Saturday, July 21, 2012

वो सुबह कभी तो आएगी...


बादल पूरी रौ में बरस रहे थे और मैं सड़क के किनारे एक टीन के शेड के नीचे खड़ा था एक साल पहले बनी सड़क पर एक फिट से भी गहरे गड्ढे हो गए थे और वो पूरी तरह भर चुके थे , नालियाँ चोंक हो गयी थीं, और सड़क पर एक छोटी गंगा का अवतरण हो चुका  था, पर यकीन मानिये इस गंगा को अवतरित कराने के लिए किसी भागीरथी ने कोई तपस्या नहीं की बल्कि ये  गंगा तो  नगरमहापालिका और पी.डब्लू. डी. के संयुक्त प्रताप से आम आदमी की सेवा में बह रही थी और आम आदमी हैं की  इस सेवा से हलकान हो कर प्रसाशन को मंत्रध्वनि में कोस रहा था . 
सड़क के किनारे हर छायादार जगह पर उसकी क्षमता के ज्यादा लोग खड़े हुए थे  जो की इंडिया में डिमांड और सप्लाई की कंडीशन का एक सच्चा सिम्बोलिक प्रेजेंटेशन  कर रहा था .  मैं जिस जगह आर खड़ा था वो क्षत्रफल के हिसाब से थोड़ी बड़ी थी यहाँ लगभग हर क्लास और एज ग्रुप के रेप्रेजेंटेटिव थे  जो इस वक़्त तन मन धन से बस डार्विन के सिधांत ''सर्वाइवल आफ द फिटेस्ट'' को साधने में लगे हुए थे अगर कोई व्यंग चित्रकार इस समय इस सीन को देखता तो उसके मन में जो पहली कल्पना उठती वो  सम्पूर्ण भारत के आम जन मानस की सामूहिक तस्वीर की होती और वो जो इंडियन सोसाइटी की जो एब्सट्रैक्ट पेंटिंग गढ़ता वो लोक प्रियता और विवादों के सारे रिकार्ड तोड़ देती पर अफ़सोस  ये सब कुछ नहीं था वहां महज एक भीड़ थी और मैं था. 

भीड़ में लोगो ने एकांत का घेरा तोड़ कर अपने हिसाब के चहरे छाटने शुरू कर दिए थे और किस्से-कहानी, गप-सप, चर्चा विमर्श का दौर चल निकला था. स्कूल से लौटते बच्चे के बीच होम्वोर्क और कार्टून कैरेक्टर सेंट्रल थीम थे तो औरतें आस-पड़ोस की राजनीति, घर की कलह और सीरियल के उलझे हुए एपिसोड की उलझनों में उलझी हुईं थी. लड़के लड़कियों का ग्रुप खुद एक दुसरे के लिए देखने, घूरने और फुफुसने  की वजह बना हुआ था तो बुजुर्गों का खेमा नगरमहापालिका को कोसने और भगवान् के गुणगान में जुटा हुआ था. एक व्यस्त भीड़ में शायद मैं ही एक खाली आदमी था जो कोई चेहरा तलाश नहीं कर पाया था जिससे मैं अपने मन में सोसाइटी के कनफ्लिक्ट से उठने वाले सवालों को साझा कर पाता. जिससे मैं गुवाहाटी में बीच चौराहे पर  15 -20  आदमियों की सनक की शिकार 15  साल की उस मासून लड़की  की बात कर पाता जिसे शायद जवानी के दहलीज पर कदम रखने और लड़की होने की सजा दी गयी थी. टीवी पर चलती हुई न्यूज़ को देख कर ज़माने को कोसने वाली उस बड़ी भीड़ के बारे में बात कर पाता  जो अपने घरों की बेटियों  की कैरियत  की दुआ  करने के बाद  मामले को भूल जाती है. मैं दिल्ली के रोहणी इलाके की उन दो बहनों की बात करना चाहता था जो अपने पिता की मृत्यु के बाद समाज में व्याप्त महिला असुरक्षा के डर से अवसाद में चली गयीं थीं और उनके पड़ोसियों ने उनकी कोई सुध तब तक नहीं ली जब तक लगभग 30 साल की उन बहनों के महज 18  किलो वजन के बचे  हुए  शरीर में सडन नहीं दौड़ गयी और जब ये दुर्गन्ध पड़ोसियों की परेशानियों का सबब बनी तो उन्होंने पुलिस को इन्फोर्म किया. इस घटना के साए में विकास को फिर से परिभाषित करने का उठता हुआ सवाल , सेल्फसेंट्रिक अप्रोच  और माइक्रो कल्चर के दलदल में धसते हुए महानगरों में आम आदमी के गुमनाम दर्द की बदनाम कहानी के रंगों से बनता कोलाज जिसे नजरंदाज करके जीने का मतलब है अपने समय को और खुद  को धोखा देना. ऐसी ही कई और घटनाएँ और सवाल हैं  जो अखबारों में तीसरे-चौथे पन्ने पर एक दो-कॉलम तक सिमट कर दम तोड़ देते हैं और इन सवालों पर एक खुली बहस की दरकार को बाजार और पैसे की चमक से गढ़े गए विकास के औजार से हंसिये पर धकेल दिया  जाता है. 

अकेला आदमी ज्यादा देर अकेला  नहीं रह सकता इसीलिए मैंने अपने बैग से अखबार निकल लिया और उसे खोलता हूँ तो पहले ही पन्ने  पर एक बड़ी तस्वीर दिखी जिसमे  पुलिस का एक आला अफसर एक लावारिस लाश का कफ़न अपने जूते से हटा रहा था. कानून बनाने वालों और कानून चलाने वालों की नजरों में आम आदमी की जिंदगी और मौत की क्या कीमत है ये तस्वीर देख कर साफ़ हो रहा था. ये तस्वीर इंसान के भीतर इंसानियत के बचे हुए प्रतिसत की जांच करने की जरूरत को गला फाड़ कर कह रही थी. हमारा पूरा एजुकेशन सिस्टम और अफसरों की सोसलाईजेशन की  प्रोसेस इस तस्वीर से खड़े किये गए सवालों की ज़द में था और मैं एक गहरी सोच में डूबा एक गहरे मौन में उतर गया था. बारिश थम चुकी थी और भीड़ भी छंट  गयी थी जिसे जहाँ जाना था वो वहां चला गया था सिवाय मेरे, मैं अब भी यही सोच रहा था की कब इंडियन सोसाइटी को रेप्रेजेंट करने वाली ये भीड़ इन सवालों और इन घटनाओं पर खुल कर बात करेगी. कब वो दिन आएगा जब ये सारे सवाल हमारी जिंदगी में अहमियत रखने  लगेंगे और हम इनके लिए  बोलने और लड़ने लगेंगे मुझे लगता है की वो दिन अभी दूर है जब हम टीवी सेट के सामने ज़माने को कोसने की जगह अपनी पहल पर कुछ सार्थक और रचनात्मक करने समाज के बीच आयेंगे पर ये यकीन भी है की वो दिन भी आएगा जरूर आएगा . यही सब सोचते और साहिर साहब का गीत '''वो सुबह कभी तो आएगी..... गुनगुनाते हुए मैं उस टीन के शेड से बहार निकल  कर घर की ओर चल देता हूँ.   
अनुराग अनंत 

यह लेख आई-नेक्स्ट(दैनिक जागरण)  में 1 अगस्त को प्रकाशित हुआ है  लिंक नीचे है 



Tuesday, May 29, 2012

ये कैद है कि दिखती नहीं है ..........


पंछीनदिया और पवन के झोंकों की तरह ही हमारा बचपन भी आज़ाद होता है वो न किसी शरहद के बांधे बंधता हैन किसी दीवार के रोके रुकता है और न ही किसी लकीर के बांटे बांटता है. वो जब तक रहता है अपने नैचुरल फ्लो में बहता रहता है और जब बीत जाता है तो हम  जिंदगी के किसी मोड़ पर उसकी याद में  जगजीत सिंह की तरह ..ये दौलत भी ले लोये शोहरत  भी ले लोभले छीन लो मुझसे मेरी जवानीमगर मुझको लौटा दोवो बचपन का सावन,वो कागज की कश्तीवो बारिश का पानी.... गाते हुए पाए जाते हैं. अपनी सारी दौलतशोहरत और जवानी को बचपन के सावनकागज की कश्ती और बारिश के पानी पर वार देने का एक जज्बा रह-रह कर हमारे भीतर से आवाज़ लगता है और हम किसी भी कीमत पर अपने बचपन को फिर से जीने की कभी न पूरी हो सकने वाली तम्मना के साथ जीने को मजबूर होते है. जिंदगी को अगर एक किताब मान लिया जाए तो मैं मानता हूँ की हर किसी का एक ही जवाब होगा कि वो बचपन के चैप्टर को फिर से पढना चाहता है और जिन पन्नो पर बचपन की शैतानियों के किस्से लिखे है उन पन्नो की महक से उसका रोम-रोम आज भी महक उठता है.

बचपन की बात चले और गर्मियों की छुट्टियों का जिक्र न हो ऐसा हो ही नहीं सकताकम से कम मेरे साथ तो नहीं ही होगा क्योंकि  मेरे बचपन में गर्मियों की बहुत सारी यादें हैजिसमे आम के घने बगीचे हैफूलों के बाग़ हैउड़ती हुई तितलियाँ  हैबारिश हैकागज की कश्ती हैलहलहाते खेत हैमासूम से खेल-खिलौने हैखुट्टी-मिल्ली हैनानी-दादी की कहानियां हैचोरी के लड्डू हैझूठी- सच्ची अफवाहें हैगुड्डा-गुडिया हैऔर इन सब के आगे वो दोस्त है जिन्हें मैंने उतनी ही इमानदारी और सच्चाई  के साथ बनाया था. जितनी सच्चाई और इमानदारी के साथ हम साँसे लेते है और पलकें झपकाते है. जैसे पलक झपकने और  सांसों के आने-जाने की हमें कोई खबर नहीं होती और ये बस हो जाते है ठीक उसी तरह मैंने वो दोस्त बनाये नहीं थे बस बन गए थे. मैंने उन दोस्तों में कभी जात-धर्मगरीबी-अमीरीगोरा-कालासेक्स-जेंडर जैसा कुछ देखने या तलाशने की कोई कोशिश नहीं की. वो मेरे लिए बस मेरे दोस्त थे,बस दोस्त. फिर चाहे वो प्रधान जी का बेटा हो या फिर घर काम करने वाली आई की बेटी हो मेरे लिए सब बार बार थे. मैं जिस तरह किसी चुन्नूमुन्नू रामू,श्यामू के साथ रहता था ठीक उसी तरह किसी मुन्नीगुड्डीसीतागीता के साथ पाया जाता था. ये बात सिर्फ मुझ पर ही लागू नहीं थी बल्कि हम सब के सब ऐसे ही थे. और मेरे ख्याल से हर बचपन ऐसा ही होता है आपका भी रहा होगा. पर जैसे-जैसे हम बड़े होते है कई  तरह की शरहदोंदीवारों और लकीरों के शिकार होते जाते हैये हमें बच्चो से लड़का-लड़कीअमीर-गरीबहिन्दू-मुसलमानब्रह्मण-दलित और ना जाने क्या क्या बना देतीं  है. हम कहने को तो आज़ाद होते है पर अगर सही से देखें तो हम आँखों से न दिखने वाली शरहदोंदीवारों  और लकीरों  में कैद है. जिन्हें बस महसूस किया जा सकता है.जब हम सोकॉल्ड सिनिअरसोकॉल्ड सिविलाइज्ड हो जाते है तब हमें किसी से मिलने  तो छोडिये बात करने से पहले भी ये सोचना पढता है कि सामने वाला हमारे लेवल का है या नहीं इस आदमी या औरत से बात करने पर सोसाइटी का कहेगी सामने वाले की जात से लेकर कपड़े तक सब कुछ हम देखने लग जाते है और अपने लेवल और स्टैण्डर्ड  के चक्कर में ऐसा पड़ते है की वो बचपन की पंछीनदिया और  पवन के झोंके वाली आजादी कहीं गुम हो जाती है और हम एक कैदी ही रह जाते हैं.

