Monday, February 20, 2012

दिल मांगे मोर फैक्टर बहुत जरूरी है ............

लतीफा फातमी और ताज मुहम्मद खान हिन्दुस्तान के विभाजन के समय पेशावर से दिल्ली चले आये थे.इस मध्यम वर्गीय परिवार में एक साधारण से बच्चे ने 2-nov-1965 को जन्म लिया.पिता फ्रीडम फाइटर थे, जिनका बेटे के जन्म के जल्द बाद ही देहांत हो गया.माँ को सरकारी मिटटी के तेल की एजेंसी मिल गयी थी जिससे परिवार की किसी तरह गुजर-बसर हो रही थी. माँ की हसरत थी की बेटा पढ़-लिख कर एक सरकारी नौकरी कर ले. लेकिन लड़के की आँखों में कुछ और ही सपने पल रहे थे.वो अपने आपको सिल्वर स्क्रीन पर दिलीप कुमार और अमिताभ बच्चन  की तरह देखना चाहता था.लड़के ने टी.वी.सेरियल वालों के चक्कर लगाना शरू कर देता है .उसे ''फौजी'' और ''सर्कस'' जैसे सीरियल भी मिल जाते हैं .मीडिया में उसकी चर्चा होती है इसी बीच उसकी माँ की डेथ हो जाती है. लड़का 1991 में अपने सपनो के साथ सपनो के शहर मुंबई चला आता है.और एक साल के भीतर ही राजकपूर निर्देशित फिल्म ''दीवाना'' के जरिये फ़िल्मी दुनिया में कदम रखता है.इस फिल्म में उसे फिल्म फेयर अवार्ड के लिए  बेस्ट ड़ेबुय एक्टर चुना जाता है.उस लड़के का  न कोई फ़िल्मी बेकग्राउंड था और न सिने जगत में कोई  परिचित,मगर अपनी मत्वाकांक्षा के बल पर वो साधारण पठान परिवार का लड़का,बालीवुड का किंग खान ,शाहरुख़ खान, बन जाता है.उसका नाम भी अमिताभ और दिलीप कुमार जैसे सुपर स्टार में शुमार होने लगा.
आपने जो कहानी सुनी ये पूरी कहानी नहीं थी,बल्कि मैं जो कहानी आपको सुनाने वाला हूँ उसका एक पहलु था.  दुसरे  पहलु में मैं उदय चोपड़ा  की बात करना चाहूँगा,जिनके पिता यश चोपड़ा और भाई आदित्य चोपड़ा के साथ काम करना ही सफलता की आधी गारंटी होती है. उदय चोपड़ा के पास यशराज बैनर,लम्बी चौड़ी फ़िल्मी लाबी, ''मोहबतें'' और ''धूम'' जैसी सुपरहिट फिल्मों का लांचिगपैड था,कुल मिला कर हर वो जरूरी सामान था जिससे फ़िल्मी दुनिया में अपना सिक्का चलाया जा सके.पर इन सब के बाद भी उदय फ़िल्मी दुनिया में नहीं टिक पाए,आज उन्हें लोग एक्टर मानने  को भी तैयार नहीं हैं.
इस तरह की दो पहलुओं वाली कहानी फ़िल्मी दुनिया में ही नहीं है बल्कि किसी भी क्षेत्र में ऐसी कई स्टोरीस मिल जाएँगी.जिसमे किसी को अनुकूल परिस्तिथियों में भी असफलता मिलती है तो कोई प्रतिकूल  परिस्तिथियों में भी कामयाबी की इबारत लिखता है.अब क्रिकेट को ही ले लीजिये बडौदा की एक मस्जिद के एक मुअज्जन  के दो बेटे मस्जिद के आँगन में कपडे धोने के पिटने से खेलते हुए भारतीय टीम के इरफ़ान पठान और यूसुफ़ पठान हो जाते है.गाँव के बीहड़ से निकल कर मुनाफ पटेल टीम इण्डिया की रफ़्तार बन जाता है और रांची में रेलवे के फोर्थ क्लास इम्प्लोय का बेटा महेंद्र सिंह धोनी देश के लिए वर्ल्ड कप उठता है .वहीँ भारतीय क्रिकेट के महानतम खिलाडियों  में शुमार सुनील गावस्कर का बेटा रोहन गावस्कर क्रिकेट के माहौल में पलने-बढ़ने और अपने पहले टेस्ट मैच में सेंचुरी जड़ने के बाद भी टीम का हिस्सा तक  नहीं हो पाते.
