Monday, April 14, 2014

स्त्री अधिकार और आंबेडकर..!!

बाबा साहेब भीम राव आंबेडकर, देश में दलितों के नेता के रूप में प्रायोजित किये जाते हैं. और ये एक भ्रम सा है कि आंबेडकर ने सदैव एक जाति-वर्ग की पैरोकारी की. आंबेडकर की लड़ाई एक व्यवस्था के खिलाफ थी. एक क्रनितिकारी सोच से डॉ. आंबेडकर का जीवन दर्शन संचालित होता था. जीवन दर्शन जो समता और सौहार्द पर आधारित समाज के संगठन और निर्माण के लिए संघर्ष की प्रेरणा देता है. आंबेडकर सत्ता और व्यवस्था को उलट देना चाहते थे. पर इसके लिए वो राजनीति को ही अंतिम साधन नहीं मानते थे. वो इसे एक सतत चलने वाली प्रक्रिया के रूप में देखते थे. और सामाजिक समता को जीवन में प्राप्त व स्थापित करने को ही सबसे बड़े लक्ष्य के रूप में चिन्हित करते थे. 

आंबेडकर पूरे देश के शोषितों के नेता हैं. वो दलितों, स्त्रियों के पक्ष में सशक्त आवाज़ बन कर संघर्ष करते हैं. इतिहास इस बात की गवाही देता है कि आंबेडकर जी ने सदैव शोषितों की लड़ाई लड़ी है. भारत में स्त्री मुक्ति के लिए आंबेडकर ने बहुत ही जुझारू संघर्ष किया है. और एक प्रगतिशील समाज बंनाने में महती भूमिका निभाई है. जनसत्ता में 14 अप्रैल, 2014 को सम्पादकीय पृष्ठ पर  "स्त्री अधिकार और आंबेडकर" शीर्षक से सुजाता पारमिता का एक लेख छपा है. जो डॉ. आंबेडकर का स्त्री मुक्ति संघर्ष और उनके अधिकारों को दिलवाने के लिए आंबेडकर के संघर्ष व योगदान को दिखता है. मैं यहाँ आप सब से वो लेख साझा करता हूँ......माडरेटर अनुराग अनंत 



आंबेडकर ने कहा था, ‘मैं नहीं जानता कि इस दुनिया का क्या होगा, जब बेटियों का जन्म ही नहीं होगा।
स्त्री सरोकारों के प्रति डॉ भीमराव आंबेडकर का सर्मपण किसी जुनून से कम नहीं था। छियासी साल पहले, अट्ठाईस जुलाई 1928 के दिन, उन्होंने बंबई विधान परिषद में स्त्रियों के लिए प्रसूति से जुड़े पहलुओं से संबंधित एक महत्त्वपूर्ण विधेयक पेश किया गया था। उसका जोरदार समर्थन करते हुए उन्होंने कहा था कि यह देश के हित में है कि मां को बच्चे के जन्म के दौरान आराम मिले। सरकारी और निजी, दोनों क्षेत्रों के अंतर्गत आने वाले तमाम कारखाने, खदान या ऐसे सभी उपक्रम जहां भारी संख्या में स्त्रियां मजदूरी करती हैं और जो खतरनाक हैं और जिनमें काम करना उनके लिए जानलेवा भी सिद्ध हो सकता है, यह उनकी जिम्मेदारी है कि वे इस खर्च का वहन करें, क्योंकि वे स्त्री श्रमिकों को तभी काम पर रखते हैं, जब उन्हें इससे ज्यादा फायदा होता है। इस विधेयक का मुख्य आधार अन्य सुविधाओं के साथ ही महिला श्रमिकों के लिए वेतन समेत छुट््िटयों का प्रावधान था। आंबेडकर ने ब्रिटेन सरकार से इस विधेयक को केवल बंबई विधान परिषद क्षेत्र तक सीमित न रख कर देश भर में लागू किए जाने की अपील की। जबकि भारतीय सामाजिक परंपरा में दलितों और स्त्रियों के लिए अपने श्रम के एवज में किसी सहूलियत की उम्मीद करना लगभग अपराध माना जाता था।

इसके बाद आंबेडकर ने बंबई विधान परिषद में पीजे रोहम द्वारा नवंबर, 1938 में जनसंख्या नियंत्रण विधेयक के रूप में एक ऐतिहासिक विधेयक पारित करवाया। उस विधेयक ने मनु के सदियों से चले आ रहे उस दर्शन को ध्वस्त कर दिया, जिसमें स्त्री को एक ऐसे गुलाम के रूप में जीने को कहा गया था जिसका अपनी ही देह और कोख पर अधिकार न हो। उस दर्शन के मुताबिक उसका जन्म स्त्री के रूप में इसीलिए हुआ है कि वह पुरुष की सेवा करे, उसे तृप्त करे और बच्चे पैदा करने का साधन बनी रहे। यह सिद्धांत सदियों से भारतीय स्त्रियों की भयानक स्थिति के लिए जिम्मेदार रहा और आज भी उसके खिलाफ कई रूपों में संघर्ष जारी है। भारत के इतिहास में पहली बार इस विधेयक ने स्त्रियों को यह अधिकार दिया कि अनचाहे गर्भ से मुक्ति उनका अपना निर्णय होगा और अपनी देह और कोख पर उनका अधिकार। साथ ही आंबेडकर ने तत्कालीन सरकार से ऐसी व्यवस्था करने की अपील की कि हर भारतीय स्त्री को अनचाहे गर्भ से मुक्ति उसकी मर्जी से और आसानी से मिले।

आंबेडकर को वायसराय की काउंसिल में बीस जुलाई 1942 को बतौर श्रम-सदस्य शामिल किया गया। वहां अपने चार साल (1942-46) के कार्यकाल में उन्होंने कई महत्त्वपूर्ण कानून बनाए और कई पुराने कानूनों में बदलाव किए। यह उन्हीं की देन है कि भारतीय श्रम कानून का स्वरूप न केवल बदला, बल्कि कहीं ज्यादा मानवीय हुआ और महिला श्रमिकों के लिए विशेष सुविधाएं लागू की गर्इं। कारखानों और खदानों में काम के घंटे घटा कर फिर से निर्धारित किए गए। स्त्री और पुरुष श्रमिकों के लिए समान वेतन के अधिकार का भी प्रावधान किया गया। छोटे बच्चों के लिए काम की जगह के आसपास ही पालनाघर बनाए गए। स्वास्थ्य और जीवन बीमा की शुरुआत की गई, सामाजिक सुरक्षा अधिनियम बनाया गया।
आज देश भर में जो कर्मचारी राज्य बीमा निगम के अस्पताल चलाए जा रहे हैं, इस नीति को भी आंबेडकर ने ही मूर्त रूप दिया था। निश्चित तौर पर उनका योगदान श्रम कानून के क्षेत्र में बहुत व्यापक और सराहनीय था। अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि उस समय पूंजीपति वर्ग द्वारा चलाए जा रहे कारखानों में पीने के पानी तक की व्यवस्था नहीं थी और वह आंबेडकर के प्रयासों से ही संभव हो सकी। यों भी, पानी का अधिकार दलितों के लिए हमेशा ही संघर्ष का कारण रहा। खुद आंबेडकर इस दर्द के साथ ही जन्मे और इस समस्या का सामना किया।

अप्रैल 1947 में डॉ आंबेडकर ने हिंदू कोड बिल का मसविदा तैयार कर संविधान सभा में रखा, जिस पर बहस होनी थी। यह बिल मुख्य रूप से संयुक्त या अविभाजित  हिंदू परिवार में संपत्ति के अधिकार से संबंधित था। यह अगर उस वक्त पारित हो गया होता तो स्त्रियों को स्वतंत्र और आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकता था। यह सिर्फ स्त्री अधिकारों पर आधारित था और यही इस बिल की खासियत थी। इसमें स्त्रियों को अपनी मर्जी से विवाह और तलाक, पति से अलग रहने पर गुजारा भत्ता, गोद लेने (बच्ची को भी गोद लिए जाने) और बच्चों के संरक्षण का भी अधिकार दिया गया था। संपत्ति का विभाजन होने पर उसमें घर की स्त्रियों के रूप में मां, पत्नी और बेटी, सभी का हिस्सा निर्धारित किया गया। इस क्रांतिकारी बिल से उस वक्त तूफान आ गया था। जिस देश में स्त्री को इंसान होने के बुनियादी अधिकारों से भी वंचित किया गया था, उसे एक साथ इतने सारे हक दिए जाने वाले थे। लेकिन आखिरकार फिजूल की प्रक्रिया से जूझते रहने के बाद इस बिल को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। हालांकि इसमें सुझाए गए चार प्रावधानों को तब किसी तरह पारित किया गया।

स्वतंत्र भारत में जब आंबेडकर को संविधान निर्माण का जिम्मा दिया गया तो जैसी उनसे उम्मीद थी, उन्होंने जाति, धर्म और गोत्र के सारे बंधन तोड़ कर सभी भारतीयों के लिए समता के अधिकार को प्राथमिकता दी। आज भारतीय संविधान अपने सभी नागरिकों को समान अधिकार की गारंटी देता है, चाहे वह अंबानी हों या घरों में बर्तन मांज कर परिवार का पेट भरती स्त्रियां या फिर भीख मांग कर गुजारा करते लोग। खासतौर पर स्त्रियों के साथ किसी भी आधार पर भेदभाव को कानूनी तौर पर जुर्म माना गया।