मेरा ये दर्द आपने भी जिया होगा क्योंकि मैं ये जो आप से शेयर कर रहा हूँ ये एक भोगा हुआ यथार्थ है. ये न दिखने वाली कैद तब महसूस की जा सकती है जब आप हाइयर एजुकेशन में हों या अच्छी जॉब मे हों और गरीबी की वजह से आपका बचपन का दोस्त सब्जी का ठेला या ऐसा ही कोई काम करता हो और आप उससे वैसे ही मिलना चाहें जैसा बचपन मे मिलते थे तो आप कभी नहीं मिल सकते क्योंकि वो आपके स्टैण्डर्ड का नहीं रहा और सोसाइटी में रहना है तो स्टैण्डर्ड बना कर रहना पड़ेगा. इसी तरह जब कोई लड़की जो आपकी बचपन मे सबसे अच्छी दोस्त रही हो आपको पहचान तक नहीं पाती और रास्ते मे आँख चुराते हुए चली जाती है वो भी सिर्फ इसलिए क्योंकि वो समाज की उस सोच की शरहद मे कैद है जो किसी जवान लड़के-लड़की को दोस्त नहीं मानती. वो सोच कहती है कि लड़की एक सफ़ेद चादर होती है जिस पर एक बार दाग लग जाए तो कभी धोया नहीं जा सकता. इसीलिए वो लड़की उसी सोकॉल्ड सफेदी को बचाने के लिए ही अपने बचपन के दोस्त तक से अजनबियों की तरह व्यवहार करती है.

ऐसी ही कई और दीवारें, शरहदें और लकीरें है जो हमे रोकती, बांधती और बांटती रहती है. और हम सोसाइटी और स्टैण्डर्ड के नाम पर एक जकड़न और कैद को हंस कर जीने लिए तैयार हो जाते है. शायद यही वजह है जो हमे जकड़न और कैद के  बड़कपन से कहीं ज्यादा अच्छा मासूम और आज़ाद बचपन लगता है और हम उसे फिर से जीने के लिए हम हँसकर  अपनी सारी दौलत, शोहरत और जवानी लुटाने को तैयार हो जाते है.

तुम्हारा--अनंत 


    

Thursday, May 24, 2012

शोषण से बड़ी संघर्ष की लकीर ..................

एक बेख़ौफ़ लड़की जिसकी आँखों में गुस्से का शैलाब तैर रहा हो, कलाइयों में खनकती हुई चूड़ियों की जगह चमकती रिवाल्वर हो और होठों पर मखमली मुस्कान की जगह एक शक्ति भरी ललकार ने ले रखी हो, आपके हिन्दुस्तानी मन को चौंका  सकती है. आपके इस आश्चर्य का पैमाना तब और भी बढ़ सकता है जब उस लड़की की आड़ में एक हट्टा-कट्टा नवजवान छिप कर शरण ले रहा हो. फिल्म इश्क्ज़ादे के एक पोस्टर में मैंने जब ये तस्वीर देखी जिसमे परणीती चोपड़ा  के आड़ में अर्जुन कपूर छिपते हुए दिखाए गए हैं तो मेरे मन में एक अनजानी सी तसल्ली का भाव उठा, ये भाव क्यों आया मैं नहीं जनता बस इतना कह सकता हूँ कि किसी हिन्दुस्तानी लड़की को तस्वीर में ही सही पर इतनी  बेख़ौफ़, बेबाक और इस तरह लड़ते हुए देख कर अजब संतोष मिला था. ये तस्वीर हिन्दुस्तानी लड़की की बरसो पुरानी गढ़ी-गढ़ाई छवि की हदें तोड़ रही थी और उस परिभाषा के एकदम उलट  थी जिसमे लड़की को डरी-सहमी, सुशील,सुन्दर, संस्कारी, सहनशील और अपनी खुद की सुरक्षा के लिए भी मर्दों की मोहताज बताया गया है.ये तस्वीर  उस देश में आशा की किरण सी लगी  थी  जिस देश में हर 47 मिनट के बाद एक बलात्कार होता हो, हर 44 मिनट के बाद एक महिला का अपहरण होता हो, 60 % कामकाजी महिलाएं किसी न किसी तरह यौन शोषण का शिकार होती हो, लगभग 30  हज़ार बच्चियां वस्यावृति की गिरफ्त में हों. जहाँ स्कूल-कालेज, बस-ट्रेन, गली-सड़क, गाँव-शहर यहाँ तक ही घर में भी महिलाएं असुरक्षा के भाव से ग्रस्त हों, जहाँ  सत्ता के गलियारों से लेकर खेत-खलिहानों  तक महिलाओं के शोषण की दर्द भरी कहानी फैली हो. जहाँ औरत  महज एक जिस्म हो और स्त्री-विमर्श देह से शुरू हो कर देह पर ही ख़तम हो जाता हो. जहाँ  औरत को देवी कह कर शोषण किया जाता हो और हर  तरह के बलिदान के लिए हंस कर तैयार रहने को विवश  किया जाता हो, वहां किसी महिला की ऐसी तस्वीर चौंकाती भी है  और तसल्ली भी देती है जिसमे वो अपनी सुरक्षा के लिए किसी मर्द  की मोहताज़ नहीं है बल्कि किसी मर्द को भी सुरक्षा देने का माद्दा रखती है और ईंट का जवाब पत्थर से देने के लिए तैयार है.

हमारी सोसाइटी में वूमेन आइडेन्टिटी को लेकर काफी कंट्राडिक्शन है. एक तरफ हम उसे शक्तिस्वरूपा कहते हुए पूजते है तो दूसरी तरफ हम उसे उसके अबलापन और कमजोरी का एहसास कराते हुए उसकी बेहतरी के लिए चारदीवारी के भीतर अपना संसार तलाशने और गढ़ने की नसीहत देते है.पर इसके बाद भी अगर कोई औरत आजादी के एहसास को जीने के लिए अपने वजूद को तलाशते हुए समाज में आती है तो उसे हमारे उसी सभ्य समाज में बलात्कार और शोषण का सामना करना पड़ता है. हमारे समाज में व्याप्त  ये विरोधाभाष और स्त्रियों को कम समझने का नजरिया हमारे विकास का सबसे बड़ा बाधक है

हम अक्सर इतिहास के उन पन्नो को नजरअंदाज कर देते है जिनमे स्त्रियों के साहस, संघर्ष और शौर्य  की गाथा लिखी है. मुझे इश्क्जादे फिल्म के उस पोस्टर को देख कर प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की उन वीरांगनाओं की याद आ गयी जिन्होंने घर की दहलीज लांघ कर फिरंगियों के दांत खट्टे कर दिए थे और जिनके कंगनों की खनक तलवार की झंकार में बदल गयी थी. ये मेरठ की सभ्य समाज से निष्कासित कोठे वाली नर्तककियां ही थीं जिन्होंने हिन्दुस्तानी फौजियों को ताने मार कर देश के लिए लड़ने को  प्रेरित किया था. 1857 के महासंग्राम में रानी लक्ष्मी बाई, अवन्ती बाई,जीनत महल, बेगम हजरत महल, जैसी  मुख्यधारा की कुलीन महिलाओं के अलावा भगवती देवी, इन्दर कौर, जमीला बाई, उदा पासी, आशा देवी, बख्तावारी देवी, जैसी पिछड़ी और दलित महिलाएं भी हथियार उठा कर देश के लिए लड़ रही थी. 12 मई को प्रबुद्धनगर में बख्तावारी देवी अंग्रेजों  के खिलाफ युद्ध में कूद पड़ीं उन्होंने कैराना की महिलाओं का एक जत्था बना रखा था .आशा देवी भी इन्ही क्रांतिकारी महिलाओं में शामिल थी. बख्तावारी देवी  और आशा देवी ने अपनी महिला सेना के साथ शामली तहसील पर धावा बोल दिया जहाँ शोभा देवी ने पहले से ही महिलाओं की एक सेना बना रखी  थी जिसमे करीब 250  महिलाएं शामिल थीं ये सभी महिलाये अंग्रेजों से खूब लड़ीं और अपने अप्रतिम शौर्य की अमिट गाथा कह गयी. इस विद्रोह की सजा के तौर पर लगभग 250 महिलाओं को फांसी के तख्ते पर लटका दिया गया. असगरी बेगम को जिन्दा जला दिया गया और शोभा त्यागी को आधा जमीन में गाड़ कर  कुत्तों से नुचवाया गया. इससे कहीं बड़ी,गहरी और गाढ़ी जुल्म  की  दास्तान लिखी गयी पर हिन्दुस्तानी महिलाएं न डिगीं और न  ही टूटीं बल्कि संघर्ष की राह  पर देश की रक्षा के लिए बलिदान हो गयी.

पित्रसत्तात्मक समाज महिलाओं के योगदान को कम करके आंकता या नजरअंदाज करता है पर अफ़सोस तो तब होता है जब खुद वूमेन  कमुनिटी अपने इस स्वर्णिम साहस, संघर्ष और शौर्य के इतिहास से कटी हुई पायी जाती है आज जरूरत है कि देश की लड़कियां  उन लाखों शहीद विरंगानायों  से प्रेरणा ले जो अपनी सुरक्षा  के लिए किसी मर्द के कन्धों की  मोहताज नहीं थीं बल्कि सारे  देश की रक्षा के लिए संघर्ष करते हुए शहीद हुईं थीं.
मुझे इश्क्जादे फिल्म के उस पोस्टर में अतीत के सहस से प्रेरणा लेती हुई भविष्य की उस  हिन्दुस्तानी लड़की की झलक मिली थी जो शोषण से बड़ी संघर्ष की लकीर खींचने पर यकीन रखती है. 

तुम्हारा--अनंत 

Thursday, April 26, 2012

हार न मानने की ज़िद......

continuity has its own music''यानी सततता का अपना संगीत होता है, मैंने जब ये कोटेशन पढ़ा, तब ये मुझे बिलकुल समझ नहीं आया था. पर उस दिन इस कोटेशन का मतलब मुझे अचानक से समझ में आ गया जब ट्रेन में सफ़र के दौरान, मेरे आपर्टमेंट के दुसरे छोर से एक खनकती हुई आवाज़ मेरे कानों में पड़ी....ये हौसला कैसे झुके , ये आरजू कैसे रुके, मंजिल मुस्किल तो क्या, साहिल धुंधला तो क्या.....दुनिया और जिंदगी में कुछ कर दिखाने के जज्बे से लैस ''डोर'' फिल्म के इस गाने को सुन कर मैंने अपनी इच्क्षा  से अपनी नींद तोड़ ली और अपनी बर्थ पर बैठ गया, लगातार चलती हुई ट्रेन, उसके खड़कते हुए  पुर्जे, लोहे की पटरी पर दौड़ते हुए लोहे के पहिये, ट्रेन का सायरन और पैसेंजर्स की आवाज़ सबने मिल कर एक मुजिकल कोलाज़ सा बना दिया था. ये म्यूजिक continuity की म्यूजिक थी, लग रहा था कि कोई बैंड ग्रुप ट्रेन में इंविसिबल फॉर्म में अपने इन्सट्रूमेंट बजा रहा है और उनका साथ देने के लिए अपार्टमेन्ट के दुसरे छोर  से कोई गा रहा है, 

अभी गाने का मुखड़ा भी ख़तम नहीं हुआ था कि गाने का ट्रैक चेंज का दिया गया और इस बार 1940 की ''बंधन'' फिल्म का गाना ...चना जोरगरम बाबू मैं लाया मजेदार...चना जोरगरम.... गाते हुए वो मखमली आवाज़ मेरे कुछ नजदीक आती हुई सी लगी. कुछ ही देर में 12 -14 साल का वो गायक मेरी आँखों के सामने था, कमर पर चने की एक पेटी बांधे, कंधे  पर पानमसाला की लडियां, जेब में सिगरेट के पैकेट, मैले कुचैले-कपड़ों  में हँसता गाता सा बचपन, मेरे सामने जिंदगी के गीत गाते हुए खड़ा था उसकी आवाज में एक अजीब सी कशिश थी जो लोगों को अपनी  ओर खीच रही थी, मैं उस बच्चे की प्रतिभा देख कर चौंक गया था, जिस आवाज़ को पाने के लिए लोग घंटो रियाज करते हैं, हजारों रूपए टुय्शन  पर खर्च कर देते हैं वो उसने न जाने कैसे हासिल कर ली थी.

