Sunday, June 4, 2017

वो शायर जो फ़िल्मी गाने लिखता था तो मुहावरे बन जाते थे..!!

वो जो गीत लिखते थे, उसके बोल लोगों की जुबान चढ़ कर मुहावरों में बदल जाते थे। उनके फ़िल्मी गीत हमारी भाषा का अकार बढ़ाते थे और हमारे एहसासों को व्यक्त करने का हमें एक नया तरीका दे जाते थे। याद करिए हमने ना जाने कितनी बार गुमसुम खड़े किसी अपने को "गुमसुम खड़े हो जरूर कोई बात है" कहते हुए छेड़ा होगा। जब हमारे बीच की कोई लड़की ज्यादा होशियारी करती हुई पायी गयी तो हमने उसके लिए "एक चतुर नार बड़ी होशियार" जुमला प्रयोग किया होगा। हमने अपने किसी ख़ास को इम्प्रेस करने के लिए "पल पल दिल के पास तुम रहती हो" वाला स्टेटमेंट भी चिपकाया होगा। ये सभी पंक्तियाँ फ़िल्मी गीतकार राजेंद्र कृष्ण के गीतों के बोल हैं। जो हमारी भाषा का हिस्सा होकर हमारे बीच मौजूद हैं। गीतकार राजेंद्र कृष्ण का जन्म  6 जून1919 को अविभाजित भारत के जलालपुर जाटां में हुआ था। आज ये स्थान पाकिस्तान में है। पर राजेंद्र कृष्ण के गीत भारत में भी हैं और पाकिस्तान में भी, बल्कि विश्व के हर उस कोने में राजेंद्र अपने गीतों के शक्ल में मौजूद हैं जहाँ हिंदी बोली समझी जाती है या फिर हिंदी बोलने समझने वाले लोग रहते हैं।

राजेंद्र कृष्ण का पूरा नाम राजेंद्र कृष्ण दुग्गल था। कविता का कीड़ा बचपन से काट गया था इसलिए मन बहुत कुछ कहना चाहता था। डायरियों के पन्नों पर मन का उलझाव दर्ज करते रहे और कविता, शायरी, ग़ज़ल जैसा कुछ रचने लगे। साहित्य ठीक से पढ़ा, जब 1942 में शिमला की म्युनसिपल कार्पोरेशन में क्लर्क हो गए। थोड़ी झिझक मिटी जो अख़बारों को कवितायेँ प्रकाशन के लिए भेजने लगे। धीरे धीरे भीतर का कवि आकार लेने लगा था। पर अभी भी वो विश्वास नहीं था कि छाती ठोंक कर कह सकें "हाँ ज़नाब शायर हूँ मैं" मंचों पर भी कविता पढ़ने जाने लगे और वाहवाही वहाँ भी मिली। पर बात वैसी नहीं थी जैसी राजेंद्र चाहते थे।  बात सन 1945-46 की है। उन दिनों शिमला में बहुत बड़ा मुशायरा हुआ करता था। जिसमे हिंदुस्तान (तब बंटवारा नहीं हुआ था ) के बड़े शायर पूरे देश से इकठ्ठा हुआ करते थे। वहां राजेंद्र साहब ने अपनी पहली ग़ज़ल पढ़ी और उस पर कुछ ऐसी दाद मिली की राजेंद्र साहब के दिल ने कह दिया "यार तुम पक्के वाले शायर हो" जब राजेंद्र साहब ग़ज़ल पढ़ चुके तो जिगर मुरादाबादी मंच पर पहुंचे। उनसे किसी ने कहा "जनाब आप इस नए शायर के कुछ गज़ब के शेर सुनने से रह गए" जिगर साहब साहब ने नवजवान शायर से फिर से शेर सुनाने को कहा, और जों ही राजेंद्र साहब ने मतला पेश किया "कुछ इस तरह वो मेरे पास आये बैठे हैं, जैसे आग से दामन बचाए बैठे हैं" इस मतले को सुनकर जिगर साहब से ऐसे और इतनी देर तक सर हिलाया कि राजेंद्र साहब ने तय कर लिया कि अब उन्हें नौकरी से इस्तीफा दे देना है और एक शायर की ही ज़िन्दगी जीनी है। राजेंद्र कृष्ण दुग्गल ने म्युनसिपल कार्पोरेशन के क्लर्क की नौकरी से इस्तीफा दे दिया और लेखक "राजेंद्र कृष्ण" मुंबई चले आये। उनके ज़हन में जिगर मुरादाबादी का दाद में देर तक हिलता हुआ सर था। जो हर वक़्त उनमे आत्मविस्वास जगाता रहता था। उन्हें कहीं भीतर बहुत गहरे में इस बात का विस्वास था कि जिगर साहब ने मान लिया है तो दुनिया भी मान ही लेगी।

इस बीच 1947  में देश आज़ाद हुआ और 1947 में उन्हें पहली फिल्म "जनता" पटकथा लिखने को मिली। उसी साल आयी किशोर शर्मा निर्देशित फिल्म ज़ंज़ीर के गीत भी लिखने को मिले। राजेंद्र कृष्ण साहब का पहला मशहूर गीत महात्मा गाँधी की हत्या के बाद लिखा गीत था।  जिसके बोल थे "सुनो सुनो दिनियावालों  बापू की ये अमर कहानी" ये गीत गाँधी जी के जीवन पर आधारित गीत था। जिसे बापू की हत्या के बाद पूरे देश ने करुण स्वर में गया। राजेंद्र कृष्ण ने भारत के रुंधे हुए गले को आवाज दे दी थी। पूरा भारत इस गाने की ताल पर रो पड़ा। इस गीत के बोल भारत के हर आंगन में गूंजे। इस तरह ये पहला मौका था जब राजेंद्र कृष्ण ने भारत की सामूहिक चेतना को आवाज़ दी थी। फिर इसके बाद ऐसे मौके आते रहे जब देश राजेंद्र कृष्ण के गीतों में लहराया, डूबा उतराया।