चार साल बाद कानूनमंत्री के रूप में आंबेडकर ने एक बार फिर हिंदू कोड बिल को संसद में रखा, लेकिन उनकी तमाम कोशिशें बेकार हो गर्इं जब यह बिल भारी मतों से पराजित हो गया। हिंदू कोड बिल का पराजित होना आंबेडकर की निगाह में उनकी निजी हार थी। स्त्री अधिकारों के प्रति वे कितने संवेदनशील थे, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इस हार के बाद उन्होंने 27 नवंबर 1951 को कानूनमंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया। तब से आज तक इस बिल को कई टुकड़ों में पारित किया गया, लेकिन एक तरह से देखें तो 2006 में बने घरेलू हिंसा कानून ने उनके सपने को पूरा किया।

आंबेडकर महिलाओं और दलितों की शिक्षा, प्रगति और जागरूकता के लिए जिंदगी भर संघर्ष करते रहे। उनके सभी सामाजिक आंदोलनों में दलित स्त्रियां भारी संख्या में शामिल रहीं, चाहे वह पानी के सवाल पर हुआ ‘महाड सत्याग्रह’ हो या मंदिर प्रवेश के लिए ‘काला राम सत्याग्रह’ या फिर 1942 में नागपुर में आयोजित दलित महिला अधिवेशन, जिसमें पच्चीस हजार दलित महिलाओं ने शिरकत की थी। उस अधिवेशन में आठ महत्त्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किए गए, जिनमें से एक, भारतीय स्त्रियों के लिए तलाक के अधिकार से संबंधित था।

कमजोर सामाजिक तबकों की स्त्रियों की स्थिति बदलने का संघर्ष आंबेडकर के लिए एक ‘महायुद्ध’ था, जिससे वे एक योद्धा की तरह लड़े। उनका संघर्ष देश के उस तबके के लिए था जो सम्मान और न्याय के लिए सदियों से संघर्ष कर रहा था। आंबेडकर को दलितों और स्त्रियों के लिए हर उस स्थिति से लड़ना था जो उनके हालात के लिए जिम्मेदार थी। उन्होंने समय-समय पर ऐसे कई आंदोलन किए, जिन्होंने हिंदू धर्म की जड़ों पर चोट की। पच्चीस दिसंबर 1927 को उन्होंने महाड (महाराष्ट्र) में मनु-स्मृति को जलाया था, जिसे ‘हिंदू धार्मिक संविधान’ माना जाता रहा और जो दलितों और स्त्रियों की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार था। उस वक्त यह ऐसा ‘शॉक-ट्रीटमेंट’ साबित हुआ जिससे हिंदुत्व की जड़ें हिल गर्इं और जिसने भारतीय समाज को यह सोचने पर बाध्य कर दिया कि धर्म से भी विद्रोह किया जा सकता है; धर्म पत्थर पर लिखा फरमान नहीं है, जिसे बदला नहीं जा सकता। इन्हीं हालात में दलितों और स्त्रियों के बीच धार्मिक बेड़ियां टूटीं, अंधविश्वास के ‘उद्योग’ को भारी धक्का पहुंचा, शिक्षा और जागरूकता की शुरुआत हुई।

आंबेडकर जानते थे कि वे जिस वर्ग के लिए संघर्ष कर रहे हैं वह सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक और राजनीतिक, सब तरह से कमजोर है। उस स्थिति से लड़ना और जीतना कोई आसान काम नहीं। यह चौतरफा लड़ाई थी, जिसमें एक ओर ताकतवर हिंदू धर्म-रक्षक भी थे। लंबी चली लड़ाई में आंबेडकर ने कई आंदोलन किए। मंदिर प्रवेश के मुद््दे पर उन्होंने 1927-30 के बीच दलितों के साथ नाशिक के काला राम मंदिर, पूना के पर्वती और अमरावती के अंबादेवी मंदिर में प्रवेश किया, जहां उन्हें हिंसा का भी सामना करना पड़ा।
हिंदू धर्म से टक्कर आंबेडकर के लिए बेमानी था, लेकिन दलितों के बीच स्वाभिमान जगाने के लिए यह जरूरी था। 1929 में येऊला के अधिवेशन में यह प्रस्ताव पारित किया गया कि दलितों को हिंदू धर्म में अत्याचार सहते रहने की कोई आवश्यकता नहीं, वे चाहें तो किसी भी धर्म में प्रवेश कर सकते हैं।

इसी के बाद बारह महारों (दलित) ने हिंदू धर्म त्याग कर इस्लाम को अपना लिया। इस घटना से हिंदू धर्माधीशों के होश उड़ गए। आंबेडकर ने अपने अंतिम दिनों तक आंदोलन को जिंदा रखा। अपनी मृत्यु से महज दो महीने पहले उन्होंने हिंदू धर्म त्याग कर चौदह अक्तूबर 1956 को नागपुर की दीक्षा भूमि में लगभग चार लाख दलितों के साथ बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया। उसे आज तक दुनिया का सबसे बड़ा धर्म परिवर्तन माना जाता है। बौद्ध धर्म में प्रवेश की प्रक्रिया भारत में आज भी जारी है।

आजादी के अड़सठ सालों बाद भारत में सवर्ण स्त्रियों की दशा में काफी बदलाव आया है। लेकिन दलित स्त्रियां आमतौर पर आज भी लगभग उसी स्थिति में हैं। आधुनिक स्त्रीवादी आंदोलन भारत में सत्तर के दशक में शुरू हुआ, लेकिन उसका नेतृत्व अब तक सवर्ण महिलाओं के ही पास है और उनके इर्दगिर्द घूमता है। कुछ दलित स्त्रियों ने इस मुद््दे पर जरूर आंदोलन किया, लेकिन उसका फायदा इस समूचे आंदोलन के नेतृत्व-वर्गों को ही मिला, उन्हें नहीं, जो वास्तव में ज्यादा शोषण का शिकार थीं।

भारत में स्त्रियों के अधिकार और सम्मान के लिए सबसे ज्यादा ज्योतिबा फुले, उनकी पत्नी सावित्री बाई फुले और डॉ आंबेडकर ने संघर्ष किया, लेकिन महाराष्ट्र के स्त्रीवादी आंदोलन को छोड़ शेष भारत में तो उनका नाम भी किसी स्त्रीवादी आंदोलन में नहीं लिया जाता। यह ब्राह्मणवादी मानसिकता जहां स्त्रीवादी आंदोलन को सीमित कर रही है, वहीं इससे दलित स्त्रीवादी आंदोलन को अलग विस्तार मिल रहा है। दलित स्त्रीवादी आंदोलन का इतिहास काफी पुराना है और उन्हें लड़ना आता है। लेकिन इस अलगाववादी सोच से आखिरकार किसका नुकसान होगा, यह जाहिर-सी बात है।
--सुजाता पारमिता
लेखिका से sujataparmita@yahoo.com पर संपर्क किया जा सकता है. 

Sunday, March 30, 2014

निरर्थकता से सार्थकता की ओर..!!

कभी कभी यूं ही सोचने लगता हूँ और बहुत सोचने के बाद भी कुछ नहीं सोच पाता. सब कुछ वैसा का वैसा ही रहता है जैसे पहले था. बिना कुछ बदले खड़ा रहता है समय, किसी पेड़ की तरह. कोई रेल भी तो नहीं आती कि मैं रेलगाड़ी में बैठ कर निकल जाऊं और समय का पेड़ पीछे छूट जाये. रेल में अमीर लोग बैठते हैं. हमारे पास तो टिकट के भी पैसे नहीं है, रेल हमारे लिए अभी सपना है और इसलिए हम अभिशप्त है. उसी ठहरे हुए समय के पेड़ से बंध कर पिटने के लिए, तब तक जबतक समय हमें खुद से रिहा न कर दे. 

कभी कभी ऐसे ही बातें करने का मन करता है. जिनका कोई अर्थ नहीं होता. मैं मानता हूँ कि हर चीज का कोई अर्थ हो ये जरूरी तो नहीं. कई बार चीजें अर्थों की भीढ़ में अपना असली अर्थ खो देतीं हैं. निरर्थक, अर्थ की तलाश में फिरते हुए ही लोग सिद्धार्थ से बुद्ध हो गए, मोहनदास से महात्मा गाँधी और राहुल सांकृत्यायन से महापंडित राहुल सांकृत्यायन. निरर्थकता में सार्थकता और इस सार्थकता में जीवन का अर्थ तलाशना ही तो जीवन जीना कहलाता है. हमसे पहले लोगों ने जो अर्थ तलाशा या गढा अगर हम उसे अपने जीवन का अर्थ मान लेंगे तो हमारे जीवन जीने का क्या मतलब रह जायेगा, क्या हम यहाँ खाने, पीने, सोने और बच्चे जनने के लिए ही आये हैं. जीवन का अर्थ क्या बस अपने पीछे खुद की कमाई कुछ दौलत, इमारतें और औलादें छोड़ जाना ही है. यही अर्थ है जीवन का, जिसे दुनिया सार्थकता की कसौटी पर कसा हुआ अर्थ मानती है. अगर ऐसा है तो मुझे इस अर्थ में निरर्थकता दिखती है और मेरी निरर्थक खोज में ही मेरा सार्थक अर्थ निहित है. 

मैं जनता हूँ. हर जगह अर्थ तलाशने वालों को मेरी इस निरर्थक बात का कोई अर्थ समझ नहीं आएगा. मैं ये भी जनता हूँ कि इस दुनिया में जितनी भी अर्थ वाली चीज है. उनकी शुरुवात निरर्थक खोजों से ही हुई थी और इसी निरर्थकता ने उसमे असीम अर्थ भर दिया. 

कल बीच रात को उठ कर मैं खुद से यही जिरह कर रहा था. ये कोई लेख नहीं है. बल्कि क्या है, मैं खुद नहीं जनता. कागज के एक पन्ने पर दिल ने जो कहा मैंने दर्ज कर लिया. अब इसकी शक्ल ये है आप इसे जो भी कहना चाहें, कह सकते हैं. मैंने जो कल खुद से बातें की थी आप से साझा कर रहा हूँ.