दस साल की छोटी सी उम्र में उस बच्चे के पिता की ट्रेन दुर्घटना में मौत हो गयी थी, वो अंधे थे और ट्रेन पर ही मोमफाली, पान मसाला, वगैरह बेच कर घर का खर्च चलते थे.घर पर बीमार माँ और छोटे भाई बहनों की जिम्मेदारी उस नन्हे कंधो पर आ गयी थी. जिंदगी से डर कर भागने के बजाय उसने लड़ना मंजूर किया और दस साल की उम्र से ही ट्रेन पर चने बेचने लगा. ये सारी जानकारी मुझे उस बच्चे से बात-चीत के दौरान मालूम चली. मैंने उससे उसके सपने के बारे में पुछा तो उसका सीधा जवाब था ''अपने छोटे भाई बहनों को पढ़ा-लिखा कर बहुत बड़ा आदमी बनाऊंगा''.
जीवन के प्रति ये उर्जावान नजरिया और स्ट्रगल की ये स्पिरिट देख कर मन में  अजीब सी इन्स्पिरेशनल वेब बहने लगी थी.खुद अनपढ़ हो कर भी अपने भाई बहनों को अच्छी शिक्षा दिलाने के लिए उसका ये संघर्ष वाकई सलाम करने लायक था.उसकी मेरी बात अभी चल ही रही थी की दूसरा स्टेशन आ गया और वो बच्चा कोई और गीत गुनगुनाता हुआ उतर गया. पर मैं उसके जाने बाद भी उसके होने को महसूस करता रहा और ये सोचता रहा ही छोटी सी उम्र में लाइफ के इतने बड़े चैलेन्ज का  हंस कर सामना करने वाले  इस बच्चे में एक आइडियल के सारे गुण  हैं. आज जब यूथ  थोड़ी सी परेशानी से हार कर जिंदगी ख़तम कर ले रहा है तभी  ये बच्चा हँसते  हुए परेशानियों के पार जाने के लिए स्ट्रगल कर रहा है. उसकी आँखों में मुझे  डर या उदासी नहीं दिखी थी बल्कि उम्मीद और स्ट्रगल  की चमक दिखी थी. उस बच्चे को देख कर मुंह से अनायास  फूट पड़ा था. हार न मानने की ज़िद जीत तक  ले जाती है.

आप-हम सब लोग अपने आस-पास रोज न जाने कितने बच्चों को, बूढों को और विकलांगों को, काम करते हुए देखते हैं. और उसे देख कर बस यूं ही जाने देते हैं, पर जरा सोच कर देखिये कि जब कुछ न होते हुए भी ये लोग जिंदगी से बिना कोई सिकवा-शिकायत करे अपने सपनों के लिए संघर्ष कर सकते है तो हम क्यों नहीं ? मेरा यकीं मानिये जिस दिन आप ये सोच कर काम करेंगे की जब  ये 12 -14 साल का बच्चा १२ घंटे  हँसते हुए मेहनत कर सकता है तो मुझे तो और करनी चाहिए. ये सोच आपके लक्ष्य के प्रति आपके प्यार को पढ़ा देगी और आपको आपका काम आसान लगने लगेगा. वैसे भी जिस देश में बचपन 12  घंटे सिर्फ रोटी के लिए काम कर रहा हो उस देश की जवानी भला कैसे आराम  कर  सकती है.

हम किताबों में, अखबारों में, टीवी पर, रेडियो पर अपने आइडियल ढूढ़ते  है, जिनके संघर्ष और मेहनत को हम अपनी आँखों से देख नहीं पाते , हमें अपना आइडियल इन्ही   बच्चों में तलाशना चाहिए जो हमारी आँखों के सामने जी तोड़  मेहनत करते है और जिंदगी की एक नई परिभाषा गढ़ते है.इन्ही बच्चों की जमात से ही डॉ.कलाम और अब्राहम लिंकन जैसे लोग निकलते है. जो परेशानियाँ देख कर घबराते नहीं मुस्कुराते है, गाते है वही   परेशानियों के पार जीत के पास तक जाते है. उस बच्चे के जीवन में परेशानियों के खिलाफ  चल रहे  लगातार  संघर्ष में मैंने एक संगीत सुना था; संघर्ष का संगीत. ये संगीत सुन कर मैंने वही कोटेशन बोला था  जो मुझे बहुत पहले  समझ में नहीं आया था और जिसका मतलब मैंने उस बच्चे से जाना था ''continuity has its own music''


ये आलेख आई-नेक्स्ट (दैनिक जागरण ) में 24-04-2012 को प्रकाशित हुआ है; आलेख का लिंक ये रहा :----http://epaper.inextlive.com/34637/INEXT-LUCKNOW/24.04.12#page/15/1

तुम्हारा--अनंत 

जिंदगी उठ खड़ी होती है हर वार के बाद......


आज कल अखबारों में सुसाइड शब्द सुर्खियाँ बना हुआ है तो सोचा कि इस बार इस पर ही आपसे कुछ शेयर किया जाए, मुझे अक्सर ऐसा लगता है कि साँसों के लम्बे सफ़र में जब जिन्दगी किसी अँधेरी गली में झटके से ख़तम कर दी जाती है, तब उसे सुसाइड कहते है. ये शब्द जितना छोटा और सरल है इसका मतलब उससे कहीं ज्यादा भयानक और यातनापूर्ण है. कानों में इस शब्द के जाते ही नसों में सन्नाटा दौड़ जाता है और मुहं से बस एक ही वाक्य लिकालता है '' हे भगवन! दुश्मन के साथ भी ऐसा न हो''

सुसाइड करने वाला तो अपनी जिंदगी ख़तम कर लेता है पर उसके पीछे उसके अपनों की जिंदगी मौत से भी बद्दतर हो जाती है. दर्द, आंसू और पछतावे के सिवा अगर उनके पास कुछ बचता है तो वो ''सुसाइड नोट'' जिसमे परेशानियों और चुनौतियों से डर कर भागने का बयान दर्ज होता है.

21 वीं सदी सपनों, आशाओं, प्रतियोगिताओं और दौड़ की सदी है. यहाँ अपनी चाहत की दौड़ में दौड़ते कदम थकते भी हैं, बहकते भी है, और लड़खड़ाते भी, पर इसका मतलब ये कतई नहीं निकलना चाहिए कि हम हमेशा के लिए हार गए और अब जिंदगी ख़तम कर ली जाए. सुसाइड अक्सर वो लोग करते हैं, जिन्हें  इस बात पर विस्वास नहीं  होता की रात के बाद सवेरा आता ही आता है, इसलिए रात का डट कर मुकाबला किया जाना चाहिए  न कि डर कर आत्महत्या.

सुसाइड के केस को जब हम स्टडी करते है तो पाते हैं  कि इसमें भी युवा ही सबसे आगे हैं, ऑस्ट्रेलिया में 15 -29  वर्ष के युवाओं कि जितनी भी मौतें होतीं हैं उसमे सुसाइड दूसरा सबसे बड़ा कारण होता है. अमेरिकन यूथ में सुसाइड मौत की तीसरी सबसे बड़ी वजह है. इंडिया में ये समस्या कुछ ज्यादा ही विकराल हो जाती है यहाँ 15 -29 साल के बीच जितनी भी डेथ होती है उनके 1/3  के पीछे सुसाइड का ही हाँथ होता है . क्राइम रिकार्ड ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार इंडिया में सुसाइड रेट 8 % की दर से बढ़ रहा है. 

मैं जब कभी भी सुसाइड के बारे में कुछ सुनता हूँ तो मुझे मेरे दोस्त की याद आ जाती है जो ग्रेजुएशन के एक्जाम में मेरी पीछे वाली सीट पर बैठा था , इनकम टैक्स का पेपर आखरी था जो काफी टफ आया था. सभी के पसीने छूट रहे थे, लिहाजा उसका परेशान होना भी लाजमी था, हम सब तीन घंटे तक सर खपाते रहे पर वो बीच में ही पेपर जमा कर के चला गया,  ये  देख कर थोड़ी हैरानी हुई पर लगा की ये पढने के काफी तेज है सो हो सकता है जल्दी सॉल्व कर लिया हो. पर अगली सुबह जब अखबार खोला तो होश उड़ गए थे, उसने सुसाइड कर  ली थी और सुसाइड नोट में टैक्स का पेपर ख़राब हो जाने के लिए अपने मामी-पापा से माफ़ी मांगी थी, उसने लिखा था ''मम्मी-पापा मुझे माफ़ करना, मैं भैया और दीदी की तरह C.A. नहीं बन सकता, मैं आपका नाम नहीं ख़राब करना चाहता, इसलिए सुसाइड कर रहा हूँ,, 

मुझे उसकी मौत से एक अजीब सा झटका लगा था. जब रिजल्ट आया तो मैंने अपना रिजल्ट देखने से पहले उसका रिजल्ट देखा, उसने टैक्स में भले ही कम नंबर पाए हो पर बाकी सब्जेक्ट में उसे सबसे ज्यादा मार्क्स मिले थे इस तरह वो हमारे कॉलेज का टॉपर था. पर इस चीज को देखने के लिए वो अब हम लोगों के साथ नहीं था. वो पढ़ाई से ज्यादा स्पोर्ट्स ,एक्टिंग और सिंगिंग एन्जॉय करता था और उस फिल्ड में बेस्ट था पर मम्मी पापा उसे उसके भैया और दीदी की तरह C.A. बनाना चाहते थे. जिसकी वजह से उसे हमेशा एक इनर कंफ्लिक्ट से फाईट करना पड़ता था. इसी कंफ्लिक्ट से फाईट करते हुए उसने सुसाई कमिट कर ली.

सुसाइड के किसी केस को सुन कर सबे पहले इसका रीजन जाने को मन करता है जिसके जवाब में कई चीजे सामने आती है. मसलन एकेडमिक विफलता, प्यार में धोखा, अच्छी जॉब न मिल पाना, या घर वालों से कंफ्लिक्ट, इन कुछ में रीजन्स के अलावा भी कई और कारण हो सकते है. पर सुसाइड  के लिए इनमे से कोई भी वजह जिम्मेदार नहीं होती, सुसाइड की असल वजह स्ट्रगल स्पिरिट और सहन शक्ति की कमी का होना है जो आदमी के धैर्य को घटा कर उसे पलायनवादी यानी क्विटर बना देती है.लिहाजा आदमी जरा सी भी टफ कंडीशन आने पर भागना चाहता है और न भाग पाने की कंडीशन में सुसाइड  कर बैठता है. 