1948 में बनी फ़िल्म  "प्यार की जीतका सुरैया की आवाज़ में गाया गया गीत "तेरे नैनों ने चोरी किया मेरा छोटा सा जिया परदेसिया" देश में किसी लोक गीत की तरह गया गया। 1949 में फिल्म आयी "बड़ी बहन" जिसमे राजेंद्र कृष्ण का मशहूर गीत "चुप चुप खड़े हो जरूर कोई बात है, पहली मुलाकात है, ये पहली मुलाकात है" लता मंगेशकर और प्रेमलता की आवाज में गाया गया। इस गीत ने उस समय के युवाओं को दीवाना कर दिया। गली, नुक्कड़, चौराहों से लेकर मंदिर और कोठों तक ये गीत गाया गया कहीं इसे मूल रूप में गाया गया कहीं इसकी पैरोडी बना कर गाया गया। पूरा देश राजेंद्र कृष्ण की कलम के मोहपाश में बंध गया था। इस गीत की सफलता से खुश हो कर फ़िल्म के निर्माता-निर्देशक डी.डी. कश्यप ने राजेंद्र कृष्ण साहब को ऑस्टिन कार इनाम के रूप में दी। ये कार उस समय बड़े बड़े लोगों के पास नहीं हुआ करती थी।

1951 में आयी फ़िल्म  बहार का शमशाद बेगम का गाया गया गीत "सैंया दिल में आना रे, आके फिर जाना रे, छम छमाछम छम" इतना मकबूल हुआ कि उस समय की महिलाएं और प्रेमिकाएं अपने पति और प्रेमी से इसी गाने को गा के मनुहार करतीं थीं। आज भी कहीं करतीं ही होंगी। 1953 में फिल्म अनारकली आयी जिसके गीत भी राजेंद्र कृष्ण ने लिखे। गीतों ने लोकप्रियता के नए कीर्तिमान बनाये।  इस फ़िल्म में "जिंदगी प्यार की दो-चार घड़ी होती है, चाहे छोटी भी हो, ये उम्र बड़ी होती है" जैसे मशहूर और मार्मिक गीत थे। इसी साल फिल्म "लड़की" सिलीज हुई जिसमे एक से बढ़ कर एक गीत थे "मेरे वतन से अच्छा कोई वतन नहीं है/ सारे जहां में ऐसा कोई रतन नहीं है" ये गीत बहुत मशहूर हुआ। हर देशभक्त उस वक़्त इस गीत को गाता हुआ मिल जाता था। नारी सशक्तिकरण का एक गीत इसी फिल्म में था "मैं हूं भारत की नार, लड़ने मरने को तैयार, मुझे समझो ना कमजोर, लोगो समझो ना कमजोर" इस गीत को जितने बल के साथ राजेंद्र साहब ने लिखा था, उसी तेवर के साथ लता जी ने गाया भी था। पूरे देश में महिलाएं इस गीत से अज़ब सा तेज और ओज प्राप्त करतीं थीं। इस फिल्म में एक और अलहदा अंदाज़ का गीत गज़ब का मशहूर हुआ। गीत लता मंगेशकर ने ही गाया था गीत के बोल थे "तोड़के दुनिया की दीवार/ बलमवा करले मुझसे प्यार/ जो होगा देखा जाएगा"

1954 में आयी नागिन फिल्म का गीत "मेरा मन डोले, मेरा तन डोले", "मेरा दिल ये पुकारे" और "जादूगर सैंया छोड़ो मोरी बहिंयां हो गई आधी रात, अब घर जाने दो" आज भी दिल में बसा है और हमारे पसंदीदा गीतों में शुमार है। फ़िल्म देख कबीरा रोया (1957) का गीत "कौन आया मेरे मन के द्वारे पायल की झंकार लिएऔर इसी साल आयी फिल्म गेट वे ऑफ़ इंडिया फिल्म का गीत "सपने में सजन से दो बातें की एक याद रही, एक भूल गए " और भाभी फिल्म का गीत "चल उड़ जा रे पंछी कि अब ये देश हुआ बेगाना" हिंदी  गीतों की मक़बूलियत की मिसाल हैं। राजेंद्र कृष्ण पूरे पचास के दशक में छाये रहे। 1961 में आयी फ़िल्म संजोग का गीत "वो भूली दास्ताँ लो फिर याद आयी" और 1962 की फिल्म मनमौजी का किशोर कुमार की अल्हड़-खिलंदड़ अंदाज़ में गाया गया गीत "जरूरत है, जरूरत है, जरुरत  है, एक श्रीमती की, कलावती की, सेवा करे जो पति  की" आज भी उतनी ही मस्ती और चाव से गाया जाता है जितना उस दौर में गाया जाता था। ये गीत समय के पाश में नहीं बंधता और समय के साथ-साथ अमर होता चला जा रहा  है। राजेंद्र साहब ने जहाँआरा (1964), नींद हमारी ख्वाब तुम्हारे (1966) और पड़ोसन (1968) के बेहतरीन गीत लिखे। साठ और सत्तर के दशक में राजेंद्र कृष्ण ने फिल्मों की कहानी, संवाद और पटकथा ज्यादा लिखी और अपने काम से सबको चौकाते रहे। फिल्म गोपी (1970) के लिए लिखा गीत "सुख के सब साथी दुख का कोय" घर घर में जीवन का दर्शन बताने और अपने से छोटों को सिखाने-समझाने के लिए आज भी प्रयोग किया जाता है। 

राजेंद्र कृष्ण को घोड़े की दौड़ का ख़ासा शौक़ था। उन्हें सत्तर के दशक में 46 लाख का इनकम टैक्स फ्री जैकपॉट घोड़े की दौड़ में मिला। ये राजेंद्र कृष्ण साहब की किस्मत थी, जिसने उन्हें उस दौर का सबसे अमीर लेखक बना दिया था। राजेंद्र कृष्ण ने फिल्मों के लिए हज़ारों गीत लिखे। करीब सौ से ज्यादा फिल्मों की  कहानी, संवाद और पटकथा लिखी। जिसमे कुछ मशहूर फ़िल्में पड़ोसन, छाया, प्यार का सपना, मनमौजी, धर्माधिकारी, माँ-बाप, साधु और शैतान जैसे फ़िल्में हैं।

राजेंद्र कृष्ण  साहब को तमिल भाषा पर भी अच्छा अधिकार था। वो तमिल फिल्मों की पटकथा भी लिखा करते थे। उन्होंने करीब अठारह तमिल फ़िल्में AVM Studios  के लिए लिखीं। राजेंद्र साहब ने लगभग सभी बड़े संगीत निर्देशकों के साथ फ़िल्में की पर उनकी जोड़ी ख़ास तौर पर सी. रामचंद्रा के साथ रही। यूं तो राजेंद्र साहेब के गीतों को करीब करीब सभी पार्श्व गायकों ने गाया पर सुरैया, लता, किशोर, मुहम्मद रफ़ी, और मन्ना डे ने राजेंद्र कृष्ण के गीतों अलग सी  ऊंचाई तक पहुँचाया।