इस निरर्थकता में अर्थ की तलाश को बेचैन मन बिना अर्थ की बातें करते हुए अर्थ की तलाश करता है. मेरा मन भी आजकल उसी निरर्थक अर्थ की तलाश में जुटा हुआ है. जिसमे अपरिमित सार्थकता सी व्याप्त हो. जीवन जिस अर्थ को पाकर अर्थवान महसूस करे. दुनिया की नजर में फिर चाहे उस अर्थ का कोई अर्थ हो या न हो पर खुद को उस अर्थ में असीम अर्थ का बोध हो. यही तो चाहता हूँ मैं खुद से, खुद के जीवन, खुद के मन से...ए मन मुझे निरर्थकता से सार्थकता की ओर ले चल...

अनुराग अनंत  

Sunday, March 23, 2014

ई लहरिया चुनाव है भईया !!

साल 2014 का चुनाव कई मायनों में याद किया जायेगा. ये वो समय है जब देश में अपनी लहर बहा रहा नेता 'सुरक्षित सीट खोजो अभियान' का प्रणेता बना हुआ है और पार्टी अध्यक्ष के साथ मिलकर अपने ही खेमे के नेताओं को एक एक कर के ध्वस्त कर रहा है. वो जनता है कि चुनावी लड़ाई के बाद उसे इनसे लड़ना पड़ेगा सो इससे बेहतर है कि पहले ही इन्हें परास्त कर दिया जाये.

इस लड़ाई में एक तरफ औसत राजनितिक कद के राजनाथ सिंह हैं. जो अध्यक्ष पद पर बैठेकर शक्ति संपन्न है और अटल के अभेद्य किले से चुनावी लड़ाई लड़ने जा रहे है. तो दूसरी तरफ भारतीय राजनीति की भाषा और व्याकरण बदल देने वाले युग पुरुष अडवानी हैं. वही अडवानी जिसने "जय श्री राम" के नारे से देश की राजनीती और हिंदू मानस का चेहरा रँग कर भगवा कर दिया था. आज उसी आडवानी का चेहरा संघ के भगवा लाल मोदी ने बेरंग कर छोड़ा है.कहने के लिए तो इस राजनीति के योद्धा ने अपने नाम से पूरा एक युग जिया है पर आज अपनी ही पार्टी में अपनी पसंद की एक अदद सीट के लिए तरस रहा है. बात अनुशासन और पार्टी के नियम की होती तो भी ठीक था, बात आतंरिक राजनिति में पछाड़ खा कर चित्त होने की है. जिसे आडवानी ने लंगोट बंधना सिखाया था उसीने आज अडवानी को चारो खाने चित्त कर दिया है. अहमदाबाद ने हिरेन पाठक की सीट बचाना तो छोडिये. अडवानी भोपाल की सीट से लड़ने का हट भी छोड़ आये. जुबान में चाहे जो भी रहा हो, उनके दिल में, बड़े बेआबरू हो कर तेरे कुचे से हम निकले, वाला ख्याल रहा होगा. 

नरेन्द्र मोदी की लहर की लहर ने गैरों को अपनों के खेमे में और अपनों को कहीं का न छोड़ने का काम शुरू कर दिया है. अडवानी से लेकर जसवंत सिंह तक की कतार जो लाल जी टंडन, कलराज मिश्र, विनय कटियार, उमा भारती जैसों से भरी पड़ी है, मोदी लहर में बह गयी और मुख्यधारा से बह कर हासिये पर पहुँच गई. पर इसे सत्ता की लालच में उपजी मजबूरी कहें या लोकतंत्र की विडम्बना, जो मुख्यधारा के पुरोधाओं को हासिये पर खड़े हो कर मुस्काते हुए मनो मंत्र का जाप करना पड़ रहा है. अपनों को अपने ही खेमे में जिस लहर ने धाराशाही किया उसी लहर ने विरोधियों को अपनों के खेमे में ला कर पटक दिया है और जसवंत सिंह जैसे लोग नई पार्टी और पुरानी पार्टी की थियरी देने लगे हैं. 

मनुवाद का झंडा बुलंद करने वाले संघ की संतान बीजेपी की गोद में जब रामदास अठावले, राम विलास पासवान और उदित राज जैसे लोग बैठे तो आवाज उठी कि नमो लहर ने खाइयां और दूरिय पाट दी हैं. भीम सेना ने संघर्ष और प्रतिरोध का नीला झंडा छोड़ कर भगवा बुलंद कर लिया है. इसीबीच एक वरिष्ठ पत्रकार और सेकुलर कांग्रेसी पूर्व संसद भगवा ओढते हुए दिखे. पत्रकार एमजे अकबर ने जब कमल के फूल का गुणगान करना शुरू किया तब  वो एक पत्रकार नहीं एक मुश्लिम चेहरा बन गए. जो नमो मंत्र का जाप कर रहा है. ताकि देश स्थिर बना रहे और उसकी प्रगति सुनिश्चित की जा सके.

गैरों को अपना बनाने वाली और अपनों को गैर कर देने वाली इस नमो लहर का क्या होगा ये एक रहस्य है. जो भावी चुनाव के गर्भ में विश्राम कर रहा है. पर इतना तय है कि इस लहर में कई लहर है और हर लहर की अपनी अलग राजनीति है. इस सतरंगी नमो लहर में कौन सी वाली लहर जीतती है, देखना दिलचस्प होगा. 

लहरियों के लहरिया, राजनाथ ने इस नमो लहर में अपनी हिस्से की भी नमो लहर छोड़ रखी है. जो तब उभर कर सतह में आएगी जब मोदी 220  या उससे कम सीट पाएंगे. तब राजनाथ इस छुपी हुई लहर पर सवार हो कर सतह पर प्रकट होंगे और मोदी का शिकार, ये कह कर करेंगे कि देखिये लहराधिपति ! आपके सांप्रदायिक होने की वजह से गटबंधन नहीं हो पा रहा है इसलिए आप नेपथ्य में संभावनाएं तलाशिए. मैं मंच पर नायक की भूमिका में आता हूँ. आडवानी, यशवंत सिंह की तरह नहीं रूठ रहे क्योंकि उन्हें लगता है कि जब मोदी की लहर से राजनाथ लहर टकराएगी तब वो वरिष्ठता की  लहर पर सवार हो कर गद्दी पर जा चढेंगे. इधर अरुण जेठली ने भी नमो लहर में अपने हिस्से की लहर मिला दी है. इस लहर के भागीरथी, प्रकश सिंह बादल हैं. जिन्होंने पंजाब की रैली में जेठली के उपप्रधानमंत्री होने कि घोषणा कर दी. बीजेपी इस बार मनो लहर पर चुनाव लड़ रही है और वो अब लहरिया पार्टी बन चुकी है. जहाँ नेता नहीं हैं बस लहरें हैं. हर नेता एक लहर है और हर लहर एक नेता. सब लहर इस समय रूप बदल कर नमो लहर बनी हुई हैं, सही समय पर अपना असली नाम और चेहरा उजागर करेंगी.  कोई चाय वाला कह रहा था कि भईया इस बार का चुनाव लहर से लहर के टकराव का चुनाव है. इस बार का चुनाव लहरिया चुनाव के नाम से जाना जायेगा.

अनुराग अनंत

ये लेख जनज्वार वेबसाईट पर प्रकाशित हुआ है.
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ई लहरिया चुनाव है भईया!

Wednesday, March 19, 2014

झूठी आजादी का झूठा इतिहास

यह लेख हिमांचल प्रदेश के रहने वाले भाई "राकेश कुमार" का है| मुझे भाई अनिल रघुराज के ब्लॉग एक हिन्दुस्तानी की डायरी पर मिला. अनिल जी ने इसे राकेश जी के फेसबुक प्रोफाइल से उठाया था और अपने ब्लॉग पर झूठे इतिहास की घुट्टी का मिथ कब तक! नाम से छापा था| लेख इतिहास के झूठे मिथकों को बड़े ही तर्कसंगत ढंग से तोड़ता है साथ ही साथ सच्चाई की एक नई तस्वीर पेश करता है| ये सच्चाई बिना आधार की गल्प कथा न होकर पूरे तार्किक धरातल पर खड़ी सच्चाई है| हम हिन्दुस्तानी जो गाँधी जी को देश की आजादी का नायक मानते हैं और गाते हुए बड़े होते है कि "दे दी हमें आजादी बिना खडग बिना ढाल, साबरमती के संत तुने कर दिया कमाल" उनके लिए ये लेख बहुत ही जरूरी है. सत्ता के नायकों को, सत्ता, जनता पर कैसे थोपती है और जानकारी के आभाव में जनता सत्ता के नायकों को अपना नायक समझ बैठती है. फिलहाल आप ये लेख पढ़ें और भारत की आज़ादी के नायकों और कारकों के एक नए पक्ष से रूबरू होइए. ...माडरेटर अनुराग अनंत.   
कृपया निम्न तथ्यों को बहुत ही ध्यान से तथा मनन करते हुए पढ़िए। एक, 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन को ब्रिटिश सरकार कुछ ही हफ्तों में कुचल कर रख देती है। दो, 1945 में ब्रिटेन विश्वयुद्ध में विजयी देश के रुप में उभरता है। तीन, ब्रिटेन न केवल इम्फाल-कोहिमा सीमा पर आजाद हिन्द फौज को पराजित करता है, बल्कि जापानी सेना को बर्मा से भी निकाल बाहर करता है। चार,इतना ही नहीं, ब्रिटेन और भी आगे बढ़कर सिंगापुर तक को वापस अपने कब्जे में लेता है। पांच, जाहिर है कि इतना खून-पसीना ब्रिटेन भारत को आजाद करने के लिए तो नहीं ही बहा रहा था। यानी, उसका भारत से लेकर सिंगापुर तक अभी जमे रहने का इरादा था।
फिर 1945 से 1946 के बीच ऐसा कौन-सा चमत्कार हो गया कि ब्रिटेन ने हड़बड़ी में भारत छोड़ने का निर्णय ले लिया? हमारे शिक्षण संस्थानों में आधुनिक भारत का जो इतिहास पढ़ाया जाता है, उसके पन्नों में सम्भवतः इस प्रश्न का उत्तर नहीं मिलेगा। हम अपनी ओर से भी इसका उत्तर जानने की कोशिश नहीं करते क्योंकि हम बचपन से ही सुनते आए हैं कि दे दी हमें आजादी बिना खड्ग बिना ढाल, साबरमती के सन्त तूने कर दिया कमाल। इससे आगे हम और कुछ जानना नहीं चाहते। [प्रसंगवश- 1922में असहयोग आन्दोलन को जारी रखने पर जो आजादी मिलती, उसका पूरा श्रेय गांधीजीको जाता। मगर चौरी-चौरा में ‘हिंसा’ होते ही उन्होंने अपना ‘अहिंसात्मक’ आन्दोलन वापस ले लिया, जबकि उस वक्त अंग्रेज घुटने टेकने ही वाले थे!]
दरअसल गाँधीजी सिद्धान्त व व्यवहार में अन्तर नहीं रखने वाले ‘महापुरूष’ हैं, इसलिए उन्होंने यह फैसला लिया। हालाँकि एक दूसरा रास्ता भी था कि गाँधीजी खुद अपने आप को इस आन्दोलन से अलग करते हुए इसकी कमान किसी और को सौंप देते। मगर यहां ‘अहिंसा का सिद्धान्त’ भारी पड़ जाता है देश की आजादी पर।