 हमें कभी नहीं भूलना चाहिए कि कोई भी प्रोब्लम हमारी जिंदगी से बड़ी नहीं हो सकती है जिंदगी के साथ प्रोब्लम आती-जाती रहती है, इसे हमें लाइफ का पार्ट समझ कर चलना चाहिए , याद करिए जब छोटे थे तो बोर्ड एक्जाम का कोई पेपर ख़राब हो जाने पर या पहले प्यार  में धोखा खाने पर कैसे-कैसे अजीब ख्याल आये थे अगर उस समय हमने स्ट्रगल नहीं किया होता हो हम यहाँ नहीं होते और हमारे अपनों के पास भी बचता एक ''सुसाइड नोट'' जो हमारे भगौड़े होने की गवाई दे रहा होता. हम आज जिन्हें भी जीत की  ऊंचाई  पर देख रहे हैं वो कई हार के बाद यहाँ तक पहुंचे है. उनके जीवन में भी कई बार ऐसे पल आये थे जब उन्हें लगा था कि जिंदगी कुछ नहीं है अब इसे ख़तम कर लेना  चाहिए पर उन्होंने स्ट्रगल किया और आज वो, वो है जीने हम अपना हीरो मानते है. इसलिए हमें ये कभी नहीं भूलना चाहिए कि..... और भी जीत है ''अनंत''एक हार के बाद, जिंदगी उठ खड़ी होती है हर वार के बाद,,

आर्टिकल का लिंक ये है :----http://epaper.inextlive.com/30968/INEXT-LUCKNOW/29.03.12#page/11/1

तुम्हारा --अनंत

बचपन की यादों वाला वो कमरा....


हमारे आपके सबके घर मे एक स्टोर रूम होता है । एक बड़ा अंधेरा बंद कमरा जिसमे पुराने और बेकार समान बेतरतीब पड़े रहते हैं. ये कमरे या तो समान रखने के लिए खोले जाते हैं या तो कबाड़ निकाल कर बेचने के लिए, इसके अलावा इस कमरे से जो एक और इंपोर्टेंट काम लिया जाता है, वो है बच्चो को डराने का काम, मेरे मम्मी-पापा ने भी मुझे बचपन मे कबाड़ वाले कमरे के भूत से खूब डराया है, इस भूत के डर से स्कूल न जाने की जिद्द, दूध न पीने के नखरे, और देर रात तक जागने का रोमांच सब कुछ छोडना पड़ता था। कबाड़ वाले कमरे में भूत है, ये बात मेरे मन मे बड़े गहरे से बैठ गयी थी, शायद इसलिए बचपन में मैंने कभी उस कमरे को कभी खोलने की हिम्मत नहीं दिखाई. मैं उस वक़्त घर से कहीं और चला जाता था जब उस कमरे से कबाड़ बेचने के लिए निकाला जाता था, मैं जब घर आता तो मुझे कुछ चॉकलेट दी जाती और बताया जाता  कि भूत अंकल ने मुझसे खुश होकर दी है, और कहा है कि खूब मन लगा कर पढ़ाई करूँ, अच्छे-अच्छे काम करूँ, शैतानी और जिद्द न करूँ और न जाने ऐसे कितने आदेश या फरमाइशें भूत अंकल के नाम पर मेरे मम्मी-पापा मेरे सामने रख देते थे।


चॉकलेट खाते वक़्त अक्सर मुझे ऐसा लगता था कि भूत कोई जज होता है। जो हर घर के कबाड़ वाले कमरे मे रहता है, वो बच्चो के अच्छे बुरे कामों को देखता रहता है। अच्छा काम करने पर चॉकलेट देता है और बुरा काम करने पर बच्चे को खा जाता है। माँ मुझसे अक्सर कहा करती थी शरारत करोगे तो भूत अंकल तुम्हें खा जाएंगे।

मेरी ये सोच कहीं न कहीं मेरे मम्मी-पापा के लिए काफी मुफीद थी क्योंकि इससे उन्हे मेरे सवाल-जवाब और नखरों से छुटकारा मिल गया था। जब उनसे कोई बात नहीं संभलती तो वो उसी स्टोर रूम की ओर इशारा कर दिया करते थे और मैं शांत हो जाया करता था। उन्होने मेरे ऊपर एक प्रकार की अनजानी आभासी सत्ता स्थापित कर दी थी। जिसके बारे मे उन्हे खुद भी नहीं मालूम था। वो अनजाने  मे मेरी साइंटफिक अप्रोच को किल कर रहे थे।

ये कहानी सिर्फ मेरे बचपन की नहीं है बल्कि मेरा मानना है आप सबलोगों के बचपन मे भी ये घटी होंगी. हो सकता है, आपके बचपन मे फियरिंग कैरेक्टर झोलीवाले बाबा, अंधेरेवाली बुढ़िया, चमकीली आँखवाली बिल्ली, पीपलवाले बाबा और ऐसे ही नामों वाले कोई और भी हो सकते है, पर सबका काम वही होता था. जो कबाड़ वाले कमरे का भूत करता था।

मेरी मिमोरिज मे स्टोर रूम तबतक किसी डार्क रूम की तरह था, जबतक मैं उसे खोल कर उसके अंदर नहीं गया। पिछले दिनों जब होली मे उसकी सफाई करने के लिए मैं उसके भीतर गया तब मुझे लग रहा था कि अभी भूत सामने खड़ा हो जाएगा, मेरी आंखे उसे ढूंढ रही थी। लेकिन वो नहीं मिला, उसकी जगह मुझे ‘’सुल्तान’’ मिल गया, उसके मिलते ही मैं खुशी से नाच उठा और उसे उठा कर चूम लिया। ‘’सुल्तान’’ के बगल मे ‘’मुनमुन’’ पड़ी हुई थी मैंने उसे भी उठाया और उसपर जमी हुई धूल हटाई। सुल्तान साइकिल के टूटे हुए पहिये से बनाया गाया एक गाड़ीनुमा खिलौना था. जिसे बचपन में मैंने बनाया था और मुममुन मेरी छोटी बहन की बनाई हुई कपड़े की  गुड़िया थी। मैं दिन भर  सुल्तान के साथ खेलता रहता था और छोटी मुममुम के साथ। ये हमारे सबसे अच्छे दोस्त थे. जो हमारी सब बातें मानते थे। मुझे याद आ रहा था कैसे मैंने सुल्तान को वीडियो गेम खेलने के लिए गेम वाले के यहाँ इस शर्त के साथ रख दिया था कि जब पैसे दे दूँ तो मुझे दे देना, उसे लाने के लिए मैं पैसे चोरी करते हुए घर मे पकड़ा गया था और पापा ने ‘’समझवान लाल’’ से मेरी खूब पिटाई की थी. मैं रोते हुए भी बस ‘’सुल्तान-सुल्तान’’ कह रहा था. पापा ने सुल्तान के बारे मे पूछा और मेरे बताने पर शाम को उसे अपने साथ ले आए और मुझे गिफ्ट किया। मैं ये सब याद कर के हंस ही रहा था कि पापा की वो छड़ी ‘’समझवान लाल’’ भी दिख गई, मुझे लग रहा था कि मानो समय बीतने के साथ मेरा बचपन भी बीत कर इसी स्टोर  रूम मे छिपा जा रहा था और आज मैंने उसे ढूंढ लिया है । बाबा की आराम कुर्सी वहीं पड़ी थी, दादी की टूटी हुई खाट दीवार से सटी हुई खड़ी थी, मेरे और छोटी के पुराने खिलौने मानों मुझे देख कर पहचान गए हों और शरमा रहे हों, बचपन फिरसे जिंदा हो गया था।

काफी देर हो गयी थी. मम्मी बहार से आवाज़ लगा रहीं थीं शायद उन्हे पहली बार लगा होगा कि कबाड़ वाले कमरे मे कोई भूत रहता है और उसने मुझे खा लिया तभी वो तेज आवाज लगती हुई कमरे मे घुसीं मैंने उन्हे देख कर कहा मम्मी आप झूठ कहती थी. कबाड़ वाले कमरे मे भूत नहीं रहता, यहाँ बचपन रहता है.यादें रहती है. मम्मी ने भी पहली बार उस कमरे को मेरी निगाह से देखा,  और उन्होने भी मेरी कही हुई बात दोहरा दी और हम दोनों काफी देर तक कबाड़ वाले कमरे मे यादों के बीच रहे....बचपन के बीच रहे.

ये लेख दैनिक जागरण के (आई नेक्स्ट) में दिनांक 26-12-2013 को प्रकाशित हुआ है नीचे लिंक है 
http://inextepaper.jagran.com/203641/I-next-allahabad/26.12.13#page/11/2



अनुराग अनंत 

Sunday, March 25, 2012

भगत सिंह मरे नहीं हैं जि़दा हैं,..............


"नौजवानों को अपने पैरों पर खड़े होना चाहिए। उन्हें अपने आप को बाहरी प्रभावों से दूर रहकर संगठित करना चाहिए। उन्हें चाहिए कि मक्कार और बेइमान लोगों के हाथों में न खेलें, जिन के साथ उनकी कोर्इ समानता नहीं है और जो हर नाजुक मौके पर आदर्श का परित्याग कर देते हैं। उन्हें चाहिए कि संजीदगी और र्इमानदारी के साथ सेवा, त्याग और बलिदान को अनुकरणीय वाक्य के रूप में अपना मार्गदर्शक बनाये।"-----भगत सिंह 


भगत सिंह 22 वर्ष की उम्र में जब अपने साथियों से यह कह रहे थे तब ये महज उनकी बात नहीं थी। ये नवजवानों के लिए जवानी की एक परिभाषा थी। मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण के विरूद्ध लड़ते हुए जिस नवजवान से भगत सिंह ने ये बातें कही थी, वह आधुनिकता की अंधी दौड़ में किसी अंधेरी गली में गुम हो गया है। उसकी ज़ुबान पर लहराता हुआ ‘’इंकलाब जिंदाबाद’’ का नारा अपह्र्त कर लिया गया है और जवानी की परिभाषा अंधे और क्रूर सपनों के बाट तले रौंद दी गयी है। आज का नौजवान भगत सिंह के विचारों से ज्यादा क्लोज़अप टूथपेस्ट के उस विज्ञापन पर विश्वास है जिसमें कहा जाता है कि इससे ब्रश करने से लड़कियाँ मूंह चूमने को आतुर हो जाती हैं। शीला की जवानी और मुन्नी की ज़ुल्फों में उलझे हुए नौजवान से भगत सिंह की ये अपेक्षाएं खांटी बेमानी लगती हैं। 

जब देश की आत्मा तक चूस रहे भ्रष्ट राजनीतिज्ञों के नाम जपते, मतलब परस्त, राजनीतिक पार्टियों के बहुरंगे झण्डे लहराते नौजवान अपने तुच्छ से तुच्छ निजी हित के आगे घुटने टेकते नजर आते हैं,  उस वक्त सच कहूँ तो मुझे एक गहरी कोफ्त होती है, उस तथाकथित नौजवान से जो भगत सिंह सरीखे शहीदों की शहादत से मिली आज़ादी का दोहन कर रहे हैं। आज देश ऐसे नौजवानों से भरा पड़ा है जिनके सपनों की उड़ान एक बंगला, एक गाड़ी और एक छोटे परिवार पर दम तोड़ देती है। वो अपने तुच्छ सपनों को पूरा करने के लिए किसी भी हद तक गिरने को सहर्ष तैयार रहते हैं।

