Thursday, November 14, 2013

राजनीतिक अकाल की उपज

राजनीतिक विकल्पहीनता की स्थिति में साधारण से साधारण व्यक्तित्व भी असाधारण लगने लगते हैं और उनकी बिना सर-पैर की नीतियां या सुझाव भी सुनहरे मॉडल कहे जाते हैं. निर्वात में जैसे हर वस्तु हलकी हो जाती है ठीक वैसे ही इस समय देश में राजनीतिक निर्वात है शायद इसीलिए सारी विचारधाराएँ हवा में तैरती हुई जान पड़ती है. इस समय विचारधारा को संशोधनवाद और प्रयोगवाद ने पूरी तरह अपनी गिरफ्त में ले लिया है. आज वाम से ले कर दक्षिण तक सब गड्ड-मड्ड हो गया है. आंबेडकर की अस्मिताई राजनीति से लेकर जेपी और लोहिया का समाजवाद तक सबकुछ बिखरा हुआ, बेतरतीब सा दीखता है. इस राजनीतिक निर्वात के समय में  छापामार राजनीति करने वालों और विचार को फैशन की तरह ओढने वालों की चल निकली है. सब उनमें देश का भविष्य तलाशने लगे हैं. उनके किये बिन सर-पैर के वादे उज्जवल भविष्य की कुंजी माने जा रहे हैं और विचारधारा की राजनीति करने वाले लोग पुरातन व पिछड़े कहे जा रहे हैं.  

देश में इंटरनेट आने के बाद राजनीति में भी व्यापक बदलाव आये हैं, लोकप्रियता के पैमाने बदले हैं. लोग इन्टरनेट में चलने वाले पोल, मिलने वाली लाइक, कमेन्ट और विजिट को अपनी लोकप्रियता का पैरामीटर बताने लगे हैं और मीडिया से लेकर आमजनता तक उस आभासी दुनिया की लोकप्रियता को कोट करने लगी है. देश में खासतौर पर पिछले दो सालों में इंटरनेट पालिटिक्स ने देश के युवाओं और बहुत हद तक मध्यम वर्ग की राजनीतिक चेतना को प्रभावित किया है. अन्ना का आन्दोलन हो, अरविन्द केजरीवाल का उदय या फिर आम आदमी पार्टी का प्रभावशाली उभार इनसब के पीछे इन्टरनेट की महती भूमिका रही है. नरेन्द्र मोदी को लोकप्रिय बनाने में भी इन्टरनेट ने बड़ी भूमिका निभाई है. इन्टरनेट पालिटिक्स के महत्व का अनुमान हम इस बात से भी लगा सकता है कि एक व्यक्ति जिसे स्वयं उसकी पार्टी के वरिष्ठ नेता और गठबंधन की कई पार्टियां पसंद नहीं करती, वो प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बन जाता है. ये इन्टरनेट की आभासी दुनिया पर उसकी विश्वव्यापी लोकप्रियता और उसके गुजरात मॉडल की ब्रांडिंग ही थी कि पार्टी के बड़े नेताओ को भी मोदी के सामने झुकना पड़ा और उन्हें प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया. मोदी ने इस अभियान की शुरुवात २००७-०८ में एपको वर्ल्डवाइड नाम की अमेरिकन विज्ञापन एजेंसी को खुद के छवि निर्माण के लिए नियुक्त करके कर दी थी. जिसके परिणाम हमें २०१३ में पूरी रंगत के साथ दिख रहें हैं. मोदी इन्टरनेट पालिटिक्स और तकनीक के महत्त्व को समझते हैं तभी तो उन्होंने एक पूरी टीम बना रखी है जो मोदी की इन्टरनेट पर ब्रांडिंग करती है. उनकी लोकप्रियता बढ़ाने के लिए अभियान चलाती है और फिर मीडिया से लेकर आमजनता तक उसी आभासी लोकप्रियता और समर्थन की आंधी में उड़ती नज़र आती है. मोदी की तरह दूसरी जो शख्सियत इन्टरनेट और तकनीक के हथियार से राजनीति का समर लड़ रही है वो है, अरविन्द केजरीवाल. एक ऐसा आदमी जो दो साल पहले राजनीति की “रा” नहीं जानता था आज “आप” के नाम पर आपको क्रांति बाँट रहा है. केजरीवाल ने आपकी क्रांति नाम से एक वेब साईट बनवाई है. जहाँ जाते ही आपको महसूस होता है की क्रांति एक उत्पाद है जिसे केजरीवाल आपको सस्ते दाम या यूं कहिये मुफ्त में दे रहे हैं. उनकी पार्टी की वेबसाईट पर ऊपर ही एक डिजिटल घड़ी लगी है जो  मतदान की तिथि को कितने सेकेण्ड बचे हैं ये बताती है. आपको वहाँ कोई सेल लगे होने का पूरा अहसास होता है. केजरीवाल और मोदी ने देश में छापामार राजनीति का नया व्याकरण गढा है. उन्होंने देश की आभासी नब्ज़ टटोली है. वो इन्टरनेट पर मौजूद आभासी लोगों को देश की जनता मान बैठे हैं. इसीलिए उनकी राजनीती, उनके सवाल और चिंताएं सबकुछ आभासी ही लगते हैं.

मोदी ने झाँसी में यूपी के मजदूरों के लिए छ: महीना काम और छ: महीना आराम का जो मॉडल बताया वो मजदूरों के प्रति उनकी खोखली समझ और पूंजीवादी शोषण के गिरफ्त में मजदूरों को धकेलने की साजिश सी जान पड़ती है. मोदी का ये मॉडल कांट्रेक्ट लेबर मॉडल का एक घिनौना रूप होगा. इसके अलावा अर्थशास्त्रीय नज़रिए से भी ये मॉडल निराधार ही है. वहीँ केजरीवाल का स्वराज का मॉडल कई सारे सवालों पर औंधे मुंह गिरता हुआ दीखता है. ये केजरीवाल के भारतीय समाज की समझ का अभाव ही है जो वो जनता को दूध का धुला मान रहे हैं  और अतिविकेंद्रिकरण की बात कर रहे हैं. इसी जनता और आम आदमी के बीच सामंती और जातिवादी सोच वाले लोग भी हैं. दलित, किसान मजदूर और स्त्री भी हैं. केजरीवाल की जनता और आम आदमी कौन है? ये साफ़ नहीं हुआ है. शायद अभी केजरीवाल को भी उनके आम आदमी की परिभाषा ठीक ठीक मालूम नहीं होगी. उनका एक बहुत प्रयोग किया जाने वाला उदाहरण है कि गांव में नल कहाँ लगेगा इसमें सरकार की कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए ये वहाँ के लोग तय करेंगे कि नल कहाँ लगेगा. मेरा सवाल है कि वो गांव जहाँ आज भी ठाकुर साहब का कहा जनता का कहा होता है. वहाँ सरकार के प्रभाव न होने पर तो नल किसी ठाकुर जी के या यहाँ किसी पंडित जी के यहाँ ही लगेगा. तब तो आपका स्वराज फिर से सामंती जकड़ को नए चेहरे के साथ समाज में लाएगा. 

खैर मोदी और केजरीवाल जैसे नेता अपनी दूरदर्शिता और तकनीक के प्रयोग से राजनीतिक वितान पर एक सशक्त परिघटना तो बन कर उभरे हैं पर इनके नेतृत्व में देश की जनता कहीं नहीं है- मजदूर, किसान, दलित और स्त्री कहीं नहीं हैं. ये देश में विचारधारा आधारित राजनीतिक-अकाल की उपज है जिनसे भूखे को भूख मिलेगी और खाए अघाये को खाना.

अनुराग अनंत 

Saturday, November 9, 2013

सब कुछ सुनहरा नहीं


एक ऐसे समय में जब सबकुछ सुनहरा-सुनहरा ही बताया जा रहा हो. सांसद धंनजय सिंह के दिल्ली स्थित सरकारी आवास पर काम करने वाली महिला, राखी की मौत कई सारे भ्रम एक साथ तोडती है. इन्टरनेट के इस तिलस्मी समय में जब जाति, रंग और वर्ग के सवाल बीते दिनों की बात कही जाने लगी है. तब ये घटना एक बार फिर सच्चाई नए सिरे से बयां करती है. दासता के बदले हुए स्वरुप और लोकतान्त्रिक सामंतो का विद्रूप चेहरा बेपर्दा करती ये घटना समाज की संवेदना और चेतना से लेकर देश में लोकतंत्र की जीवंतता तक पर कई सवाल खड़ा करती है. दलितों और वंचितों की पार्टी कही जाने वाली बीएसपी से आया एक नेता, जिसका इतिहास अपराधों का इतिहास है और उसकी पत्नी अपने ही घर में काम करने वाली महिला राखी की निर्मम हत्या के आरोप में हिरासत में है. ये विचारधार का विरोधाभास और सामाजिक न्याय की लड़ाई की संकल्पना के साथ चलती हुई पार्टी का पक्षधरता और सरोकार के सवाल पर ध्वस्त होना नहीं तो और क्या है?