यहां हम 1945-46 के घटनाक्रमों पर एक निगाह डालेंगे और उस ‘चमत्कार’ का पता लगाएंगे, जिसके कारण और भी सैकड़ों वर्षों तक भारत में जमे रहने की इच्छा रखने वाले अंग्रेजों को जल्दबाजी में फैसला बदलकर भारत से जाना पड़ा। [प्रसंगवश, जरा अंग्रेजों द्वारा भारत में बनाई गई इमारतों पर नजर डालें। दिल्ली के ‘संसद भवन’ से लेकर अण्डमान के ‘सेल्यूलर जेल’ तक- हर निर्माण 500 से 1000 वर्षों तक कायम रहने और इस्तेमाल में लाये जाने के काबिल है!


लालकिले के कोर्ट-मार्शल के खिलाफ देश के नागरिकों ने जो उग्र प्रदर्शन किये, उससे साबित हो गया कि जनता की सहानुभूति आजाद हिन्द सैनिकों के साथ है। इस पर भारतीय सेना के जवान दुविधा में पड़ जाते हैं। फटी वर्दी पहने, आधा पेट भोजन किये,बुखार से तपते, बैलगाड़ियों में सामान ढोते और मामूली बन्दूक हाथों में लिये बहादुरी के साथ भारत माँ की आजादी के लिए लड़ने वाले आजाद हिन्द सैनिकों को हराकर व बन्दी बनाकर लाने वाले ये भारतीय जवान ही तो थे, जो ‘महान ब्रिटिश सम्राज्यवाद की रक्षा के लिए’ लड़ रहे थे! अगर ये जवान सही थे, तो देश की जनता गलत है; और अगर देश की जनता सही है, तो फिर ये जवान गलत थे! दोनों ही सही नहीं हो सकते।

सेना के भारतीय जवानों की इस दुविधा ने आत्मग्लानि का रूप लिया, फिर अपराधबोध का और फिर यह सब कुछ बगावत के लावे के रूप में फूटकर बाहर आने लगा। फरवरी1946 में, जबकि लालकिले में मुकदमा चल ही रहा था, रॉयल इण्डियन नेवी की एकहड़ताल बगावत में रुपान्तरित हो जाती है। कराची से मुम्बई तक और विशाखापत्तनम से कोलकाता तक जलजहाजों को आग के हवाले कर दिया जाता है। देश भर में भारतीय जवान ब्रिटिश अधिकारियों के आदेशों को मानने से इनकार कर देते हैं। मद्रास और पुणे में तो खुली बगावत होती है। इसके बाद जबलपुर में बगावत होती है, जिसे दो हफ्तों में दबाया जा सका। 45 का कोर्ट-मार्शल करना पड़ता है। यानि लालकिले में चल रहा आजाद हिन्द सैनिकों का कोर्ट-मार्शल देश के सभी नागरिकों को तो उद्वेलित करता ही है, सेना के भारतीय जवानों की प्रसिद्ध ‘राजभक्ति’ की नींव को भी हिला कर रख देता है। जबकि भारत में ब्रिटिश राज की रीढ़ सेना की यह ‘राजभक्ति’ ही है!
बिल्कुल इसी चीज की कल्पना नेताजी ने की थी. जब (मार्च 1944 में) वे आजाद हिन्द सेना लेकर इम्फाल-कोहिमा सीमा पर पहुँचे थे। उनका आह्वान था- जैसे ही भारत की मुक्ति सेना भारत की सीमा पर पहुँचे, देश के अन्दर भारतीय नागरिक आन्दोलित होजाएं और ब्रिटिश सेना के भारतीय जवान बगावत कर दें। इतना तो नेताजी भी जानते होंगे कि- 1. सिर्फ तीस-चालीस हजार सैनिकों की एक सेना के बल पर दिल्ली तक नहीं पहुँचा जा सकता, और 2. जापानी सेना की ‘पहली’ मंशा है- अमेरिका द्वारा बनवायी जा रही (असम तथा बर्मा के जंगलों से होते हुए चीन तक जानेवाली) ‘लीडो रोड’ को नष्ट करना; भारत की आजादी उसकी ‘दूसरी’ मंशा है। ऐसे में, नेताजी को अगर भरोसा था,तो भारत के अन्दर ‘नागरिकों के आन्दोलन’ एवं ‘सैनिकों की बगावत’ पर। मगर दुर्भाग्यकि उस वक्त देश में न आन्दोलन हुआ और न ही बगावत। इसके भी कारण हैं।