राजेंद्र कृष्ण अपने आखरी दिनों तक काम में  मशगूल रहे। उन्हें लगातार काम मिलता रहा और वो काम करते रहे। काम भी ऐसे जो दिलों में बस जाए और हम याद भी ना करना चाहें तो भी बसबस याद जाए। उनकी आखरी फिल्म आग का दरिया थी जिसके लिए वो गीत  लिख रहे थे।ये फ़िल्म उनकी  मृत्यु के दो साल बाद 1990 में आयी। राजेंद्र कृष्ण साहब का निधन 23 सितम्बर 1988 को मुंबई में हुआ।

आज राजेंद्र कृष्ण हमारे बीच नहीं है बल्कि वो हमारे भीतर कहीं गहरे बसे हुए हैं। हमारे दिमाग की दिवार पर रचे हुए हैं। हमारी भाषा में घुले हुए हैं और हमारी अभिव्यक्ति में मिले हुए हैं। ये अलग बात है कि हम इस सच को नहीं जानते। हम इस सच से अनजान हैं। 


अनुराग अनंत

Friday, June 2, 2017

बलात्कार की घटनाएं एक सड़ा हुआ समाज रच रहीं हैं..!!

एक गरीब महिला अपने बीमार पति का इलाज करने के लिए जिला हरदोई से राजधानी लखनऊ आती है। पति तीन हज़ार उधार लेकर राजधानी का रुख करता है। पूरा दिन पति पत्नी इलाज और जांच के लिए इधर उधर धक्के खाते हैं। दिन भर कुछ खाते-पीते भी नहीं क्योंकि उन्हें अंदाजा नहीं है कि इलाज़ और जांच में अभी कितना रुपया लगेगा। जांच करवा कर अगली सुबह डाक्टर को दिखा कर वापस गाँव भी जाना था, इसलिए अस्पताल के परिसर में ही पति पत्नी रुक जाते है। रात को  अस्पताल का गार्ड शिवकुमार महिला से कहता है, भंडारे का प्रसाद बचा है, आ कर लेलो। तुम दोनों के खाने को हो जायेगा। महिला अस्पताल के लिफ्ट रूम में जाती है और वहां पहले से इन्तजार कर रहे गार्ड संतोष कश्यप और लिफ्ट मैन विनय कुमार के साथ मिलकर शिवकुमार महिला का गैंगरेप करता है। महिला शोर मचने को कहती है तो उसे करेंट लगाने की धमकी दी जाती है। अपने साथ घटी इस दरिंदगी के बाद जब महिला बदहवास बाहर आ कर अपने पति को घटना के बारे में बताती है और हंगामा करने की सोचती है तो ये दरिंदे पति और महिला को जान से मारने की धमकी देते हैं और डरते धमकाते भी है। पति-पत्नी रात भर अस्पताल में ही रात में छ: घंटे तक सहमे पड़े रहते हैं। सुबह होती है तो महिला अपनी आप बीती पुलिस को बताती है तो केस लिखा जाता है।

बुधवार रात लखनऊ के केजीएमयू के शताब्दी अस्पताल में घटी ये घटना, हमारे असंवेदनशील हो चुके मन और मस्तिष्क को बलात्कार की साधारण सी घटना ही लगेगी। समस्या यही है कि हमने बलात्कार की घटनाओं को एक साधारण अपराध की तरह लेना शुरू कर दिया है। ये समाज के रूप में हमारी सामूहिक चेतना के पतन का सबसे डरावना रूप है। कोई गरीब महिला अपने बीमार पति का इलाज अकेले बड़े शहर में कराने का सहस जुटाती है और उसके साथ ये दरिंदगी घट जाती है। क्या आगे से वो ऐसा सहस दुबारा कर सकेगी ? क्या समाज में अन्य महिला इससे डरेंगी नहीं ? अगर डरेंगी तो हमारे समाज की सामूहिक हार नहीं होगी ?
आज हमारे समाज में महिलाओं पर अत्याचार बढ़ें हैं। आठ साल की बच्ची से लेकर साठ साल की वृद्ध तक सारी महिलायें एक खौफ, आशंका और असुरक्षा के माहौल में जीने को अभिशप्त है। महिलाएँ कहीं सुरक्षित नहीं हैं। स्कूल कालेज, बस-ट्रेन, सड़क-गली, शहर-गाँव, खेत-खलियान यहां तक की घरों में भी महिलाओं के खिलाफ हैवानियत की कहानियां लिखीं जा रहीं हैं। सरकारें सिर्फ दावा कर रहीं हैं और हम लगातार असंवेदनशील होते जा रहे हैं। ये तथाकथित सभ्य समाज की सभ्यता पर लगा सबसे बड़ा सवालिया निशान है।
ये कौन पुरुष हैं, जो महिलाओं के लिए एक डरावना समाज रच रहें हैं। क्या ये नहीं जानते कि उनकी बहन, बेटी और माँ को भी इसी समाज में रहना है। एक समाज जहाँ आधी आबादी डरी हुई रहे, वो कैसा भद्दा और डरावना समाज होगा?

उत्तर प्रदेश में भाजपा ने नारा दिया था। न गुंडाराज, न भ्रस्टाचार, अबकी बार भाजपा सरकार। भ्रस्टाचार पर तो अभी कुछ नहीं कह सकते पर गुंडाराज के मामले में सच्चाई दावों के विपरीत ही है। योगी सरकार के बनने की बाद लोगों को उम्मीद थी कि उत्तर प्रदेश की कानून व्यवस्था में सुधार होगा पर योगी सरकार कानून व्यवस्था के मोर्चे पर खास तौर पर विफल रही है। प्रदेश में लूट-डकैती और बलात्कार की घटनाओं में विशेष बढ़ोत्तरी हुई है। तो क्या ये मान लिया जाए कि सरकारें चाहे जो भी हों सब के सब महिलाओं के प्रति हिंसा और अत्याचार रोकने में असफल रहीं हैं। असफलता सरकार की हो या समाज की। ये हमारी निजी और सामूहिक दोनों तरह की असफलता है। जिसका सबसे बड़ा दंश महिलाएं झेल रहीं हैं। अस्पताल जैसी जगह जहाँ आदमी टूटा हुआ, हरा हुआ पहुँचता है । वहां ऐसी दरिंदगी अगर हमें शर्मिंदा नहीं करती तो हमारे भीतर इंसान कहीं मर रहा है । अगर हमारा समाज सामूहिक जिम्मेदारी के साथ इस तरह की हैवानियत के खिलाफ नहीं खड़ा होता तो हम स्वच्छ समाज की जगह एक सड़ा हुआ समाज बना रहे हैं। ये हमारे समय की सच्चाई है। यही हमारे समाज का आईना भी है। हम हमारे समाज में फैलते इस दलदल की सामूहिक जिम्मेदारी अगर नहीं लेते तो हमारे कदम इसी दलदल में धंसे होंगे और हम एक सड़े हुए समाज के बीचो बीच फंसे होंगे।


अनुराग अनंत     

Monday, May 22, 2017

इश्क़ में घायल हुआ वो शायर..!!

