Saturday, June 28, 2014

ये समय एक वैश्या है !!

समय एक वैश्या है और हम लोग, जो इस समय में जी रहे हैं. वो सब भी वैश्या ही हैं. क्यों गाली लगा न ? कितनी बड़ी बात कह दी मैंने और सोचा भी नहीं. यकीन मानो बहुत सोचा, इस सोचने में यह भी सोचा कि सोचते-सोचते ही तो निराला, मुक्तिबोध, धूमिल, गोरख और रूसो पागल हो गए थे. जिन्हें भद्र लोग अपनी भद्र भाषा में विक्षिप्त कहते थे, कहते हैं. 

मैंने सोचने-सोचने में ही सोचा कि कह देता हूँ मैं भी, जो मन में आया है, कहाँ सोचते हैं वो लोग कुछ भी कहने से पहले. जिन्होंने इस वैश्या समय को गढा है. जो इस वैश्या समय की फैक्ट्री से वैश्या इंसानों को उत्पाद की तरह पैदा कर रहे हैं. वो कहते हैं दिन को रात और हम मान लेते हैं. उधर वो हमारी रात को भी वो रात नहीं कहते. जब वो करोणों लोगों के दर्द पर मुट्ठी भर लोगों का विकास लिखते हैं. तब हम पेट के पहाड के तले दबे हुए अपनी रोजी रोटी को निहारते रहते हैं. वो हमें हँसने को कहते हैं तो हम हंस देते हैं. रोने की इजाजत नहीं देते है वो लोग. वैश्यायें दिल बहलाने की चीज होतीं है. उन्हें सिर्फ हँसने-हंसाने और दिल बहलाने की इजाजत है. अपना दर्द कहने और दूसरों का दर्द सुनने की न उन्हें इजाजत है, न समय. 

वैश्या शब्द तुम्हारे लिए एक गाली होगी. हमारे लिए ये समय की एक कैद है, एक अवस्था है. एक अवस्था जहाँ हम हारे हुए, डरे हुए, कैद हैं. जहाँ जीवन एक पहाड है और मजबूरी अस्तित्व का दूसरा नाम. हर कदम जहाँ परतंत्र है और समर्पण जीवन की पहली और अंतिम शर्त. 

भाषा ने अपने हथियार डाल दिए हैं और वो हाँथ खड़े करके बेशामों की तरह उनके खेमे में खड़ी हो गयी है. व्याकरण ने अपने ही नियमों में उलझ कर दम तोड़ दिया है. जीवन अब बेशर्म भाषा और मुर्दा व्याकरण से परिभाषित नहीं किया जा सकता. इसीलिए हमने भाषा और व्याकरण के हांसिये पर फेंके गए शब्दों, नियमों और परिभाषाओं को बटोरना शुरू कर दिया है. हम इन्ही शब्दों, नियमों और परिभाषाओँ में अपने जीवन के स्वर तलाश रहे हैं. उसके अर्थ ढूंढ रहे हैं. तुमने जिन्हें अश्लील कह दिया है. वही हमें हमारी परिभषा लगती है. और तुम जो लाल किले की छत से कहते हो, देश की उन्नति के गीत गाते हो. आदर में सर झुकाते हो, गले मिलते हो, हाँथ जोड़ते हो. ये सब हमें बेहद अश्लील लगता है. आत्मा तक छील देने वाली अश्लीलता भरी है इसमें.

नौकरी है, रोजी है, रोटी, घर है, गाडी है, टीवी है, सुकून है, शोर से भरा हुआ. बीवी है, बच्चे हैं और बहुत सारा डर. ये व्यवस्था जब तब आत्मा तक को नंगा कर देती है. बलत्कृत देह नहीं आत्मा होती है. हर बार जब भी कुछ सही और गलत में टटोलने लगते हैं. सच जानते हैं पर झूठ बोलते हैं और हमारा बलात्कार हो जाता है. हम जानते हैं कि पुलिस ने गोली क्यों चलाई अपनी जमीन के लिए लड़ते हुए किसानों पर, हम जानते हैं कि लाल गलियारे में युद्ध जनता नहीं सत्ता लड़ रही है. हम जानते हैं कि ये पुलिस किसकी है, ये अदालतें, ये अफसर किसके हैं. पर हम बोलते कुछ नहीं . हम राष्ट्रगान गाते हैं और खुद को देशभक्त समझते हुए. एकटक देखते रहते हैं. रोजी रोटी के चाँद को. सुख को आराम को. हमारी कोई अपनी इच्छा नहीं है. क्योंकि वैश्याओं की अपनी कोई इच्छा नहीं होती. हम व्यवस्था के इशारे पर मुजरा कर रहे हैं. बेचे जा रहे हैं. नोचे जा रहे हैं. हम बेशर्म भाषा और मुर्दा व्याकरण के सहारे खड़े हैं. हमने अपने बचाओ में गढे हैं बेहद अश्लील, गोल मटोल तर्क. और उसी को सटा देते हैं जब हमारी आत्मा हमपर चढाई करती है. पेट और आत्मा की लड़ाई में पेट जीत जाता है और आत्मा बलत्कृत होने को अभिशप्त होती है. 

हम प्रोफ़ेसर, डाक्टर, कलेक्टर, इंजीनियर, पत्रकार, सत्ताधीश और न जाने क्या क्या बनने के फिराक में न जाने कब और कैसे वैश्या बन जाते हैं. हमें पता भी नहीं चलता. हम व्यवस्था के हांथों हजारों बार बेइज्जत होते हैं. शोषित होते हैं. लूटे जाते हैं. पीटे जाते हैं. बलत्कृत होते हैं. पर लगातार व्यवस्था के दरबार में नाचते रहते हैं. मन बहलाते रहते हैं सरकार बहादुर का. क्योंकि हम रोजी, रोटी, संरक्षण, सुरक्षा और संयम के मारे हुए लोग हैं. हम वैसे ही जीने के आदि होते जा रहे हैं जैसे  जिया ही नहीं जा सकता. सो हम मरते हुए जी रहे हैं और जीते हुए मर रहे हैं.

हम मीडिल क्लास इस वैश्या समय के गुलाम हो गए हैं और ये गुलामी हमें लगातार वैश्या बनाती चली जा रही है. पर कभी कभी आशा जगती है कि ये वेश्याएं जागेंगी. अपना हक मागेंगीं. दूसरों के हक का हिसाब लेंगीं. आजादी और समानता के सिद्धांत को जीवन का दूसरा नाम घोषित किया जायेगा. और इस लड़ाई में ये वैस्यायें भी शामिल होंगी. मुक्ति यज्ञ में अपना डर, अपनी कैद, अपनी फिकर, अपनी रोजी रोटी सब आहूत कर के. जनता की मुक्ति के लिए. जनता की सत्ता के लिए. लड़ाई में ये सब साथ आयेंगीं. भाषा की बेशर्मी को दूर किया जाएगा. व्याकरण फिर से जिन्दा होगी और मानवता अश्लीलता को खतम कर देगी. यही सोचता हूँ मैं, जब सोचने बैठता हूँ. एक समय आएगा जब हम इस वैश्या समय को खत्म कर देंगे और इस समय की कैद में जितनी वैस्यायें हैं. सब को आजाद करा दिया जायेगा. इंसान होंगे सब एक दूसरे के लिए जीते, इंसान. अपना सुख दुःख बांटते इंसान. आजादी और समानता को जीवन के उद्देश्य की तरह जीते इंसान. 

तुम्हारा-अनंत         



       
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