पहला कारण, सरकार ने प्रेस पर पाबन्दी लगा दी थी और यह ठिंठोरा पीटा गया था किजापानियों ने भारत पर आक्रमण किया है। सो, सेना के ज्यादातर भारतीय जवानों की यही धारणा थी। दूसरा कारण, फॉरवर्ड ब्लॉक के कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया गया था, अतः आम जनता के बीच इस बात का प्रचार नहीं हो सका कि इम्फाल-कोहिमा सीमा पर जापानी सैनिक नेताजी के नेतृत्व में युद्ध कर रहे हैं। तीसरा कारण,भारतीय जवानों का मनोबल बनाए रखने के लिए ब्रिटिश सरकार ने नामी-गिरामी भारतीयों को सेना में कमीशन देना शुरू कर दिया था।
इस क्रम में महान हिन्दी लेखक सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्सयायन 'अज्ञेय' भी 1943से 46 तक सेना में रहे और वे ब्रिटिश सेना की ओर से भारतीय जवानों का मनोबलबढ़ाने सीमा पर पहुंचे थे। (ऐसे और भी भारतीय रहे होंगे।) चौथा कारण, भारत की प्रभावशाली राजनीतिक पार्टी कांग्रेस गाँधीजी की ‘अहिंसा’ के रास्ते आजादी पाने की हिमायती थी, उसने नेताजी के समर्थन में जनता को लेकर कोई आन्दोलन शुरू नहीं किया। (ब्रिटिश सेना में बगावत की तो खैर कांग्रेस पार्टी कल्पना ही नहीं कर सकती थी!- ऐसी कल्पना नेताजी जैसे तेजस्वी नायक के बस की बात है। ...जबकि दुनिया जानती थी कि इन भारतीय जवानों की राजभक्ति के बल पर ही अंग्रेज न केवल भारत पर, बल्कि आधी दुनिया पर राज कर रहे थे।
पांचवे कारण के रूप में प्रसंगवश यह भी जान लिया जाए कि भारत के दूसरे प्रभावशाली राजनीतिक दल भारत की कम्युनिस्ट पार्टी ने ब्रिटिश सरकार का साथ देते हुए आजाद हिन्द फौज को जापान की 'कठपुतली सेना' (पपेट आर्मी) घोषित कर रखा था। नेताजी के लिए भी अशोभनीय शब्दों और कार्टून का इस्तेमाल उन्होंने किया था।
खैर, जो आन्दोलन व बगावत 1944 में नहीं हुआ, वह डेढ़-दो साल बाद होता है और लन्दन में राजमुकुट यह महसूस करता है कि भारतीय सैनिकों की जिस राजभक्ति के बल पर वे आधी दुनिया पर राज कर रहे हैं, उस राजभक्ति का क्षरण शुरू हो गया है... और अब भारत से अँग्रेजों के निकल आने में ही भलाई है। वरना, जिस प्रकार शाही भारतीय नौसेना के सैनिकों ने बन्दरगाहों पर खड़े जहाजों में आग लगाई है, उससे तो अँग्रेजों का भारत से सकुशल निकल पाना ही एक दिन असम्भव हो जाएगा... और भारत में रह रहे सारे अंग्रेज एक दिन मौत के घाट उतार दिए जाएंगे।
लन्दन में ‘सत्ता-हस्तांतरण’ की योजना बनती है। भारत को तीन भौगोलिक और दो धार्मिक हिस्सों में बाँटकर इसे सदा के लिए शारीरिक-मानसिक रूप से अपाहिज बनाने की कुटिल चाल चली जाती है। और भी बहुत-सी शर्तें अंग्रेज जाते-जाते भारतीयों पर लादना चाहते हैं। (ऐसी ही एक शर्त के अनुसार रेलवे का एक कर्मचारी आज तक वेतन ले रहा है, जबकि उसका पोता पेन्शन पाता है!) इनके लिए जरूरी है कि सामने वाले पक्ष को भावनात्मक रूप से कमजोर बनाया जाए। लेडी एडविना माउण्टबेटन के चरित्र को देखते हुए बर्मा के गवर्नर लॉर्ड माउण्टबेटन को भारत का अन्तिम वायसराय बनाने का निर्णय लिया जाता है- लॉर्ड वावेल के स्थान पर।
एटली की यह चाल काम कर जाती है। विधुर नेहरूजी को लेडी एडविना अपने प्रेमपाश में बाँधने में सफल रहती हैं और लॉर्ड माउण्टबेटन के लिए उनसे शर्तें मनवाना आसान हो जाता है! (लेखकद्वय लैरी कॉलिन्स और डोमेनिक लेपियरे द्वारा भारत की आजादी पर रचित प्रसिद्ध पुस्तक ‘फ्रीडम एट मिडनाइट’ में एटली की इस चाल को रेखांकित किया गया है।)
बचपन से ही हमारे दिमाग में यह धारणा बैठा दी गयी है कि गाँधीजी की अहिंसात्मक नीतियों से हमें आजादी मिली है। इस धारणा को पोंछकर दूसरी धारणा दिमाग में बैठाना कि ‘नेताजी और आजाद हिन्द फौज की सैन्य गतिविधियों के कारण’ हमें आजादी मिली- जरा मुश्किल काम है। अतः नीचे खुद अँग्रेजों के ही नजरिये पर आधारित कुछउदाहरण प्रस्तुत किये जा रहे हैं, जिन्हें याद रखने पर शायद नयी धारणा को दिमाग में बैठाने में मदद मिले।
सबसे पहले, माइकल एडवर्ड के शब्दों में ब्रिटिश राज के अन्तिम दिनों का आकलन:“भारत सरकार ने आजाद हिन्द सैनिकों पर मुकदमा चलाकर भारतीय सेना के मनोबल को मजबूत बनाने की आशा की थी। इसने उल्टे अशांति पैदा कर दी- जवानों के मन में कुछ-कुछ शर्मिन्दगी पैदा होने लगी कि उन्होंने ब्रिटिश का साथ दिया। अगर बोस और उनके आदमी सही थे- जैसा कि सारे देश ने माना कि वे सही थे भी- तो भारतीय सेना के भारतीय जरूर गलत थे। भारत सरकार को धीरे-धीरे यह दीखने लगा कि ब्रिटिश राज की रीढ़- भारतीय सेना- अब भरोसे के लायक नहीं रही। सुभाष बोस का भूत, हैमलेट के पिता की तरह, लालकिले (जहाँ आजाद हिन्द सैनिकों पर मुकदमा चला) के कंगूरों परचलने-फिरने लगा, और उनकी अचानक विराट बन गयी छवि ने उन बैठकों को बुरी तरह भयाक्रान्त कर दिया, जिनसे आजादी का रास्ता प्रशस्त होना था।”
अब देखें कि ब्रिटिश संसद में जब विपक्षी सदस्य प्रश्न पूछते हैं कि ब्रिटेन भारत को क्यों छोड़ रहा है, तब प्रधानमंत्री एटली क्या जवाब देते हैं। प्रधानमंत्री एटली का जवाब दो बिन्दुओं में आता है कि आखिर क्यों ब्रिटेन भारत को छोड़ रहा है- 1. भारतीय मर्सिनरी (पैसों के बदले काम करने वाली- पेशेवर) सेना ब्रिटिश राजमुकुट के प्रति वफादार नहीं रही, और 2. इंग्लैण्ड इस स्थिति में नहीं है कि वह अपनी (खुद की) सेना को इतने बड़े पैमाने पर संगठित एवं सुसज्जित कर सके कि वह भारत पर नियंत्रण रख सके।

यही लॉर्ड एटली 1956 में जब भारत यात्रा पर आते हैं, तब वे पश्चिम बंगाल के राज्यपाल निवास में दो दिनों के लिए ठहरते हैं। कोलकाता हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश चीफ जस्टिस पी.बी. चक्रवर्ती कार्यवाहक राज्यपाल हैं। वे लिखते हैं: “... उनसे मेरी उन वास्तविक बिन्दुओं पर लम्बी बातचीत होती है, जिनके चलते अँग्रेजों को भारत छोड़ना पड़ा। मेरा उनसे सीधा प्रश्न था कि गाँधीजी का "भारत छोड़ो” आन्दोलन कुछ समय पहले ही दबा दिया गया था और 1947 में ऐसी कोई मजबूर करने वाली स्थिति पैदा नहीं हुई थी, जो अँग्रेजों को जल्दीबाजी में भारत छोड़ने को विवश करे, फिर उन्हें क्यों (भारत) छोड़ना पड़ा? उत्तर में एटली कई कारण गिनाते हैं, जिनमें प्रमुख है नेताजी की सैन्य गतिविधियों के परिणामस्वरुप भारतीय थलसेना एवं जलसेना के सैनिकों में आया ब्रिटिश राजमुकुट के प्रति राजभक्ति में क्षरण। वार्तालाप के अन्त में मैंने एटली से पूछा कि अँग्रेजों के भारत छोड़ने के निर्णय के पीछे गाँधीजी का कहाँ तक प्रभाव रहा? यह प्रश्न सुनकर एटली के होंठ हिकारत भरी मुस्कान से संकुचित हो गये जब वे धीरे से इन शब्दों को चबाते हुए बोले, न्यू-न-त-म!” [श्री चक्रवर्ती ने इस बातचीत का जिक्र उस पत्र में किया है, जो उन्होंने आर.सी. मजूमदार की पुस्तक ‘हिस्ट्री ऑफ बेंगाल’ के प्रकाशक को लिखा था]
निष्कर्ष के रूप में यह कहा जा सकता है कि 1. अंग्रेजों के भारत छोड़ने के हालांकि कई कारण थे, मगर प्रमुख कारण यह था कि भारतीय थलसेना व जलसेना के सैनिकों के मन में ब्रिटिश राजमुकुट के प्रति राजभक्ति में कमी आ गयी थी और बिना राजभक्त भारतीय सैनिकों के सिर्फ अंग्रेज सैनिकों के बल पर सारे भारत को नियंत्रित करना ब्रिटेन के लिए सम्भव नहीं था। 2. सैनिकों के मन में राजभक्ति में जो कमी आयी थी, उसके कारण थे नेताजी का सैन्य अभियान, लालकिले में चला आजाद हिन्द सैनिकों पर मुकदमा और इन सैनिकों के प्रति भारतीय जनता की सहानुभूति। 3.अँग्रेजों के भारत छोड़कर जाने के पीछे गांधीजी या कांग्रेस की अहिंसात्मक नीतियों का योगदान नहीं के बराबर रहा। सो, अगली बार आप भी ‘दे दी हमें आजादी ...’ वाला गीत गाने से पहले जरा पुनर्विचार कर लीजिएगा।

राकेश कुमार 

Wednesday, March 5, 2014

तेलंगाना का सवाल, इतिहास का जवाब

तेलंगाना की तस्वीर शीर्षक से एक लेख जनसत्ता में 16 November 2013 को सम्पादकीय पृष्ठ पर छपा था | मैंने इस लेख को सहेज कर रख तो लिया था पर किन्हीं कारणवश आपसे साझा नहीं कर सका | आज ड्राफ्ट चेक कर रहा था | तभी ये लेख मिल गया | ये लेख तेलंगाना समस्या की बारीक़ पड़ताल करता है और मुझे लगता है कि इतिहास के पृष्ठ पर लिखे जवाबों से वर्तमान के सवाल हल करने में सहायक है | मेरे ख्याल से तेलंगाना मसले में एक समझ बनाने के लिए ये लेख काफी मददगार सिद्ध हो सकता है. इसी उम्मीद के साथ, मैं ये लेख आप सभी से साझा कर रहा हूँ. आशा है विनय सुल्तान का लिखा ये लेख आप सभी पाठकों के लिए लाभकारी सिद्ध होगा. माडरेटर...अनुराग अनंत 

तेलंगाना की सात दिन की यात्रा से पहले मेरे लिए तेलंगाना का मतलब था आंदोलनकारी छात्र, लाठीचार्ज, आगजनी, आत्मदाह, रवि नारायण रेड्डी और नक्सलबाड़ी आंदोलन।

संसद के शीतकालीन सत्र में तेलंगाना के दस जिलों की साढ़े तीन करोड़ आबादी का मुस्तकबिल लिखा जाना है। मेरे लिए यह सबसे सुनहरा मौका था वहां के लोगों के अनुभवों और उम्मीदों को समझने का।

पृथक राज्यों की मांग के पीछे अक्सर एक पूर्वग्रह काम करता है, भाषा और संस्कृति। तेलंगाना का मसला इसके ठीक उलट है। यहां शेष आंध्र की तरह ही तेलुगू मुख्य भाषा है। अलबत्ता भाषा का लहजा और यहां की संस्कृति दोनों सीमांध्र से अलग हैं।