इश्क़ में घायल हुआ वो शायर, अपने ज़ख्मों में कलम डुबो कर शायरी लिखता था। ग़रीब-गुरबों का दर्द उसकी सांसों में धड़कता था। इसलिए ये शायर हुकूमत से ख़ल्क़ का नुमाइंदा बनके उलझने से भी नहीं कतराता था। पेशे से हकीम, हर्फों के जादूगर और दर्द के चारागर इस अजीम शायर का नाम असरारुल हसन खान उर्फ़ मजरूह सुल्तानपुरी था। शुरुवाती दिनों में पेशे से हकीम थे। लोगों की नब्ज़ देख कर दवाई देते थे। न सिर्फ जड़ी-बूटियों से बल्कि हर्फों से भी हर दर्द की दवा बनाते फिरते थे। इन्हें एक तहसीलदार की बेटी से इश्क़ हुआ था। ये बात उसके रसूख़दार पिता को नागवार गुजरी थी। सो मोहब्बत की कहानी अधूरी रह गयी इसलिए ज़िन्दगी एक ग़ज़ल की शक्ल में पूरी की। और मुशायरे के मंचों से होते हुए फिल्मों की खिड़की से कूदकर हमारे दिलों में इस तरह दाखिल हुए कि हमारे हर एहसास के लिए गीत लिख गए। जब हम प्रेम में पड़े तो मजरूह को गाया। जब दिल टूटा तो मजरूह को गुनगुनाया। जब दुनिया से लड़े तो मजरूह साथ थे। जब अकेले पड़े तब मजरूह के हाँथ हमारे हाँथ थे। इस तरह मजरूह सुलतानपुरी घायलों की "घायलियत" सवालियों की "सवालियत" और इंसानों की "इंसानियत" का दूसरा नाम था। 

मार्क्स और लेनिन का सपना उनकी साँसों में धड़कता था। इसलिए गैरबराबरी के अँधेरे में इंक़लाब का सुर्ख सूरज बनकर जलना चाहते थे। और इसलिए शायद ग़ज़लों की गौरैया को सरमायादारी के बाज़ से लड़ाना चाहते थे, इस यक़ीन के साथ कि जीत आखिर में गौरैया की ही होगी। 

बात आजादी के दो साल पहले की है।  44-45 का दौर था, जब मजरूह, बम्बई किसी मुशायरे में गए थे। मशहूर फिल्म निर्माता-निर्देशक कारदार साहब (एआर कारदार) ने उन्हें सुना और उनके मुरीद हो गए। उन्होंने मजरूह को अपनी फिल्म में गीत लिखने को कहा, मजरूह साहब ने मना कर दिया जैसे गीतकार शैलेन्द्र ने राजकपूर को मना किया था। ये बात जब उनके दोस्त जिगर मुरादाबादी को पता चली तो उन्होंने मजरूह साहब को समझाया और वो राजी हो गए। फिल्म का नाम था शाहजहान, गीत गाय था मशहूर गायक कुन्दनलाल सहगल (के.एल सहगल) ने, धुन बनाई थी नौशाद ने और जो गीत मज़रुह की कलम से निकल कर हमारे दिलों में दाखिल हुआ, वो था "जब दिल ही टूट गया, हम जी के क्या करेंगे" . इस गीत के लिए कहा जाता है कि ये गीत उस वक़्त के दिलफ़िगार आशिकों के लिए राष्ट्रीय गीत की तरह था। आज भी ये गीत टूटे हुए दिलों के तन्हाई का साथी है। 

उसके बाद एस फ़ज़ील की "मेहँदी (1947 )", महबूब  खान की "अंदाज़ (1949 )" और शाहिद लतीफ़ की "आरज़ू (1950)" के लिए मजरूह साहेब ने गीत लिखे।  आरज़ू फिल्म के सभी गीत सुपरहिट हुए।  "ए दिल मुझे ऐसी जगह ले चल जहाँ कोई न हो" जाना ना दिल से दूर, आँखों से दूर जाके", "कहाँ तक हम उठाएँ गम",  और "जाओ सिधारो हे राधे के शयाम" जैसे गीत आम जन मानस की जुबान पर चढ़ गए थे। फिल्म इंडस्ट्री ने मजरूह की धमक महसूस कर ली थी और ये तय हो गया था आने वाले समय में मजरूह सुल्तानपुरी सारे हिंदुस्तान को अपनी कलम की नोक पर नाचने वाले हैं। मगर इसी बीच बम्बई में मजदूरों की एक हड़ताल में मजरूह सुल्तानपुरी ने एक ऐसी कविता पढ़ी कि अपने आपको भारत के जवान समाजवादी सपनो का कस्टोडियन कहने वाली नेहरू सरकार आग बबूला हो गयी। तत्कालीन गवर्नर मोरार जी देसाई ने महान अभिनेता बलराज साहनी और अन्य के साथ मजरूह सुल्तानपुरी को भी ऑर्थर रोड जेल  में डाल दिया।  मजरूह सुल्तानपुरी को अपनी कविता के लिए माफ़ी मांगने को कहा गया और उसके एवज में जेल से आजादी का प्रस्ताव दिया गया। पर मजरूह के लिए किसी नेहरू का क़द उनकी कलम से बड़ा नहीं था। सो उन्होंने साफ़ शब्दों में मना कर दिया।  मजरूह सुल्तानपुरी को दो साल की जेल हुई और शायर आज़ाद भारत में आज़ाद लबों के बोल के लिए दो साल तक सलाखों के पीछे कैद रहा।  आप भी पढ़िए, मजरूह साहब ने नेहरू जी के लिए क्या कहा था।