भगत सिंह के सपनों का नौजवान और सपनों का भारत दोनों ही न जाने कहाँ सिसकियां भर रहे हैं उनके विचारों के स्पंदन तभी सुनार्इ पड़ते हैं जब इस देश की चुनी हुर्इ, पूंजीवाद की अभिभावक सरकार नंदीग्राम और सिंगूर की ज़मीनें छीनकर मुनाफाखोरों  की भूख मिटाने के प्रति प्रतिबद्धता निभाने पर उतारू नज़र आती है। भगत सिंह बक्सर के जंगलों में ‘'सोनी शोरीं’’ की आवाज़ में उस वक्त इंकलाब जि़ंदाबाद चीखते हुए पाए जाते हैं, जब हमारे संविधान के तथाकथित रक्षक उसकी कोख में पत्थर डाल रहे होते हैं। भगत सिंह उस वक्त मुस्कुराते  हुए पाये जाते हैं जब एक गरीब जुलाहे का तन सर्दियों में ढ़का होता है, जब एक गरीब मजदूर परिवार एक छत के नीचे भरपेट खाना खाकर सोता है। भगत सिंह उस वक्त खिलखिलाकर हंसते हैं जब किसी गरीब की बेटी दहेज की कमी से जलार्इ नहीं जाती, जब मजदूरों का काफिला जि़दगी के सवाल पर उठ खड़ा होता है और उनकी आत्मा का पोर-पोर इंकलाब के रंग से रंग जाता है। भगत सिंह उस समय मायूस हो रहे होते हैं जब छियत्तर करोड़ भूखे देशवासियों की ख़बर से बेख़बर नौजवान विधा बालन के गदराये बदन पर उ –ला-ला कर रहा होता है। भगत सिंह उस समय फिर से बम फेंकने की योजना बना रहे होते हैं जब सुरेश कलमाड़ी, ए राजा, कनिमोझी  और कमोबेस  ऐसे ही सैकड़ों काले अंग्रेज संसद के भीतर बहुमत का चक्रव्यूह रचाकर लोकतंत्र की हत्या कर रहे होते हैं। एक गहरी उलझन भगत सिंह के मन में तब पैठ बना रही होती है जब देश का युवा आम बजट पर गरीबों की टूटती हुर्इ रीढ़ और बहते हुए आंसुओं पर ध्यान न देकर सचिन के सैकड़े पर कार्पोरेटी संचार जनित उन्माद में फंस  कर मिठार्इयाँ  बाँट  रहा होता है और वो अपने विज्ञापनों के दाम बढ़ा रहे होते हैं। भगत सिंह के मन की उलझन तब और बढ़ जाती है जब जनता के मुददे हासिये पर दम तोड़ रहे होते हैं और मीडिया के मंच पर निर्मल बाबा' सरीखे अध्यात्म विक्रेताओं के दरबार सजे होते हैं और देश के तथाकथित बौद्धिक अन्धविश्वास और धर्मान्धता की अफीम के नशे में धुत हो रहे होते हैं। यूँ तो भगत सिंह लाख ढूढ़ने से नहीं मिलते क्योंकि भगत सिंह वक्त और परिस्थितियों  के परिणाम होते हैं, भगत सिंह एक इंसान नहीं वरन एक विचार हैं जो मरते नहीं सर्वत्र फैल जाते हैं जो कभी तीव्र होते हैं तो कभी क्षीण। न होकर भी होना ही भगत सिंह है। जिनके साथ कोर्इ नहीं हैं उनके साथ भगत सिंह हैं। जहां  अवसाद का सूरज चरम पर होता है, व्यवस्था क्रूरता और शोषण के कोड़े बरसाती है। आशाओं का हलक सूखने लगता है मृत्यु और अन्त अनिवार्य सा प्रतीत होता है तब भगत सिंह संघर्ष की आवाज़ बनकर फूटता है।

भगत सिंह हर नौजवान के मन में बसा हुआ एक अरमान है, ये बात और है कि उसके कदम कुछ भटके हैं, मुझे इंतज़ार उस दिन का है, जब नौजवानों का काफिला भगत सिंह की राह पर इंकलाब का परचम लिए उसके जि़ंदाबाद होने तक संघर्ष करेगा और हँसकर बड़े से बड़ा बलिदान देने के लिए तैयार रहेगा । एक नौजवान के तौर पर मैं ये महसूस करता हूं कि 


                                                         ''भगत सिंह मरे नहीं हैं जि़दा हैं, हम सबके अरमानों में, 
                                                          मज़दूर और किसानों में, खेतों और खलिहानों में ''


इंकलाब जिंदाबाद .......भगत सिंह तुम्हारा---अनंत 

Thursday, March 15, 2012

कहानी की कहानी जलेबी की तरह सीधी है .....


सच बोलता हुआ इंसान जितना अच्छा लगता है, सच दिखाती हुई फिल्मे भी उतनी ही अच्छी लगती हैं। अक्सर जब हमे कुछ दिखाना होता है तो हम उसे या तो सुंदर दिखाते है या फिर बदसूरत, जो जैसा है उसे वैसा दिखाना तो जैसे हम भूल ही गए हैं। शायद यही वजह है कि जो जैसा है उसे ठीक वैसा देख कर न चाहते हुए भी चौंकन पड़ता है। कहानी की कहानी सुनाते हुए जब सुजॉय घोष अपना कैमरा कोलकाता की गलियों मे टहलाते हैं तो वो कोलकाता को ठीक वैसा दिखा रहे होते हैं जैसा वो है, उस वक़्त वो उसके चेहरे पर मेकअप नहीं करते, और न किसी हीरोइन का सुंदर और सेक्सी अंग दिखाने के तर्ज पर कोलकाता की खूबसूरत जगह और पॉश इलाकों को शूटिंग के लिए चुनते हैं। कोलकाता को इतना सटीक और सच्चा देख कर सच मे एक चौंकने का भाव जागता है।  कोलकाता की हंसी-खेल, चाल-ढाल, रंग-ढंग, तेवर-कलेवर, त्योहार–पर्व, बाज़ार-हाट, गली-मोहल्ला, आदमी-औरत, बच्ची-बच्चा, बूढ़े-जवान, सबकी मानो जी-राक्स कापी दिखा रहे हो सुजॉय। जिसमे कोलकाता नैसर्गिक रूप से स्वतंत्र और उन्मुक्त दिखाई पड़ता है और सुजॉय उसकी नैसर्गिक स्वतन्त्रता और उन्मुक्तता का पूरा सम्मान करते हुए, एक इंच भी अतिक्रमण करते हुए नहीं पाये जाते, यही वो तत्व है जो परोक्ष रूप से ही सही पर सबसे ज्यादा प्रभावित करता है। 

कहानी की कहानी उस कागज की पुड़िया की तरह है, जिसे चीनी की  पुड़िया कह कर हाथों मे थमाया गया हो और खोलने पर उसके भीतर से मिर्च पाई गयी हो। ‘’कहानी’’ की कहानी उतनी ही सीधी है जितनी एक जलेबी होती है, सबकुछ उतना ही बेपरदा और खुला हुआ है जितना एक प्याज मे होता है, बालीवुड मे बनी सभी सस्पेंस फिल्मों को अगर सब्जियों की  उपमाएँ दी जाएँ तो ‘’कहानी’’ के लिए प्याज से बेहतर कोई और उपमा हो ही नहीं सकती, वो भी एक ऐसी प्याज जिसके हर परत के हटते ही दिमाग के दाँत तले अंगुलियाँ आ जाए और जुबान सिसियाने या चुचुवाने से शुरू हो कर......ओ! माई गाड ! पर ही जा कर रुके। 

अब जब मैं आपसे ये सारी बातें कह रहा हूँ तो आप बेवजह सब्जी, तेल, मसाला, किराना, परचून के बारे मे न सोचें, क्योंकि मेरा ये इरादा कतई नहीं था कि मैं चीनी, मिर्च, जलेबी, प्याज, के दाम के बारे मे बताऊँ, इनके दामों मे जो भी ज्वार-भाटा आएगा उसके बारे मे प्रणब दादा आपको बजट मे बता देंगे, मैं तो बस यही चाहता हूँ कि मेरी ये बातें सुनकर आप सिनेमेटोग्राफर सेतु और फिल्म एडिटर नम्रता राव के काम के बारे मे सोचें, जिन्होने अपने जादू से चीनी की  पुड़िया से मिर्च निकाल दी, और रहस्य की परतों को इतनी खूबसूरती से कसा और बांधा की  वो ईश्वर की नायाब रचना ‘’प्याज’’ की  तरह अद्वतीय हो गयी।
पिक्चर हाल मे ''कहानी'' देखना किसी व्यस्ततम सड़क पर गाड़ी चलाने जैसा है जहां जरा सा ध्यान हटने पर बड़ी दुर्घटना घट सकती है। कहानी देखते वक़्त यदि आपका ध्यान जरा सा भी हटेगा तो दुर्घटना घट जाएगी और फिल्म पूरी करके आप हाल से निकाल आएगें पर ‘’कहानी’’ की कहानी तब तक समझ नहीं आएगी जबतक आप उसकी कहानी अपने किसी मित्र से नहीं पूछ लेते, मगर दुर्भाग्यवश यदि आपके साथी का भी  ध्यान भटका होगा और वो भी आपके ही तरह  दुर्घटना के शिकार हुए होंगे तो ऐसी दशा मे आप दोनों के पास दो ही रास्ते बचते है पहला तो आप दोनों ही अपना पैसा डूबने के गम मे सुजॉय को कोसें और उसकी पुरानी फिल्मों के नाम लेते हुए उसे गाली दें जोकि आपको बमुश्किल याद आएंगी, दूसरा रास्ता ये है कि आप ‘’हमे तो समझ नहीं आई यार’’ ..... जैसा जुमला रट लें और जहां भी ‘’कहानी’’ की कहानी छेड़ी जाए आप बिना एक पल भी गवाएँ झट से अपना रटा-रटाया जुमला दोहरा दें। पर यकीन मानिए इस तरह आप एक अच्छी फिल्म के खराब दुस्प्रचारक साबित होंगे। 

कहानी की शुरुवात एक सफ़ेद चूहे के एक्सट्रीम-क्लोजप शॉट से होती है और किसी कैमिकल के द्वारा समूहिक चूहा संहार पर सीन खतम होता है। फिर कालीघाट मेट्रो-रेलवे पर गैस अटैक का सीन बीतता है, दिमाग कुछ समझने के लिए वर्जिश कर ही रहा होता है कि हवाई अड्डा दिखाई पड़ता है और विद्या बालन यानि विद्या बागची सूटकेस खीचती हुई इंट्री मारती है, उसके  फूले हुए पेट और फिल्म के प्रमोशन से ही बताई जा रही कहानी के आधार पर आप कहानी समझना शुरू  कर देते है। इस दौरान आपको पता ही नहीं चलता कि न जाने कब और कैसे आप एक सात माह की गर्भवती महिला का दर्द महसूस करते हुए आर्नव बागची की तलाश मे कोलकाता की ख़ाक छानने लगते हैं। पहली बार मे बिदया बागची के हाथों मे बिसलेरी की बोतल और डायरी  देख कर आपको लग सकता है कि ये कोई जर्नलिस्ट है, पर आपका ये भ्रम तब चकनाचूर हो जाता है जब विद्या कालीघाट पुलिस स्टेशन मे कंप्यूटर मे आई खराबी ठीक करते हुए डायलग मारती  है कि ‘’ थोड़ी सी मिमोरी क्लियर करनी थी अब कोई प्राबलम नहीं होगी’’ और आप समझ जाते हैं कि विद्या कंप्यूटर इंजीनियर है । 