1947 में सत्ता हस्तांतरण के तुरंत बाद भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन के आंदोलन शुरू हो गए। 1952 में पोट्टी श्रीरामलु का निधन मद्रास स्टेट से पृथक आंध्र प्रदेश बनाने की मांग को लेकर किए गए अनशन के दौरान हुआ। इसके बाद प्रथम राज्य पुनर्गठन आयोग या फजल अली आयोग की स्थापना हुई। तेलंगाना आजादी से पहले ब्रिटिश राज का हिस्सा नहीं था; यहां पर निजाम का शासन था। 1948 की पुलिस कार्रवाई के बाद निजाम हैदराबाद का विलय भारतीय राज्य में हुआ। राज्यों के भाषाई आधार पर हो रहे पुनर्गठन के दौरान निजाम हैदराबाद के मराठीभाषी क्षेत्रों को महाराष्ट्र में, कन्नड़भाषी क्षेत्रों को कर्नाटक में और तेलुगूभाषी क्षेत्रों को आंध्र प्रदेश में मिला दिया गया।

इस पूरी प्रक्रिया में फजल आली शाह कमेटी की सिफारिशों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया। फजल आली शाह आयोग की सिफारिश स्पष्ट तौर पर विशाल आंध्र के गठन के खिलाफ थी। इस सिफारिश का पैरा 378 शैक्षणिक रूप से अगड़े सीमांध्र के लोगों द्वारा पिछड़े तेलंगाना के संभावित शोषण को विशाल आंध्र के गठन के विरोध का सबसे महत्त्वपूर्ण कारण मानता है। साथ ही पैरा 386 में कहा गया है कि तेलंगाना को आंध्र प्रदेश में न मिलाया जाना आंध्र और तेलंगाना दोनों के हित में रहेगा। इस तरह से देखा जाए तो आंध्र प्रदेश के निर्माण के साथ ही गैर-बराबरी, शोषण और तकसीम के बीज बोए जा चुके थे।

फजल आली शाह कमेटी की आशंका सही साबित हुई। विशाल आंध्र के गठन के महज तेरह साल बाद ही तेलंगाना के लोगों ने नौकरियों में हो रहे भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाना शुरू कर दिया। 1969 के उस जन-उभार का सरकार ने निर्मम दमन किया। आज 369 तेलंगाना के लोगों के लिए महज एक गणितीय आंकड़ा नहीं है। यह 1969 के जन आंदोलन में पुलिस की गोली से शहीद हुए लोगों का प्रतीक है। इसके बाद कभी तेज और कभी मंद, लेकिन तेलंगाना की मांग मुसलसल जारी रही। एक दहला देने वाला आंकड़ा यह भी है कि तेलंगाना राज्य की मांग को लेकर दिसंबर, 2009 से अब तक बारह सौ से ज्यादा लोग आत्मदाह कर चुके हैं। किसी भी आंदोलन में इतने बड़े पैमाने पर आत्मदाह का उदाहरण मिलना मुश्किल है।

हैदराबाद कभी ब्रिटिश राज का हिस्सा नहीं रहा। इस वजह से यहां की राजनीतिक और शेष आंध्र की राजनीतिक अर्थव्यवस्था में एक ऐतिहासिक फर्क रहा, जो आज भी मौजूद है। समाजवादी चिंतक केशवराव जाधव की मानें तो यह एक तरह का आंतरिक साम्राज्यवाद है। तेलंगाना के संसाधनों के बड़े हिस्से पर सीमांध्र के लोगों का कब्जा रहा है। तेलंगाना आंध्र प्रदेश में बयालीस फीसद की भौगोलिक हिस्सेदारी रखता है, साथ ही कुल जनसंख्या का चालीस फीसद हिस्सा इस क्षेत्र में निवास करता है।

राज्य के कुल राजस्व का इकसठ फीसद हिस्सा इसी क्षेत्र से आता है, लेकिन आंध्र प्रदेश के कुल बजट का मुश्किल से बीस फीसद ही तेलंगाना को मिल पाता है। उदाहरण के लिए, नाबार्ड द्वारा 2009 में आबंटित एक सौ तीस करोड़ में से एक सौ इक्कीस करोड़ रुपए सीमांध्र और रायलसीमा में खर्च किए गए।

आंध्र प्रदेश की कुल साक्षरता दर 67 फीसद है जबकि तेलंगाना में महज 58 फीसद। महबूबनगर साक्षरता की दृष्टि से देश का सबसे पिछड़ा जिला है। आंध्र प्रदेश के कुल शिक्षण संस्थानों में से महज एक चौथाई संस्थान तेलंगाना में हैं। 1956 से अब तक शिक्षा पर हुए कुल खर्च का दसवां भाग ही तेलंगाना की झोली में आ पाया। जहां सीमांध्र और रायलसीमा के लिए शिक्षा के मद में क्रमश: 1308 और 382 करोड़ रुपए की व्यवस्था की गई वहीं तेलंगाना को 162 करोड़ रुपए ही मिल पाए। सीमांध्र और रायलसीमा में सरकारी विद्यालयों की संख्या 39,801 है। तेलंगाना में यह संख्या इसके आधे से भी कम है। डिग्री कॉलेजों का अनुपात भी 240 के मुकाबले 74 ठहरता है।

यहां गौरतलब है कि तेलंगाना में आदिवासी, दलित और पिछड़े मिल कर आबादी का अस्सी फीसद भाग गढ़ते हैं। इन आंकड़ों को देख कर शिक्षा में इस इलाके के पिछड़ेपन को केवल संयोग तो नहीं कहा जा सकता। 

शिक्षा का सीधा संबंध रोजगार से है। प्रो जयशंकर द्वारा किए गए शोध के अनुसार सिर्फ बीस फीसद सरकारी रोजगार तेलंगाना के खाते में हैं। सचिवालय की नौकरियों में तेलंगाना का प्रतिनिधित्व घट कर दस फीसद पर पहुंच जाता है। कुल एक सौ तीस विभागों में से सिर्फ आठ विभागों मेंतेलंगाना क्षेत्र का कोई अधिकारी नीति निर्धारक पद पर है। सरकारी नौकरियों में अवसर की अनुपलब्धता से रोजगार के लिए यहां बड़े पैमाने पर विस्थापन होता है। महबूबनगर जिले की तैंतीस फीसद आबादी इस तरह के विस्थापन की शिकार है।

वर्ष 1997 से 2010 तक आंध्र प्रदेश में पांच हजार आठ सौ किसानों ने आत्महत्या की। इनमें से तीन हजार चार सौ आत्महत्याएं तेलंगाना में हुर्इं। एक तथ्य यह भी है कि इस देश में किसानों की आत्महत्या की अड़सठ फीसद घटनाएं कपास उगाने वाले क्षेत्रों में हुर्इं। तेलंगाना में कपास उगाने का चलन आंध्र के आदिवासियों द्वारा 1980 के बाद शुरू हुआ। इतने बड़े पैमाने पर आत्महत्याओं के पीछे बड़ी वजह यह है कि तिरासी फीसद किसान ऋण के लिए साहूकारों पर निर्भर हैं, जहां ब्याज की दर छत्तीस फीसद है, आपके होम लोन, पर्सनल लोन या कार लोन से तीन से पांच गुना ज्यादा। सरकार द्वारा आबंटित कुल कृषि ऋण का महज सत्ताईस फीसद भाग तेलंगाना के हिस्से आता है। ब्याज-मुक्त ऋण का आबंटन 15.24 फीसद है। जबकि चालीस फीसद कृषियोग्य भूमि इस क्षेत्र में आती है।

पानी तेलंगाना-संघर्ष का सबसे बड़ा कारण रहा है। कृष्णा नदी का उनहत्तहर फीसद और गोदावरी का उनासी फीसद बहाव क्षेत्र तेलंगाना में है। लेकिन पानी के बंटवारे में जो अन्याय तेलंगाना के साथ हुआ उसकी दूसरी नजीर नहीं मिलेगी। नागार्जुन सागर बांध नलगोंडा जिले में है। इसके द्वारा कुल पच्चीस लाख एकड़ जमीन की सिंचाई की व्यवस्था की गई। चौंकाने वाला तथ्य यह है कि इसके जरिए सीमांध्र की बीस लाख एकड़ और तेलंगाना की महज पांच लाख एकड़ जमीन सींची जा रही है। इसी तरह जिस श्रीसैलम परियोजना के कारण तेलंगाना के कुरनूल जिले के एक लाख लोगों को विस्थापित होना पड़ा था उसका एक बूंद भी तेलंगाना को नहीं मिलता। हालांकि ‘तेलुगू गंगा’ के नाम पर इसका एक हिस्सा चेन्नई की पेयजल आपूर्ति के लिए दिया जाता है।

सूखे की मार से त्रस्त महबूबनगर के लिए 1981 में जुराला परियोजना की शुरुआत की गई थी। इस परियोजना से एक लाख एकड़ जमीन की सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध होने की उम्मीद थी। पर तीन दशक बाद भी यह परियोजना निर्माणाधीन है।

तेलंगाना के लोगों का मानना है कि अलग राज्य बनाए जाने से उनको पानी में न्यायपूर्ण हिस्सा मिल सकेगा। तेलंगाना की कुल उपजाऊ जमीन के चार फीसद भाग को नहरों के जरिए सिंचाई का पानी मयस्सर है। सीमांध्र की कुल उपजाऊ जमीन के अट्ठाईस फीसद भाग को नहरों का पानी मिल रहा है। सिंचाई पर सरकार ने तेलंगाना में 4005 करोड़ रुपए खर्च किए हैं जो कि सीमांध्र के मुकाबले पांच गुना कम है। पिछले पचास सालों में आबंटित चालीस परियोजनाओं में से सैंतीस का लाभ सीमांध्र को पहुंच रहा है। यह एक और ऐसा तथ्य है जिसे संयोग नहीं कहा जा सकता।

