Saturday, July 21, 2012

वो सुबह कभी तो आएगी...


बादल पूरी रौ में बरस रहे थे और मैं सड़क के किनारे एक टीन के शेड के नीचे खड़ा था एक साल पहले बनी सड़क पर एक फिट से भी गहरे गड्ढे हो गए थे और वो पूरी तरह भर चुके थे , नालियाँ चोंक हो गयी थीं, और सड़क पर एक छोटी गंगा का अवतरण हो चुका  था, पर यकीन मानिये इस गंगा को अवतरित कराने के लिए किसी भागीरथी ने कोई तपस्या नहीं की बल्कि ये  गंगा तो  नगरमहापालिका और पी.डब्लू. डी. के संयुक्त प्रताप से आम आदमी की सेवा में बह रही थी और आम आदमी हैं की  इस सेवा से हलकान हो कर प्रसाशन को मंत्रध्वनि में कोस रहा था . 
सड़क के किनारे हर छायादार जगह पर उसकी क्षमता के ज्यादा लोग खड़े हुए थे  जो की इंडिया में डिमांड और सप्लाई की कंडीशन का एक सच्चा सिम्बोलिक प्रेजेंटेशन  कर रहा था .  मैं जिस जगह आर खड़ा था वो क्षत्रफल के हिसाब से थोड़ी बड़ी थी यहाँ लगभग हर क्लास और एज ग्रुप के रेप्रेजेंटेटिव थे  जो इस वक़्त तन मन धन से बस डार्विन के सिधांत ''सर्वाइवल आफ द फिटेस्ट'' को साधने में लगे हुए थे अगर कोई व्यंग चित्रकार इस समय इस सीन को देखता तो उसके मन में जो पहली कल्पना उठती वो  सम्पूर्ण भारत के आम जन मानस की सामूहिक तस्वीर की होती और वो जो इंडियन सोसाइटी की जो एब्सट्रैक्ट पेंटिंग गढ़ता वो लोक प्रियता और विवादों के सारे रिकार्ड तोड़ देती पर अफ़सोस  ये सब कुछ नहीं था वहां महज एक भीड़ थी और मैं था. 

भीड़ में लोगो ने एकांत का घेरा तोड़ कर अपने हिसाब के चहरे छाटने शुरू कर दिए थे और किस्से-कहानी, गप-सप, चर्चा विमर्श का दौर चल निकला था. स्कूल से लौटते बच्चे के बीच होम्वोर्क और कार्टून कैरेक्टर सेंट्रल थीम थे तो औरतें आस-पड़ोस की राजनीति, घर की कलह और सीरियल के उलझे हुए एपिसोड की उलझनों में उलझी हुईं थी. लड़के लड़कियों का ग्रुप खुद एक दुसरे के लिए देखने, घूरने और फुफुसने  की वजह बना हुआ था तो बुजुर्गों का खेमा नगरमहापालिका को कोसने और भगवान् के गुणगान में जुटा हुआ था. एक व्यस्त भीड़ में शायद मैं ही एक खाली आदमी था जो कोई चेहरा तलाश नहीं कर पाया था जिससे मैं अपने मन में सोसाइटी के कनफ्लिक्ट से उठने वाले सवालों को साझा कर पाता. जिससे मैं गुवाहाटी में बीच चौराहे पर  15 -20  आदमियों की सनक की शिकार 15  साल की उस मासून लड़की  की बात कर पाता जिसे शायद जवानी के दहलीज पर कदम रखने और लड़की होने की सजा दी गयी थी. टीवी पर चलती हुई न्यूज़ को देख कर ज़माने को कोसने वाली उस बड़ी भीड़ के बारे में बात कर पाता  जो अपने घरों की बेटियों  की कैरियत  की दुआ  करने के बाद  मामले को भूल जाती है. मैं दिल्ली के रोहणी इलाके की उन दो बहनों की बात करना चाहता था जो अपने पिता की मृत्यु के बाद समाज में व्याप्त महिला असुरक्षा के डर से अवसाद में चली गयीं थीं और उनके पड़ोसियों ने उनकी कोई सुध तब तक नहीं ली जब तक लगभग 30 साल की उन बहनों के महज 18  किलो वजन के बचे  हुए  शरीर में सडन नहीं दौड़ गयी और जब ये दुर्गन्ध पड़ोसियों की परेशानियों का सबब बनी तो उन्होंने पुलिस को इन्फोर्म किया. इस घटना के साए में विकास को फिर से परिभाषित करने का उठता हुआ सवाल , सेल्फसेंट्रिक अप्रोच  और माइक्रो कल्चर के दलदल में धसते हुए महानगरों में आम आदमी के गुमनाम दर्द की बदनाम कहानी के रंगों से बनता कोलाज जिसे नजरंदाज करके जीने का मतलब है अपने समय को और खुद  को धोखा देना. ऐसी ही कई और घटनाएँ और सवाल हैं  जो अखबारों में तीसरे-चौथे पन्ने पर एक दो-कॉलम तक सिमट कर दम तोड़ देते हैं और इन सवालों पर एक खुली बहस की दरकार को बाजार और पैसे की चमक से गढ़े गए विकास के औजार से हंसिये पर धकेल दिया  जाता है. 

अकेला आदमी ज्यादा देर अकेला  नहीं रह सकता इसीलिए मैंने अपने बैग से अखबार निकल लिया और उसे खोलता हूँ तो पहले ही पन्ने  पर एक बड़ी तस्वीर दिखी जिसमे  पुलिस का एक आला अफसर एक लावारिस लाश का कफ़न अपने जूते से हटा रहा था. कानून बनाने वालों और कानून चलाने वालों की नजरों में आम आदमी की जिंदगी और मौत की क्या कीमत है ये तस्वीर देख कर साफ़ हो रहा था. ये तस्वीर इंसान के भीतर इंसानियत के बचे हुए प्रतिसत की जांच करने की जरूरत को गला फाड़ कर कह रही थी. हमारा पूरा एजुकेशन सिस्टम और अफसरों की सोसलाईजेशन की  प्रोसेस इस तस्वीर से खड़े किये गए सवालों की ज़द में था और मैं एक गहरी सोच में डूबा एक गहरे मौन में उतर गया था. बारिश थम चुकी थी और भीड़ भी छंट  गयी थी जिसे जहाँ जाना था वो वहां चला गया था सिवाय मेरे, मैं अब भी यही सोच रहा था की कब इंडियन सोसाइटी को रेप्रेजेंट करने वाली ये भीड़ इन सवालों और इन घटनाओं पर खुल कर बात करेगी. कब वो दिन आएगा जब ये सारे सवाल हमारी जिंदगी में अहमियत रखने  लगेंगे और हम इनके लिए  बोलने और लड़ने लगेंगे मुझे लगता है की वो दिन अभी दूर है जब हम टीवी सेट के सामने ज़माने को कोसने की जगह अपनी पहल पर कुछ सार्थक और रचनात्मक करने समाज के बीच आयेंगे पर ये यकीन भी है की वो दिन भी आएगा जरूर आएगा . यही सब सोचते और साहिर साहब का गीत '''वो सुबह कभी तो आएगी..... गुनगुनाते हुए मैं उस टीन के शेड से बहार निकल  कर घर की ओर चल देता हूँ.   
अनुराग अनंत 

यह लेख आई-नेक्स्ट(दैनिक जागरण)  में 1 अगस्त को प्रकाशित हुआ है  लिंक नीचे है 



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