गौरतलब है कि राखी के बेटे शहनाज़ को पुलिस ने पूछ-ताछ के लिए बुलाया था जिसके बाद से उसका कोई पता नहीं लग रहा है. कयास लगाये जा रहे हैं कि सांसद ने उसकी हत्या या अपहरण करा दिया है. सांसद ने जिस तरह से पहले सीसीटीवी कैमरे के फूटेज गायब कराये और फिर राखी के बेटे को गायब कराया वो ये साफ़ बयां करता है कि इस सियासी सामंत के मन के कानून को ले कर कितना खौफ़ है. क्या इस देश का कानून केवल गरीब, किसान, मजदूर और मेहनतकश को ही डरा सकता है ? उनकी ही जमीने और रोटी छीन सकता है. पेट के सवालों में उलझे हुए इंसानों को डराने वाला कानून क्या कारण है कि ऐसे सियासी सामंतो के दिल में झुरझुरी तक नहीं पैदा कर पाता ? वो संविधान जो “हम भारत के लोग... से शुरू होता है. सिर्फ भारत के आम लोगों को ही डरा सकता है. सत्ता और सियासत के आगे इसके कुछ और ही मायने हो जाते है. खैर इस पूरे घटनाक्रम से जो चीज़ साफ़ दिखती है वो है  व्यवस्ता में व्याप्त सामंतवाद व उसका सामंती चरित्र. 

ये घटना ये भी दिखाती है कि कैसे घर में काम करने वाले लोगों को इस समाज में पूंजीपति, सामंती और तथाकथित पढ़े लिखे लोग अपना दास और निजी बपौती समझते है. इन मेहनतकश लोगों के लिए सुरक्षा, न्याय और लोकतंत्र जैसे शब्द कोरे लफ्फाजी के अलावा कुछ और नहीं हैं. अभी कुछ दिन पहले दिल्ली के नेता जी नगर में एक एयर होस्टेस ने अपने घर में 12 साल की मेड को कमरे बंद करके आस्ट्रेलिया चली गयी थी. जिसे दो दिन बाद ने पुलिस ने बहार निकला था. ऐसे ही निर्ममता की कई कहानियां है. जो महानगरों की चमकदार गलियों के घुप्प अँधेरे में दम तोड़ देती है या दबी कुचली आवाज़ की तरह न जाने कब उठती है और कब दब जाती है.

एक देश जहाँ एक लाख छिहत्तर हज़ार करोंड़ का घोटाला लोकतंत्र के सिरमौर माननीय सांसद जी लोग करते है. वहीँ उत्तर प्रदेश, बिहार, उत्तर-पूर्व जैसे राज्यों से गरीब लड़कियां-औरते रोटी की तलाश में महानगरों में यौन शोषण से लेकर निर्मम हत्याओं तक का दंश भोगने को अभिशप्त हैं. और हर बार कोई धनजय सिंह, कोई पूंजीपति. कोई सामंत, थोड़ी सी कानूनी नूराकुश्ती और मीडिया उठापटक के बाद मुक्त हो जाता है फिर से वही सबकुछ करने के लिए. और इस सब के बीच हम कुछ सुनहरा है के ख्याल के साथ, आल इज वेल कहते हुए पाए जाते हैं.  


मेरा ये लेख जनसत्ता में 13-nov-2013 को छापा था यहाँ मैं नीचे लिंक दे रहा हूँ आप इसे जनसत्ता की वेबसाईट पर भी पढ़ सकते हैं. 

Monday, July 29, 2013

हमें ये बेखबरी का दौर तोडना होगा. ...

ये सावन का महीना है. बादलों की सरकार और बूंदों की व्यवस्ता चल रही है. हम भीतर से लेकर बाहर तक सावन के रंग में रंग गए हैं और इस समय मन जब तब गा उठता है....सावन का महीना पवन करे शोर..जियरा रे ऐसे नाचे जैसे बन में नाचे मोर...| मैं कल अपनी बाइक पर लौट रहा था. कि तभी बारिश होने लगी, बारिश की रिमझिम में मन यही गीत गाने लगा. सुनील दत्त और नूतन पर फिल्माया ये गीत 1967 में बनी फिल्म “मिलन” का है. ये तो मुझे पता था पर दिल अलग ही सवाल पूछ बैठा, ये गीत लिखा किसने है? फिर क्या था, मन अशांत हो गया. एक ग्लानी का भाव उमड़ उठा, और मैं सोचने लगा की ये गीत जो देश में सावन के प्रतीक गीतों में से एक है और बारिश की एक बूँद भी शरीर पर गिरते ही हर हिन्दुस्तानी दिल इसे गुनगुना उठता है, उसके ही लेखक का नाम नहीं मालूम. ऐसे ही न जाने कितने गीत हैं जो वक्त का बंधन तोड़ कर हमारी जिंदगी, हमारी खुशी, हमारे गम का हिस्सा है पर हम उन नामों को नहीं जानते जिन्होंने हमारी अनकही अमूर्त भावना को गीत के रूप में साकार किया और हमारे कई अव्यक्त भावों को अमर स्वर दिए. जब हम-आप उदास होते है और कुछ नहीं समझ आता तो अकसर “आनंद” फिल्म का गाना “ जिंदगी कैसी है पहेली हाय!...या “सफर” फिल्म का गीत “जिंदगी का सफर है ये कैसा सफर..या फिर ऐसे ही अनगिनत गाने हैं जिनसे हम अपना दर्द बाँट लेते हैं. ये गीत कभी हमारे आंसूं पोछ कर काँधे का सहारा देते हैं तो कभी उदास मन में एक नई उमंग भर देते है. पर अफ़सोस हम उन नामों को नहीं जानते जिन्होंने हमें इतने अनलोम तोहफे दिए.

ऊपर जो मैंने दो गीत बताये हैं उनके बोल पढते ही आपके दिमाग में जो पहली तस्वीर बनेगी वो राजेश खन्ना की होगी क्योंकि ये गीत उनपर ही फिल्माए गए हैं पर आपके दिमाग में “योगेश” और “इंदीवर” का नाम तक नहीं आयेगा. जो इन गीतों के गीतकार है. ये हम दर्शकों की उदासीनता कहें, या फ़िल्मी दुनिया का बेजा दस्तूर. जो हिंदी फिल्मों का गीतकार हमारी जिंदगी में इतनी अहमियत रखने के बावजूद इतना उपेछित है. हम दिन रात जिस गीतकार के लिखे गीत गुनगुनाते रहते हैं उसके नाम तक को नहीं जानते और न जानने की कोशिश ही करते हैं.

 मैं जब किसी को कोई गीत गाते सुनता हूँ और उससे उसके लेखक का नाम पूछता हूँ तो 99.99% लोगों को गीतकार का नाम नहीं मालूम होता. ये एक ऐसा सच है जो कई सारी सच्चाइयों को झुठला देता है. जैसेकि अच्छे गीत ही फिल्म की जान होते है, गाने अच्छे हैं तो फिल्म कभी घाटा नहीं खा सकती या फिर अच्छे गीत फिल्म को अमर बना देते हैं. मैं पूछता हूँ अगर ऐसा है तो इन गीतों को लिखने वाले गीतकारों की हालत इतनी दयनीय और जिंदगी इतनी गुमनाम क्यों है. मुझे ये कहते हुए थोड़ी सी भी झिझक नहीं होती कि भारतीय फिल्म इंडस्ट्री लेखकों और गीतकारों के खून पी कर पनप रही है. ये उनके गुमनाम संघर्ष और शोषण पर टिकी हुई है. और हम, हमारे ग़मों को आवाज़ देने वालों के ग़मों से बेखबर हैं. 

कितने नाम गिनाएं जाएँ, फेहरिस्त बहुत लंबी है गुमनाम शहीदों की, योगेश, इंदीवर, राजेंद्र किशन, भारत व्यास, अनजान, प्रेम धवन, गुलशन बवरा, आरज़ू लखनवी, शैलेन्द्र, ये कल के वो नाम हैं जो हमारे आज में गुनगुनाते है. जो हमारे जिंदगी का हिस्सा हैं. आज के कुछ नाम जो अपना कल दोहरा रहे है और अपने पुरखो की तरह ही गुमनामी में ही गीत लिखे जा रहे है जैसे मिथुन, संदीप नाथ, तुराज़, संजय मासूम, इरशाद कामिल, हिमांशु कुमार, शब्बीर अहमद, निरंजन इयांगर, रजत अरोरा, अमिताभ भट्टाचार्य, जावेद बशीर, कुमार, प्रिया पंचाल,  न जाने कितने युवा गीतकार और लेखक है जो लगातार उन्दा लेखन कर रहे है पर हम उन्हें नहीं जानते. हम हिन्दुस्तानी, पटकथा लेखक और गीतकार के नाम पर जावेद और गुलज़ार से आगे ही नहीं बढ़ पाते. पर अब समय बदल चूका है. एक पूरी की पूरी खेप आ चुकी है जो बहुत ही उन्दा और जिन्दा लिख रही है. जरूरत है तो बस उनके हुनर को उनका हक देने की. उनकी वो पहचान उन्हें देने की जिसके वो हक़दार हैं. 