मेरा यकीन मानिए पूरी फिल्म मे आप इंस्पेक्टर राणा को जीभर कर के दुआएं देते रहेंगे और आपके मन की कोख में एक मखमली अरमान विद्या के बच्चे की तरह भविष्य में सच होने कि आस में सांस लेने लगेगा. आप एक खुशनुमा ख्याल के चलते ये मान बैठेंगे एक दिन ऐसा भी आएगा जब सारे हिंदुस्तान भर के ‘’दारोगा जी’’ इंस्पेक्टर राणा की तरह ही सुंदर, सुशील, संस्कारी, और संवेदनशील हो जाएगें, और समाज की  औरतों के साथ ''विद्या बागची'' जैसा व्याहवार करेगे वो न तो बक्सर के बीहड़ मे  ‘’सोनी सोरी’’ के गुप्तांगों मे पत्थर डालेगे, और न ही लखीमपुर खीरी के निघासन थाने परिसर मे बकरी चराने आई नाबालिग ''सोनम'' के छोटे कोमल शरीर को नोचेंगे, रात के सन्नाटे मे किसी अकेली लड़की को इन्हे देख कर डर नहीं लगेगा, ये नोएडा-दिल्ली की सूनसान सड़कों पर प्यार कर रहे किसी जोड़ो की तलाश मे भेड़ियों सा नहीं घूमेंगे, और अगर कभी किसी कार मे लाइट बंद मिलेगी और जवानी के उफान मे कुछ कदम बहक रहे होंगे तो ये महिला कदमो मे बेड़ियाँ डाल कर उसे वासना भरी यातना नहीं देंगे, बल्कि उसे  समझा कर सुरक्षित उसके घर तक पहुंचा देंगे। अच्छा सोचना आपका लोकतांत्रिक अधिकार है, आप किलो मे नहीं बल्कि कुंतल  के परिमाण में अच्छा सोच सकते है। मैं इसके लिए आपको कतई नहीं कोसूंगा कि आप इतने बदतर समय मे इतना अच्छा कैसे सोच सकते हैं, वो भी बिना संघर्ष किए। क्योंकि मैं जानता हूँ कि आप अच्छा इसलिए सोच सकते है क्योंकि आपके साथ बुरा नहीं हुआ है और मेरी यही  दुआ है कि कभी हो भी न ।

परमबत्रा बेनर्जी हिन्दी अच्छी बोल रहे है अब इसके लिए उन्होने विद्या बालन को कितनी टूयशन फीस दी या कितनी बार थैंक्स कहा ये तो परमबत्रा और विद्या के अलावा कोई और जानता होगा तो वो सुजॉय  घोष ही होंगे.
विद्या को बिध्या कहना बिलकुल बुरा नहीं लगता फिर भी वो मोनालिसा गेस्ट हाउस के मालिक और एनडीसी की  रिसेप्स्निस्ट के साथ-साथ जो भी उसे विद्या की जगह बिध्या कहता है, उसे टोक देती है, ताकि उसके टोकने से कोलकाता की क्षेत्रीय जुबान की महक हम तक पहुँच जाये । इस तरह बिन बताए ही हमे पता चल जाता है कि कोलकाता मे व को ब बोला जाता है इसीलिए विद्या को बिध्या कहा जाएगा।

एनडीसी की  एचआर आफिसर एगनेस  को देख कर न जाने क्यों ऐसा लगता है कि ये कुछ कमाल करेगी और वो कर भी देती है कहानी को नया मोड दे कर, यहीं  से आर्नव बागची की खोज मिलन दामजी की खोज मे बदल जाती है, आर्नव और मिलन आपस मे गुथ जाते है। निर्देशक हमसे मनवा लेता है कि मिलन के मिले बिना अर्नव को नहीं पाया जा सकता। 

विद्या बालन का अभिनय देख कर सच मे कहने को दिल करता है कि ''विद्या इज दी बेस्ट'' । जिस तरह से उन्होने अपने किरदार को जिया है, उस तरह बहुत कम अदाकारा ही कर पाती रहीं है। यूं तो विद्या अपने पेट पर रबर का तसलेनुमा कुछ लगाए रहती है जिसे हम पूरे फिल्म मे उनका गर्भस्थ शिशु माने बैठे रहते है क्योंकि विद्या की चाल से ले कर भाव तक इतने सटीक और नपे-तुले हैं कि हम उन्हे सात माह की गर्भवती महिला ही पाते है, पर आर्नव बागची को बचाने के लिए जब वो मिलन दामजी से मिलने जाती है और वो उसके पेट मे लात से चोट कर के अपनी बंदूक तानता है, तब विद्या अपने पेट से तसला निकाल कर उसके हांथ पर दे मारती है यकीन मानिए अगर आपने पूरी फिल्म ध्यान लगा कर एकाग्रता के साथ देखी होगी तो आपको इस समय ऐसा लगेगा कि किसी ने आपका एबोर्शन कर दिया हो, उस समय ये बात कोई मायने नहीं रखेगी कि आप महिला हैं या पुरुष, आप यकीनन उस फेंके गए रबर के टुकड़े को अपना बच्चा मानकर रोना चाहोगे पर रो नहीं पाओगे, क्योंकि ये कोई इमोशनल जर्क नहीं है, ये सस्पेंस का जर्क है और सस्पेंस का जर्क झटका देता है रुलाता नहीं, बंगालियों की पारंपरिक ध्वनि के बीच  विद्या बागची जब मिलन दामजी की  गर्दन पर चाकू मारती है तब वो माँ दुर्गा का मानव रूप लगती है, आप आगे से राणा जैसे किसी दोस्त के द्वारा चौड़े लाल किनारे वाली उपहार की गयी साड़ी को पहने हुए ''विद्या बालन'' सरीखी ''विद्या बागची'' को देखेंगे तो इस बात की  काफी संभावना है कि आप उसे माँ दुर्गा मान कर श्रद्धा से भर जाएँ और ये भी हो सकता है कि मन ही मन अपना सर झुका कर उसे प्रणाम भी कर ले, ये बात और है कि अगले ही पल आपको ये काम एक गलती लगेगा और प्राश्चित सा कुछ करने को दिल करेगा, पर इसमें आपकी गलती नहीं है सारा दोष विद्या की अदाकारी का है, और थोडा बहुत श्रेय इंस्पेक्टर राणा के अव्यक्त सात्विक प्रेम और उस पारंपरिक साड़ी को भी दिया जा सकता जो इस पूरे सीन पर अजीब सा देवत्व के जैसा कुछ छिड़क देती है। विद्या बागची जब अधमरे भागते मिलन को दौड़ा कर गोली मारती है तब अजय देवगन से ले कर संजय दत्त तक सब के सब उसमे झिलमिला उठते हैं। 

आईबी आफिसर खान के रोल मे नावजूद्दीन सिद्दीकी अपने होने को बड़ी मजबूती से जताते रहते है। अमिताभ बच्चन काफी निष्ठुर हैं जो लम्बे से भी लम्बे समय तक दर्शकों से इन्तजार करवाते है, और अपनी मोहक आवाज से श्रोताओं को महरूम रखते है। ''एकला चलो रे'' उनकी आवाज मे काफी असरदार लग रहा है, उषा उत्थुप का कोई जोड़ नहीं, उनकी आवाज एकदम अलग है '' अमी सोक्ति बोलची'' गीत उन्ही के लिए बना था और उन्होने ही गाया, शायद इसलिए ये इतना असरदार लगता है । विशाल-शेखर का संगीत एक बार फिर कानों का दिल जीतने मे कामयाब रहा। 


ये फिल्म एक नया ज्ञान दे कर जाती है वो ये कि ''गर्भवती महिलाओं पर कोई शक नहीं करता'' पर मैं अबतक यही मानता रहा हूँ कि भारतीय समाज में यदि किसी पर सबसे ज्यादा शक किया जाता रहा है तो वो गर्भवती महिलाएं ही हैं, उनके गर्भ में पल रहे बच्चे से लेकर बाप के नाम तक सब पर एक सुनहरा सवालिया निशान मढ़ा रहता है, और समाज इसे समय-समय पर मजाक में ही पर व्यक्त भी करता रहता है, लेकिन अगर खान जैसा पुलिस अफसर ये कह रहा है कि गर्भवती महिलाओं पर उसे यानि पुलिस को शक नहीं होता तो मुझे लगता है कि मुझे अपनी सोच के बारे में फिर से सोचना होगा, खैर एक बात जो अभी भी वहीँ का वहीँ है वो ये कि पुलिस विद्या के गर्भवती होने को का फायदा उठा रही थी या विद्या पुलिस के पुलिस होने का. पुलिस और विद्या एक राह  के दो मुसाफिर थे, वे  दोनों एक दुसरे का फायदा उठा कर मिलन दामजी को उठाना चाहते थे जो कहानी के ख़तम होते-होते उठ भी  जाता है. इस वजह से ये बात बहस के दायरे से बाहर की जा सकती है कि कौन किसका फायदा उठा रहा था. 
  
इस फिल्म के बाद  कुछ परिवर्तन समाज मे देखने को मिल सकते हैं जैसे महिलाओ मे कंप्यूटर हैकिंग के प्रति क्रेज़ बढ़ेगा, और गर्भवती महिलाओं को अब पहले से कुछ ज्यादा ही समझदार समझा जाने लगेगा, महिलाएं अपने आपको पहले से बड़ी जासूस मानने लगेंगी, गोरे और गोल-मटोल इन्सोरेंस एजेंटस से लोग दूरी बढ़ाएगे उनके मन मे ये डर बैठ जाएगा कि कहीं ये ''प्रभाकरन''  द्वारा भेजा गया सीरियल किलर ''बॉब'' तो नहीं है, इसके अलावा एक संभावना ये भी है कि अभी तक सीरियल किलिंग कर रहे किलर्स इन्सोरेंस एजेंट भी बन सकते है और पॉलिसी करने के बीच समय मिलने पर डॉ गांगुली, मिस्सस अगेनस, जैसे केस को भी हैंडल करते रह सकते है, आज इस मंहगाई के दौर मे किलर्स का आमदनी बढ़ाने का एक अच्छा तरीका सुजॉय ने सुझाया है। 

कहानी देखने के बाद ये लगता है कि किसी फिल्म को एक अच्छी कहानी, दमदार अभिनय और सधे हुए निर्देशन के बल पर हिट कराया जा सकता है और दर्शक के आलीशान फाइव स्टार महल के सारे कमरे हथियाए जा सकते है। दबंग, रेडी, रॉवन, जैसी फिल्मे दर्शक का पैसा तो हथिया सकती है पर अगर दिल पर अधिकार करना है तो दिवाकर बेनर्जी, अनुराग कश्यप, शेखर कपूर, तिग्मांशू धूलिया, की तरह कुछ जिंदगी से जुड़ा, कुछ सच दिखाना पड़ेगा। ताकि इंसान फिल्म देख कर कहे, इसकी कहानी मेरी कहानी से मिलती है. 

तुम्हारा--अनंत        


Wednesday, March 14, 2012

’अब न रहे वो पीने वाले , अब न रही वो मधुशाला....