मन में ज़हर डालर का बसा के 
फिरती है भारत की अहिंसा 
खादी की केचुल को पहन कर 
ये केचुल लहराने ना पाए 
ये भी है हिटलर का चेला 
मार लो साथी जाने ना पाए 
कॉमनवेल्थ का दास है नेहरू 
मार लो साथी जाने ना पाए 

सत्ता की छाती पर चढ़ कर एक शायर ने वो कह दिया था। जो पहले इतनी साफ़ और सपाट आवाज़ में नहीं कहा गया था।  ये मजरूह का वो इंक़लाबी अंदाज़ था जिससे उन्हें इश्क़ था। वो फिल्मों के लिए लिखे गए गानों को एक शायर की अदाकारी कहते थे और चाहते थे उन्हें उनकी ग़ज़लों और ऐसी ही इंक़लाबी शायरी के लिए जाना जाए। पर जैसाकि कहा जाता है पेट से उठने वाला दर्द, जिगर से उठने वाली आह से ज्यादा दिलफरेब होता है और ऐसा ही हुआ। जेल के दौरान ही मजरूह साहब को पहली बेटी हुई और परिवार आर्थिक तंगी गुजरने लगा।  मजरूह साहब ने जेल में रहते हुए ही कुछ फिल्मों के गीत लिखने की हामी भरी और पैसे परिवार तक पहुंचा दिए गए। फिर मजरूह साहब 1951-52 के दौर में बाहर आये और तबसे इस दुनिया को 24 मई 2000 को अलविदा कहने तक मुसलसल गीत  लिखते रहे। 

उन्होंने बेहतरीन हिंदी फिल्मों के लिए सैकड़ों बेसकीमती गीत लिखे।  उनकी जोड़ी संगीतकार नौशाद और फिल्म निर्देशक नासिर हुसैन के साथ कमाल बरपा करती रही और हमें बेहतरीन फ़िल्में और दिलनशीन गीत मिलते रहे। उन्होंने नासिर हुसैन के साथ "तुम सा नहीं देखा", "अकेले हम अकेले तुम", "ज़माने को दिखाना है", "हम किसी से काम नहीं",  "जो जीता  वही सिकंदर" और "क़यामत से क़यामत तक" जैसी कभी न भुलाई जाने वाली फिल्मे की। उन्होंने ए के सहगल से लेकर सलमान तक के लिए गीत लिखे। और अपने पचास साल से ऊपर के करियर में हमें सैकड़ों ऐसे गीत दे गए जो हमारे वज़ूद का हिस्सा हैं । उन्हें दोस्ती फिल्म के "चाहूंगा तुझे सांझ सवेरे"  गीत के लिए 1965 में पहला और आखरी फिल्मफेयर अवार्ड मिला। 1993 में मजरूह साहब को फिल्मों में उनके योगदान के लिए फिल्मों का सबसे बड़ा पुरूस्कार "दादा साहेब फाल्के अवार्ड" दिया गया . पर मजरूह साहब किसी भी पुरूस्कार और खिताब से ऊपर थे।  हर्फों के वो मसीहा थे जो उनमे जान फूंक कर उन्हें कालजयी कर दिया करते थे। वो अहसासों को आवाज़ देने के इस सफर में अकेले ही चले थे पर लोग उनके  साथ आते गए और कारवाँ बनता गया।  मजरूह साहब  किसी मजदूर के हांथों में पड़े लाल ठेठे की लाली हैं। किसी इंक़लाबी सुर्ख आवाज़ हैं तो किसी चाक़ जिगर आशिक के दिल का लहू हैं।  मजरूह साहब ने कभी हमें अकेला नहीं छोड़ा। वो  हमारे साथ थे और हम उनके साथ होते चले गए। वो शायद इस बात को जानते थे इसीलिए उन्होंने एक शेर में कहा है 
'मैं अकेला ही चला था जानिबे मंजिल मगर / लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया’

Sunday, March 26, 2017

क्योंकि उनके पास ज्ञान है बुद्धि नहीं है !!

कितना आसान होता है। खांचे में फंसा कर गर्दन उतार देना।  बिलकुल यांत्रिक कत्लखाने की तरह सहज और सफल। इस तरह के  कत्लखाने कब बंद होंगे ? कौन सी सरकार, कौन सा नेता ऐसे क़त्ल खाने को बंद करेगा? मैं नहीं जनता।

आप  किसी भी क्षण किसी भी ख़ास तरह के पैमाने से नाप दिए जाते हैं और नापने वाला आपकी एक परिभाषा, एक सूत्र अपने दिमाग में बैठा लेता है। और यदा-कदा उसी परिभाषा, उसी सूत्र के हिसाब से आपको हल करता रहता है।  कुछ तो आप पर पीएचडी कर लेते हैं और आप पर आपसे ज्यादा अधिकार उनका हो जाता है।  आप खुद को नहीं जान पाते पर वो आपकी नश-नश से वाकिफ होने का दावा करते हुए, आप पर लेक्चर देते हैं और लोग मन लगा कर आदर्श विद्यार्थी की तरह उन्हें सुनते हैं।  यही हमारे समय का सच है।  ये सुन्दर है या भयवाह।  ये आप जाने।

आपने देश और सेना पर बात कर दी, आप राष्ट्रवादी, आपने मोदी की तारीफ कर दी, जनविरोधी, बुर्जुआ, पूंजीवादी। आपने मोदी की आलोचना कर दी।  आप वामपंथी। आपने धर्म की बात कर दी, आप दक्षिणपंथी। आपने एंटी रोमियो की आलोचना कर दी। आप ठरकी, कुंठित। आपने योगी से सवाल कर दिया। आप खिसियानी बिल्ली। आपने गैरबराबरी वाली व्यवस्था को बदलने की बात कह दी, आप देशद्रोही।  आपने किसानों अदिवासियों के जलते सवाल पूछ दिए, आप नक्सलवादी।  आपने किसी विशेष संगठन, विशेष पार्टी पर कुछ कह दिया, आप पाकिस्तानी। 

ऐसे ही बहुत सारे खांचे हैं।  लोग हांथो में लिए घूम रहे हैं।  बिलकुल शिकारियों के तरह चौकन्ने।  आपके मूँह से कुछ निकला नहीं कि  आप खांचे में फिट, पैमाने से नाप लिए गए।  आपकी परिभाषा और सूत्र तैयार।  आप व्यक्ति नहीं रहे, एक बड़ी पहचान आपके साथ चस्पा, चाहे आप उस बड़ी पहचान का मतलब भी न जाने पर अब वो पहचान आपकी पहचान है।  