मैंने जितने नाम ऊपर गिनाये हैं, उन सबके गीत और फ़िल्में तो मैं यहाँ नहीं बता सकता पर इतना जरूर कह सकता हूँ कि इनके लिखे गीत और संवाद, हमारी  जिंदगी का अटूट हिस्सा हैं और उनके बिना शायद हम खुद को पूरी तरह व्यक्त नहीं कर सकते. त्यौहार नहीं मना सकते, हंस नहीं सकते, रो नहीं सकते. 

अब इन दिनों आशिकी 2 का ही मशहूर गीत “सुन रहा है न तू, रो रहा हूँ मैं.... को लें ले, जो संदीप नाथ जैसे युवा गीतकार  ने लिखा है, या "राँझना" जैसी सुपरहिट फिल्म जिसे हिमांशु कुमार ने लिखा है पर ये  हममें से कईयों को नहीं पता होगा . हमें ये बेखबरी का दौर तोड़ना होगा. और मुझे ये उम्मीद है की वो दिन जल्द ही आयेगा.

मेरा ये लेख दैनिक जागरण के (आई नेक्स्ट) में दिनांक 17-10-2013 को प्रकाशित हुआ है. लिंक नीचे है यदि चाहें तो वेबसाइट पर भी पढ़ सकते है.




Saturday, July 13, 2013

जिंदगी ज़ब्त हो गयी शायद...

समंदर पर चल कर आती हुई लहर जैसे किनारे पर सर पटक कर मर जाती है वैसे ही उस दिन मरे थे कई ज़ज्बात, आखरी बार तडपते हुए देखा था उन्होंने मुझे, मानो कुछ भी नहीं कहना चाहते वो मुझसे और मैं खड़ा था वहीँ पर जैसे खड़े रह जाते हैं स्टेशन के किनारे के पेड़, जाती हुई रेलगाड़ी को देखते हुए, सब कुछ ऐसा घटा जैसा उसे घटना चाहिए. आस-पास जो हवा थी अचानक पानी बन गयी थी और एक नाकाम कोशिश जो बहुत पहले गंगा में डूब मरने की,  की थी, कामयाब होने पर अमादा थी. दम घुट रहा था और जहन में एक गाना गूँज रहा था "तड़प तड़प के इस दिल से आह निकलने लगी कि ऐसा क्या गुनाह किया कि लुट गए हम तेरी मोहब्बत में..." मन ही मन हम जल रहे थे पर होंठों पर मुस्कान थी. कितना कठिन होता है, रोते हुए हंसना हमने जान लिया था उसी एक क्षण में. आँखों में शाम उतर आई थी और कड़ी धूप में भी ऐसा लग रहा था कि बारिश हो रही हो. सिविल लाइन की रोड जहाँ थोड़ी सी सावधानी हटने पर मौत पक्की मानी जाती थी. मेरी आँखों में बिलकुल सूनसान दिख रही थी. उस समय मुझे कोई आदमी नहीं कह सकता था. मैं बिलकुल एक कटी पतंग हो गया था. जिसे कोई लूटना वाला भी नहीं था. जिसके हाँथ में मेरी डोर थी उसी ने डोर हाँथ पर से तोड़ दी थी और मारा था एक गुलाबी फ़्लाइंग किस धीरे से, मीठी मुस्कान चिपका कर,  भाई मन तो करा था कि उसकी फ़्लाइंग किस पर एक जोरदार किक चपका दें, पर क्या करें  मरते हुए आदमी में कोई ऐटीट्यूड नहीं होता, वो या तो कराह सकता है या मुस्कुरा सकता है. मैं उस समय कराहना चाहता था पर मुस्काना पड़ा. 

 वो यूं तो मेरे सामने से चली गयी थी पर मुझे वो साइकिल चलाती हुई दिख रही थी और मैं जो पेड़ों की तरह खड़ा था. उसने भी एक रेंजर साईकिल की सवारी कर ली थी. हम छ: साल पीछे चले गए थे. शायद शाम का वक्त था और हम दोनों कोचिंग से पढ़ कर वापस आ रहे थे. मैं उसके पीछे और वो मेरे आगे थी. उसके बराबर चलने की हिम्मत मेरे में नहीं थी. पर वो अक्सर मुझे आगे अपने साथ बुला लेती थी. उसकी आँखों में रेगिस्तान और समंदर दोनों थे और इसीलिए मैं उसकी आँखों में या तो डूबने लगता था या हांफने लगता था. वो अक्सर समझ जाती थी की मैं डूब रहा हूँ या हांफ रहा हूँ और खिलखिला कर हँसने लगती थी. जब वो हँसती थी न!  तो लगता था जैसे मानो मोहल्ले की मंदिर में आरती हो रही हो. बिलकुल पवित्र हंसी थी उसकी. मैं शाहरुख खान की तरह उसका नाम पुकारना चाहता था पर "ओम नम: शिवाय" बोल बैठता था. उसका और मेरा परिवार शिव जी का भक्त था. दोनों ब्राह्मण परिवार थे.

वो निराला चौक से अपने घर के लिए मुड जाती थी और मैं हनुमान जी की मंदिर की ओर मुड जाता था. क्योंकि मैं उसके पीछे ये कह कर आता था की मुझे हनुमान जी के दर्शन करने जाना है. हर दिन विदा होते हुए "आई लव यू" कहने का मन करता था पर "जय श्री राम" कह बैठता था. वो समय, समय जैसा नहीं था, वो कबूतर का पंख था जो थोड़ी सी हवा लगने पर फुदकने लगता था. पकड़ना मुश्किल था उन दिनों मुझे भी और मेरे समय को भी.....अरे भाई  मैं जनता हूँ की मैं सिविल लाइन में खड़ा हूँ और मेरे आस-पास कोई नहीं है. जो थी वो जा चुकी है. मैं छ: साल पीछे कहीं पर उलझा हुआ हूँ. हवा पानी हो चुकी है और रोड से सारी गाडियां गयाब हो गयी है. मैं जो एक पेड़ की तरह खड़ा था वो साइकिल में सफर कर रहा हूँ और वो लड़की जो कार में अभी-अभी चली गयी है. वो साइकिल से घर लौट चुकी है. तुम मुझे वापस बुलाना चाहते हो और सिविल लाइन में फैले हुए बवाल को खतम करना चाहते हो पर मैं एक भँवर में फंस चूका हूँ और फिलहाल वापस नहीं आ पाउँगा.ये मेरी मजबूरी भी है और मेरी इच्छा भी.

         मेरी आँखों में दृश्य बदल रहे हैं और अब मैं हमारे कसबे के सबसे व्यस्त चौराहे से  कोयले की बोरी लिए हुए गुजर रहा हूँ मेरे दिमाग में एक तस्वीर है जो उस लड़की की है जिसे मैं बचपन में प्यार करता था. ये बात और है कि उस समय मुझे प्यार की स्पेलिंग भी नहीं मालूम थी. यही कोई दूसरी या तीसरी कक्षा रही होगी. उस लड़की के बाल मुझे बहुत अच्छे लगते थे और जब मैं उसे याद करता था तो मेरी आँखों में उसके बाल ही दिखाई देते थे. मैं उसे एक कविता समझता था और उसे पढना चाहता था। उसे नए सिरे से रचना चाहता था। शायद इसीलिए मैं बचपन से ही कवी बनना चाहता था, बिना ये जाने हुए की कवी कोई बनता नहीं समय लोगों को कवी बना देता है। वो जब हंसती थी तो ब्रम्हांड के सारे नियम टूट कर बिखर जाते थे और एक आह सी उठती थी. जो प्रकृति स्वयं उसके सौन्दर्य से इर्ष्या करके भर रही होती थी. वो कुल मिला के बहते हुए पानी की धारा थी और मैंने उस पर कुछ लिखना चाह था. शायद लिख भी दिया था पर पढ़ नहीं पाया और पानी आगे बह गया था। बह कर कहाँ गया पता नहीं पर मैं प्यासा हूँ, था और रहूँगा उस पानी के लिए जिसकी सतह पर मैंने समय को कविता बना कर लिख दिया था। मैंने खुद को गढ़ा था उसकी हर एक बूँद में। उस पानी की धार जैसी लड़की का नाम 'स्नेहा' था. वो कहाँ की थी पता नहीं पर रहती मेरे दिल में थी.