घर से निकलते ही कुछ दूर चलते ही रस्ते पर है घिस्सू मियां का घर, शरीर जर्जर, तेज नज़र, आवाज़ प्रखर, देश-दुनिया की खबर, कविता मे तलवार का असर, तुकबंदी  करता चला जाऊँ तो मुक्तिबोध की तरह एक बड़ी कविता लिख डालूँगा पर उसकी कोई जरूरत नहीं है। लेकिन आप सोच रहे होंगे कि 1997 मे ‘’ पापा कहते हैं’’ फिल्म के लिए जावेद अख्तर के लिखे जिस गाने को ‘’फिल्म फेयर’’ मिला। उसे मैंने, न जाने किस घिस्सू मियां के ऊपर वार दिया। जवाब आपको चौंका सकता है ! पर मैं जानता हूँ कि आप चौकने के आदि हो गए है, और अब बड़ी से बड़ी बात भी आपको नहीं चौका पाती, अभी राजनीतिक अटकलों के बीच पूर्ण बहुमत की सरकार बनने की चौकाने वाली घटना भी बिन चौकाए ही होली की तरह हो ली। और आपकी की माथे की लकीरें न हिलीं न डोलीं।
खैर बात घिस्सू मियां कौन हैं पर अटकी थी। तो इस सवाल का जवाब है कि घिस्सू मियां कोई नहीं है पर बहुत कुछ हैं। क्योंकि वो एक कवि है और कवि कुछ न होते हुए भी बहुत कुछ होता है। मैं घिस्सू मियां से जब मिलने गया तब वो कागज पर कलम घिस रहे थे। शायद कोई कविता लिख रहे थे। उनका चेहरा होली के बाद बिजली की तारों पर लटके हुए कपड़ों कि तरह लटका हुआ था।


मैंने उनकी उदासी कि परत कुरेदी तो दर्द का समंदर फूट पड़ा, कहने लगे ‘’अजी ये कोई होली है, होली तो हमारे जमाने मे मनाई जाती थी,अच्छे-खासे रंगों के त्योहार को बदरंग कर डाला, मैंने कुछ और जानने की नियत से घिस्सू मियां को थोड़ा और घिसा तो कहने लगे ‘’होली मे पहले कविता के गुलाल उड़ते थे, व्यंग की  पिचकारियाँ चलाई जाती थी। छोटे शहर-कस्बों से लेकर महानगरों तक रंगभरी एकादसी से होली के बाद चलने वाले होली मिलन समारोह मे कवि सम्मेलनों मे आम आदमी के दुख, दर्द, पीड़ा, कुंठा की बात की जाती थी । फागुन की हवा जैसे ही फगुनाती थी हवा मे हरमुनिया बजने लगता था आदमी क्या पेड़ पौधे तक बौरा उठते थे।  उस होली के उमंग मे कहना पड़ता था ‘’होली मे बाबा देवरा लागे’’ लेकिन मोबाइल और कंप्यूटर के इस युग मे सब नदारद हो गया है। अब त्योहार के आते ही हवाओं मे डिजिटल मैसेज तैरने लगते है वो भी फारवर्ड किए हुए, खुद के दिल से निकले नहीं बल्कि एड्वरटाइजिंग एजेंसी के डिजाइन किए गए मैसेज। अब होली मे न वैसा रंग है, न वैसा संग है, मन को हुलसाने वाली वैसी हुड़दंग भी कहाँ है ! न वो प्रीत है, न मीत है और न ही वो गीत है। 
घिस्सू मियां की आँखें अतीत मे कुछ देख रही थी और वो कह रहे थे कि  ‘’अब वो फिल्मे भी नहीं रही जो बताती हों कि कैसे घर के आँगन मे गोरी लऊँगा-ईलाईची का बीरा लगा कर अपने यार का इंतजार किया करती है ताकि वो आकर ‘’सिलसिला’’ के अमिताभ की तरह उसके साथ गा सके ‘’ रंग बरसे भीगे चुनर वाली रंग बरसे’’।
गली मोहल्ले मे हमजोलियों की टोलियाँ दो-चार-दस मोहल्ले मे दौड़ लगा कर ‘’कटी पतंग’’ का सुपर हिट गाना ‘’आज न छोड़ेगे बस हमजोली खेलेंगे हम होली, खेलेंगे हम होली,, गाया करती थी। 
उन्हे इस बात कि कोई सुध नहीं रहती थी कि हमजोली की चुनरिया भीग रही है या चोली’’ वो तो बस होली खेलने मे मस्त रहते थे, कहीं‘’होली खेलय रघुवीरा’’ गूंज रहा होता था तो कहीं मधुवन मे राधा-कृष्ण के होली गीत गए जा रहे होते थे। चौराहों मे लगे हुए लाउड स्पीकर से जब ‘’शोले’’ फिल्म का गीत …’’होली के दिन, दिल खिल जाते है, रंगों मे रंग मिल जाते है, गिले शिकवे सब भूल के दोस्तों! दुश्मन भी गले मिल जाते है....’’ सुनाई देता था तो लगता था कि मानो किसी ने होली का सच्चा फलसफा कह दिया हो।
 हमारे बालीबुड़ मे ‘’सिलसिला’’ से ले कर ‘’बागबान’’ तक ऐसी सैकड़ों फिल्मे हैं जो होली के रंगों से रँगी हैं। पर हाल इसमे कुछ कमी आई है आजकल के फिल्मों और उसके गीतों से हमारा जीवन और जीवन के प्रतीक गायब से होते जा हैं। त्योहार, पर्व, नदी, पहाड़ी, जंगल, झरना,डाकिया, खत, फूल, बाग, भौंरा, आसमान, हवा, परिंदे, याद, दर्द, आँसू सब कुछ कहीं खो सा गए है।
आज गोरी होली पर ‘’डर’’ फिल्म की  नायिका की तरह अपने साजन से ‘’ अंग से अंग लगाना साजन,, ऐसा रंग लगाना साजन,, कि मनुहार नहीं करती बल्कि ‘’चिकनी चमेली’’ छिपके अकेली पव्वा चढ़ा कर आती है और न जाने कितनों को खुद पर फिसलाते हुए, उपभोगतावाद की अंधी गलियों मे अपना नाम ‘’जलेबी बाई’’ बता कर गुम हो जाती है। आज बसंत मे आम के बौराने पर गोरी कोई लोकगीत गाते हुए जवान नहीं होती बल्कि किसी और ग्रह से आई हुई शीला की तरह जवान होती है और मुन्नी की तरह बदनाम हो जाती है।
घिस्सू मियां और भी बहुत कुछ कहना चाह रहे थे पर न जाने क्यों हरिबंश राय बच्चन की मधुशाला की पंक्तियाँ गाते हुए चुप हो गए  ‘’अब न रहे वो पीने वाले , अब न रही वो मधुशाला......मैं तो घिस्सू मियां का दर्द समझ गया था... शायद आप भी समझ गए हो।      

तुम्हारा--अनंत  

Monday, February 27, 2012

शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले....

रात के बाद सुबह होना कोई नई बात नहीं है, और न ही रविवार के बाद सोमवार का  आना कोई आश्चर्य की बात है, 26 फ़रवरी के बाद 27 फरवरी आती है, इस बात को जान कर भी चौकने वाली कोई घटना नहीं हो सकती, पर मेरे साथ अक्सर ऐसी घटनाएं घट जाती है .मैं  चौंक जाता हूँ, मुझे आश्चर्य होता है,और हर बार मुझे ये कुछ नया सा लगता है,जब मैं ये देखता हूँ कि ये तारिख, दिन और सुबह भी साधारण सुबह, तारिख और दिन की तरह आये और चले गए. मुझे बहुत हैरानी,कोफ़्त और दुःख होता है, जब मैं ये देखता हूँ कि देश-दुनिया की छोटी से छोटी घटना की पूरी-पूरी जानकारी रखने वाला युवा अपने ही  देश के शहीदों और महापुरुषों के जन्मदिवस और शहादत दिवस भूल गया है.
अभी पिछले दिनों एक स्वयंसेवी संघटन ने इंडिया की रीनऊंड यूनिवर्सिटी और हाइयर एजुकेशनल इंस्टीटूशनस में एक सर्वे किया जिसका रिजल्ट हमें सोचने को मजबूर करता है.इस सर्वे से पता चलता है कि हमारे देश में हाइयर एजुकेशन ले रहे 80% यूथ को चंद्रशेखर आज़ाद और भगत सिंह जैसे फेमस शहीदों, तक के जन्मदिवस और शहादत दिवस के बारे भी नहीं मालूम. उनके माता-पिता, बर्थ प्लेस, एजुकेशन जैसे पॉइंट पर इन्फार्मेशन होना तो दूर कि बात है. खुदीराम बोस, उद्धम सिंह, मदनलाल ढींगरा, सूर्यसेन जैसे शहीदों के नाम तक भी कई लोगों को नहीं मालूम थे.
देश के शहीदों के प्रति ये हाल और रवैया, देश के एजुकेटेड यूथ का है. तो कम पढ़े-लिखे और न पढ़े लिखों को दोष नहीं दिया जा सकता. इस दशा में जब भी शहीदों के लिए कहा गया मशहूर शेर ...शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पर मरने वालों का यही बके निशाँ होगा,,मैं सुनता हूँ तो मेरे दिल में इस शेर के जवाब में एक शेर और गूँज उठता है कि ''जिस भी शायर ने ये शेर कहा होगा,, बड़ा भोला रहा होगा, बड़ा नादाँ रहा होगा,, मेरी हताशा की वजह ये हैं जिस नई नस्ल के लिए ये क्रांतिकारी  शहीद हुए थे जिनकी आजादी के लिए उन्होंने अपने  प्राण गवांये थे उस नई नस्ल को अमिताभ बच्चन से ले कर मल्लिका शेरावत तक की सारी  इन्फार्मेशन है. उनकी बर्थडे डेट से लेकर उनके टेस्ट और फेवरेटस की पूरी लिस्ट उसे जुबानी रटी है, लेकिन उसके पास इतना समय नहीं है कि वो शहीदों के बारे में सोचे, बातें करे, उनको अपने भीतर उतारने के लिए संघर्ष करे, उसे इतनी भी जरूरत और फुर्सत नहीं है कि वो कम से कम उन शहीदों को उनके जन्मदिवस और शहादत दिवस पर याद कर ले.
मैकडोनाल्ड के पिज्जा और मॉल्स के ऑफर में उलझे हुए युवा को, गर्लफ्रेंड, बॉयफ्रेंड, मोबाइल, फेसबुक, बाइक,यूएसबी कार, और करियर के अलावा किसी भी चीज की कोई फिकर नहीं है,वो उस दैन्य स्तिथि में पहुँच गया है जहाँ उसकी सोच की उड़ान उस पर ही ख़तम हो जाती है, उसके सपने उसकी जद में ही दम तोड़ देते है, उसके दिल में कोई हलचल नहीं मचती है जब किसी की बहन को कोई दबंग विधायक या उसका गुंडा राजनीतिक पार्टियों के झंडे लहराते हुए अपने साथ उठा ले जाते है और उसके साथ वो करता है जिसे सुन कर भी रूह काँप जाती है, ये युवा तब ही रोमांटिक फंतासियों में खोये रहते है जब लखीमपुर खीरी की ''सोनम'' सरीखी मासूम और कम उम्र की लड़कियां पुलिसवालों और तथाकथित रक्षकों की कुंठा की  शिकार हो रही होतीं हैं,ये युवा तब भी सचिन के छक्कों  और चौकों की तारीफ में कसीदे पढ़ रहा होता है जब सरकार विकास के नाम पर किसानों और आदिवासियों की जमीने छीन रही होती है और उनके संघर्ष को बन्दूक की नोक पर दबाया जा रहा होता है. ये युवा फिल्मों के कलाकारों के सौन्दर्य के सरोवर में नहा रहा होता है और देश की कई हज़ार लड़कियां महज़ रोटी के लिए तन बेच रही होती है. हजरों-हज़ार बच्चे  चाय की दुकानों पर अपना बचपन खपा रहे होते हैं.   
सवालिया निशानों की एक बड़ी फ़ौज आज हमारे एजुकेशन सिस्टम, गवर्नमेंट, पैरेंट्स, मीडिया और यूथ को घेरे खड़ी है. और इस सवाल का जवाब मांग रही है कि दोषी कौन है ? ऐसा क्यों हो रहा है? आज ये जिम्मेदारी नवजवानों के कंधे पर सबसे ज्यादा है कि वो खुद इस बात को सिद्ध करें  कि वो सिर्फ वलेंटाइन डे सरीखे डेस की ही फ़िक्र और इंतिजार नहीं करता, उसे सिर्फ खुद की ही  फ़िक्र नहीं है बल्कि वो उन सारे मुद्दों को गंभीरता से लेता है और उनके लिए संघर्ष करता है, जिनसे प्रथम दृष्टया उसे कटा हुआ मान लिया जाता है, वो इन शहीदों और महापुरुषों के जन्म और शहादत दिवस का भी इंतिजार करता हैं ताकि वो उनके लिए अपने दिल में बसे प्यार को दिखा सके.ये जता  सके कि हम उनके ऋणी है. जिन्होंने हमें आज़ादी दिलाई.
इनफ़ोसिस के फाउंडर, वर्ल्डफेम, इंडियन साइबर आइकान, एन.आर. नारायणमूर्ति से जब भ्रष्टाचार के कारण के बारे में पूछा गया तो उन्होंने दो टूक आंसर दिया कि ....आज हमारे देश में सच्चे रोल मॉडल की कमी हो गई है. ऐसे रोल मॉडल जिन्होंने समाज को कुछ देने  के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया, आज ऐसे लोग समाज में चर्चा के दायरे से बहार हो गए हैं. हम उन्हें हीरो समझ बैठे है जो किसी और के लिखे संवाद दोहराते है.किसी के निर्देशन से अभिनय करते है, टूथपेस्ट से ले कर अंदरवेयर तक बेचते है और अपनी उन्नति और विकास के अलावा कुछ और नहीं सोचते है,राजनीती, सिनेमा, खेल और सामाजिक कार्य हर क्षेत्र में ऐसे ही लोग छाए हुए है, घोटालों  पर घोटाले कर के मुस्काते हुए नेता हो या रिकार्ड की अंधी दौड़ में भागते सचिन सरीखे खिलाडी जो हिन्दुस्तान के युवा और सम्भावना से लैस शक्ति के अवसर छीन रहे हैं. ये लोग अच्छे हैं, इनमे गुण भी है, तभी ये यहाँ तक पहुंचे है , पर ये हीरो नहीं हैं. हमारे सच्चे हीरो हमारे शहीद है जिन्हें हम भूलते जा रहे है हमें फिर से उन शहीदों के नाम और उनके कामों की चर्चा को मेन स्ट्रीम में ले कर आना होगा. नारायणमूर्ति कहते हैं की उनकी सफलता का कारण ये था कि उनके रोल मॉडल ऐसे लोग थे जिन्होंने खुद  की उन्नति करने के साथ समाज को भी बहुत कुछ दिया, समाज में फैली विसंगतियों के खिलाफ लड़े, 
वो व्यक्तिगत तौर महात्मा गाँधी और सिंगापुर के पहले प्रधानमंत्री ली कुआन येव से प्रभावित हैं .जो निर्विवादित रूप से 30 साल तक सिंगापुर के प्रधानमंत्री रहे और उन्होंने अपने देश सिंगापुर को तीसरी दुनिया की त्रासदी और पिछड़ेपन से उबार कर विकसित देशों की श्रेणी  में ला कर खड़ा कर दिया.
समाज में शहीदों को याद करते रहना  इसलिए जरूरी है क्योंकि उनके जीवन से हमें देश के लिए, समाज के लिए निस्वार्थ जीने की प्रेरणा मिलती है, पर ये भी बात समझ लेनी चाहिए कि हम जिस समय और  जिस व्यवस्था में जी रहे है वो ऐसे लोगों को चर्चा का विषय नहीं होने देना चाहती , जिन्होंने दूसरों की गुलामी के लिए अपनी आजादी दांव पर लगा दी, जिन्होंने दूसरों के आंसुओं के लिए खुद की मुस्कान की बलि चढ़ा दी.ये व्यवस्था ऐसे व्यक्तित्व से युवाओं का ध्यान खीचना चाहती है .
ये लेख कोई लेख न हो कर एक आइना है जिसमे आज का युवा अपना चेहरा देख सकता है और ये महसूस कर सकता है की उसके कल और आज में कितना अंतर है. इस अंतर को बांप कर ही उसे अपने कल की सूरत गढ़नी होगी. 