अलग तेलंगाना राज्य की मांग के रास्ते में सबसे बड़ा रोड़ा सीमांध्र की अधिवासी लॉबी बनी रही। तेलंगाना की आबादी में बाईस फीसद और हैदराबाद की आबादी में पैंतालीस फीसद हिस्सा इनका है। हैदराबाद के आसपास सहित तेलंगाना की उपजाऊ जमीन के बड़े हिस्से पर इनका कब्जा है। भारत-पाक बंटवारे के बाद हैदराबाद के कई मुसलिम जमींदार पाकिस्तान चले गए थे। इनकी लगभग दो हजार एकड़ जमीन बहुत सस्ती दरों पर आंध्र-अधिवासियों को उपलब्ध कराई गई।

इसी तरह निजाम के समय के डेढ़ सौ कारखाने सत्तर का दशक आते-आते बंद हो गए। इनको निजाम के समय जरूरत से कई गुना जमीन आबंटित की गई थी। उदाहरण के तौर पर प्रागा टूल्स को निजाम के समय में सौ एकड़ जमीन मिली थी। इन सारी जमीन पर आज आंध्र के अधिवासियों का कब्जा है। वक्फ की जमीन की बंदरबांट भी इसी तर्ज पर कर दी गई। इस तरह आंध्र अधिवासी भू-माफिया गिरोह बहुत शक्तिशाली होते गए। आज तेलंगाना में पैंसठ फीसद औद्योगिक इकाइयों के मालिक यही अधिवासी हैं। भारत की बड़ी निर्माण कंपनियों के मालिक आंध्र से हैं। इनके लिए तेलंगाना सस्ते श्रम का स्रोत है। एक तेलुगू लोक गीत इस त्रासदी को कुछ इस तरह से बयां करता है- ‘हम दुनिया के लिए सड़क बनाते हैं, पर हमारे जीवन में कोई रास्ता नहीं है/ सुबह हाथ की लकीरें दिखने से पहले हम काम पर जाते हैं, और लौटते हैं जब लकीरें दिखना बंद हो जाएं।’

पैंतीस साल लंबे संघर्ष के बाद तेलंगाना को जिल्लत, इलाकाई गैर-बराबरी और कमतरी के अहसास से छुटकारा मिलने की उम्मीद जगी है। वहीं अल्पसंख्यक समुदाय खुद को डर और अनिश्चितता से घिरा पा रहा है। मुसलमान तेलंगाना के सांप्रदायिक इतिहास से सहमे हुए हैं।

तेलंगाना राष्ट्र समिति एक-सूत्री पार्टी है। तेलंगाना निर्माण के बाद टीआरएस का कांग्रेस में विलय होने की अटकलें लगाई जा रही हैं। अगर ऐसा हुआ तो विपक्ष के शून्य को भरने के लिए भाजपा सबसे मजबूत स्थिति में होगी। ऐसे में अल्पसंख्यकों का डर आधारहीन नहीं कहा जा सकता|

 विनय सुल्तान



Monday, February 3, 2014

तीसरी दुनिया के शोषितों की आवाज़ थे मंडेला

नेल्शन मंडेला ने शोषण के विरूद्ध दक्षिण अफ्रीका में जो लड़ाई लड़ी, वो एक वैचारिक लड़ाई थी. असमानता और विभेद के खिलाफ मानव सम्मान की लड़ाई लड़ते हुए मंडेला ने अपने जीवन में महान क्रन्तिकारी आदर्श जिया और इन आदर्शों को जीने में जो संघर्ष करने होते हैं उन्हें भी बखूबी किया. मंडेला की अपनी एक स्वतंत्र वैचारिकीय थी. जो गांधी के विचारों से लेकर मार्क्स तक फैली हुई थी. एक लोकतान्त्रिक और समता मूलक समाज निर्माण के लिए लड़ते हुए एक नेता को जो-जो कुर्बानियां देनी पड़ती है. मंडेला ने हँसते हुए दी थी. तीसरी दुनिया में सम्मान पूर्ण जीवन पर आस्था और उसे प्राप्त करने के लिए संघर्ष के ज़ज्बे का जीवंत रूप थे नेल्शन मंडेला. मंडेला का संघर्ष देशों की सीमाओं में नहीं बंधता, उनका संघर्ष अन्याय और शोषण के खिलाफ संघर्ष है. जो दुनिया के किसी भी कोने में हो रहे अन्याय के विरुद्ध लड़ता हुआ पाया जाता है. तीसरी दुनिया में शोषण और असमानता के विरुद्ध चल रहे संघर्षों के प्रतीक के रूप में उभरे हैं मंडेला, उनके संघर्ष चेतना और समता पर आस्था प्रदान करते हैं, जनसत्ता के  4 फरवरी, 2014, संस्करण में  रंगभेद से मुक्ति के मायने शीर्षक से लेल्शन मंडेला पर अजेय कुमार जी का एक बहुत ही उन्दा लेख पढ़ने को मिला. उन्दा इस लिहाज से क्योंकि ये लेख अपने आप में नेल्शन मंडेला होने का मतलब बताता है. विचार पर आस्था और अडिग संघर्ष की एक तस्वीर खींचता हुआ ये लेख आप सब से साझा कर रहा हूँ   ....माडरेटर अनुराग अनंत 


नेल्सन मंडेला की मौत के बाद अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस और दक्षिण अफ्रीकी कम्युनिस्ट पार्टी ने अपने बयानों में स्वीकार किया है कि 1962 में गिरफ्तार होने से पहले वे कम्युनिस्ट पार्टी की केंद्रीय कमेटी के सदस्य थे। पार्टी ने यह रहस्योद्घाटन करते हुए यह भी कहा कि उसने ‘राजनीतिक कारणों’ से इस सच को दबाए रखा।

पचास के दशक में अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस शांतिपूर्ण प्रतिरोध के लिए प्रतिबद्ध रही। 1956 में जब मंडेला और अन्य डेढ़ सौ कार्यकर्ताओं पर देशद्रोह का मुकदमा चला तो उनका विश्वास अहिंसा के मार्ग से डगमगाने लगा। 1961 में जब अदालत ने उन्हें सभी मामलों से बरी कर दिया तो उन्होंने जेल से बाहर आकर एएनसी की सशस्त्र शाखा ‘उम्खोंतो वे सिज्वे’ (राष्ट्र का भाला) का गठन किया जिसके वे पहले कमांडर-इन-चीफ बने। इस सशस्त्र संगठन के गठन की मांग ने दरअसल 1960 में शार्पविले में हुए नरसंहार के बाद जोर पकड़ा, जब दक्षिण अफ्रीका के सुरक्षा बलों ने 69 मासूम लोगों को गोलियों से भून डाला और अन्य लगभग तीन सौ लोगों को जख्मी कर दिया जो काले लोगों की आवाजाही पर लगी रुकावटों के विरुद्ध शांतिपूर्ण ढंग से विरोध प्रकट कर रहे थे।

इस नरसंहार के बाद रंगभेदी निजाम ने देश भर में आपातस्थिति की घोषणा कर दी, एएनसी को गैर-कानूनी घोषित किया, जिसके कारण मंडेला और उसके साथियों को भूमिगत होना पड़ा। पंद्रह महीनों तक मंडेला को पुलिस ढूंढ़ नहीं पाई। इस अवधि में मंडेला कभी दरबान, कभी कार-गैराज में कार्यरत मजदूर और कभी रसोइये की भूमिकाएं बखूबी निभाते रहे। छह फुट दो इंच लंबे और लगभग पंचानबे किलो वजन के मंडेला ने ये सब काम कैसे किए होंगे, सोच कर हंसी आती है। मजेदार बात यह भी हुई कि मंडेला इस अवधि में अखबारों को फोन द्वारा सरकारी नीतियों का विरोध भी करते रहे और एक बार तो बीबीसी टेलीविजन के लिए साक्षात्कार भी दे डाला।

लगभग एक वर्ष बाद मंडेला अपना नाम डेविड मोतस्ंमयी रख कर देश से बाहर निकल गए, कई अफ्रीकी देशों का दौरा किया ताकि एएनसी के लिए समर्थन जुटाया जा सके। इस बीच उन्होंने चे ग्वारा को भी पढ़ा और अदीस अबाबा में थोड़ी देर के लिए गुरिल्ला युद्ध में प्रशिक्षण भी प्राप्त किया। कुछ देर वे एएनसी के निर्वासित राष्ट्रपति ओलीवर टैम्बो के साथ लंदन में भी रहे।

पांच अगस्त 1962 को जब वे डरबन-जोहानिसबर्ग हाइवे से वापस दक्षिण अफ्रीका आ रहे थे, तो सीआइए ने रंगभेदी निजाम को मंडेला की यात्रा की सूचना दे दी और एक पुलिस चेक-पोस्ट पर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें बिना अनुमति के देश से बाहर जाने के लिए पांच वर्ष की कैद की सजा सुनाई गई। अभी मंडेला यह सजा काट ही रहे थे कि उन्हें और अन्य नौ सक्रिय एएनसी सदस्यों को तोड़-फोड़ और देशद्रोह के आरोप में जोहानिसबर्ग के उत्तर में स्थित रिवोनिया में अदालत के सामने पेश किया गया। रिवोनिया में एक फार्म पर एएनसी की सर्वोच्च समिति (हाइकमांड) मिला करती थी।