 कक्षा तीन तक जिंदगी अपनी रफ़्तार में चल रही थी. सुबह माँ की डाँट उठाती थी और शाम को खेल की थकान सुला देती थी. दिन मनो शुरू होते ही खतम हो जाया करता था. पढाई करना एक औपचारिकता थी जिसे मैं औपचारिक रूप से ही निभा रहा था. रोज मैडम की डाँट-मार मिलती थी और वो भी जिंदगी का हिस्सा हो गयी थी. पर स्नेहा के आने के बाद मैं पढाई को पढाई की तरह करने लगा था. क्योंकि यही एक रास्ता था उसके करीब जाने का, उससे रिश्ता बनाने का. इन सब के बीच दो साल बीत गए और मैं पांचवीं पास करके सरकारी कालेज में अपनी बारहवीं तक की पढाई के लिए चला गया. स्नेहा आठवीं तक वहीँ पढ़ती रही. स्नेहा के पास मेरा जैसे कुछ छूट गया था. मैं नहीं जनता क्या था वो? पर उसे देखने की दिल में उन दिनों एक अजीब सी उलझन रहा करती थी. मैंने तब तक प्यार का नाम भी नहीं सुना था. इसलिए मैं उसे प्यार नहीं कह पाया था. वो क्या है ? या क्या हो रहा है? मैं नहीं जनता था. मैं रोज लंच के बाद कालेज की दिवार फांद कर उसे देखने के लिए भाग आता था. मैं उसका पीछा करते हुए उसके घर तक जाता और उसे तब तक निहारता रहता जब तक वो घर के भीतर नहीं चली जाती.तीन साल तक मेरी यही दिनचर्या रही. फिर आठवीं की छुट्टियाँ हुई और वो जो उन छुट्टियों में कहीं गयी फिर कभी नहीं आई. मैं उसे तलाशता रहा पर कभी नहीं मिल सका.  





Thursday, February 7, 2013

ये समय नारी मुक्ति का इतिहास लिखने का समय हैं....

कश्मीर की वादियों में इन दिनों सबसे बड़े मुफ्ती बशीरुन्दीन अहमद की जहरीली आवाज़ गूंज रही है. आबो-हवा में संगीत, कला, प्रतिभा और सपनों का दम घोट देना वाला फ़तवा तैर रहा है. लड़कियों के एक मात्र बैंड “प्रगाश” को बंद करने के लिए कट्टरपंथियों ने लामबंदी कर ली और हदें तोड़ते हुए उन लड़कियों को सोशल नेटवर्किंग साईट पर बलात्कार तक की धमकी तक दे डाली. डरी-सहमी लड़कियों को अपना बैंड बंद करने और कभी गाना न गाने का फैसला लेना पड़ा.

इस्लामिक संघटन दुश्तकान-ए-मिल्लत ने बैंड में शामिल लड़कियों के परिवार का सामाजिक बहिष्कार कर दिया और इसी के साथ एक बार फिर साबित हो गया कि कोई भी धर्म कभी भी लड़कियों और महिलाओं को बराबर का दर्जा नहीं दे सकता. चाहे वो हिंदु धर्म हो या इस्लाम या फिर दुनिया का कोई और धर्म हो. मुझे दुःख होता है ये देख कर कि जिन प्रतिभाओं को सर आँखों पर बिठाना चाहिए था उन्हें समाज बलात्कार की धमकियाँ दे रहा है. जिनकी आवाज़ सात समंदर पार जा सकती थी वो बंद दरवाजे में गुट रहीं हैं. ये कैसा धर्म है? ये कैसा समाज है? जहाँ लड़कियां खुद ही खुद में कैद कर दी जातीं है. और उनकी आवाज़ तक नहीं निकलने दी जाती. चाहे किसी खाप का सरपंच हो या मंदिर-मस्जिद का पुजारी-मुल्ला सब के सब हांथों में जंजीरें लिए लड़कियों की प्रतिभा, क्षमता, और आजादी को कैद करने को तैयार पाए जाते हैं.  “प्रगाश” का बंद होना एक ऐसी सांकेतिक घटना है जो ये दिखाती है कि समाज में लड़कियों की आज़ादी पर कितने कड़े पहरे हैं और हमारे देश की आधी आबादी, कितने तरह-तरह की जंजीरों में कैद है

कोई लड़की बढ़ कर ये पूछ सकती है कि मेहँदी हसन, गुलाम अली, रहत फ़तेह अली खान, नुसरत फ़तेह अली खान, आतिफ असलम जैसे पुरुष गायकों पर कभी फ़तवा जारी क्यों नहीं किया गया. उनसे कभी क्यों नहीं कहा गया कि संगीत इस्लाम में हराम है. क्यों ?....क्योंकि वो पुरुष थे?
मैं जनता हूँ उस लड़की के सवालों का कोई जवाब न मुफ्ती साहब के पास होगा और न किसी धर्म के पास. जवाब सब जानते है. लड़की को “लड़की” और लड़के को “लड़का” समझने वाला समाज दोनों को बराबरी का दर्जा नहीं दिला सकता.

इस समाज में जिस दिन से कोई लड़की कन्धों पर दुपट्टा लेने लगती है उसी दिन से वो एक वस्तु हो जाती है जो छाती, कमर के नीचे, और टांगों के बीच के हिस्से में बंटी होती है. उस दिन से माँ उसे परियों की कहानियों के बजाय कपडे पहने, अपने अंगों को ढकने, बात करने, चलने, देखने, हँसने, मुस्कुराने के तरीके समझाने लगती है. तो बाप की नज़र, बागबान की नज़र से कोतवाल की नज़र हो जाती है जिसे हमेसा ये लगता है कि उसकी लड़की किसी और का धन है और उसे इसकी हिफाजत करते हुए उन्हें सौंप देना है जिनकी ये अमानत है. तभी तो बात-बात पर उसे जाता दिया जाता है कि बेटी तू पराया धन है, तुझे कहीं और जाना है. उसका भाई जो कल तक हमसाया था, वो अचानक रखवाला बन जाता है और बहन की साँसों और दिल की धडकनों तक पर पहरा देना चाहता है. और इस तरह लड़कियां अपने ही घर में कैद कर दी जातीं हैं.

मुझे याद हैं बचपन के वो दिन जब गर्मियों में लाईट चले जाने पर मोहल्ले भर की लड़कियां गली भर में दौड लगातीं थीं. सावन में झूले डाले जाते थे. लुका-छिपी से ले कर दौड़ा-भागी तक न जाने कितने खेल खेला करते थे हम. पर आज जैसे गली में कोई लड़की ही नहीं है. सब कहते है कि जमाना खराब हो गया है. मैं कहता हूँ, हम खराब हो गए हैं और हमारी सोच खराब हो गयी है. जहाँ हम लड़कियों को इंसान के बजाए खुली तिजोरी, घर की इज्ज़त, पराया धन, खानदान की शान और एक वस्तु समझ बैठे हैं. आज जवान होते ही लड़कियों के  कट्टो,गिलहरी, छम्मक-छल्लो, रानी, बिल्लो, कंटास, कटपीस, माल, शीला, मुन्नी, जैसे न जाने कितने  नाम पड़ जातें हैं और उनके असली नाम गुमनाम हो जाते है. राह पर चलते हुए से ले कर बस में सफर करते हुए तक उन्हें उन्ही नामों से पुकारा जाता है.

ये गज़ब का खतरनाक समय है जो लड़कियों से उनकी कला, प्रतिभा, आज़ादी और पहचान सब कुछ  छीन लेना चाहता है. इस कठीन दौर में जरूरत है कि देश की महिलाशक्ति  एकजुट हो जाये और इसे अपनी मुक्ति के संग्राम की तरह समझे, हर गलत चीज़ का प्रतिकार करे, विरोध करे. तब तक, जब तक उसके पैरों की सारी बेडियाँ कट न जाएँ. ये समय नारी मुक्ति का इतिहास लिखने का समय हैं. 

अनुराग अनंत 


दैनिक जागरण (i-next) में 19-2-2013 को लेख प्रकाशित पढ़ने के लिए लिंक क्लीक http://inextepaper.jagran.com/90805/I-next-allahabad/19.02.13#page/11/1



Wednesday, January 2, 2013

स्वतंत्रता बनाम स्वछंदता


जब सारा देश नए साल का स्वागत जश्न के माहौल से नहीं बल्कि आँखों में आंसू लिए इस संकल्प के साथ कर रहा था कि अब देश की किसी भी लड़की या महिला के साथ बलात्कार जैसी आमानवीय घटनाएं नहीं होने देंगे. उसी समय गुडगाँव के एक समारोह में कला के नाम पर अश्लील कुंठाएं बेचने वाला एक गायक अपने फूहड़ गानों का दरबार सजाये बैठा था. ये वही था जो ‘’मैं हूँ बलात्कारी’’ जैसे क्रूर और अश्लील गाने गाता है और विडम्बना ये कि प्रसिद्धि और लोकप्रियता भी हासिल कर लेता है. दुःख तो तब होता है जब इसके चाहने वालों में लड़कियों की भी भारी संख्या देखी जाती है.