27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद के अल्फ्रेडपार्क  में हिंदुस्तान सोसलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी  के चीफ चन्द्रशेखर आज़ाद देश की आजादी  के लिए लड़ते हुए शहीद हो गए थे और 24 दिन बाद यानी 23 मार्च 1931 को शहीदे आज़म भगतसिंह, राजगुरु, और सुखदेव को फांसी दी गयी थी. मैं उनके विषय मे इतिहासिक शैली मे, घर, गाँव और माता-पिता के नाम नहीं गिनाऊंगा, मैं उनसे जुडी एक घटना बताऊंगा या फिर यूं कहूं की उनकी शहादत के समय की घटना बताऊंगा. आज के  नवजवान को ये देखना चाहिये कि कैसे जवानी जी जाती है दूसरों के लिए लड़ते हुए समाज को आज़ाद करने के लिए कैसे जान तक की परवाह नहीं की आज़ाद ने, और उनकी शहादत का जनता ने कैसे गले लगा कर अभिनन्दन  किया.

हिदुस्तान सोसिस्लिस्ट रीपब्लिकन आर्मी  द्वारा किये गये साण्डर्स-वध और दिल्ली एसेम्बली बम काण्ड में फाँसी की सजा पाये तीन अभियुक्तों- भगत सिंह, राजगुरु व सुखदेव ने अपील करने से साफ मना कर ही दिया था। अन्य सजायाफ्ता अभियुक्तों में से सिर्फ ३ ने ही प्रिवी कौन्सिल में अपील की। ११ फरवरी १९३१ को लन्दन की प्रिवी कौन्सिल में अपील की सुनवाई हुई। इन अभियुक्तों की ओर से एडवोकेट प्रिन्ट ने बहस की अनुमति माँगी थी किन्तु उन्हें अनुमति नहीं मिली और बहस सुने बिना ही अपील खारिज कर दी गयी। चन्द्रशेखर आज़ाद ने मृत्यु दण्ड पाये तीनों प्रमुख क्रान्तिकारियों की सजा कम कराने का काफी प्रयास किया। वे उत्तर प्रदेश की सीतापुर जेल में जाकर गणेशशंकर विद्यार्थी से मिले। विद्यार्थी से परामर्श कर वे इलाहाबाद गये और जवाहरलाल नेहरू से उनके निवास आनन्द भवन में भेंट की। आजाद ने पण्डित नेहरू से यह आग्रह किया कि वे गांधी जी पर लॉर्ड इरविन से इन तीनों की फाँसी को उम्र- कैद में बदलवाने के लिये जोर डालें। नेहरू जी ने जब आजाद की बात नहीं मानी तो आजाद ने उनसे काफी देर तक बहस भी की। इस पर नेहरू जी ने क्रोधित होकर आजाद को तत्काल वहाँ से चले जाने को कहा तो वे अपने तकियाकलाम 'स्साला' के साथ भुनभुनाते हुए ड्राइँग रूम से बाहर आये और अपनी साइकिल पर बैठकर अल्फ्रेड पार्क की ओर चले गये। अल्फ्रेड पार्क में अपने एक मित्र सुखदेवराज से मन्त्रणा कर ही रहे थे तभी सी०आई०डी० का एस०एस०पी० नॉट बाबर जीप से वहाँ आ पहुँचा। उसके पीछे-पीछे भारी संख्या में कर्नलगंज थाने से पुलिस भी आ गयी। दोनों ओर से हुई भयंकर गोलीबारी में आजाद को वीरगति प्राप्त हुई। यह दुखद घटना २७ फरवरी १९३१ के दिन घटित हुई और हमेशा के लिये इतिहास में दर्ज हो गयी।पुलिस ने बिना किसी को इसकी सूचना दिये चन्द्रशेखर आज़ाद का अन्तिम संस्कार कर दिया था। जैसे ही आजाद की शहादत की खबर जनता को लगी सारा इलाहाबाद अलफ्रेड पार्क में उमड पडा। जिस वृक्ष के नीचे आजाद शहीद हुए थे लोग उस वृक्ष की पूजा करने लगे। वृक्ष के तने के इर्द-गिर्द झण्डियाँ बाँध दी गयीं। लोग उस स्थान की माटी को कपडों में शीशियों में भरकर ले जाने लगे। समूचे शहर में आजाद की शहादत की खबर से जब‍रदस्त तनाव हो गया। शाम होते-होते सरकारी प्रतिष्ठानों प‍र हमले होने लगे। लोग सडकों पर आ गये।

आज़ाद के शहादत की खबर जवाहरलाल नेहरू की पत्नी कमला नेहरू को मिली तो उन्होंने तमाम काँग्रेसी नेताओं व अन्य देशभक्तों को इसकी सूचना दी। । बाद में शाम के वक्त लोगों का हुजूम पुरुषोत्तम दास टंडन के नेतृत्व में इलाहाबाद के रसूलाबाद शमशान घाट पर कमला नेहरू को साथ लेकर पहुँचा। अगले दिन आजाद की अस्थियाँ चुनकर युवकों का एक जुलूस निकाला गया। इस जुलूस में इतनी ज्यादा भीड थी कि इलाहाबाद की मुख्य सडकों पर जाम लग गया। ऐसा लग रहा था जैसे इलाहाबाद की जनता के रूप में सारा हिन्दुस्तान अपने इस सपूत को अंतिम विदाई देने उमड पडा हो। जुलूस के बाद सभा हुई। सभा को शचीन्द्रनाथ सान्याल की पत्नी प्रतिभा सान्याल ने सम्बोधित करते हुए कहा कि जैसे बंगाल में खुदीराम बोस की शहादत के बाद उनकी राख को लोगों ने घर में रखकर सम्मानित किया वैसे ही आज़ाद को भी सम्मान मिलेगा। सभा को कमला नेहरू तथा पुरुषोत्तम दास टंडन ने भी सम्बोधित किया। इससे कुछ ही दिन पूर्व ६ फरवरी १९२७ को पण्डित मोतीलाल नेहरू के देहान्त के बाद आज़ाद भेष बदलकर उनकी शवयात्रा में शामिल हुए थे पर उन्हें क्या पता था कि इलाहाबाद की इसी धरा पर कुछ दिनों बाद उनका भी बलिदान होगा!
इस पूरे घटनाक्रम को पढ़ कर पता चलता है की आज़ाद देशप्रेम और अपने मित्रों के लिए पूरी तरह समर्पित थे, उनके भीतर बेहद जीवंत और जीवट व्यक्ति बसता था जो किसी भी अन्याय के खिलाफ अंतिम सांस तक लड़ने की कटिबद्धता निभाता रहा.  उन्होंने भगत सिंह और उनके साथियोको बचाने के लिए एड़ी चोटी का बल एक कर दिया था.
हमें अबकी बार ये तारीखें नहीं भूलनी है और ये दिखा देना है कि यूथ रोज डे, टैडी डे, चोकलेट डे, हग डे, किस डे, वलेंटाइन डे सरीखे डेस के साथ शहीदों के शहादत दिवस भी याद रखता है. वो डर्टी पिक्चर की विद्या बालन  की बात करने  के साथ-साथ उन शहीदों के संघर्षों की बात भी करता है. उसकी जुबान पर मुन्नी बदनाम हुई और शीला की जवानी जैसे गानों के साथ-साथ माई  रंग दे बसंती चोला और सरफरोसी की तम्मना जैसे गीत भी लहराते है. वो राखी सावंत के लटकों-झटकों  के साथ बक्सर के जंगलों में पुलिसिया अत्याचार भोग रही ''सोनी सोरी'' की भी आवाज़ उठता है, वो फेसबुक और किसी भी मंच जहाँ भी वो मौजूद है, से इन शहीदों के शहादत के किस्से पढता है. और उन्हें चर्चा की मुख्य धारा में लाता है, और अंत में, मेरे नवजवान दोस्तों मैं अफ़सोस के साथ कह रहा हूँ पर ये सच है कि अगर ऐसा नहीं हो पाया और युवा  ज़माने के साथ चलने के नाम पर उन शहीदों को भूलता चला गया तो वो दिन दूर नहीं जब युवा हिन्दुस्तान (यंगिस्तान) की पहचान में कसीदे की तरह पढ़ी जाने वाली लाइन ...जिस ओर जवानी चलती उस और जमाना चलता है ..उलट कर कुछ यूं  हो जाएगी कि...जिस और जमाना चलता है उस और जवानी चलती है. पर मुझे विस्वास  है कि हमारे देश का युवा  ऐसा नहीं होने देगा. उसकी  रगों  में चंदशेखर आजाद का लहू दौड़ रहा है  
तुम्हारा--अनंत