हमने सवाल उठाया कि एंटी रोमियो स्क्वाड का नाम एंटी रोमियो ही क्यों रखा गया ? और इस नाम के दर्शन को भारत के परिपेक्ष्य में देखने की कोशिश की। एक भाई हमारी बहन के लिए चिंतित हो गये।  उसे पूरे प्रकरण में ले आये।और एक खाँचा ले कर मुझे नाप दिया। ये खांचा था हम फर्जी विरोध करते हैं। ठीक है भाई ! पर हम फिर से सवाल पूछते हैं कि अगर महिला सुरक्षा ही  मामला था तो इस सेल का आम वीमेन सिक्युरिटी स्क्वाड रख देते।  तो ज्यादा व्यापक सुरक्षा हो पाती।  पर यहाँ तो नाम ही बताता है कि ये एन्टीरोमियो दल प्रेम या छेड़छाड़  के मामले में ही मुख्यतयः दखल रखेगा।  तो क्या हमारे प्रदेश में सबसे ज्यादा महिलाएं पार्क में, कालेजों के बाहर, और सार्वजानिक स्थलों पर ही असुरक्षित हैं ? क्या हमारे प्रदेश में बलात्कार सबसे ज्यादा हो रहे हैं ? नहीं दोनों बात नहीं है।  फिर एन्टीरोमियो नाम क्यों ? फिर भी महिला सुरक्षा के हर पहल का स्वागत है। बस सकारात्मक आलोचना ये है कि इस स्क्वाड का नाम बदल कर इसे लार्जर मैनडेट के साथ जोड़ा जाए। ताकि महिलाओं के साथ छेड़छाड़ का मामला उसके भीतर आये और उनके साथ हो रहे सारे अपराध के लिए पुलिस सीधे तौर पर जवाबदेह हो। ये तो योगी जी से इल्तजा थी। पर दूसरी  चीज़ तो  भगवान ही दे सकता है।  वो है खाँचेबाजों को बुद्धि, जितनी भी मिल जाए, उनके लिए सद्बुद्धि ही होगी।  क्योंकि उनके पास ज्ञान है बुद्धि नहीं है !!  

अनुराग अनंत 


   
    

योगिराज कृष्ण बनाम सीएम योगी आदित्य नाथ..!!

गज़ब विरोधाभासी चरित्र है हमारा, और जो सत्ता में हैं वो इसे अच्छे से जानते हैं।  शायद उन्होंने ही इसे गढ़ा है और संस्कृति के फ्रेम में मढ़ा है। विराट भारतीय परंपरा में निषेध शब्द नहीं है।  भाषा, खान -पान, मत-विश्वास, रहन-सहन ले लेकर जीवन के हर मोर्चे पर एक बहुरंगी वितान भारतीय परंपरा का हिस्सा रहा है। पर इस उद्दात परंपरा के सामानांतर एक विरोधाभासी धारा हमेशा से बहती रही है।  जो कभी कम और कभी ज्यादा प्रभावित करती है।  भारतीय मानस इसी द्वय में फंस हुआ है।  इसीलिए काल के हर खंड में, हर बिंदु  पर विरोधाभासमें लिपटा  हुआ, घिरा हुआ पाया जा सकता है।

ये इसी द्वय की द्वंदात्मक परंपरा है कि जिस काल खंड में सत्ताएं मनुस्मृति के हिसाब से चल रही थीं।  कानों में  शीशे ढाले जा रहे थे।  पैरों में कीलें ठोकी जा रहीं थी। उसी समय सवर्ण मानसिकता को चुनौती देते हुए राजसत्ता के सीमाओं को लांग कर एक सवर्ण नवजवान सिद्धार्थ से गौतम बुद्ध हो गया। उसने क्या क्या, कैसे कैसे बदल दिया।  आप जानते हैं, मैं नहीं बताऊँगा। और वो कौन सी शक्तियां और सोच थी जिसने बुद्ध का बहिष्कार, विरोध किया।  ये भी आप जानते हैं। इसी देश में जहाँ द्रोणाचार्य एक शूद्र का अंगूठा बिना पढ़ाये गुरु दक्षिणा में ले लेते हैं।  वहीँ दूसरी तरफ चाणक्य भी हैं  जो रास्ते के किनारे भेड़ चराते एक शूद्र के बच्चे को शिक्षा दे कर चक्रवर्ती सम्राट बना देते हैं।  ब्राह्मणवाद के खिलाफ महान योद्धा भीम राव आंबेडकर में  आंबेडकर नाम उनके एक ब्राह्मण गुरु  का दिया  हुआ है। यहाँ मंदिरों का निर्माण कराते, मंदिरों  के चौखटों पर सर नवाते अकबर के कहानियां हैं तो मंदिर तोड़ते औरंज़ेब के किस्से भी हैं। ये विरोधाभासभारतीय इतिहास के हर मोड़ और वर्तमान के हर कदम पर विद्यमान है।

अभी वर्तमान में हमारे प्रदेश में एन्टीरोमियो दल बनाया गया है।  कहा जा रहा है कि ये महिलाओं की सुरक्षा के लिए काम करेगा।  पर असल में ये प्रेमी युगलों पर पहरा है।  मिलने जुलने और प्रेम करने पर पाबन्दी है।  अब देखिये कितना मजेदार विरोधाभासहै।  हिंदी फिल्मों में जो परिवेश, संस्कृति, समाज दिखया जाता है वो मुख्य रूप से उत्तर-मध्य भारत का ही होता  है।  बॉलीवुड से दक्षिण-उत्तरवूर्व और पश्चिम लगभग नदारद ही रहता है।  तो मतलब हिंदी फिल्मे इसी गईया-पट्टी, हिंदी-पट्टी की ही कहानी होती है।  उसमे जब बागों  में प्रेम दिखाया जाता है तो हमें अच्छा लगता है।  लड़के मन ही मन हीरो और लड़कियां मन ही मन हीरोइन होती रहतीं है।  जब प्रेम ज़माने के खिलाफ बगावत का ऐलान करता है तो हम साथ होते हैं।  प्यार किया तो डरना क्या गाते हैं।  जब प्रेमी-युगल फिल्म में परेशानी में फंसता है तो अपने अल्लाह-भगवान से दिल के किसी कोने में दुआ जैसा भी कुछ  कर जाते हैं।  इस तरह  हम प्रेम  और प्रेमियों के पक्ष में खड़े हुए लोग लगते हैं; पर  एन्टीरोमियों दल हमारे प्रदेश में ही बनाया जाता है।  और हम उसे सही कहते हैं। यहीं एक बादशाह के खिलाफ एक राजकुमार ने प्रेम के लिए बगावत कर दी थी और एक हम हैं। जो प्रेम परंपरा के विरुद्ध बहे जा रहें हैं।  हमारे प्रदेश में ही प्रेम के प्रतीक श्री कृष्ण जी ने जन्म लिया। अच्छा हुआ आज-कल के दिनों में वो जवाँ नहीं हुए नहीं तो एंटी रोमियो वाले पकड़ लेते।  फिर राधा के घर वालों को फोन जाता। पूरे बृज में बदनामी होती और श्री कृष्ण का काम तमाम हो जाता। हम उस प्रदेश में एन्टीरोमियो दल देख रहे हैं जहाँ राधा कृष्ण के रूप में प्रेमियों को पूजते हैं। ये हमारे वर्तमान में भारतीय विरोधाभासी परंपरा का उधाहरण हैं।