दिल्ली की सड़कों पर जो युवा “ वी वांट जस्टिस” के नारे लगते, पुलिस की लाठी खाते पाए जाते है वही इसके गानों और वाहियात कार्यक्रमों में थिरकते और इसकी एक दरश को तरसते भी मिलते है. हैरानी तब और बढ़ जाती है. जब देश की सरकारें इसे सरकारी कार्यक्रमों में बुलातीं है और मंचों पर मुख्यमंत्री इसके साथ नाचती हुई पायी जातीं है. सच कहता हूँ यकीन नहीं होता कि 21 वीं सदी में क्या यही कला और कलाकार हैं? अगर हाँ तो मुझे लगता है कि कला और कलाकार दोनों की संवेदना मर चुकी है. जब मैं ये सब कुछ सोच रहा हूँ तब मेरे दिमाग में कालीदास से ले कर सफ़दर हाश्मी तक के नाम आ रहे है और मन में वन्देमातरम से सरफरोशी की तमन्ना तक सब कुछ गूँज रहा है.

हिन्दुस्तान के मनोरंजन उद्द्योग, खास तौर पर फिल्मों ने महिलाओं के साथ ज्यादातर अन्याय ही किया है. एक महिला पर बीतने वाली सबसे भयानक ट्रेजडी “बलात्कार” को फिल्मों में सक्सेस कंटेंट और मसाला एलिमेंट की तरह यूज किया जाता रहा है. और लगभग हर फिल्म में महिला को उसकी सोकॉल्ड इज्ज़त लुटने के बाद हासिए  पर धकेल कर फिल्म को इज्ज़त लूटने वाले पुरुष और इज्ज़त बचने वाले पुरुष का संघर्ष मात्र दिखया जाता रहा है. इन फिल्मों और विज्ञापनों ने कहीं न कहीं महिलाओं और उनके शरीर को एक उत्पाद की तरह पेश करने और उसे मुनाफे के लिए प्रयोग करने की कोशिश की है. तभी कहीं पंखे के विज्ञापन में फ्रांक उड़ाती लड़की तो कहीं परफ्यूम के विज्ञापनों में लड़के की ओर पागलों सी भागती, लिपटती, यहाँ तक कि शर्ट फाड़ती लड़कियां दिखाई गयी है. उदाहरणों की  फेहरिस्त बहुत लंबी है.

फ़िल्मी गानों के जरिये भी महिलाओं को चिकनी चमेली बना कर पव्वा पिलाया गया तो कभी शीला और मुन्नी नाम की लाखों लड़कियों की जिंदगी में जहर घोल दिया गया. टिंकू जिया को इश्क का मंजन कराती लड़की से ले कर फेविकोल से सीने में तस्वीर चिपकाने की नसीहत देने वाली तक कोई भी लड़की इस देश की आम लड़की नहीं लगती तो फिर न जाने ये कला और कलाकार कौन सी लड़की की तस्वीर दिखा रहे है जो हमारे समाज के लिए बिलकुल ही “एलियन” है.

मुझे तब बिलकुल आश्चर्य नहीं होता जब दिल्ली बलात्कार कांड के विरोध प्रदर्शन में शामिल एक लड़की अखबार में ये बयान देती है कि हनी सिंह अश्लील गाने गाता है पर उसमे सिर्फ मनोरंजन है और कुछ नहीं...मैं जानता हूँ कि आजकल की पीढ़ी कला के नाम चल रहे “कल्चरल इम्पिरिलिजम” को नहीं समझ पा रही है. तभी तो एक छोटी सी बच्ची गुड़ियों से खेलने की उम्र में हॉट दिखना चाहती है, एक छोटा बच्चा “मैं हूँ बलात्कारी” गाना गाते पाया जाता और बड़े हो कर हनी सिंह जैसा बनना चाहता है. जिस उम्र में हम सिर्फ फ्रेंड बनाया करते थे उस उम्र में ये बच्चे बॉय फ्रेंड और गर्ल फ्रेंड बनाने में लगे है. अब इसे बदलती पीढ़ी का बदलाव कहें या बहकती पीढ़ी का बहकाव.

ये वो समय है जब पूनम पांडे, राखी सावंत और उनके प्रसिद्धि पाने के सस्ते तरीके लड़कियों को लुभाने लगे हैं और वो सत्ता, ताकत, रुतबा और दौलत के लिए फिजा मोहम्मद, भंवरी देवी, मधुमिता शुक्ला और गीतिका शर्मा बन कर अपने दुखद अंजाम अंत तक पहुँच रही है.

आज दामिनी बलात्कार कांड ने पूरे देश को जगा कर रख दिया है इसलिए जरूरी है कि हम हर विषय और हर स्तर पर चर्चा करें और जहाँ से भी हमारी वैल्यू सिस्टम में सेंध लग रही हो उसे ठीक करें. हमें स्वतंत्रता और स्वछंदता में भेद करना होगा.ये जानना होगा कि जिम्मेदार आज़ादी स्वतंत्रता होती है और बहकी हुई आज़ादी स्वछंदता. स्वतंत्रता के नाम पर समाज में गलत मूल्य स्थापित करने वाली हर चीज का प्रोटेस्ट करना होगा चाहे वो कला हो या कलाकार. तभी हम एक ऐसा हिन्दुस्तान बना पाएंगे जो सारे जहाँ से अच्छा होगा.

 तुम्हारा अनंत  



दैनिक जागरण (i-next) में 04-1-2013 को लेख प्रकाशित]  पढ़ने के लिए लिंक क्लीक करें http://inextepaper.jagran.com/79704/I-next-allahabad/04.01.13#page/11/2







Thursday, December 27, 2012

मेरी यादों में साल 2012......


मैं साबरमती के किनारे, डूबते हुए सूरज से लाल होती नदी को देखते हुए, एक उठान पर बैठा हुआ हूँ. साल 2012 इतिहास होने वाला है पर इससे पहले वो एक फिल्म बनकर मेरी आँखों पर से गुजरना चाहता है. मुझे याद आता है कि...

वो साल 2011 की अंतिम रात थी. मैं इलहाबाद के सेंट जोसफ कालेज के बाहर खड़ा हुआ था. भीतर भारत-पाक भाईचारा सम्मलेन चल रहा था. जिसमे भाईचारा जैसा कुछ नहीं था. मैं ऊबकर बहार सड़क के किनारे आ गया था और वहीँ नए साल का इंतज़ार कर रहा था. 5-10 मिनट में साल 2012 आने वाला था. सड़क अमूमन इस वक्त तक सो जाया करती थी पर उस दिन वो मानो उसी वक्त जगी थी. कालेज के बाहर अधनंगे बच्चे ठिठुरते हुए खड़े हुए थे इस यकीन के साथ कि अंदर से जो भी आयेगा उन्हें केक, टाफी, और पैसे देगा. पर उनका यकीन साल के शुरु होते ही टूट गया. जिसकी कोई आवाज़ नहीं हुई. सड़क के एक किनारे से रिक्से वालों की लाइन लगी थी. जिसमे हर उम्र के आदमी थे. वो अपनी सवारी की आस में टकटकी बांधे, खुद में सिकुड़े हुए खड़े थे. मैं इन कांपते हुए बच्चों, ताकते हुए रिक्शेवालों और थिरकते हुए महमानों के अपने-अपने नए सालों की तासीर नापने में लगा था. और सोच रहा था कि नए साल का क्या मतलब है? उन लोगों के लिए जिनके लिए रोटी का सवाल सबसे बड़ा सवाल है.... मैं अभी सोच ही रह था कि मेरी सोच में खलल डालती, फर्राटा भरती हुई, अंग्रेजी और हिंदी की मिलीजुली भाषा में गलियां गाती, यांगिस्तानियों की एक टोली गुजर गयी जिसने लहराते हुए हांथों से सड़क के किनारे खड़े लगभग सभी रिक्शे वालों को एक-एक चपत लगाई थी. और एक बुजुर्ग रिक्शे वाले के रिक्शे पर एक लात जमाई थी. जिससे रिक्शा बुरी तरह टूट गया था. मुझे विश्वास नहीं हुआ था कि ये वही यूथ है जो अन्ना के एक इशारे पर दिल्ली के सड़कों पर सैलाब बन गया था. उस वक्त न जाने क्यों मुझे उस बुजुर्ग की सूरत में अन्ना दिखने लगे थे. मैं घर आया था और एक कविता लिखी थी. जो अब कहाँ है मुझे याद नहीं. उन ताकते, थिठुरते, पिटे हुए लोगों का दर्द मैंने उस कविता के रूप में कहीं गुमा दिया है. मेरे लिए साल 2012  कुछ यूं आया था. एक सच्चाई को आइना दीखता हुआ कि ‘’कदम अभी ठीक से संभले नहीं हैं, हम अभी उतने भी भले नहीं है’’.