क्या आपने कभी सोचा है कि कैसे छोटे शहरों, गली-कूंचों से निकल कर गरीब और मिडिल क्लास फैमली के बच्चे देश दुनिया की  फलक पर छा जाते है ?.वो कौन सा कारण है कि शाहरुख़ खान,इरफ़ान-युसूफ पठान,और धोनी जैसे लोग अपने अपने क्षेत्र में सफलता का सोपान चखते है ? और उदय चोपड़ा और रोहन गावस्कर जैसे लोग जीत की  दौड़ में पीछे छुट जाते है.मैं अक्सर ये सोचता रहता हूँ और जब-जब मैं ये सोचता हूँ मेरे जहन ''ये दिल मांगे मोर'' जिंगल बज उठता है कुछ ज्यादा पाने कि ललक ही ''दिल मांगे मोर'' फैक्टर है इस फैक्टर को ही महत्वकांक्षा कहते है,जीत के बाद भी न रुकने का जज्बा है महत्वकांक्षा, ये ''जितनी चादर हो उतना पैर फैलाओ'' कहावत को नहीं मानती ये कहती है कि ''जितना पैर है उतनी चादर फैलाओ'' इसके लिए चाहे जितनी मेहनत करनी पड़े, ये ''कुछ मांगे मोर'' फैक्टर ही है जो किसी व्यक्ति को सर्वश्रेष्ठ शिखर पर ले जाता है, कुछ ज्यादा पाने के लिए अक्सर कुछ ज्यादा करना पड़ता है, शायद  यही वजह है कि उम्र के इस पड़ाव  और इतनी सफलता देखने के बाद भी अमिताभ बच्चन दिन में 20 घंटे काम करते है और सचिन तेंदुलकर 10 घंटे नेट पर प्रक्टिस करते हुए  पसीना बहाते है.
पर यहाँ ये बात अच्छे  से समझ लेनी चाहिए कि जब ये महत्वकांक्षा किसी भी कीमत पर कुछ पाने कि सिचुवेशन में पहुँच जाती है,जब महत्वाकांक्षा की अति हो जाती है,और सपनों  को पूरा करने के लिए हम अपनी मोरैलिटी दांव पर लगा देते है. तब ''ये दिल मांगे मोर'' फैक्टर डिसट्रकटिव शाबित होता है और समाज को विश्व युद्ध जैसी भयानक विपदाओं का सामना करना पड़ता है, हिटलर,नेपोलियन ,गदाफी जैसे  तानाशाह पैदा होते है, इसलिए इस बात का ध्यान हमें रखना चाहिए कि हम अपनी सफलता का रथ चलाये पर किसी के खुशियों  की फसल  रौंद  कर नहीं .
खैर मैं अपनी बात को कन्क्लूड करता चलूँ ,मशहूर अमेरिकन मनोचिकित्षक  डीन सिंमोंटन कहते है ''महावकंक्षा स्वप्न, उर्जा और दृढ निश्चय का समन्वय है जो कुछ ज्यादा पाने के लिए प्रेरित करती है,जो लोग प्रतिकूल परिस्तिथियों में सफल होते है उनकी महत्वाकांक्षा में उर्जा, दृढ निश्चय और लक्ष्य (स्वप्न) का सामंजस्य बना होता है और जो लोग सारी सुविधाओं के बावजूद सफल नहीं हो पाते वो कहीं न कहीं इनका सामंजस्य बनाने में चूक जाते है,,
मेरे लिए महत्वाकांक्षा जिन्दगी है क्योंकि ये हमेशा चलने के लिए कहती है कुछ नया, कुछ बेहतर, कुछ ज्यादा, कुछ अच्छा,पाने के लिए कहती है .
अलबर्ट आइंस्टीन के शब्दों के साथ मैं आपसे विदा लेता हूँ ''जिन्दगी एक सइकिल है जिसमे पैडल मरना बंद करने पर गिरना तय है,चलने रहने के लिए पैडल मरते रहिये''   

तुम्हारा--अनन्त 

ये लेख आई-नेक्स्ट(दैनिक जागरण) में 09-02-2012 को प्रकाशित है.
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