दूसरा उदाहरण गोरखनाथ मंदिर का ही ले लेते हैं।  ये मंदिर कभी मुस्लिम योगियों और दलित-पिछड़े संतों का गढ़ रहा है। आपसी सद्भाव, सूफी संतत्व, जाति-प्रथा के नाश के आंदोलन का केंद्र रहा है। पर आज हम देख सकते हैं मंदिर किस  प्रतीक के रूप में जाना जाता है। आज लोग मंदिर को मुस्लिम-विरोध  का गढ़ मानने  लगे हैं। राजनीतिक महत्वाकांक्षा के चलते ऐसा कुछ समय से किया भी गया  जो  मंदिर के मूल चरित्र के साथ विरोधाभासी है।

ऐसे ही विरोधाभासके कई उदाहरण और भी दे सकता हूँ।  जिसकी  कोई जरूरत नहीं  है।  आप  समझ गए होंगे, मैं क्या कहना चाहता हूँ।  भारत बहुरंगी सांस्कृतिक धाराओं का विराट समुद्र है।  जिसमे कुछ भी निषेध नहीं है। हमने विश्व को प्रेम से सम्भोग और सम्भोग से समाधी तक जाने का रास्ता दिखाया है।  एंटी-रोमियों दल हमारी समृद्ध परंपरा और उसके विस्तार पर सवालिया निशान है। भारतीय परंपरा की  द्वय विरोधाभासी धारा में आप किधर जाना चाहते हैं? अंगूठा काटने वालों की तरफ, कानों में शीश ढालने वालों की तरफ या फिर गरीब के बच्चे को सम्राट बना कर भारत का गौरव बढ़ाने वालों के साथ। आप प्रेमियों का पक्ष लेते हुए योगिराज कृष्णा के साथ खड़े होना चाहते हैं या एन्टीरोमियो दल की वकालत  करते  हुए योगी आदित्यनाथ के साथ खड़े होना चाहते हैं। अब फैसला आपको करना है इस विरोधाभासी समय  में आप किस  तरफ हैं

अनुराग अनंत

         

Friday, March 3, 2017

गुरमेहर की आवाज में हमारी सांस्कृतिक विरासत प्रतिध्वनित होती है ..!!

दिल्ली विश्वविद्यालय की वो लड़की जो अचानक मशहूर हो गयी थी। जिसके विषय में नेता से लेकर अभिनेता तक और खिलाड़ी से लेकर अनाड़ी तक आपस में लड़ रहे थे। दिल्ली छोड़ कर जालंधर वापस चली गयी है। उसने अपना फेसबुक प्रोफ़ाइल भी डीएक्टिवेट कर दिया है। जी हाँ "गुरमेहर कौर" की बात कर रहा हूँ। जिसकी गलती थी कि वो सोचती थी और बोलती भी थी। क्योंकि उसे लगता था कुछ नहीं सोचने और कुछ नहीं बोलने पर आदमी मर जाता है। और वो बिना कुछ किए मरना नहीं चाहती थी।  उसने एक लंबा दौर नफरत और घृणा से लड़ते हुए गुज़ारा था इसलिए वो प्रेम और शांति के कुछ अलग अर्थ समझती थी और शायद हम सब से वही अर्थ साझा कर रही थी। पर हम लोग जिस समय में जी रहे है वो शायद किसी शतरंज की बिसात पर बिछता जा रहा है। और पूरा समाज काले सफ़ेद घरों में बंटा हुआ दिख रहा  है। जिनके पास ताकत  है,  सत्ता है या फिर  जो लोग ताकत और सत्ता  के  साथ हैं,  वो खुद को सफ़ेद घरों में खड़ा हुआ महसूस करते हैं। बिलकुल स्वच्छ, पाक, साफ़।  उनसे इतर जो लोग है किसी भी राजनितिक विचार और सोच के, सभी काले घरों में हैं। बहके हुए, प्रदूषित दिमाग के लोग। जो देश के खिलाफ हैं। धर्म के खिलाफ हैं और जिन्हें फेसबुक ट्विटर से लेकर सड़कों और कैम्पसों तक मारा जाना चाहिए। इसीलिए काले घर में खड़ी हुई गुरमेहर कौर को स्वच्छ, पाक, साफ़ लोगों ने गलियां दीं, धमकियाँ दीं और उसे जताया कि वो लड़की है और उसका बलात्कार भी किया जा सकता है। सरकार के मंत्रियों ने उसे बहका हुआ, संक्रमित और प्रदूषित दमाग की देशविरोधी लड़की तक कह दिया। एक माननीय नेता जी ने कहा कि गुरमेहर ने अपने शहीद पिता की शहादत पर राजनीति करने की कोशिश की है और उन्हें शर्मिदा किया है।

माननीय बताना चाहते हैं कि शहीदों और सैनिकों पर अब उनके  बच्चों का भी कोई  अधिकार  नहीं बचा है और इसलिए वो अपने पिता के विषय में बात नहीं कर सकते। पर सरकार चाहे तो सेना और सैनिकों की उपलब्धि को अपनी उपलब्धि बता सकती है। अपनी योजनाओं को सही ठहराने के लिए उनके नाम का सहारा  ले  सकती है और तर्क ख़तम हो जाने पर सेना को ढाल की तरह इस्तेमाल  कर सकती  है। ये राजनीति नहीं है, राष्ट्रसेवा है और  एक बेटी  का अपने पिता को याद करना राजनीति है।  