साल 2012 को अगर “दिल्ली वाला साल” कहा जाये तो गलत नहीं होगा. वो दिल्ली जहाँ इस साल जनता ने “मैं अन्ना हूँ” से ले कर “मैं हूँ आम आदमी” तक का सफर तय किया. बिजली की तारों को पर कटती-जुड़ती राजनीती और अपने नाम (आम आदमी पार्टी) पर बनती हुई पार्टी देखी.  इस साल दिल्ली का शर्म से झुलसता हुआ चेहरा देखा, जिसमे पूरा देश जल उठा. ये वो वक्त था जब बलात्कार की घटनाओं से आजिज आ कर देश का युवा (वही युवा जो रात के अंधेरों और शराब के नशे में बुजुर्ग-मेहनतकश को चपत भी लगा सकता है) “वी वांट जस्टिस” के नारे लगा रहा था. पुलिस उनपर लाठियां बरसा रही थी और एक बुजुर्ग कांस्टेबिल की मौत पर कूटनीति रची जा रही थी. 

पूरे साल महिला जाति की एक संघर्ष करती हुई तस्वीर आँखों के सामने बनती है. चाहे वो छत्तीसगढ़ के जंगलों में सिस्टम से लड़ती मार खाती “सोनी सोरी” हो, पकिस्तान में तालिबानियों से लोहा लेती “मलाला युसुफजई” हो या फिर दिल्ली की गलियों में गुस्से से तमतमाई लड़कियों की आवाज़ में घुल कर बोलती हुई “दामनी”. हर कहीं संघर्ष करती हुई स्त्री दिखती है, सो कहने को इसे “महिला संघर्ष वर्ष” कहा जाना चाहिए.

इस साल के परदे पर राजेश खन्ना साहब और यश चोपड़ा का जाना भी याद आता है. वो नायक और निर्देशक जिसने पूरे देश को रूमानी होना सिखया था. वो प्यार के कलाकार बेइन्तहां प्यार अपने दमन में बटोर कर वहाँ चले गए जहाँ से कोई नहीं आता. इसके साथ ही ये साल साक्षी रहा है क्रिकेट के भगवान (सचिन तेंदुलकर) के वनडे मैचों संन्यास लेने का भी ,और इसी के साथ 2012 ने  उस इतिहास को अपने पन्नों में  दर्ज किया जो भविष्य में भी कभी इतिहास नहीं हो पायेगा.

साल 2012 दुनिया के अंत होने की अफवाह का भी अंत बन कर बीत रहा है. और ये 12-12-12 की अंतिम गणितीय तारीख का भी इतिहास अपने भीतर ले कर स्वयं इतिहास होने वाल है. पर ये जाते हुए हमें दे जा रह है हमरा नया दोस्त 2013. इस उम्मीद के साथ की हम केक, टाफी की राह देखते बच्चों की आस नहीं टूटने देंगे. गरीबों को और मेहनतकशों को आँखों में आंसू नहीं आने देंगे. अब अपने देश को फिर कभी शर्मिंदा न होने देंगे. और उसे एक ऐसा देश बनायेगे जहाँ किसी लड़की को ये न कहना पड़े कि ”अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो” और देश का हर एक कंठ पूरे गर्व और सम्मान के साथ गा सकेगा “सारे जहाँ से अच्छा हिंदुस्तान हमारा......

अनुराग अनंत
     

Monday, December 24, 2012

मेरे भीतर एक कायर है, उसे मार देना चाहिए


लखनऊ से अहमदाबाद के लिए सीधे ट्रेन नहीं मिल पाई थी, सो ब्रेक जर्नी ही एक रास्ता था. लखनऊ से दिल्ली और दिल्ली से अहमदाबाद जाना तय किया था हमने. हम PHD में एडमिशन के बाद यूनिवर्सिटी ज्वाइन करने जा रहे थे, हम तीन लोग थे पर मैं बिलकुल अकेला ही था. वो दोनों अपने आप में मगन थे और मैं अपने आप में मस्त. ट्रेन के बाहर का नज़ारा भी ट्रेन की ही रफ़्तार से ट्रेन की उलटी दिशा में भाग रहा था. खेत, पेड़, नदी, पहाड़ और आदमी सब को पहिये लग गए थे. मैं उन भागते हुए दृश्यों को अपनी ठहरी हुई आँखों से देखते हुए न जाने कब सो गया मुझे पता ही नहीं चला. दिल्ली आने वाली थी, घडी ने यही कोई साढ़े पांच या छ: बजाये होंगे कि ठंढी हवाओं ने जगा दिया था. लाल किला एक्सप्रेस, लाल किले के पीछे से गुजर रही थी और रेल की पटरियों के किनारे बसी बस्तियों के घरों के भीतर तक हमारी निगाहें घुस चुकी थी. कहने के लिए तो उन झोपडियों में दीवारें थी पर सब कुछ दिख रहा था. उनका सोना, रोना, लड़ना, नहाना, धोना सब कुछ बेपर्दा था. जिंदगी का बेपर्दा होना कैसा होता है. मैंने पहली बार वहीँ महसूस किया था. निजता जैसा कोई शब्द उन झोपडी में रह रहे लोगों ने शायद ही कभी सुना हो. जिंदगी वहाँ शर्म के बंधनों से आजाद थी, या यूं कहें उनकी और हमारी शर्म की परिभाषा में बहुत बड़ा अंतर था. जो हमारे लिए शर्म है उनके लिए क्या हैं मैं नहीं जनता, पर शर्म बिलकुल नहीं है. जिंदगी जीने के ज़ज्बे, जरूरत, या मजबूरी (आप जो भी कहना चाहें) के आगे शर्म बहुत छोटी चीज़ होती है.  मेरे लिए ये बात भी बिलकुल साफ़ हो गयी थी. 

रेल कुछ आगे बढ़ चुकी थी और अब जिस इलाके से गुजार रही थी. वहाँ कूड़े-कचरे का अम्बार लगा था. आँखों में समाई लाल किले की सूरत कचरे में बचपन गुजारते और रोटी तलाशते बच्चों की तस्वीर के आगे फीकी पड़ गयी थी. लाल किले की प्राचीर से चढ कर भाषण देते प्रधानमंत्री को शायद ये बच्चे कभी नहीं दिखे होंगे. नहीं तो उन्हें भी उतनी ही निराशा होती जितनी मुझे हर बार ये महसूस करके होती है कि सन सैतालिस (1947) में जो आज़ादी मिली वो झूठी थी. मैं जब भी ये सोचता हूँ. मुझे देश के वजीर-ए-आला की हर दलील झूठी और विकास का हर आंकड़ा बेमानी जान पड़ता है. मैं पूरे यकीन के साथ कह सकता हूँ कि जब वो लाल किले की प्राचीर से देश को संबोधित कर रहे होते होंगे, डाइस के पीछे उनके पैर, ये सारे झूठे और बेमानी शब्द बोलते हुए कांपते होंगे पर राजधर्म में फंसा हुआ आदमी अधर्म करने को अभिशप्त होता है. यही उसकी नियति होती है.

खैर देश के प्रधानमंत्री के बारे में सोचते सोचते मैं रेल में सवार आगे बढ़ ही रहा था कि तभी मेरी नज़र कचरे के ढेर के बीच करीब 14-15  साल के लड़के-लड़की पर पड़ी. वो प्रोयोगशाला में विज्ञान के प्रयोग करने की उम्र में कचरे के ढेर में शरीर के प्रयोग कर रहे थे. सुबह जब देश में उनकी उम्र के कई बच्चे हाँथ में किताबें थाम कर तेज आवाज़ में वर्ड मीनिंग, पहाड़ा, और गणित के सूत्र रट रहें होंगे, वो जिंदगी की बेजान और बेरंग तस्वीर में एक फीका सा रंग भरने में लगे थे. वो रंग जो अशिक्षा, बेरोजगारी, गरीबी, कुंठा और नशे में रंगीन लगता है, पर है बिलकुल भी नहीं. वहाँ पहली बार लगा कि इनके लिए जीवन महज़ भूख भर बचा है, पर ऐसा कैसे हुआ और किसने किया? सवाल गहराता गया और मैं डूबता गया. जब थोडा निकला तो पाया कि पुरानी दिल्ली स्टेशन आ चुका था.