इस इलाके में केवल गोरे रहते थे। मंडेला अपने को माली कह कर यहां कई बार रहे। एक बार पड़ोसियों को जब शक हुआ तो उन्होंने पुलिस को सूचना दे दी। पुलिस ने फार्म पर धावा बोला और वहां उसे बम बनाने के नुस्खे, विस्फोटक पदार्थ, रणनीतिक लक्ष्यों के मानचित्र और कई खुफिया दस्तावेज मिले। इसके साथ ही पुलिस ने मंडेला का हस्तलिखित एक आलेख भी जब्त किया जिसका शीर्षक था, ‘अच्छे कम्युनिस्ट कैसे बनें?’ इन तमाम सबूतों के बाद रिवोनिया मुकदमे में फैसले को लेकर कोई शक नहीं बचा था। देखना यह था कि उन्हें फांसी की सजा मिलेगी या आजीवान कारावास।

अदालत में अपने बयान का समापन करते हुए उन्होंने कहा था, ‘मैंने अपने पूरा जीवन अफ्रीकी जनता के इस संघर्ष के लिए समर्पित कर दिया है। मैंने गोरों के प्रभुत्व के खिलाफ लड़ाई लड़ी है और मैंने कालों के प्रभुत्व के खिलाफ भी लड़ाई लड़ी है। मैं एक जनतांत्रिक और स्वाधीन समाज के आदर्श की कामना करता हूं, जहां सभी लोग सद््भाव से रहें और उनके लिए बराबर के अवसर हों। यह ऐसा आदर्श है, जिसेजीने की और जिसे हासिल करने की मैं उम्मीद करता हूं।’ इसके बाद मंडेला ने, यह सोच कर कि उन्हें फांसी की सजा भी हो सकती है, जज की तरफ देखा और कुछ पल बाद कहा, ‘लेकिन, यह वह आदर्श भी है जिसके लिए, अगर जरूरत पड़े तो मैं मरने के लिए भी तैयार हूं।’ (20 अप्रैल 1964) न्यायाधीश ने उन्हें कठोर श्रम के साथ आजीवन कारावास की सजा सुनाई। रोबेन द्वीप की जेल में उन्हें पत्थर की चट्टानों को तोड़ने का काम दिया गया। उन्हें किसी से बात करने की मनाही थी। वर्ष में केवल एक बार उनसे कोई मिल सकता था, हर छह महीने में उन्हें एक डाक-पत्र प्राप्त करने की इजाजत दी गई थी।

प्राय: हर दिन उन्हें और उनके साथियों को गड्ढा खोदने के लिए कहा जाता था जहां उन पर जेलर पेशाब किया करते थे। मंडेला की यह महानता थी कि जब वे राष्ट्रपति बने तो उन्होंने अपने पहले सरकारी भोज में उस जेलर को भी आमंत्रित किया जिसने उनके साथ जेल में ऐसा व्यवहार किया था।

अठारह वर्षों तक रोबेन द्वीप में सजा काटने के बाद मंडेला को 1982 में केपटाउन के नजदीक जेल में स्थानांतरित किया गया जहां उनके साथ थोड़ा बेहतर सलूक किया गया। 1988 में फिर उन्हें एक अन्य जेल में डाला गया जहां उन्हें एक गोरे रसोइये की सुविधा भी प्रदान की गई। 1976 में सोवेटो विद्रोह, स्टीव बीको की पुलिस हिरासत में मौत, मंडेला और उसके साथियों की रिहाई के लिए अंतरराष्ट्रीय मुहिम आदि ने गोरे शासन को यह सोचने के लिए मजबूर कर दिया कि रंगभेद की नीति को अब और नहीं चलाया जा सकता।

दो फरवरी 1990 को एएनसी पर प्रतिबंध हटा दिया गया और लगभग तीन दशकों की जेल के बाद 11 फरवरी, 1990 को मंडेला और उनके साथ कदम मिलातीं उनकी पत्नी विन्नी मंडेला, जिन्होंने जेल से निकलने पर उनका दाहिना बाजू प्रतिरोध के रूप में ऊपर उठा दिया था, रिहा हुए।

वर्ष 1991 में डरबन में एएनसी के अड़तालीसवें अधिवेशन के मौके पर मंडेला ने कहा, ‘हमने सशस्त्र कार्रवाई को फिलहाल रोक दिया है, लेकिन सशस्त्र संघर्ष को खत्म नहीं किया है। इसलिए उम्खोंतो वे सिज्वे को चाहे देश में तैनात किया जाए या बाहर, उस पर यह जिम्मेदारी आती है कि खुद को तैयारी की स्थिति में रखे कि कहीं प्रतिक्रांति की ताकतें एक बार फिर एक जनतांत्रिक समाज में शांतिपूर्ण संक्रमण का रास्ता रोकने की कोशिश न करें। ठीक यही संघर्ष है जिसने शक्तियों के संतुलन को इस हद तक बदल दिया है कि रंगभेदी व्यवस्था अब पीछे हटने के लिए मजबूर हो गई है। हमारी जनता के संघर्षों से एएनसी पर लगी पाबंदी हटी है और हम आज अपने ही देश में एकत्र हो पाए हैं। एक ऐसे निजाम को, जिसकी विचारधारा घोर कम्युनिज्म-विरोध पर टिकी हुई है, हमारी सहयोगी दक्षिण अफ्रीका की कम्युनिस्ट पार्टी से पाबंदी हटानी पड़ी है और कम्युनिस्ट आदर्शों के प्रचार पर पाबंदी लगाने वाले प्रावधानों को कानूनों से हटाना पड़ा है।’

मंडेला की चेतावनी सच निकली। दस अप्रैल 1993 को क्रिसहानी की, जो वहां की कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव थे, रंगभेदी निजाम ने हत्या कर दी। इस हत्या का मकसद रंगभेद की व्यवस्था को खत्म करने की प्रक्रिया में रुकावटें पैदा करना था। यह मंडेला की सूझबूझ थी कि उन्होंने संवैधानिक ढंग से सरकार के साथ समझौता किया, जिसके फलस्वरूप 27 अप्रैल, 1994 को दक्षिण अफ्रीका के इतिहास में पहला स्वतंत्र और गैर-रंगभेदी चुनाव हुआ जिसमें भारी बहुमत से एएनसी ने सत्ता प्राप्त की। दस मई, 1994 को मंडेला राष्ट्रपति चुने गए।

आज जब हम मंडेला को याद करते हैं तो हमें नहीं भूलना चाहिए कि रंगभेदी निजाम कितना क्रूर था, कि उसके खिलाफ लड़ना मानवीय गरिमा और स्वतंत्रता को बचाने के लिए कितना महत्त्वपूर्ण था। आज की युवा पीढ़ी के लिए इसका अनुमान तक लगाना कठिन है कि दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद नीति के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक पहलू क्या थे।

वर्ष 1948 में नेशनल पार्टी ने दक्षिण अफ्रीका में चुनाव जीता तो गोरों का प्रभुत्व जमाने के उद्देश्य से केवल गोरों की संसद ने चालीस कानून पास किए जिनके तहत कालों की सारी जमीन हड़प ली गई, उन्हें वोट देने के अधिकार से वंचित किया गया और उन्हें शहरों में उनके घरों से खदेड़ कर दूरदराज इलाकों में लगभग फेंक दिया गया जहां बिजली, पानी जैसी मूलभूत सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं थीं। बच्चे के पैदा होने से ही रंगभेद लागू हो जाता था क्योंकि उसका जन्म-पंजीकरण उसके रंग के अनुसार किया जाता था। उसकी शादी केवल अश्वेतों में संभव थी।

हर क्षेत्र को ‘काले’ या ‘सफेद’ के अनुसार चिह्नित किया गया। गोरों को सस्ते श्रम की जरूरत थी, इसलिए कालों को उनके घरों में काम करने की इजाजत दी गई। ‘श्वेत’ क्षेत्र में घुसने के लिए हर काले के पास एक ‘पहचानपत्र’ होना अनिवार्य था। पुलिस कभी भी और कहीं भी, किसी भी काले व्यक्ति को रोक कर उससे उसका पहचानपत्र मांग सकती थी।

सार्वजनिक मनोरंजन से लेकर शौच-सुविधाओं तक, जीवन के हर क्षेत्र में काले-गोरे का भेद किया जाता था। स्कूलों में काले बच्चों को वही विषय पढ़ाए जाते थे जो उन्हें श्रम करने में सहायक हों। उन्हें स्थानीय भाषा ही सिखाई जाती थी।

रंगभेद निजाम की किसी भी किस्म की आलोचना करना गैर-कानूनी था। हजारों काले लोगों को सुरक्षा बलों ने मौत के घाट उतार दिया। लाखों लोगों को जेल में अमानवीय सजाएं दी गर्इं। मंडेला शांतिप्रिय नागरिक होते हुए और गांधी और मार्टिन लूथर किंग के प्रशंसक होते हुए भी, सशस्त्र संघर्ष की ओर मुड़े क्योंकि दक्षिण अफ्रीका की गोरी सरकार के अत्याचारों के आगे इसका कोई विकल्प न था। उनका मानना था कि जब बातचीत से हल न निकल पा रहा हो तो इसे अंतिम हथियार के रूप में इस्तेमाल करना चाहिए।

मंडेला ने इसलिए जब दो महीने पहले, पांच दिसंबर को आखिरी सांस ली तो दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति जेकब जूमा ने अपने टेलीविजन प्रसारण में इन शब्दों के साथ उन्हें श्रद्धांजलि दी: ‘हमारे राष्ट्र ने अपना सबसे महान पुत्र खो दिया है। हमारी जनता ने अपने पिता को खो दिया है।... हमारी भावनाएं और प्रार्थनाएं मंडेला परिवार के साथ हैं। हम उनके आभारी हैं। उन्होंने बहुत कुर्बानियां दी है और बहुत दुख सहे हैं ताकि हमारी जनता आजाद हो सके।’मंडेला दक्षिण अफ्रीका ही नहीं, तीसरी दुनिया के तमाम शोषितों और उत्पीड़ितों के सच्चे झंडाबरदार थे।
--अजेय कुमार 
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