन गुजारते और रोटी तलाशते बच्चों की तस्वीर के आगे फीकी पड़ गयी थी. लाल किले की प्राचीर से चढ कर भाषण देते प्रधानमंत्री को शायद ये बच्चे कभी नहीं दिखे होंगे. नहीं तो उन्हें भी उतनी ही निराशा होती जितनी मुझे हर बार ये महसूस करके होती है कि सन सैतालिस (1947) में जो आज़ादी मिली वो झूठी थी. मैं जब भी ये सोचता हूँ. मुझे देश के वजीर-ए-आला की हर दलील झूठी और विकास का हर आंकड़ा बेमानी जान पड़ता है. मैं पूरे यकीन के साथ कह सकता हूँ कि जब वो लाल किले की प्राचीर से देश को संबोधित कर रहे होते होंगे, डाइस के पीछे उनके पैर, ये सारे झूठे और बेमानी शब्द बोलते हुए कांपते होंगे पर राजधर्म में फंसा हुआ आदमी अधर्म करने को अभिशप्त होता है. यही उसकी नियति होती है.

खैर देश के प्रधानमंत्री के बारे में सोचते सोचते मैं रेल में सवार आगे बढ़ ही रहा था कि तभी मेरी नज़र कचरे के ढेर के बीच करीब 14-15  साल के लड़के-लड़की पर पड़ी. वो प्रोयोगशाला में विज्ञान के प्रयोग करने की उम्र में कचरे के ढेर में शरीर के प्रयोग कर रहे थे. सुबह जब देश में उनकी उम्र के कई बच्चे हाँथ में किताबें थाम कर तेज आवाज़ में वर्ड मीनिंग, पहाड़ा, और गणित के सूत्र रट रहें होंगे, वो जिंदगी की बेजान और बेरंग तस्वीर में एक फीका सा रंग भरने में लगे थे. वो रंग जो अशिक्षा, बेरोजगारी, गरीबी, कुंठा और नशे में रंगीन लगता है, पर है बिलकुल भी नहीं. वहाँ पहली बार लगा कि इनके लिए जीवन महज़ भूख भर बचा है, पर ऐसा कैसे हुआ और किसने किया? सवाल गहराता गया और मैं डूबता गया. जब थोडा निकला तो पाया कि पुरानी दिल्ली स्टेशन आ चुका था.

अहमदाबाद के लिए ट्रेन 8 घंटे बाद थी सो फ्रेश हो कर और कुछ देर आराम करने के बाद दिल्ली घूमने को बाहर निकल पड़ा. अभी सीढ़ी से बाहर की ओर निकल ही रहा था कि देखा पुलिस वाले ने दो अधेड़ों के साथ एक 14-15 साल के बच्चे को किनारे कर रखा था और उनकी माँ बहनों को इज्ज़त दे रहा था. मैं कुछ साफ़ समझ पता कि उसने उस बच्चे की मुट्ठी में बंद पसीने में डूबी, तुड़ी-मुडी 500 नोट छीन ली और डाँट कर भगा दिया. मैंने बढ़कर बच्चे से पुछा तो उसने बताया कि वो अपने पिता के मरने के बाद घर का खर्च चलने के लिए, गांव के कुछ लोगों के साथ दिल्ली मजदूरी करने बिहार से आया है. ये रूपये उसकी माँ ने बचा रखे थे और उसे काम न मिलने तक अपना पेट भरने के लिए दिए थे. जिसे पुलिस वाले ने छीन लिया. ये कहते हुए वो बच्चा (जिसे परिस्थियों ने जवान या यूं कहें की बूढा बना दिया था) बच्चों की तरह रोने लगा. तभी पीछे से वो पुलिस वाला आ गया और उसने उस बच्चे को एक लाठी जमाई और कहा कि “अबे! जाता है कि हवालात ले चलूँ !... वो लड़का सकपका के आंसू पोछते हुए चला गया. मैं अभी कुछ समझ नहीं पाया था कि पुलिस वाले ने मुझसे कहा कि चलो हवालात, मैंने पूछा किस जुर्म में ? उसने कहा कि गंजा अफीम बेचते हो साले! और रंगबाजी दिखाते हो, और हवा में लाठी तान ली ! मुझे डरना नहीं चाहिए था पर मैं डर गया. मेरे दिमाग में संविधान के प्रस्तावना से लेकर लोकतंत्र के परिभाषा तक सकुछ अचानक नाच गया. मैं, हम भारत के लोग,......या जनता द्वरा जनता के लिए जनता की सरकार...जैसा कुछ बोलना चाहता था. पर मैंने सकपकाते हुए कहा कि महोदय मैं पत्रकार हूँ और फिलहाल जनसंचार विषय में शोध कर रहा हूँ. आप मुझे गलत समझ रहे हैं. उस हवलदार को जैसे मेरे पत्रकार होने ने भीतर से रोक दिया हो, पर उसके मुंह से गाली नहीं रोक सका. उसने मेरी माँ और बहन की तारीफ़ की और भाग जाने को कहा. मैंने वहाँ से नहीं जाना चाहता था. और वहीँ पर अब्राहम लिंकन, नेल्सन मंडेला, गाँधी या अन्ना हो जाना चाहता था. मैं संविधान और लोकतंत्र की दुहाई देना चाहता था और खुद के आजाद होने पर दलील देना चाहता था. मैं वहाँ आज़ादी जीना चाहता था पर मैं वहाँ से चुपचाप चला आया. आमआदमी की सीमायें वहाँ मुझसे जीत गयीं और मैं हार गया. मेरी आँखों में मेरा घर परिवार नाचने लगा था, मेरी जिम्मेदारियां कोई मेरे कानों में आवाज़ मार-मार कर मुझे याद दिलाने लगा. मैंने पाया मैं कैद हूँ. और मैं डर गया मैंने महसूस किया कि संविधान से ले कर लोकतंत्र तक की सारी समझ किताबी है और जमीन पर जिंदगी घर-परिवार और जिम्मेदारियों का दूसरा का नाम है. मैंने वहाँ जाना कि एक आमआदमी के लिए हवालात भी एक ऐसा शब्द हो सकता है जिसे सुन कर आत्मा तक काँप उठे. 

उस वक्त मैंने पाया मेरा कुछ हिस्सा वहीँ हवलदार मुंह से निकले हवालात शब्द में कैद हो गया है. मेरा वो हिस्सा  मुझे आज भी आवाज़ दे रहा है और कह रहा है कि मेरे भीतर एक कायर रहता है. मुझे उसे मार देना चाहिए. जब-जब वो आवाजें आती हैं मेरे वजूद का हर एक हिस्सा परेशान हो उठता है. उस वक्त मुझे ये आज़ादी झूठी लगती है और मैं एक कैदी सा महसूस करने लगता हूँ. 

यह लेख मोहल्ला लाईव (http://mohallalive.com) पर प्रकाशित है 
लिंक http://mohallalive.com/2013/12/09/a-travelogue-by-anurag-anant/

तुम्हारा-अनंत
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