अहमदाबाद के लिए ट्रेन 8 घंटे बाद थी सो फ्रेश हो कर और कुछ देर आराम करने के बाद दिल्ली घूमने को बाहर निकल पड़ा. अभी सीढ़ी से बाहर की ओर निकल ही रहा था कि देखा पुलिस वाले ने दो अधेड़ों के साथ एक 14-15 साल के बच्चे को किनारे कर रखा था और उनकी माँ बहनों को इज्ज़त दे रहा था. मैं कुछ साफ़ समझ पता कि उसने उस बच्चे की मुट्ठी में बंद पसीने में डूबी, तुड़ी-मुडी 500 नोट छीन ली और डाँट कर भगा दिया. मैंने बढ़कर बच्चे से पुछा तो उसने बताया कि वो अपने पिता के मरने के बाद घर का खर्च चलने के लिए, गांव के कुछ लोगों के साथ दिल्ली मजदूरी करने बिहार से आया है. ये रूपये उसकी माँ ने बचा रखे थे और उसे काम न मिलने तक अपना पेट भरने के लिए दिए थे. जिसे पुलिस वाले ने छीन लिया. ये कहते हुए वो बच्चा (जिसे परिस्थियों ने जवान या यूं कहें की बूढा बना दिया था) बच्चों की तरह रोने लगा. तभी पीछे से वो पुलिस वाला आ गया और उसने उस बच्चे को एक लाठी जमाई और कहा कि “अबे! जाता है कि हवालात ले चलूँ !... वो लड़का सकपका के आंसू पोछते हुए चला गया. मैं अभी कुछ समझ नहीं पाया था कि पुलिस वाले ने मुझसे कहा कि चलो हवालात, मैंने पूछा किस जुर्म में ? उसने कहा कि गंजा अफीम बेचते हो साले! और रंगबाजी दिखाते हो, और हवा में लाठी तान ली ! मुझे डरना नहीं चाहिए था पर मैं डर गया. मेरे दिमाग में संविधान के प्रस्तावना से लेकर लोकतंत्र के परिभाषा तक सकुछ अचानक नाच गया. मैं, हम भारत के लोग,......या जनता द्वरा जनता के लिए जनता की सरकार...जैसा कुछ बोलना चाहता था. पर मैंने सकपकाते हुए कहा कि महोदय मैं पत्रकार हूँ और फिलहाल जनसंचार विषय में शोध कर रहा हूँ. आप मुझे गलत समझ रहे हैं. उस हवलदार को जैसे मेरे पत्रकार होने ने भीतर से रोक दिया हो, पर उसके मुंह से गाली नहीं रोक सका. उसने मेरी माँ और बहन की तारीफ़ की और भाग जाने को कहा. मैंने वहाँ से नहीं जाना चाहता था. और वहीँ पर अब्राहम लिंकन, नेल्सन मंडेला, गाँधी या अन्ना हो जाना चाहता था. मैं संविधान और लोकतंत्र की दुहाई देना चाहता था और खुद के आजाद होने पर दलील देना चाहता था. मैं वहाँ आज़ादी जीना चाहता था पर मैं वहाँ से चुपचाप चला आया. आमआदमी की सीमायें वहाँ मुझसे जीत गयीं और मैं हार गया. मेरी आँखों में मेरा घर परिवार नाचने लगा था, मेरी जिम्मेदारियां कोई मेरे कानों में आवाज़ मार-मार कर मुझे याद दिलाने लगा. मैंने पाया मैं कैद हूँ. और मैं डर गया मैंने महसूस किया कि संविधान से ले कर लोकतंत्र तक की सारी समझ किताबी है और जमीन पर जिंदगी घर-परिवार और जिम्मेदारियों का दूसरा का नाम है. मैंने वहाँ जाना कि एक आमआदमी के लिए हवालात भी एक ऐसा शब्द हो सकता है जिसे सुन कर आत्मा तक काँप उठे. 

उस वक्त मैंने पाया मेरा कुछ हिस्सा वहीँ हवलदार मुंह से निकले हवालात शब्द में कैद हो गया है. मेरा वो हिस्सा  मुझे आज भी आवाज़ दे रहा है और कह रहा है कि मेरे भीतर एक कायर रहता है. मुझे उसे मार देना चाहिए. जब-जब वो आवाजें आती हैं मेरे वजूद का हर एक हिस्सा परेशान हो उठता है. उस वक्त मुझे ये आज़ादी झूठी लगती है और मैं एक कैदी सा महसूस करने लगता हूँ. 

यह लेख मोहल्ला लाईव (http://mohallalive.com) पर प्रकाशित है 
लिंक http://mohallalive.com/2013/12/09/a-travelogue-by-anurag-anant/

तुम्हारा-अनंत

Tuesday, December 11, 2012

डर के आगे जिंदगी है.......


मेरे एक दोस्त ने कहा कि यार 21-12-12 को दुनिया ख़तम हो रही है. कितना डर लगता है न ये सोच कर... मैंने उसकी बात बीच में ही काट कर कहा, यार ये क्यों सोचता है कि हम 21-12-12 को सारे  संसार के साथ मारे जाने वाले लोग हैं. तू ये क्यों नहीं सोचता कि हम वो है जिन्हें अपनी सदी का एक सबसे अहम दिन 12-12-12 देखने का मौका मिला. ये अजूबी तारीख जीने वाले हम बिरलों में सामिल हो गए है ये कहते हुए मेरे चेहरे में हंसी थी और उसके चेहरे में जा जाने कैसा खौफ,  

मैंने अपने उस दोस्त की किसी भी बात को आज तक सीरियस नहीं लिया था पर पहली बार मैंने उसके जाने के बाद उसकी कही हुई बात को गंभीरता से लेने का प्रयास किया और सोचा कि मानों मेरे जीवन का ये आखिरी दिन है, मेरे साथ आप भी सोचिये कि ये जीवन का आखरी दिन है और अब आप भी बताइए कि एक दिन में वो कौन से काम है जो आप करना चाहेंगे,माथे पर पसीना आ रहा है और दिल की धडकन तेज हो गयी है न, मेरा भी यही हाल है, पर डरिए मत एक लंबी सांस खीचिये और कहिये की आप क्या करना चाहेंगे. खुदा या भगवान या जिसे भी आप सबसे ज्यादा मानते हों उसके लिए आप प्लीज ये मत कहिएगा कि मैं वैष्णो माँ का दर्शन करना चाहता हूँ, या फिर रात भर राम नाम भजन करना चाहती हूँ, या फिर गीता,कुरआन, बाइबल, या फिर ऐसा ही कोई सो कॉल्ड पुण्य का काम करना चाहूँगा या चाहूंगी.

आप इस दुनिया  के पार उस ऊपर वाले को मुंह दिखने की फिकर में न डूब जाएँ और स्वर्ग-नर्क के चक्कर में डर कर राम, रहीम, मंदिर मस्जिद न पुकारने लग जाएँ. दिल पर हाँथ रखिये और एक गहरी सांस ले कर ये सोचिये कि ऐसा क्या था जो जीत की दौड़ में दौड़ते हुए हम जिंदगी को नहीं दे पाए, जिंदगी को जिंदगी बनाने की जुगत में जिंदगी को न जाने क्या बना दिया. मैंने अपनी जनता हूँ इसलिए मैं अपनी बात कह रहा हूँ आप अपनी जानते है सो अपनी बात कहिएगा.

मैं सबसे पहले अपने घर जाना चाहूँगा और उस लड़की से अपने दिल की बात कहना चाहूँगा जिसके घर के बहार उसकी एक झलक के इन्तजार में मैंने अपनी जवानी के चार साल गुजारे थे और उससे प्यार के ढाई अक्षर भी कभी नहीं कह पाया था. वजह थी डर, एक डर था कि कहीं उसके प्यार के चक्कर में कैरियर न तबाह हो जाये, दूसरा डर था यार ये इतने अमीर घर की लड़की है कहीं मुझे इनकार कर दिया तो मैं टूट जाऊंगा. तो हाँ से भी डर और न से भी डर,और इस डर में मैं उससे दूर चला आया पर वो मेरे साथ थी मुझमें बाकी थी, दूसरा काम मैं अपनी सारी मार्कशीट जला देना चाहूँगा क्योंकि इन्हें कमाते-कमाते मैंने अपने भीतर के कलाकार,कवि और इंसान को खतम खतम होते देखा था. समाज में कवियों कलाकारों और इंसानों(मानवता के लिए जीने वाले) की जो दशा और समाज में उनके प्रति जो नजरिया था उससे मैं डर गया था और  अपने चारों तरफ मार्कशीट, डिग्रीयों और डिप्लोमा का एक बड़ा सा कवच बना लेना चाहता था जिसके भीतर मेरा इगो सेफ रह सके और मैं अपने घर वालों के सो-कॉल्ड ऑनर को बचा सकूँ.

तीसरा काम, मैं अपने बस्ती वाले दोस्तों रामू, कालू , मुन्ना, गूंजा और उनके जैसों की फ़ौज के साथ फिर से नाच गा कर पैसे मांगने वाला वही खेल खेलना चाहूँगा जिसे खेलते हुए मेरे पिताजी ने मुझे देख लिया था और बहुत मारा था. मैं बच्चे से जवान होने तक जब भी खेलना चाहता था, बस वही खेल मेरे जहन में आता था पर पिता जी और समाज के डर से नहीं खेल पाया. मेरे पिता जी और समाज उन बच्चों को आवारा और खराब कहते थे और मैं भी उनके डर से ऐसा ही कहने लगा था पर आज मैं उस डर के पार जा कर कहना चाहता हूँ कि वो रामू खराब नहीं था जो सड़कों में गाना गा कर पैसे लाता था और शाम को उसके घर का चूल्हा जलता था, वो गूंजा भी खराब नहीं थी जो उस उम्र में लोगों के घर का सारा काम करती थी जिस उम्र में मैं अपने जूते का फीता भी नहीं बाँध पाता था. वो मुन्ना भी खराब नहीं था जिसे पुलिस ने रेल में पानी का पाउच बेचते हुए पकड़ लिया था और इतना मारा था कि वो क्रिमिनल बन गया था. मैं उन सब के साथ जिंदगी के किताब के उन पन्नों को पढ़ना चाहूँगा जिसे उन्होंने अपनी मेहनत और संघर्ष की कलम से लिखा है.