गुरमेहर कौर को जिस बात पर ट्रोल किया गया।  वो लगभग उसने एक साल पहले कही थी। तो ऐसा उसने अभी क्या कह दिया जो उसकी एक साल पुरानी बात पर आज ट्रोलिंग की जा रही है। दरअसल उसने दिल्ली विश्यविद्यालय में हुई हिंसा के खिलाफ ABVP का प्रतिवाद करते हुए। ABVP से न डरने की बात कही थी। ये बात उन लोगों को शायद बुरी लगी, जो चाहते हैं लोग ABVP से डरें।  इसलिए उन्होंने एक साल पुराना वीडियो निकाला, जिसमे गुरमेहर हांथो में तख्तियां लेकर उनपे लिखे संदेशों के माध्यम से बिना कुछ बोले एक  बहुत बड़ी बात बोल रहीं थीं। बड़ी बातें हमेशा सम्पूर्ण सन्दर्भों में समझी जाती हैं। इसलिए उन लोगों ने उस पूरे वीडयो से एक हिस्सा निकाल लिया और तथ्य को सन्दर्भ से काट  दिया। उसके बाद लोग जुड़ते गए और तर्क, वितर्क और कुतर्क का कारवां बनता चला गया,  और बात  गुरमेहर की हत्या और बलात्कार की धमकियों तक पहुँच गयी। दिल्ली पुलिस इस बीच गुरमेहर को उसकी सुरक्षा का विस्वास दिलाने में असमर्थ रही और इसतरह दिल्ली में ही दिल्ली हार गयी। संविधान में  दी गयी, अपनी बात कहने की गारंटी की गारंटी जिन्हें लेना था वो चुनावी मंचो से नारियल और पाइन एपल के रस पर विमर्श करते रहे।  और एक भीड़ मौका पाते ही गुरमेहर पर फेसबुक से लेकर ट्विटर तक भेड़ियों की तरह टूट पड़ी।

तो क्या वाकई गुरमेहर ने कोई ऐसी बेजा बात कह दी थी जो आज से पहले भारत में नहीं कही गयी थी ? सवाल एक और भी है, जो सरकार पूछ रही है कि गुरमेहर किससे प्रभावित हो कर ऐसी बहकी बहकी बातें कर रही है ? कौन है जो उसका दिमाग प्रदूषित कर रहा है ? तो हम थोड़ा अगर अपने  इतिहास की तरफ देखें तो हमें पता चलता है कि गुरमेहर की आवाज में हमारी सांस्कृतिक विरासत प्रतिध्वनित होती हुई दिखती है। वो गौतम से लेकर गांधी तक की समझ को साझा करती हुई पायी जाती है।         

गुरमेहर ने कहा कि उसके पिता को पाकिस्तान ने नहीं बल्कि युद्ध ने मारा है। ये बात अशोक भी कलिंग के युद्ध क्षेत्र में लाशों के बीच खड़े हुए महसूस करते हैं। और खुद से पूछते है क्या ये मेरे निजी दुश्मन थे ? क्या मैंने ही इन्हें मारा ? और उत्तर में उन्हें जवाब मिलता है, मेरी महत्वाकांक्षा ने इन्हें मारा है। राजसत्ता ने इन्हें मारा है।  और वो राजसत्ता और महत्वाकांक्षा का त्याग करते हुए बौद्ध भिक्षु बन जाते हैं।  जब गौतम बुद्ध अंगुलिमाल डाकू से अकेले मिलते है तो उन्हें इस बात का विशवास होता है कि ये व्यक्ति हत्यारा नहीं है। हत्यारी इसकी मानसकिता है।  इसलिए वो उसे बदल पाते हैं और एक डकैत के भीतर से एक परोपकारी भिक्षु निकलता है।  जब गाँधी कहते हैं,  घृणा व्यक्ति से नहीं उसकी बुराई से करनी चाहिए।  जब वो कहते हैं,  हिन्दू मुसलमान एक दूसरे को नहीं मार रहे हैं बल्कि एक उन्माद है जो इन दोनों को मार रहा है।  और इसी विस्वास के साथ वो नोवाखली  जाते हैं और दंगे रोक देते हैं।  तो वो गुरमेहर वाली बात  रह रहे होते हैं।  भारतीय दार्शनिक इतिहास को  उठा कर देखिएगा तो  ऐसे सैकड़ो उदाहरण मिलेंगे जहाँ गुरमेहर के बयान की जड़ें हैं।


गुरमेहर ने गौतम से लेकर गांधी तक फैली हुई सैद्धान्तिक विरासत को  एक बार फिर दार्शनिक रूप में दोहराया है।  वो अगर प्रदूषित दिमाग की है तो उसके वैचारिक प्रदूषण का श्रोत गौतम से लेकर गांधी तक फैला हुआ है। तो क्या ये कहा जा सकता है कि जो लोग गुरमेहर की बात नहीं समझ पा रहे हैं और उसकी बेहद सतही व्याख्या कर रहे हैं।  वो हमारी मूल भारतीय दार्शनिक परिपाटी से कटे हुए लोग हैं।  या फिर ये कहें कि वे बेहद  धूर्त किसम के लोग हैं। वो एक नया भारत बनाना चाहते हैं जिससे गौतम और गाँधी खारिज़ हैं। जहाँ व्यवहारिक और सतही समझ के इतर सैद्धान्तिक और दार्शनिक बहसों के लिए कोई जगह नहीं होगी।  जहाँ गाँधी और गौतम पैदा नहीं होंगे।  जहाँ अंगुलिमाल को डाकू से इंसान नहीं बनाया जायेगा।  जहाँ नोवखली जैसे भीषण दंगे नहीं रोके जायेंगे।  जहाँ एक थोपी हुई परिभाषा के इतर कुछ नहीं कहा जा सकेगा।  अगर हम ऐसा नया भारत बनाने वाले हैं।  तो ये  भारत के प्रति अक्षम्य अपराध कर रहे हैं।  आज समय के इस  मुहाने पर गुरमेहर के साथ खड़े होना गांधी के साथ खड़े होने जैसा है।  गुरमेहर के लिए आवाज़ बुलंद करना गांधी की आवाज़ को बुलंद करना है।



अनुराग अनंत