इसके अलावा मैं फेसबुक के अपने उन सारे फ्रेंड को अनफ्रेंड कर बना चाहूँगा. जो वर्चुअल वर्ल्ड के वर्चुअल फ्रेंड है और जिन्हें मैंने जा जाने किस लालच और किस कुंठा के चलते अभी तक अपने साथ जोड़ रखा है.

और अंतिम में मैं कुछ देर ये बैठ कर सोचूंगा कि और वो कौन सा काम था जिसे मैं किसी न किसी डर के वजह से नहीं कर पाया या कर पा रहा रहा हूँ मैं उन सब कामों को करूँगा......और अब आप बताइए कि आप क्या करेंगे.

मैंने ये सब सोचते-सोचते ही एक ऐसी जिंदगी जी ली है जिसे मैं आज तक अपने 23 साल जीवन में किसी न किसी डर की वजह से नहीं जी पाया था, मैंने खुद को भी जान लिया है कि मैं डिग्रीयों और डिप्लोमायों से घिरा हुआ आदमी नहीं हूँ मैं मिटटी की सोंधी सुंगंध में सना और उसका दीवाना व्यक्ति हूँ. आप भी दुनिया खतम होने के डर के बहाने डर के पार जाने की कोशिश करिये सही कहता हूँ आपको वहाँ आपका सच्चा वजूद और आपकी सच्ची जिंदगी मिलेगी. क्योंकि डर के आगे जिंदगी है, डर के और आगे आप.


मेरा ये लेख आई- नेक्स्ट (दैनिक जागरण) में १२-१२-१२ को प्रकाशित हुआ था. लिंक नीचे दिया गया है. 

http://inextepaper.jagran.com/74433/I-next-allahabad/12.12.12#page/11/1

तुम्हारा- अनंत 

Tuesday, November 27, 2012

कसाब को खतम करने से कसाब खतम नहीं होंगे ..


हर साल 26 से 29 नवम्बर तक के दिन कुछ भारी-भारी गुजरते हैं। मुंबई हमले में मारे गए लोगों और देश के लिए लड़ते हुए शहादत को गले लगा लेने वाले जवानों की याद में आँखें नम हो जाती हैं। पर इस साल मंजर कुछ और है। दिवाली गुजरने के लगभग एक हफ्ते बाद 22 तारीख से  देश में दूसरी दिवाली  का माहौल है, मिठाइयाँ बांटी जा रही हैं, लोग खुशियाँ माना रहे हैं, गले मिल रहे हैं, वजह ये हैं कि 21 तारीख को  मुंबई हमले के एक मात्र जिन्दा बचे आतंकवादी कसाब  को पुणे की यरवदा जेल में फांसी पर चढ़ा दिया गया। यरवदा जेल की सूली पर लटकता कसाब का बेजान शरीर करोड़ों हिन्दुस्तानियों के सीने में गड़ी कील निकाल गया पर उसकी मौत से मेरे सीने में एक सवाल आ  कर  धंस गया है। वो ये कि कसब कौन था? आप चाहें तो मुझे गाली दे सकते हैं और मेरे देश प्रेम और सामान्य ज्ञान पर प्रश्न चिन्ह भी खड़ा कर सकते है पर फिर भी मैं बड़ी शिद्दत और संजीदगी के साथ आप हँसते गाते,  पटाखे फोड़ते, मिठाइयाँ बांटते, और खुशियाँ मानते लोगों से पूछना चाहूँगा कि ये कसाब कौन था, पर हाँ भगवान् या अल्ला या फिर जिसे भी आप सबसे  ज्यादा  मानते हों, उसके लिए आप मुझे ये मत बताइएगा  कि कसाब पकिस्तान के पंजाब प्रान्त के फरीदकोट का रहने वाला, नूर इलाही और आमिर का मझला बेटा था जो आतंकवादी संघटन लश्कर-ए-तोयबा के इशारे पर हमारे देश  में कत्ले-आम करने आया था। कसाब  की ये परिभाषा और पहचान तो मुझे भी मालूम है पर मैं कसाब की इस परिभाषा और पहचान के पार के कसाब की बात कर रहा हूं जिसे मैं तलाशता,पाता और महसूस करता हूँ। मैं जानता हूँ आप को कुछ समाज नहीं आ रहा है और आप झुंझला रहे हैं, मुझे भी कुछ समझ नहीं आता और मैं भी झुंझला जाता हूँ जब मैं ये सोचता हूँ कि एक 21 साल का जवान लड़का जिसने अभी ठीक से दुनिया देखी भी नहीं, दुनिया को मिटाते हुए, मिटने को तैयार कैसे हो गया।

वो जिसने मौत का भयानक खेल खेला और फांसी पर चढ़ा वो बेबस नूर इलाही और गरीब बाप आमिर का बेटा, बहन रुकाया का वीर और छोटे भाई मुनीर का जिम्मेदार बड़ा भाई नहीं हो सकता, वो पकिस्तान के लाहौर में ईंट ढोता, मजदूरी करता, घर चलता कसाब नहीं हो सकता।  ये वो नवजवान नहीं था जो अपने छोटे भाई को खूब पढना चाहता था, अपने माँ बाप को हज करना चाहता था।

एक जिम्मेदार और काबिल बेटे की तरह वो दुनिया की हर ख़ुशी अपने घर वालों को देना चाहता था पर वो अशिक्षा और बेरोजगारी की मार में पिसता गया और सपनों, उपेक्षाओं, आकाँक्षाओं, कुंठाओं और अवसाद में दबता गया। वो बहुत मेहनत करने के बाद दो वक़्त की रोटी भी घर वालों को शान से नहीं दे पा रहा था। दुनिया उसे जालिमों का अड्डा लगने लगी थी। इस बीच कौम और इस्लाम के नाम पर नफरत और मौत की राजनीत करने वाले संघटनों ने उसे ये समझाया की उसकी और उस जैसे सारे गरीबी झेलते मुसलमाओं की दुर्दशा की वजह हमारा देश भारत है, उसे हमसे लड़ाई करनी चाहिए ये लड़ाई नेकी की लड़ाई है और इसी को जिहाद कहते है। चौथी तक पढ़ा कसाब इसे सच मान बैठा और अपने घर वालों को उसके बाद पैसे देने और देखने की शर्त पर मरने-मारने के लिए तैयार हो गया। और फिर उसके  बाद उसका जो अंजाम हुआ आप सब जानते हो।

अगर आप ये सोच रहें हैं कि  कसाब से मुझे कोई सहानभूति है तो आप गलत सोच रहें हैं। उसका जो अंजाम हुआ वो होना ही था। मेरा सवाल ये है की क्या कसाब महज़ एक आतंकवादी था।  जिसे फांसी पर चढा कर मार दिया गया। या फिर कसाब कुछ और भी था। यकीनन कसाब कुछ और भी था जिसे हमने मिठाइयों की मिठास, पटाखों की आवाज, और खुशी के माहौल में भुला दिया। कसाब अशिक्षा, गरीबी और बेरोजगारी की मार से भटकी हुई जवानी का प्रतीक था। वो गैर बराबरी और शोषण की इस व्यवस्ता का उत्पाद था। जो कुंठा, हताशा अवसाद और अंधे जूनून की चपेट में आ कर एक ऐसी अंधी सुरंग में चला गया था जहाँ रौशनी के नाम पर बारूद की चिंगारी है, आवाज़ के नाम पर दगती हुई गोलियां हैं। और जिंदगी के नाम पर कुछ है तो मौत,

मैं कसाब की मौत वाली रात चैन से सो नहीं पाया। रात भर उसका चेहरा मेरे नज़रों के सामने नाचता रहा और उसके चेहरे में मुझे चाय की दुकानों में काम करते छोटू, ईंट-बालू ढोते कल्लू, गैराज में काम करते राजू, कारखानों और ऐसी ही कई जगह ज़िन्दगी के सबसे डरावने चहरे का सामना करते करोड़ों बच्चे और नवजवान दिखे जो खून-पसीना एक करने के बाद भी अपने घर वालों को दो वक़्त की रोटी भी नहीं दे पा रहे हैं। और भटक कर लाहौर के मेहनतकश कसाब से मुंबई का आतंकी कसाब बन जा रहे हैं। नक्सलवादी, माओवादी, गली-मोहल्ले में मारपीट करते, चोरी-डकैती करते, अपराध करते, इन भटके हुए नवजवानों में मुझे कसाब दीखता है। कसाब को ख़तम करने से कसाब ख़तम नहीं होंगे, कसाब बनाने वाले  इस सिस्टम को ख़तम करना होगा जहाँ मेहनत से दो वक्त की रोटी भी नहीं मिल पाती है और भटक कर हथियार उठा लेने पर सरकारें करोड़ों खर्च कर देती है।
  
तुम्हारा--अनंत